Thursday, 26 February 2026

460 बाबा की क्लास (कुछ भ्रान्तियॉ- भाग 2)

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460  बाबा की क्लास (कुछ भ्रान्तियॉ- भाग 2)

नन्दु- अनेक विशेषज्ञों का यह कहना कितना सार्थक है कि आध्यात्मिक साधना के लिये ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है?

बाबा- जो लोग ब्रह्मचर्य पालन करने के भय से साधना नहीं करते, उन्हें समझना चाहिये कि मन को वाह्य जड़ात्मक चिंतन से आन्तरिक सूक्ष्म चिंतन की ओर ले जाने का प्रयास करना ही ब्रह्मचर्य का पालन करना है। प्रकृति के प्रभाव से ही मन जड़ता की ओर जाता है और उसके प्रभाव को कम करने से वह सूक्ष्मता की ओर जाता है। मुक्ति का अर्थ है प्रकृति के प्रभाव को कम करके जड़ता से सूक्ष्मता की ओर जाना। ब्रह्म स्वभाव से सूक्ष्म हैं अतः यदि मन जड़ता की ओर होगा तो वह ब्रह्म को नहीं पा सकता इसलिये मन को सॉंसारिक जड़ पदार्थो से दूर करने का उपाय है ‘‘ ब्रह्म का चिंतन करना‘‘ जो प्रकृति का मन पर प्रभाव कम करते हुए ही किया जा सकता है क्योंकि प्रकृति ही उसे चारों ओर के जड़ पदार्थों की ओर खींचती रहती है। इसलिये ब्रह्मचर्य वह कार्य है जो प्रकृति के प्रभावों से मन को ब्रह्म की ओर ले जाने का प्रयत्न करे और ब्रह्मचारी वह है जो हमेशा ब्रह्म चिंतन में डूॅबा रहे। यह कार्य साधना का अभ्यास करने पर ही संभव है। साधारणरतः वीर्य संरक्षण को ही ब्रह्मचर्य माना जाता है पर वास्तव में अष्ट पाश और षडरिपु मन को बाहरी ओर के संसार में ही बॉंधते हैं, इन चौदह में से ‘काम‘  केवल एक है अतः जब तक यह सभी चौदह नियंत्रण में नहीं आते केवल ‘काम‘ को नियंत्रित करने मात्र से ब्रह्मचर्य का पालन करना नहीं कहला सकता। अविद्यामाया जो इन चौदह प्रकारों से मन को इतना जकड़े रहती है उससे तब तक नहीं छूटा जा सकता जबतक साधना न की जावे। इस साधना के सहारे धीरे धीरे मन अविद्या के प्रभाव से दूर होता जाता है और वही ब्रह्मचारी कहलाता है जो अविद्या के प्रभाव से मुक्त हो गया। जो साधना का अभ्यास किये बिना ही ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हैं वे केवल समय को ही नष्ट करते हैं। इसलिये ब्रह्मचर्य पालन करने के लिये पारिवारिक जीवन को त्यागने की आवश्यकता नहीं हैं। साधना का बल प्रकृति के बल से अधिक होता है अतः इसकी सहायता से कोई भी ब्रह्मचारी हो सकता है, वीर्य का रक्षण कर सकता है और बुद्धि को तीक्ष्ण बना सकता है।

रवि- बाबा! आपने अनेक बार षडरिपुओं और अष्टपाशों का संदर्भ दिया है, वे क्या हैं?

बाबा- मनुष्य का जीवन आठ प्रकार के बंधनों और छः प्रकार के शत्रुओं से घिरा रहता है ।  काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, और मात्सर्य ये षडरिपु और भय, लज्जा, घृणा, शंका, कुल, शील, मान और जुगुप्सा ये अष्ट पाश है। षड रिपु का अर्थ है छै शत्रु, इन्हें शत्रु इसलिये कहा जाता है क्योंकि ये इकाई चेतना को सूक्ष्मता की ओर जाने से रोककर स्थूलता में अवशोषित करने का कार्य करते हैं। इकाई चेतना का उच्चतम स्तर सूक्ष्म है अतः उस ओर जाने से रोकने वाला शत्रु हुआ। अष्ट पाश का अर्थ है आठ बंधन, बंधनों में बंधा हुआ कोई भी व्यक्ति अपनी गति खो देता है। स्रष्टि में हम देखते हैं कि मानव की गति स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है परंतु अष्ट पाश जैसे लज्जा घृणा और भय आदि स्थूलता से जकड़े रहने के कारण सूक्ष्मता की ओर जाने से रोके रहते हैं।

राजू- लेकिन कुछ लोग तो यह सलाह देते हैं कि साधना करना, भजन पूजन करना तो बुढ़ापे के काम हैं छोटी अवस्था से इनमें लगना बेकार है?

बाबा- कुछ लोग मानते हैं कि बुढ़ापे के लिये ही भजन कीर्तन ठीक हैं, इसलिये युवावस्था में इससे दूर ही रहते हैं पर वे यह नहीं जानते कि उनके जीवन में बुढ़ापा आयेगा भी या नहीं यह निश्चत नहीं है। बृद्धावस्था में जब शरीर कमजोर हो जाता है, नजरें कमजोर हो जातीं हैं, बीमारियॉं घेरे रहती हैं, स्मरणशक्ति कमजोर पड़ जाती है, कर्मों का फल भोगते हुए मन कुछ भी नया करने का साहस नहीं करता, ऐसी दशा में ईश्वर को केवल इसलिये पुकारना कि कष्ट से मुक्ति मिले कितना उचित है? इतना ही नहीं, जब इन झंझटों के कारण मन स्थिर नहीं हो पायेगा तो भगवान को पुकारने का कोई मूल्य नहीं । इस अवस्था में शरीर की कमजोरियों और पूर्वकाल की यादों के चिंतन में ही मन को फुरसत नहीं मिल पाती फिर ईश्वर का चिंतन कहॉं संभव होगा। यही कारण है कि बुढ़ापे में साधना का अभ्यास कर पाना संभव ही नहीं हो पाता यदि प्रारंभ से ही उस ओर मन को लगाने का अभ्यास न किया जाये। बांस के पेड़ को उसकी युवावस्था में इच्छानुसार मोड़ना सरल होता है, बहुत पुराना हो जाने पर मोड़ने से वह टूट जाता है, यही हाल साधना का होता है प्रारंभ से ही अभ्यास करना सफलता देता है बुढ़ापे में नहीं।

रवि- यह सुख और दुख क्या हैं?

बाबा- सॉंसारिक भोगों को पाकर मन बड़ा प्रसन्न होता है और न पाने पर दुखी । पर, जब मन उन्हें चाहे ही नही ंतो उनके पाने या न पाने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इच्छा होने पर भी जब वह प्राप्त न हो तो और अधिक दुख होता है और मन को विचलित करता है। जैसे शराबी को यदि शराब न मिले तो उसे अपार कष्ट अनुभव होगा पर गैरशराबी पर इसके मिलने या न मिलने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । साधना करने की प्रणाली का अभ्यास सक्षम गुरु के द्वारा इस प्रकार कराया जाता है कि वह अतीन्द्रिय रूप से मन को जड़ पदार्थों की ओर जाने से रोक देता है और भौतिक पदार्थों की चाह समाप्त हो जाती है। कुछ लोग सोचते हैं कि साधना करने पर भौतिक आनन्द और सुख सुविधाएं छिन जायेंगी उनका यह विचार अविवेकपूर्ण है और वे जो इन सुख सुविधाओं को जीवन का आवश्यक अंग मानते हैं वे भी गलती करते हैं।

क्रमशः... ..


Wednesday, 25 February 2026

459 - बाबा की क्लास (कुछ भ्रान्तियॉ- भाग 1)

 459 - बाबा की क्लास (कुछ भ्रान्तियॉ- भाग 1)

रवि- बाबा! कुछ लोगों का मानना है कि अमुक संत के पास सिद्धि है और वे किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं, कष्ट दूर कर सकते हैं, घटनायें टाल सकते हैं? यह कैसे होता है?

बाबा- यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया बराबर और विपरीत दिशा में होती है बशर्ते टाइम, स्पेस और पर्सन में परिवर्तन न हो । इस नियम  के माध्यम से प्रकृति का उद्देश्य यह  शिक्षा देना होता है कि बुरे कार्यों से दूर रहना चाहिये। पर कुछ लोग साधना से प्राप्त बल के द्वारा इसे दूर करने का प्रयास करने में इस विधिमान्य नियम को भूल जाते हैं और समझते हैं कि वे कल्याण कर रहे हैं। कर्मफल तो कर्म करने वाले को भोगना ही पड़ेगा, चाहे कितना बड़ा भक्त क्यों न हो वह इसे नहीं रोक सकता यदि वह ऐंसा करता है तो वह भोले भाले लोगों को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं माना जायेगा। यह हो सकता है कि कर्मफल का दंड भोगने का समय कुछ आगे टल जाये पर वह भोगना ही पड़ेगा चाहे उसे फिर से जन्म क्यों न लेना पड़े, क्योंकि हो सकता है कि दंड भोग के समय, व्यक्ति के मन में साधना कर मुक्ति की जिज्ञासा जाग जाये परंतु साधना सिद्धि प्राप्त व्यक्ति अपने बल से उसका कष्ट दूर करने का प्रयास करे तो यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध होने के कारण वह कल्याणकारी नहीं माना जायेगा वरन् वह दंड का भागीदार माना जायेगा।  इसलिये पराशक्तियों का उपयोग करना ईशनिंदा ही माना जायेगा क्योंकि यह प्रकृति के नियमों को चुनौती देकर उन्हें उदासीन करना ही कहलायेगा। पराशक्तियों के उपयोग से पानी पर चल सकते हैं, आग में चल सकते हैं, असाध्य बीमारियों को दूर कर सकते हैं, चमत्कार दिखा सकते हैं पर यह प्रकृति के स्थापित संवैधानिक नियमों की अवहेलना होगी और उस पराशक्ति के उपयोगकर्ता को कर्मफल भोगना ही पड़ेगा।


नन्दू- एक दिन राजू के पिता कह रहे थे कि उनके गुरुजी बहुत उच्च स्तर के हैं और वह जिस पर कृपा कर दें तो उसे मुक्ति मोक्ष तत्काल मिल जाता है, उसे कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं होती?

बाबा- कुछ लोग यह भ्रान्त धारणा पाल लेते हैं कि उनके गुरु तो पहॅुंचे हुए हैं, उनकी कृपा से वे मुक्त हो जायेंगे उन्हें साधना की क्या आवश्यकता? पर वे गलती करते हैं क्योंकि मुक्ति बिना प्रयास के नहीं मिल सकती। गुरु की कृपा के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती परंतु यह बात भी सही है कि गुरुकृपा पाने की योग्यता भी तो होना चाहिये केवल तभी कृपा मिल सकती है। गुरु कृपा पाने के लिये ही शिष्य को , विश्वास और भक्तिभाव से साधना करने के लिये गुरु सतत निर्देश देते हैं।


इंदु- परंतु बाबा! भक्त गण हमेशा दुखी ही देखे जाते हैं ,शायद इसीलिये लोग आध्यात्म से दूर ही रहना चाहते हैं?

बाबा- आध्यात्मिक साधना करने वाले भक्त अपने कर्मफलों को भोगने के लिये पुनः जन्म नहीं लेना चाहते अतः वे इसी जन्म में मुक्त होने की उत्कंठा से शेष बचे सभी संस्कारों के प्रभावों को शीघ्र ही इसी जन्म में भोग लेना चाहते हैं अतः यदि उन्हें साधना करने में समस्यायें/कष्ट आते हैं तो इसे शुभ संकेत माना जाना चाहिये क्यों कि यह उनके कर्मफल का भोग तेजी से ही हो रहा होता है।


चंदू- तो क्या साधना करने और अविद्या माया के जंजाल से बचने के लिये जंगल में जाना आवश्यक है? क्योंकि यहॉं तो सॉंसारिक लोग, कष्ट पा रहे साधकों पर व्यंग करते हुए हॅंसते ही है?

बाबा- अविद्या माया का अर्थ है अष्टपाश और षडरिपुओं का समाहार, अतः अविद्यामाया से दूर भाग कर उससे बचा नहीं जा सकता। उससे बचने के लिये मन को सूक्ष्मता की ओर प्रत्यावर्तित करना पड़ता है। जैसे, किसी घाव के ऊपर मंडराने वाली मक्खियों को दूर भगाना ही पर्याप्त समाधान नहीं है घाव को भरने का भी प्रयत्न करना होगा। महान गुरु के द्वारा सिखाई गयी साधना की विधि घाव भरने वाली मरहम है इसी की सहायता से कोई भी अविद्या को दूर भगाकर मुक्त हो सकता है। अविद्यामाया के हटने पर साधना के समय आने वाले सभी व्यवधान समाप्त हो जाते हैं। चूंकि यही एकमात्र विधि है जो अविद्या को दूर करती है अतः घर में रहते हुए सरलता से की जा सकती हैं, भले अविद्या प्रारंभ में कुछ व्यवधान करे पर एक बार हार जाने के बाद वह आध्यात्म साघना में रुकावट नहीं डालती। घर में रहकर साधना करने में, उनकी तुलना में अधिक सुविधा होती है जो घर छोड़कर जंगल में जाकर अभ्यास करते हैं। सत्य की पहचान कर लेने पर लोगों की हॅंसी या व्यंग करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।


रवि- बाबा! कुछ लोग किसी स्थान विशेष जैसे तीर्थ आदि, में जाकर साधना करने की सलाह देते हैं यह कितना उचित है?

बाबा- यह भेदभाव करना कि किसी स्थान विशेष पर साधना करने में सुविधा होती है या कोई स्थान साधना के लिये खराब है यह उचित नहीं है यह तो ब्रह्म को भागों में बॉंटना हुआ। सभी कुछ तो ब्रह्म की ही रचना है अतः किसी को अच्छा या बुरा कहना ब्रह्म को ही अच्छा या बुरा कहना हुआ, इसप्रकार तो स्रष्टि की शेष रचनाओं के साथ एकत्व रख पाना कठिन होगा। ब्रह्म के लिये सभी स्थान एक से ही हैं अतः ब्रह्म साधना कहीं भी की जा सकती है। संसार को छोड़कर साधना के लिये जंगल या अन्य स्थान को जाना अतार्किक है और संसार के छूट जाने के भय से साधना न करना अविवेकपूर्ण है । 

शेष अगली क्लास में....



Thursday, 12 February 2026

बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 15)

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बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 15)


राजू- लेकिन जीवधारी तो असंख्य हैं मनुष्यों की सख्या भी धरती पर कम नहीं है, धरती के अलावा अन्य ग्रहोंपर भी जीवन सम्भव है तो फिर परमपुरुष को सभी से व्यक्तिगत रूपसे जुड़कर आनन्द पाना किस प्रकार सम्भव होता है?

बाबा-  परमपुरुष ओतयोग और प्रोतयोग से सबसे जुड़े रहते हैं। ओतयोग का अर्थ है व्यक्तिशः जुड़ना और प्रोतयोग का अर्थ है सामूहिक रूपसे जुड़ना। बृजगोपाल ओतयोग से और पार्थसारथी प्रोतयोग से सब से जुड़े रहे। समाजिक चेतना को भीतर तक हिला देने के लिये छः घटकों की आवश्यकता होती है, आध्यात्मिक आदर्श, सामाजिक द्रष्टिकोण, सामाजिक आर्थिक सिद्धान्त, साहित्य और निर्देशक। कृष्ण ने अपने समय में उच्चस्तरीय सामाजिक चेतना जाग्रत की और बताया कि सभी के मिलजुल कर रहने से ही सामाजिक प्रगति हो सकती है पृथक पृथक रहकर नहीं। इसीलिये उन्होंने सामान्य जीवन को स्वाभाविक रूपसे उन्नत किये जाने पर बल दिया और जो भी इसके मार्ग में बाधक बना उसे समाप्त कर दिया। इस प्रकार कृष्ण की सामाजिक चेतना से कुछ लोगों के आनन्द में बाधा भले ही पहुंॅची हो पर इससे नन्दन विज्ञान का क्षेत्र और विस्त्रित हो गया।


इन्दु- परन्तु पार्थसारथी से तो केवल राजा लोग ही मिल पाते थे ?

बाबा- सत्य है, पर पार्थसारथी के निकट आकर लोग अपने मन की तरंग लम्बाई में बृद्धि का अनुभव करते थे। वे उनका स्मरण और चिन्तन करने पर भी अपनी तरंग लम्बाई में बृद्धि होने से आनन्द का अनुभव करते थे जो सामाजिक चेतना के जाग्रत होने पर ही सम्भव था। पार्थसारथी के अनन्त सद्गुणों के चिन्तन में लोग उन्हीं में खो जाते थे, परमपुरुष का इस प्रकार चिन्तन करते उन्हीं में खो जाना रहस्यवाद कहलाता है। इस प्रकार सभी लोग उनसे अपना व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाये थे और केवल उन्हीं के सम्बन्ध में सोचना और उन्हीं का नाम सुनना चाहते थे जो प्रकट करता है कि वे नन्दन विज्ञान के स्वयं जन्मदाता थे अतः नन्दन विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में उनका परीक्षण कौन कर सकता है ? 

रवि- कुछ लोग मोहनविज्ञान की चर्चा करते पाए जाते हैं और कहते हैं कि कृष्ण तो सबको मोह लेते थे, यह क्या नन्दन विज्ञान से अलग है ?

बाबा- नन्दन विज्ञान में आनन्द का आदान प्रदान होता है, पर मोहन विज्ञान इससे भिन्न है। निःसन्देह मानवता ने इसके थोड़े से पक्ष को अनुभव किया है पर यह विज्ञान विशिष्ठ रूप से परमपुरुष से संबंधित है कृष्ण से सम्बंधित है। यहॉं कृष्ण से तात्पर्य दोनों बृज और पार्थसारथी कृष्ण से है। मोहन विज्ञान में ये दोनों एकसाथ मिल जाते हैं। मोहन विज्ञान में परमपुरुष, मनुष्यों को तन्मात्राओं या एक्टोप्लाज्मिक आकर्षण से अपने निकट खींचते हैं अथवा अन्य लोग उनके अनवरुद्ध आकर्षण से खिंचे चले जाते हैं। कृष्ण अपने आन्तरिक प्रेम से लोगों को अपने निकट खींचते हैं, मन में वे लोग सोचते हैं कि नहीं जाऊँगा, नहीं जाऊँगा पर फिर भी आकर्षण इतना अधिक होता है कि न चाहते हुए भी उनकी ओर चले जाते हैं यह है मोहन विज्ञान। नन्दन विज्ञान और मोहन विज्ञान में यही अन्तर है। यहॉं कृष्ण ही परमसत्ता होते हैं अन्य कोई नहीं और वे भक्तों को अपने व्यक्तिगत सम्बंधों से आकर्षित करते हैं। संसार से जुड़े होने के कारण तन्मात्राओं से परिचित लोगों को इन्हीं से परमपुरुष आकर्षित करते हैं पर ये तन्मात्रायें भौतिक संसार से सम्बंधित होती हैं मानसिक संसार से संबंधित नहीं होती हैं। परमपुरुष का जब गहराई से चिन्तन किया जाता है तो भक्त एक्टोप्लाजिमक सैलों से निकलने वाली गन्ध तन्मात्राओं को भौतिक संसार की तरह ही अनुभव करता है। इसी प्रकार रुप, रस, स्पर्श और शब्द तन्मात्राओं के बारे में भी घटित होता है। एक्टोप्लाज्मिक संसार में कृष्ण कहते हैं आओ, आना ही पड़ेगा ,तुम आने के लिये रोक नहीं सकते। पास आ जाने पर उनके सुन्दर रूपको देखकर ऑंखें चौंधिया जाती हैं तथा भक्त का प्रत्येक अंग अपने भीतर कृष्णमय ही अनुभव करता है और फिर उनसे पृथक नहीं रह सकता। इस प्रकार परमपुरुष तन्मात्राओं के माध्यम से सबको अपने अधिक निकट ले आते हैं, मोहन विज्ञान का यही सार तत्व है।

चन्दू- यह बृन्दावन क्या है?

बाबा- भक्तगण भौतिक बृन्दावन में नहीं वरन् भाव के बृन्दावन में यात्रा करते हैं। कृष्ण ने कहा भी है कि आघ्यात्मिक बृन्दावन छोड़कर वे एक कदम भी कहीं नहीं जाते। इस प्रकार भक्त के हृदय के बृन्दावन में बृजगोपाल और पार्थसारथी दोनों मिलकर एक हो जाते हैं और परमपुरुष का लीलानन्द पक्ष, नित्यानन्द पक्ष में बदल जाता है। इसलिये उत्तम यह है कि मोहन तत्व के आभास होते ही बिना देर किये उनकी शरण में आ जाना चाहिये।


Tuesday, 10 February 2026

457 बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 14)

  मित्रो ! स्वास्थ्य कारणों से ‘बाबा की क्लास’ गत माह में प्रकाशित नहीं हकर सका  इसका  दुख है परन्तु अब भगवान कृष्ण के संबंध में बचे हुए भाग को आप क्रमशः देख सकेंगे और समाप्त होने के बाद अन्य टापिक चर्चा के लिए रखे जाऐंगे।

           बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 14)


रवि- भक्ति के सम्बन्ध में आपने अनेक प्रकार से समझाया है परन्तु मुझे अभी तक यह समझ में नहीं आ पाया है कि आखिर भक्ति करने से किस को आनन्द मिलता है खुद को या परमपुरुष को?

बाबा- ध्यान से सुनो। नन्दन का अर्थ है आनन्द देना और लेना। गोप का अर्थ है केवल आनन्द देना। परमपुरुष को आनन्द देना और उसी समय उनसे आनन्द प्राप्त करना ‘रगानुगा‘ भक्ति कहलाता है इसमें भक्त की भावना यह रहती है कि मैं परम पुरुष को इसलिये प्रेम करता हॅूं जिससे उन्हें आनन्द प्राप्त हो चॅूंकि मेरे इस कार्य से परमपुरुष को आनन्द मिलता है यह जानकार मुझे भी आनन्द मिलता है। सर्वोच्च स्तर की भक्ति ‘रागात्मिका‘ भक्ति कहलाती है जिसमें भक्त की यह भावना रहती है कि मैं परमपुरुष को प्रेम करता रहॅूंगा क्योंकि मैं उन्हें आनन्द देना चाहता हॅूं चाहे मुझे आनन्द मिले या न मिले, इसके लिये मैं कोई भी कठिनाई या कष्ट उठाने को तैयार हॅूं। गोप, गोपियों की भक्ति उत्तम स्तर की थी, ‘रागात्मिका’ थी।


नन्दू- तो क्या नन्दन विज्ञान का कोई महत्व नहीं है?

बाबा- नन्दन विज्ञान की उत्तमता यह है कि इसमें भक्त परमपुरुष की अनेक अभिव्यक्तियों का आनन्द पाता है।  भक्त की भावना यह होती है कि परमपुरुष मेरी व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं, उनके समान कोई नहीं , मैं उन्हें चाहता हॅूं, मैं प्रत्येक वह कार्य करना चाहता हॅूं जिसमें उन्हें आनन्द मिले, इस तरह नन्दन विज्ञान में दोनां प्रकार की भक्तियॉं एक साथ मिल जाती हैं क्योंकि भक्त सबमें परम पुरुष का ही प्रसार देखने लगता है चाहे वह पर्वत, नदियॉं, पेड़, जानवर या कोई भी जीव क्यों न हो। वह कहता है हे परमपुरुष ! मैं तुम्हें अनेक प्रकार से अनगिनत रूपों में युगों युगों में चाहता रहा हॅूं प्रेम करता रहा हॅूं तुम ‘‘अख्ंॉडचिदैकरस‘‘ अर्थात् सतत आनन्दरस प्रवाह  हो, मैं तुममें अपनी पूर्णता को ढूॅड़ रहा हॅूं। 


इन्दु- लेकिन परमपुरुष तो अलौकिक हैं, उन्हें प्रसन्नता देना क्या सम्भव है? 

बाबा- भले ही जीव, परमपुरुष को उनकी अलौकिकता में न पाये पर उनकी हलकी सी झलक ही उसे  आनन्द से उछाल देती है। संसार की कोई भी वस्तु से निकलने वाले स्पंदन हमारे मन पर सहानुभूतिक कंपन करते हैं तो हमें लगता है कि ये तो हमारे अपने हैं और हम आनन्दित हो उठते हैं। वे जो संसार के पदार्थों को केवल मनोरंजन का साधन मानते हैं वे कभी परमपुरुष के वास्तविक प्रेम को अपने जीवन में कभी नहीं जान पाते। 


चन्दू- नन्दन विज्ञान में बृजगोपाल की स्थिति क्या है?

बाबा-  बृजगोपाल सब को आकर्षित करते हैं, वे प्रेमस्वरूप है ,जो भी थोड़ा सा आगे बढ़कर उन्हें देख लेता है वह उन्हें पाने की इच्छा करता है और उनके साथ प्रेम स्थापित कर लेता है इतना कि उनके बिना नहीं रह सकता। लोग कहते हैं, देखो जिसे तुम चाहते हो वह तो माखन चोर है, अरे वह तो हृदयहीन है वह अपने चाहनेवालों को छोड़कर नदी के उस पर मथुरा चला जाता है, पर भक्तों पर उनकी बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता वरन् उत्तर में वे कहते हैं कि बस, एक बार हमने उसे चाहा है तो अब हम आजीवन चाहते ही रहेंगे। परमपुरुष की चाह अपरिवर्तनीय होती है। वेद कहते हैं कि यह पंचतत्वात्मक जगत आनन्द  से उत्पन्न हुआ है, आनन्द में ही प्रतिष्ठित है और अंत में आनन्द में ही मिल जायेगा। यही आनन्द परमपुरुष से प्रेम करने वाले अनुभव करते हैं। भले ही लोग एक सौ वर्ष की उम्र आने पर कहने लगे कि वे मरना चाहते हैं पर आन्तरिक हृदय से वे नहीं मरना चाहते क्यों कि वे  अपने चारों ओर प्यारी प्यारी संग्रहीत वस्तुओं से अलग नहीं होना चाहते। परमपुरुष सबके अन्तिम आश्रय हैं, उनके अलावा जीवों को कहीं आनन्द नहीं मिल सकता। बृजगोपाल कृष्ण आनन्द के सागर हैं। अतः नन्दन विज्ञान के द्रष्टिकोण से वह एकमेवाद्वितीयम हैं। जब कोई व्यक्ति साधना करता है तो वह तन्मात्राओं के द्वारा परम पुरुष का आनन्द पाता है। ये तन्मात्रायें ष्शब्द, स्पर्श, रूप, रस  और गंध हैं। प्रारंभिक अवस्था में वह सुगंध की अनुभूति करता है चाहे वह ज्ञात फूलों की हो या अज्ञात। यह संसार परमपुरुष की रसमय कल्पना है, वे रसिक हैं और आनन्दरस की तरंगों से सभी को अपनी रासलीला में सहभागी बनाते हैं। चाहे लोग चाहें या न चाहें उन्हें इस रासलीला में उनके साथ नाचना ही पड़ता है।


रवि- तो क्या परमपुरुष को केवल गन्ध तन्मात्रा के ही द्वारा अनुभव किया जा सकता है? 

बाबा- नहीं, यह संसार परमपुरुष के अनन्त रूपों का सीमित परावर्तन है वे सर्वद्योत्नात्मक हैं अर्थात् सभी का रूप सौंदर्य उन्हीं के प्रकाश से चमकता है अतः रूप तन्मात्रा के द्वारा वे ही सब में आभास देते हैं। वे ही लुका छिपी का खेल खेलते हैं। भक्त कहते हैं कि उनके रूप को देखने का खूब प्रयास किया पर वे इतने सुदर हैं कि मेरी ऑंखें चौंधिया गयीं और मैंने पहचान ही नहीं पाया। बृजगोपाल अपार कोमलता के श्रोत हैं, स्पर्श तन्मात्रा के द्वारा भक्तों ने उन्हें अनुभव किया और पाया कि संसार की सब कोमलता और कृपा उनसे ही अभिव्यक्त होते हैं, उनकी मृदुलता और कोमलता और अद्रश्य मधुरता अमाप्य है। इसी प्रकार शब्द तन्मात्रा के माध्यम से वे अपनी वॉंसुरी से ओंकार ध्वनि प्रसारित करते हैं जो कि ब्रह्मॉंड की उत्पत्ति के समय से अविराम जारी है इसे भक्तगण प्रणव कहते हैं। यह वह ध्वनि है जिसकी सहायता से इकाई सत्ता उस परमपुरुष से संपर्क स्थापित करती है। जिसने यह समझ लिया उसकी सभी इच्छायें पूरी हो जाती हैं परंतु उसे सच्चा भक्त होना चाहिये, क्यों कि परम पुरुष प्राकाम्य सिद्धि के अधिष्ठाता हैं। यह हो सकता है कि प्रारंभ में भक्त उन्हें न पहचान पायें क्यों कि उनकी अनन्त आनन्द तरंगे कभी इस रूप में तो कभी उस रूप में अनुभव होती हैं पर भक्त कहता है कि यदि उन्हें यह अच्छा लगता है तो वह उनके मार्ग में अवरोध क्यों करे। वास्तव में भक्त ने जिस भी तन्मात्रा के आधार पर उन्हें अनुभव करना चाहा है उसी से वह अनुभव करता है, हमारे बृजगोपाल कभी गंध कभी रस कभी रूप कभी स्पर्श कभी शब्द तन्मात्राओं के आधार पर अपना आनन्द बरसाते हुए भक्तों को आनन्दित करते रहते हैं । 


चन्दू- पार्थसारथी तो अन्याय और अपराध के विरुद्ध लगातार युद्ध करते रहे हैं फिर नन्दन विज्ञान की द्रष्टि में वे क्या थे ?

बाबा- यह विचार करने से पहले नन्दनविज्ञान के मनोविज्ञान को जानना होगा। मानव मन किसी दिशा में उसके संस्कारों के अनुसार  क्रियाशील रहता है। जब बाहर से आने वाले स्पंदनों की तरंग लंबाई उसके स्वयं के मन के स्पंदनों की तरंग लंबाई को बढ़ाकर अपने अनुकूल करने लगते हैं तो व्यक्ति को सुख प्राप्त होता है। पर यदि ये बाहरी स्पंदन उसके मन के स्पन्दनों की तरंग लंबाई को घटाने लगते हैं तो उसे दुख होता है। अनुकूलवेदनीयम सुखम् प्रतिकूलवेदनीयम दुखम्। नन्दन विज्ञान में दुख का कोई स्थान नहीं है, जब आने वाले स्पंदनों की तरंगों की वकृता में कमी आने लगती है आनन्द प्राप्त होता है जब तरंगों की वकृता में बृद्धि होने लगती है तो दुख प्राप्त होता है। जब यह वकृता बिलकुल शून्य हो जाती है अर्थात् तरंग सीधी रेखा की तरह हो जाती है तो आनन्दम् की अवस्था आ जाती है यह परानन्दन विज्ञान के अंतर्गत आता है। पार्थसारथी दुष्टों और अपराधियों के विरुद्ध लड़ते रहे जिससे जन सामान्य को राहत मिली और उन्हें आनन्द मिला और वे अपने जीवन को स्वाभाविक रूप से जी सके। अतः जिस प्रकार बृजगोपाल ने शब्द स्पर्श रूप रस और गंध के माघ्यम से आनन्द बॉंटा उसी प्रकार पार्थसारथी ने भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया और सुख बॉंटा। दोनों के कार्यों के प्रकार अलग थे पर उद्देश्य एक सा था। पार्थसारथी को नन्दन विज्ञान का निर्माता माना जाना चाहिये क्योंकि नन्दन विज्ञान की आवश्यक विषयवस्तु समग्र रूपसे पार्थसारथी के कार्यों और जीवन में पायी जाती है। बृजगोपाल ने जो कार्य कोमलता और मृदुलता से किया पार्थसासरथी ने अपनी समग्र ब्रह्मॉंड की भाभुकता के साथ किया। इस प्रकार बृजगोपाल और पार्थसारथी का नन्दन विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में समान महत्व है। 


Sunday, 21 December 2025

456 बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 13)

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बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 13)


रवि- चाहे शिव हो या कृष्ण सभी ने ‘भक्ति‘ को ही सर्वश्रेष्ठ कहा है यह केवल दार्शनिक आधार पर ही कहा जाता है या इसका कोई मनोवैज्ञानिक आधार है?

बाबा- ‘भक्ति‘ को मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दोनों आधारों पर अनेक प्रकार से समझाया जा सकता है। जब हम किसी व्यक्ति में आश्चर्यजनक रूपसे किन्हीं सद्गुणों जैसे ज्ञान, स्मृति , साहस, आदि की बहुलता देखते हैं तो हम उसके प्रति आदर भाव विकसित कर लेते हैं क्योंकि हमारे गुण उस सत्ता के अपार गुणों में निलम्बित हो जाते हैं। मन का इस प्रकार का द्रष्टिकोण भक्ति कहलाता है। 


इन्दु- परन्तु सभी लोग तो किसी न किसी की पूजा करने को ही भक्ति कहते हैं, क्या यह गलत है?

बाबा- प्राचीन समय में यदि किसी में कोई महानता दिखाई देती थी चाहे वह जड़ात्मक हो या सूक्ष्म या कारण, वे उसे देवता कहकर पूजा करना प्रारम्भ कर देते थे। अब यदि मनुष्य बहुत से महान लोगों की पूजा करेगा तो मन भी बहुत ओर जाकर भ्रमित होगा। वास्तव में उसकी पूजा करना चाहिये जो सभी बड़ों में सबसे बड़ा हो। जो पूज्यों के द्वारा भी पूज्यनीय कहे जाते हैं वह हैं परमपुरुष, अतः परमपुरुष की ही ओर सम्पूर्ण मन को केन्द्रित करना चाहिये, उन्हें ही पूजना चाहिये।


राजू- तो क्या पार्थसारथी कृष्ण को भक्तिभाव से पूजना सार्थक नहीं होगा?

बाबा- चलो पार्थसारथी का इसी परिप्रेक्ष्य में परीक्षण करें। उन्हें सबके रहस्यों के बारे में ज्ञात है। वे केवल यही नहीं लाखों वर्ष पहले और बाद में क्या हुआ और होगा सब जानते हैं। अतः इस द्रष्टिकोण से वे सब ओर से पूजनीय होने की योग्यता रखते हैं। उनमें जीवन्तता और मानवीयता भी बहुत ही उच्चस्तर की थी और वे हमेशा पॉंडवों को इस ओर प्रोत्साहित करते थे। उनका ज्ञान, बुद्धि और स्मरण शक्ति की विशालता उन्हें अतुलनीय सद्गुणों से विभूषित करती है अतः उन्हें ‘एकमेवाद्वितीयम्‘ कहा गया है। जब किसी में दिव्यता के गुण दिखाई देते है तो लोग उसे ईश्वर कहते हैं ये ईश्वरकोटि के लोग भी परमपुरुष को महेश्वर कहते हैं। पार्थसारथी भी सबके लिये महेश्वर ही हैं, यह उनकी ऐश्वर्यता प्रकट करने वाली अष्ट सिद्धियों से सिद्ध होता है। उनके पास अनिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ती, ईशित्व, वशित्व, प्राकाम्य और अन्तर्यामित्व ये सभी आठों  एश्वर्य असीम स्तर पर थे यही कारण है कि सभी उनके समक्ष अपना सिर झुकाते हैं और भक्तिभाव से पूजते हैं। अतः भक्तितत्व के परिप्रेक्ष्य में पार्थसारथी का वही परीक्षण कर सकता है जिसमें यह आठों एश्वर्य उनकी तुलना में अधिक परिमाण में हों। यह कार्य कोई मनुष्य नहीं कर सकता।


चन्दू- परिप्रश्न यह है कि क्या पार्थासारथी भगवान थे? और यदि हॉं तो उनका स्तर क्या है? 

बाबा- पहले यह समझ लो कि भगवान का क्या अर्थ है। आध्यामिक रूप से इसके दो अर्थ है, पहला है आध्यत्मिक प्रकाश और दूसरा है छह गुणों का समाहार। ‘भग‘ के पहले अक्षर ‘भ‘ का अर्थ है ‘‘भेति भास्यते लोकान,’’ अर्थात् जिसके ज्ञान, जीवन्तता और महानता के प्रकाश से सभी लोक प्रकाशित होते हैं। अत्यधिक उच्च स्तरीय मानवीय सद्गुणों का ध्वन्यात्मिक उद्गम है ‘भ‘। और ‘ग‘ का अर्थ है, ‘‘इत्यागच्छत्यजस्रम् गच्छति यस्मिन आगच्छति यस्मात्।’’ अर्थात् वह सत्ता जिसमें सभी जीव वापस लौट जाते हैं और जिससे सभी का उद््रगम भी होता है। दूसरे प्रकार से भग का अर्थ है छः गुणों का समाहार, ‘‘एश्वर्यम् च समग्रं च वीर्यं च यशासह श्रियः, ज्ञानवैराग्ययोश्च च षन्नाम भग इति उक्तम्।‘‘ एश्वर्य का अर्थ है ऊपर बतायी गयीं आठ सिद्धियॉं, वीर्य का अर्थ है जिसकी उपस्थिति से शत्रु कॉंपने लगें, जो सब पर प्रशासन कर सके। यशासह का अर्थ है यश और अपयश दोनों। श्री का अर्थ है सभी भौतिक उपलब्धियों के साथ शक्ति का प्रचुर सामंजस्य। ज्ञान का अर्थ है आघ्यात्मिक ज्ञान, परा और अपरा ज्ञान। वैराग्य का अर्थ है राग रहित होना, किसी भी भौतिक आकर्षण में लिप्त न होना। इस प्रकार जिस किसी में भी यह छः गुण हैं वह भगवान कहला सकता है पर पार्थसारथी पूर्ण भगवान थे । महाभारत के अनेक उद्धरणों में से इस संबंध में जयद्रथ बध के समय सूर्य अस्त कर फिर प्रकट करना,  पूर्ण भगवान ही कर सकते हैं। उनके शरीर का प्रत्येक भाग अतुलनीय था। वे अंशावतार या खंडावतार नहीं वे पूर्णवतार थे, भगवान ही नहीं साक्षात् भगवान थे । वही कह सकते हैं कि ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम शरणम् बृज अहम त्वॉंम् सर्व पापेभ्यो माक्षिस्यामी मा शुचः,‘  अर्थात् अपने द्वितीयक सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आजाओ मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत करो। कोई और दूसरा न कह सकता है और न कहेगा। इस तरह पार्थसारथी साक्षात् भगवान थे उनकी तुलना उन्हीं से की जा सकती है अन्य किसी से नहीं। 

क्रमशः ...

Saturday, 20 December 2025

455 बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 12)

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455  बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 12)


राजू- बाबा! कभी आप बृजकृष्ण कहते हैं कभी बृजगोपाल, इनमें अन्तर है या केवल अलग अलग नाम ?

बाबा- दोनों एक ही हैं। जब आनन्द के साथ आगे की ओर गति की जाती है तो उसे बृज कहते हैं। अनेक प्रकार की तन्मात्राओं के द्वारा हमें बाह्य भौतिक जगत का ज्ञान होता है और इन तन्मात्राओं का नियंत्रण मन के द्वारा होता है। परंतु एक और नियंत्रक होता है जो मन के पीछे छिपा होता है वह दिखाई नहीं देता ठीक कठपुतली के प्रदर्शनकर्ता की तरह। यही कारण है कि लोग कहते हैं वाह! कितना अच्छा वक्ता है, गायक है, नर्तक है पर यह नहीं जानते कि वास्तव में यह सब कराने वाला कौन है।़ पूरी महत्ता, प्रदर्शन करने वाले को ही प्राप्त होती है। सभी प्रकार की सूचनायें प्राप्त करने के लिये हम ज्ञानेन्द्रियों की सहायता लेते हैं, संस्कृत में गो का अर्थ है इिंद्रयॉं और वह सत्ता जो इनका संरक्षण और संवर्धन करता है वह गोपाल। अतः आनन्द पूर्वक लोगों को आगे ले जाने और अनुभूतियॉं कराने का कार्य करने वाला कहलायेगा बृजगोपाल। बृजगोपाल सभी को अपनी ओर आकर्षित करते, हंसाते, रुलाते, मन में जिज्ञासा जगाते, संदेह निर्मित करते, मन में अनेक रसों का प्रसार करते, हर बार नये नये रसों और प्रकारों से आनन्दित करते सब को आगे बढ़ते जाने का मार्गदर्शन करते हैं क्यों कि विश्व अनन्त रसों का सागर है। इस प्रकार वे जीवन के सार तत्व परम आनन्द की अनुभूति कराते हैं क्योंकि इसके अलावा जीवन में कुछ नहीं है। 


रवि - तो क्या बृजगोपाल की तुलना किसी अन्य सत्ता से की जा सकती है?

बाबा- लोगों ने प्रयास किया कि बृजगोपाल की तुलना करने के लिये कौन उचित होगा पर जीवों के प्रति उनका प्रेम, भाव, और अन्तर्ज्ञान, दूरदर्शिता और ज्ञान की गहराई देखकर कोई भी उनके समतुल्य नहीं मिल पाया अतः उन्होंने कहा तुला वा उपमा कृष्णस्य नास्ति। उनकी तुलना उन्हीं से की जा सकती है अन्य किसी से नहीं । 


चन्दू- बृजगोपाल और भक्ति का क्या सम्बन्ध है?

बाबा- ब्रह्मॉंड की प्रत्येक वस्तु एक दूसरे को आकर्षित करती है ग्रहों को तारे तारों को गेलेक्सी और गेलेक्सियों को ब्रह्मॉंड का केन्द्र और इन सब को परमपुरुष। जब कोई यह सोचता है कि परमपुरुष उसे आकर्षित कर रहे हैं और वह भी परमपुरुष को आकर्षित करता है तो मनोविज्ञान के क्षेत्र में इसे भक्ति कहा जाता है। इस तरह कोई छोटा हो या बड़ा, वे परस्पर और इस महान के आकर्षण से मुक्त नहीं है। यह समझ कर परम पुरुष की ओर बढ़ते जाना भक्ति है। बृजगोपाल क्या करते हैं, वह सब को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और सबको अपने प्रेम और मधुरता के भावों में प्रसन्नता से आगे बढ़ते जाने को प्रोत्साहित करते हैं। अतः बृजगोपाल के अलावा अन्य कोई सत्ता भक्ति की इस उच्च स्थिति को प्राप्त कराने में सक्षम नहीं है।


नन्दू- परिप्रश्न किसे कहते हैं ? 

बाबा- वह जिसका उत्तर पा जाने पर लोग प्रोत्साहित होकर उसी प्रकार कार्य करने लगते हैं और तदानुसार परिणाम भी प्राप्त होने लगता है। अर्थात् हर प्रभाव का कारण खोजते खोजते मूल कारण प्राप्त कर लेना। सबसे पहले जब मनुष्यों ने सोचा कि जगत का मूल कारण क्या है तो जो उत्तर मिला वह आद्या शक्ति कहलाता है। आध्यात्मिक साधकों ने कहा है कि ‘‘यच्छेदवॉंग्मनसी प्रज्ञस्तदयच्छेद्ज्ञानात्मनि। ज्ञानात्मनि महतो नियच्छेद तदयच्छेच्छान्तात्मनि।'' अर्थात् साधना के द्वारा इंद्रियों को चित्त में अर्थात् जड़ मन में समाहित करे, इस प्रकार इंद्रियों के चित्त में समाहृत हो जाने पर आप अपनी और अन्यों की इंद्रियों को स्तंभित कर सकते हो अर्थात् उनकी गतिविधियों पर अपने मन से नियंत्रण कर सकते हो। इसके बाद अपने चित्त की क्षमता को अहमतत्व अर्थात् ‘मैं करता हॅूं‘ इस भावना में संयोजित कर दो, जो कि ‘मैं हॅू‘‘ भावना अर्थात् महत्तत्व से जुड़ा है। इस प्रकार वे अन्तर्ज्ञान के क्ष्ेत्र में प्रवेश पा लेंगे और उन्हें बिना किसी औपचारिकता के सभी ज्ञान प्राप्त हो जायेगा। अब ‘मैं हॅूं‘  भावना को परम पुरुष में समर्पित कर दो इससे परम शान्ति प्राप्त होगी। इस प्रकार साधना की प्रगति की दशाओं पर प्रकाश डाला गया है जो कि वास्तव में परमपुरुष के संबंध में परिप्रश्न कहलाता है। 


रवि- तो परिप्रश्न के परिप्रेक्ष्य में बृजगोपाल का क्या स्तर है?

बाबा- बृजगोपाल क्या करते हैं? वे सभी को बिना भेदभाव के अपनी ओर आकर्षित करते हैं और भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक सभी स्तरों पर प्रगति का रास्ता दिखलाते हैं। इतना ही नहीं जो उनकी आलोचना करते हैं वे भी उनको अपना अंतरंग ही मानते हैं। इस तरह परिप्रश्न के संदर्भ में बृजगोपाल विश्व के केन्द्र हैं, मानव हृदय और संवेदनों के सार हैं, वे जीवों के अंतिम आश्रय हैं। इससे स्पष्ट होता है कि प्रारंभ में अद्वैत , बाद में द्वैत और अंत में अद्वैत की स्थिति बनती है जो ‘‘एकोहमवहुस्याम‘‘ के द्वारा अभिव्यक्त की गई है। जिसका अर्थ है मैं एक था फिर अनेक हो गया और फिर एक ही रहॅूंगा। यथार्थतः बृजगोपाल का हृदय सबका आश्रय है।

क्रमशः...

Thursday, 18 December 2025

454 बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 11)

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 बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 11)


रवि-कुछ विद्वान द्वैताद्वैतवाद की चर्चा करते हैं यह क्या है?

बाबा-  द्वैताद्वैत का अर्थ है प्रारंभ में द्वैत पर अंत में अद्वैत। अर्थात् पहले जीव अपने को परम पुरुष से पृथक मानते हैं पर बाद में साधना करके वे उनके अधिक निकट आ जाते हैं और फिर उन से मिलकर एक हो जाते हैं। अब प्रश्न है कि यह मिलकर एक हो जाना कैसा है? शक्कर और रेत जैसा या शक्कर और पानी जैसा?  यह भी जानना महत्वपूर्ण है कि जीव आखिर आते कहॉं से हैं? जीवों का अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता। यह जगत भी सापेक्षिक सत्य है। पर द्वैताद्वैतवादी इस संबंध में बिलकुल मौन हैं कि जीव आते कहॉं से हैं, पर यह कहते हैं कि अंत में वे परमपुरुष में मिल जाते हैं। सभी जीव जानते हैं कि उनके पास एक जैविक बल है, उनकी अपेक्षायें और आशायें हैं, सुख दुख हैं, भावनायें और भाभुकतायें हैं। इन सबको भुलाकर छोड़ा नहीं जा सकता। ये सब बोझ भी नहीं हैं बल्कि आनन्ददायी जीवन का आनन्द हैं। अतः स्पष्ट है कि द्वैताद्वैतवाद में मानवता का मूल्य नहीं समझा गया। वह अनन्त सत्ता जिसका प्रवाह सतत रूप से विस्तारित हो रहा है उसका अन्त भी आनन्द स्वरूप अनन्त में ही होगा अतः जीव और शिव का मिलन शक्कर और रेत की तरह नहीं वरन् शक्कर और पानी की तरह ही संभव है । अपनी उन्नत बुद्धि और निस्वार्थ सेवा के बल से साधना और सत्कर्म करते हुए वे साधारण से असाधारण व्यक्तित्व को प्राप्त कर सकते हैं।


इन्दु - तो क्या बृजगोपाल का व्यक्तित्व द्वैताद्वैवाद के अनुकूल माना जा सकता है?

बाबा- वे पैदा ही जेल में हुए, उस रात में भयंकर जलवृष्टि और विजली की बज्र चमक हो रही थी जिसका मतलब ही था कि कंस की भ्रष्ट नीतियों को नष्ट करने के लिये दूरदर्शी विधान। जेल के प्रहरी के द्वारा ही दरवाजे के ताले खोले जाना , गोकुल के सभी व्यक्तियों का गहरी नींद में सो जाना, यह सब नवजात कृष्ण को सुरक्षित बचाने का दैवीय विधान था। बृजगोपाल के जीवन की छोटी छोटी घटनायें जैसे पूतना का मारा जाना, बकासुर और अघासुर कर मारा जाना किस प्रकार संभव हुआ। ये सब कंस के जासूस थे । वे तो यह काम अपनी आजीविका के लिये करते थे, उन्हें कृष्ण से व्यक्तिगत रूपसे कुछ भी लेना देना नहीं था। कृष्ण ने भी उन्हें जानबूझकर नहीं मारा ,वे सब उन्हें मारने आये थे अतः अपने बचाव में कृष्ण ने उन्हें मारा और वे स्वभावतः मारे गये । पूतना का वे गला दबाकर या तलवार से बध कर सकते थे पर उन्होंने यह नहीं किया बल्कि दॉंत से काटा और उसके द्वारा लगाया गया विष उसी के शरीर में प्रवेश कर गया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। स्पष्ट है कि इन सब में कृष्ण ने अपना मानवीय द्रष्टिकोण नहीं छोड़ा। जीव परमपुरुष से आये हैं और उन्हीं में अंत में चले जायेंगे। पूतना आदि भी परमपुरुष से ही आये थे, वे भी द्वैतवादी थे यदि उन्होंने साधना की होती तो परम पुरुष में मिलकर एक हो गये होते पर उन्होंने नकारात्मक रास्ता चुना और उन्होंने विश्व के केन्द्र को ही नष्ट करना चाहा । अंततः कृष्ण को उनकी बुरी प्रवृत्तियॉं नष्ट कर मानवता की रक्षा के लिये मारना पड़ा। कोई यदि आग के पास बिना किसी सुरक्षा के जाता है तो वह उन्हें राख कर देती है, कृष्ण यदि केवल  द्वैतवादी की तरह व्यवहार करते तो वे अपने को उनसे दूर कर लेते पर उन्होंने यह नहीं किया, उन्होंने उन सबको अपने पास ही बुला लिया। गोपियॉं भी कोई पढ़ी लिखीं नहीं थीं, पर वे अपने द्वैत को अद्वैत में बदलने के लिये लगातार उनके पास जाने के लिये गतिशील बनी रहीं। अब यह मेल कैसा था? पानी और शक्कर की तरह । बृजगोपाल ने सभी ग्वालबालों और गोपियों के साथ अपने को इस प्रकार मिला लिया था कि उन्हें पहचानना संभव नहीं होता था। यहॉं द्वैत समाप्त था। सॉंसारिक रंग भेद और आकर्षण, द्वैत में फुसला कर भटकाये रहते हैं और परमपुरुष से दूर करते जाते हैं, कृष्ण का कहना था कि ये सब आकर्षण और भेद उन्हें देकर उनके साथ ही एक हो जाओ क्योंकि परम पुरुष से आये हो तो परमपुरुष में ही मिलने का लक्ष्य होना चाहिये, यह अद्वैत है। उन्हीं की वस्तु उनको ही सौपकर भार मुक्त होने में ही बुद्धिमत्ता है। स्पष्ट है कि बृजगोपाल का मिलन शक्कर और रेत के जैसा नहीं बल्कि शक्कर और पानी की तरह है, क्यों कि वे तारक बृह्म हैं।


चन्दू- इस परिप्रेक्ष्य में पार्थसारथी ने क्या किया? 

बाबा- उन्होंने सच्चे लोगों को एकत्रित कर मानवता के मूल्यों की रक्षा करने के लिये लगातार संघर्षरत रखा। साधक को परम पुरुष के समीप जाने के लिये साधना के कटीले रास्ते पर चलना ही पड़ता है। जब रास्ते के कॉंटे हटकर दूर हो जाते हैं साधक आगे बढ़कर परमपुरुष की गोद में आश्रय पा ही लेता है। यह भी हो सकता है कि भक्त सच्चाई और ईमानदारी से अपनी सभी ऊर्जा को एक बिंदु पर केन्द्रित कर  एक स्थान पर बैठा अधीरता से पुकार कर कहे कि हे परमपुरुष मेरे ऊपर कृपा करो और मेरे पास आ जाओ। इस प्रकार उसकी सभी मनोवैज्ञानिक ऊर्जा एक बिंदु पर केन्द्रित होकर परम पुरुष से एकीकृत हो जाती है, यह अद्वैत है। इस प्रकार का रास्ता भक्ति मार्ग , ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग कहलाता है, प्रारंभ में भक्त और परमपुरुष दो, फिर अंत में केवल परमपुरुष एक। पार्थसारथी ने सच्चाई का पालन करने के लिये कुशल रणनीति बनाने का कौशल भी सिखाया। बार बार जरासंध के आक्रमण से नागरिकों को बचाने के लिये अपनी राजधानी को मथुरा से द्वारका में ले जाना इसी रणनीति का हिस्सा था, क्योंकि जरासंध को द्वारका जाने में मरुस्थल को पार करना कठिन था। इस प्रकार व्यक्तिगत जीवन में सच्चाई के साथ रहते हुए दुष्टों के विरुद्ध शस्त्र किस प्रकार उठाये जाते हैं यह भी उन्होंने सिखाया। उन्होंने धर्म के प्रति स्थिर और बुद्धिमान लोगों को एकत्रित कर सत्य और उच्चतर जीवन जीने की ओर प्रेरित किया जिससे लोग उन्हें अपना निकटतम मानने लगे। यही कारण है कि वे आज तक सब के दिलों पर राज्य कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्टतः कहा कि मुझ से ही सभी उत्पन्न हुए हैं मुझ में ही सभी प्रतिष्ठित हैं और अंत में मुझमें ही मिल जायेंगे। द्वैताद्वैतवाद यह नहीं कह पाता कि जीव कहॉं से आते हैं, केवल यह कहता है कि अंत में वे परमपुरुष में मिल जाते हैं। अतः पार्थसारथी कृष्ण के व्यक्तित्व को द्वैताद्वैतवाद के प्रकाश में परीक्षित करना व्यर्थ है, वह उससे बहुत ऊपर हैं।

क्रमशः.....