Monday, 31 August 2026

471 विचारणीय महत्वपूर्ण शब्द पिछली पोस्ट से आगेः

 


विचारणीय महत्वपूर्ण शब्द पिछली पोस्ट से आगेः-

27 गायत्री,  

 वेदों में मुख्यतः सात प्रकार के छंद पाए जाते हैं, गायत्री, उष्णिक, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, ब्रहती, जगती, और पॅंक्ति। इसके अलावा वैदिक भाषा में कोई सर्वस्वीकृत व्याकरण नहीं थी अतः छंद और प्रचलित अलिखित व्याकरण के बीच भिन्नताओं को इस नियम के अनुसार समाधान किया जाता था कि व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार छंद को काट छॉंट कर घटा बढ़ाकर ध्वनि को व्यवस्थित कर सकता था जिससे वह छंद यथावत बना रहे। एक उदाहरण स्वीकृत ऋक 310/62 का है, जिसे सामान्यतः गायत्री मंत्र कहा जाता है, जो यथार्थतः सावित्र ऋक है। गायत्री एक विशेष छंद का नाम है, मंत्र का अर्थात् ऋक का नहीं। इस गायत्री में परमपुरुष को ‘‘सविता’’ के नाम से संबोधित किया गया है। इस शब्द की व्युत्पत्ति है , सु +त्रन् = त्रक  इसलिए इसे ‘‘सावित्र ऋक’’ कहा गया है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के एक सूक्त में कहा गया है कि 

नासदासीन्नो सदासीतदानीम, नासीद्राजो न व्योमा परो यत।

इसका प्रारंभ शब्द ‘नासद’ से किया गया है इसलिए इसका नाम हुआ ‘नासदीय सूक्त’ । पूर्वोक्त ‘सावित्र ऋक’ गायत्री छंद में रचा गया है जिसमें आठ शब्दॉंश होते हैं। इसकी तीन लाइनें हैं इसलिए कुल चौबीस शब्दॉंश हैं। ऋक इस प्रकार है,

तत्सवितुर्वरेण्यम

भर्गो देवस्य धीमही

धियो यो नः प्रचोदयात्।

‘‘अर्थात्, परम पिता, जिसने सृष्टि को सात स्तरों ( लोकों ) में निर्मित किया है, उसके दिव्य तेज का हम ध्यान करते हैं जिससे वह हमारी बुद्धि को शुद्ध कर आनन्दित पथ की ओर जाने में मार्गदर्शन करे।’’

अब यदि हम इस ऋक का विश्लेषण करें तो दूसरी लाइन में आठ शब्दॉंश- भर, गो, दे, व, स्य, धी, म और ही ; तथा तीसरी लाइन में भी आठ शब्दॉंश - धि, यो, यो, नः, प्र, चो, द और यात् पाए जाते हैं। परन्तु पहली लाइन में केवल सात शब्दॉंश - तत् स, वि, तुर, व, रे, और न्यं पाए जाते हैं अर्थात् इस लाइन में एक शब्दॉंश की कमी है अतः इसे उच्चारित करने के समय आज अथवा तत्समय भी तत्कालीन प्रचलित अलिखित व्याकरण नियमों का उल्लंघन होता है। इसलिए इसे इस प्रकार उच्चारित किया जाता है कि आठ शब्दॉंश हो जाएं, जैसे, तत् स, वि, तुर, व, रे, नि, अम् ।

मंत्र के प्रारंभ में ‘‘ओम् भूर्भुवः स्वः ओम् ’’ जोड़ दिया जाता है और अन्त में ओम् जोड़ा जाता है। यह मूलतः ऋग्वेद में नहीं है, ये अथर्ववेद में है। यह मंत्र परमब्रह्म के सप्त लोकों की सृष्टि का सामूहिक अभिव्यक्तिकरण है- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, और सत्य। परन्तु जहॉं स्थूल , सूक्ष्म और कारण नामक लोकों को संक्षिप्त रूप में प्रयुक्त किया जाता है वहॉं केवल ‘‘भूभुर्वः.स्वः’’ इन तीन नामों का ही उच्चारण किया जाता है जिनके लिए ‘‘महाव्याहृति’ (अर्थात् परमोच्चारण) शब्द का उपयोग किया जाता था। ये मूलतः ऋग्वैदिक ‘सावित्र ऋक’ के भाग नहीं हैं। सावित्र ऋक के उच्चारण का अभ्यास करने के लिए 

‘‘ ओम भूभुर्वः स्वः 

ओम् तत्सवितुर्वरेण्यं 

भर्गो  देवस्य धीमही 

धियो यो नः प्रचोदयात् ओम्’’

 इस प्रकार महाव्याहृति को जोड़कर ‘‘सावित्र ऋक ’’ का अर्थ प्रबल किया जाता है। इसे जोड़ने का कारण यह है-  महाव्याहृति के जोड़ने पर मंत्र का अर्थ स्पष्ट हो जाता है जैसे, ‘‘इन भूः भुवः स्वः अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण लोकों में हम सविता (अर्थात् परमपिता) के प्रखर तेज का ध्यान कर रहे हैं जिससे वह हमारी ‘धी’ अर्थात् बुद्धि को सच्चाई के रास्ते पर चल पाने में मार्गदर्शन करें ।’’ परमपुरुष से इस मंत्र के द्वारा आध्यात्मिक दिशा पाने के लिए प्रेरणा पाने का प्रयत्न करना ‘‘वैदिक दीक्षा’’ कहलाता है। बाद में जब व्यक्ति आध्यात्मिक रास्ते पर चलने के लिए तत्संबंधी उचित निर्देश पा जाता है तो इसे ‘‘तान्त्रिकी दीक्षा’’ कहते हैं।


Thursday, 27 August 2026

470 विचारणीय महत्वपूर्ण शब्द पिछली पोस्ट से आगेः

 कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु पिछली पोस्ट से आगे-

23. जय हो- हम सभी के पास इन तेतीस देवताओं अर्थात् ऊर्जा केन्द्रों का समूह होता है जिसे केवल एक ही परमनियंत्रक सत्ता जिसे ब्रह्म कहते हैं नियंत्रित करता है अतः मनुष्यमात्र का कर्तव्य है कि इनकी सहायता से अपनी तमोगुणी और रजोगुणी प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष कर सत्य में प्रतिष्ठित होने की विजय प्राप्त करे और अपने जीवन के मुख्य लक्ष्य इस परमपुरुष तक पहॅुंचने का कर्म करे। जितने भी महापुरुष हुए है और जिन्हें हम देवतुल्य पूजते हैं वे सभी भी हमारी ही तरह सामान्य रहे हैं परंतु उन्होंने सभी जड़ प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष कर विजय पायी और अद्वितीय कहलाये। उनकी जय बोलने का अर्थ यह है कि हम अपनी ही जय बोलते हैं और अपेक्षा करते हैं कि उनकी ही तरह हम अपने आदर्श और व्यक्तित्व को समेकित करने में सफलता पायें।

24 ऋक 

 ऋषियों के द्वारा संग्रहित प्रारंभिक ज्ञान को केवल एक वेद अर्थात् ऋग्वेद कहा जाता था । ऋक़ क्विप =ऋक । वैदिक क्रिया ऋक का अर्थ है ‘ महिमामंडन करना ’ (गीत से या सामान्य भाषा में) ‘‘ऋक’’ का संस्कृत में अर्थ है ‘स्तवन’ करना। प्राचीन समय में साधु लोग प्रकृति के विभिन्न रूपों को किसी न किसी देवता का खेल मानते थे अतः उन्होंने उनके लिए स्तवन या भजन करना प्रारंभ किया। जब उन्होंने उषा, इन्द्र, पर्जन्य, मातरिष्वा, वरुण आदि के भजन गाए तब उन्हें ‘साम’ कहा गया। उस समय तक लिपि का अनुसंधान नहीं हुआ था इसलिए शिष्य अपने गुरु से मौखिक शिक्षा को ग्रहण किया करते थे। ये सत्य के वचन थे, ज्ञान के वचन थे अतः उन्हें जानकर तत्कालीन असंस्कृत लोग संस्कृति के प्रकाश की ओर बढ़ने लगे इसलिए उन्हें ‘वेद’ या ‘ज्ञान’ कहा गया।

25 वेद 

वैदिक क्रिया ‘विद’ का अर्थ है ‘‘जानना’’ इस में ‘अल’ प्रत्यय जोड़ने से ‘वेद’ शब्द बनता है जिसका अर्थ है ‘‘ज्ञान’’। शब्द ‘वेद’ का लिखित रूप देखकर कुछ स्वर-विज्ञानियों का विचार है कि इसे ‘घञ’ प्रत्यय लगाकर बनाया गया हैय तो भी, यही सही है कि उसे ‘अल’ प्रत्यय लगाकर बनाया गया है और वह पुल्लिंग है। चूँकि लिपि के अभाव में उसे गुरु से मौखिक सुनकर याद रखा जाता था इसलिए उसका दूसरा नाम ‘श्रुति’ है। श्रु़ क्तिन= श्रुति। क्रिया ‘श्रु’ का अर्थ है, सुनना। इसलिए श्रुति का एक अर्थ है ‘कान’  और इसीलिए कहा गया है कि जो कान से सुनकर याद रखा गया है वह है ‘वेद’ । वेदों के सबसे पुराने भाग के प्रत्येक श्लोक को ‘ऋक’ कहा गया है, जब अनेक श्लोकों को एक साथ रखकर किसी विचार को प्रदर्शित किया जाता है तो उसे कहा गया है ‘सूक्त’  और अनेक सूक्तों को संग्रहित कर बनाया गया है ‘मंडल’।

26 ऋग्वेद

ऋग्वेद बहुत पुराना है इसके अतिरिक्त यह भी निश्चित है कि कृष्णद्वैपायन व्यास ने वेदों को उनकी प्राचीनता के अनुसार सबसे पुराना, मध्य, और पश्चात्वर्ती, इन तीन अलग अलग भागों में बहुत पहले विभाजित कर दिया था और  उन्हें क्रमशः ऋक, यजुः और अथर्व नाम दिया गया।। ऋग्वेद का रचनाकाल लगभग पन्द्रह हजार वर्ष से दस हजार वर्ष पूर्व के बीच का है जबकि यजुर्वेद का दस हजार से सात हजार वर्ष के बीच का और अथर्ववेद का सात से पाॅंच हजार वर्ष के बीच का माना जाता है। सामवेद कोई वेद नहीं है, शब्द ‘साम’ का अर्थ है ‘गीत या भजन’। सामवेद को पूर्वोक्त सभी वेदों के संगीत वाले भाग को अलग कर एक साथ प्रस्तुत किया गया जिसे सामवेद का नाम दिया गया है। अर्थात् सामवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद सभी में पाया जाता है। 

जैन साहित्य में वेदों विशेषतः सामवेद का उल्लेख मिलता है जो कि तत्कालीन प्राकृत भाषा में लिखा गया है। वर्धमान महावीर 2500 वर्ष से कुछ पहले हुए थे और प्राकृत भाषा का उद्गम चार से पाॅंच हजार वर्ष के बीच हुआ। इस प्रकार वेदों का जो भी भाग सबसे बाद का माना जाय वह निश्चय ही पाॅंच हजार वर्ष से कम पुराना नहीं हैं। जहाॅं तक जैन साहित्य का संबंध है उसका कुछ भाग वर्धमान महावीर के पहले, कुछ पश्चात्वर्ती जैन सन्तों के द्वारा रचित हुआ था तो भी वे किसी भी प्रकार से पाॅंच हजार वर्ष से पहले के नहीं हैं।


Sunday, 23 August 2026

469 कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय विंदु पिछली पोस्ट से आगेः-

 कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय विंदु पिछली पोस्ट से आगेः-

21. आत्मा - वह जो हमें अपने होने का साक्ष्य देता है, वही आत्मा है। वह हमारे भीतर ही रहता है। हम सभी अपने अपने अस्तित्व का अनुभव करते हैं पारस्परिक सापेक्षता से। यदि अन्य कोई भी न हों तो यह कैसे जानोगे? यही बात समझने की है। केंचुआ जानता है कि वह केंचुआ है। पेड़ जानता है कि वह पेड़ है। पर सूर्य नहीं जानता कि वह सूर्य है। जबकि सूर्य से ही ऊर्जा पाने वाले हम सब सूर्य के बारे में बहुत कुछ जानते हैं और जानने की कोशिश कर रहे हैं। किसी को उसके अस्तित्व का बोध और साक्ष्य देने वाली सत्ता को ही जीवात्मा कहते हैं। आष्चर्य यह है कि हम इसे भूलकर, अन्य सब याद रखने और पाने के प्रयास में, अनेक जन्मों तक आवागमन के चक्र में भटकते हुए  कष्ट पाते रहते हैं।

22. तेतीस करोड़ देवता-  देवताओं की संख्या के संबंध में सच्चाई यह है कि हमारे शरीर के संचालन के लिये प्रकृति ने तेतीस करोड़ नर्व सैल और नर्व फाइवर्स बनाये हैं जिन्हें नियंत्रित करने के लिये कुल तेतीस नाड़ियाॅं या ऊर्जा केन्द्र ही प्रधान होते हैं । ये परस्पर अपने व्यक्तित्व और आदर्श से ओतप्रोत होने के कारण देवता कहलाते हैं। जो कुछ मनुष्य षरीर के भीतर है वही ब्रह्मांड में गेलेक्सियों, तारों, वनस्पतियों और जीवधारियों के रूप में भी है।

इन्ही ऊर्जा केन्द्रों में एकादश रुद्र, रुद्र का अर्थ है रुलाना। (अर्थात् ये हैं, पाॅंच ज्ञानेन्द्रियाॅं, पाॅंच कर्मेद्रियाॅं और एक मन कुल ग्यारह) कहते हैं। जब कोई व्यक्ति अपना शरीर छोड़ देता है तो ये एकादश अवयव भी एक एक कर चले जाते हैं और संबंधीजन रोने लगते हैं। चूंकि ये सबको अंत में रुलाते हैं इस लिये रुद्र कहलाते हैं। 

द्वादश आदित्य,  आदित्य का अर्थ है ‘लेना‘ चूंकि साल के बारह माह धीरे धीरे व्यक्ति की आयु को लेते जाते हैं अतः आदित्य कहलाते हैं। (अर्थात इनमें वर्ष के बारह माह सम्मिलित होते हैं वही आदित्य हैं)

अष्ट वसु , (अर्थात वास स्थान ), चूंकि जीव का वासस्थान भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाष, सूर्य, चंद्र और अंतरिक्ष, इन आठ स्थानों में माना गया है अतः ये अष्ट वसु कहलाते हैं।

एक इंद्र अर्थात् ऊर्जा या कर्मशक्ति और 

एक प्रजापति अर्थात् यज्ञ या कर्म ।

इस प्रकार इनकी कुल संख्या (11+12+8+1+1 =33) तेतीस हैं। यह, जब देह में  होते हैं तब दैहिक देवता और ब्रह्म में होने पर में ब्राह्मी देवता कहलाते हैं । इसलिये जो देह में है वही ब्रह्माॅंड में भी है, यह कहा जाता है।


Saturday, 15 August 2026

468 पिछली पोस्ट से आगे कुछ महत्वपूर्ण चिन्तनीय बिन्दु -

  पिछली पोस्ट से आगे कुछ महत्वपूर्ण चिन्तनीय बिन्दु -

18. ब्रह्मचर्य- ब्रह्म स्वभाव से सूक्ष्म हैं अतः यदि मन जड़ता की ओर होगा तो वह ब्रह्म को नहीं पा सकता इसलिये मन को साॅंसारिक जड़ पदार्थो से दूर करने का उपाय है ‘‘ ब्रह्म का चिंतन करना‘‘ जो प्रकृति का मन पर प्रभाव कम करते हुए ही किया जा सकता है क्योंकि प्रकृति ही उसे चारों ओर के जड़ पदार्थों की ओर खींचती रहती है। इसलिये ब्रह्मचर्य वह कार्य है जो प्रकृति के प्रभावों से मन को ब्रह्म की ओर ले जाने का प्रयत्न करे और ब्रह्मचारी वह है जो हमेशा ब्रह्म चिंतन में डूॅबा रहे। यह कार्य साधना का अभ्यास करने पर ही संभव है। साधारणरतः वीर्य संरक्षण को ही ब्रह्मचर्य माना जाता है पर वास्तव में अष्ट पाश और षडरिपु मन को बाहरी ओर के संसार में ही बाॅंधते हैं, इन चैदह में से ‘काम‘  केवल एक है अतः जब तक यह सभी चैदह नियंत्रण में नहीं आते केवल ‘काम‘ को नियंत्रित करने मात्र से ब्रह्मचर्य का पालन करना नहीं कहला सकता। अविद्यामाया जो इन चैदह प्रकारों से मन को इतना जकड़े रहती है उससे तब तक नहीं छूटा जा सकता जबतक साधना न की जावे। इस साधना के सहारे धीरे धीरे मन अविद्या के प्रभाव से दूर होता जाता है और वही ब्रह्मचारी कहलाता है जो अविद्या के प्रभाव से मुक्त हो गया। जो साधना का अभ्यास किये बिना ही ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हैं वे केवल समय को ही नष्ट करते हैं। इसलिये ब्रह्मचर्य पालन करने के लिये पारिवारिक जीवन को त्यागने की आवश्यकता नहीं हैं। साधना का बल प्रकृति के बल से अधिक होता है अतः इसकी सहायता से कोई भी ब्रह्मचारी हो सकता है, वीर्य का रक्षण कर सकता है और बुद्धि को तीक्ष्ण बना सकता है।

19. षडरिपु और अष्टपाश- मनुष्य का जीवन आठ प्रकार के बंधनों और छः प्रकार के शत्रुओं से घिरा रहता है ।  काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, और मात्सर्य ये षडरिपु और भय, लज्जा, घृणा, षंका, कुल, शील, मान और जुगुप्सा ये अष्ट पाश है। षड रिपु का अर्थ है छै शत्रु, इन्हें शत्रु इसलिये कहा जाता है क्योंकि ये इकाई चेतना को सूक्ष्मता की ओर जाने से रोककर स्थूलता में अवशोषित करने का कार्य करते हैं। इकाई चेतना का उच्चतम स्तर सूक्ष्म है अतः उस ओर जाने से रोकने वाला शत्रु हुआ। अष्ट पाश का अर्थ है आठ बंधन, बंधनों में बंधा हुआ कोई भी व्यक्ति अपनी गति खो देता है। स्रष्टि में हम देखते हैं कि मानव की गति स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है परंतु अष्ट पाश जैसे लज्जा घृणा और भय आदि स्थूलता से जकड़े रहने के कारण सूक्ष्मता की ओर जाने से रोके रहते हैं।

20. उपवास- उपवास का अर्थ है निकट बैठना,( उप अर्थात् निकट, वास अर्थात् बैठना) । किसके निकट बैठना? ईष्वर के निकट बैठना। परंतु , अधिकाॅंष लोग उपवास का अर्थ निकालते हैं भोजन का त्याग करना और फलफूल खाना, या दिन भर भोजन त्याग कर रात में मन चाहा सुस्वादु भोजन करना। लेकिन इसे उपवास नहीं कह सकते क्योंकि केवल भोजन का त्याग करने को संस्कृत में कहते हैं ‘अनषन‘ या ‘निराहार‘, और भोजन त्याग कर केवल फलफूल खाने को कहते हैं ‘फलाहार‘।


Saturday, 1 August 2026

467 Some important words continued

 13.श्री-   ऊर्जा का बीजमंत्र है ‘‘रम्‘‘। सभी लोग भौतिक जगत की उपलब्धियों के साथ ऊर्जा को भी सक्रिय रखना चाहते हैं अतः नाम और यश के प्रेरक ‘‘श‘‘के साथ ऊर्जा की क्रियाशीलता के प्रेरक ‘‘र‘‘ को जोड़ने पर श़ + र = श्र, और स्त्रींिलंग में यह हुआ श्री, इसे आधार मानकर ही भारत में नाम के आगे श्री लगाने का प्रचलन हुआ। आजकल इस अर्थ में ‘श्री‘ किसी के पास नहीं है फिर भी सभी के नाम से पूर्व श्री लगाते हैं और यह आदर देने का सूचक बन गया है।

14.देवता- वास्तव में ‘‘ जिस किसी का भी का व्यक्तित्व और आदर्श एक समान हो जाते हैं वह देवता कहलाता है।’’ ऋषि याज्ञवल्क्य के अनुसार, ‘‘द्योतते क्रीडते यस्मात् उदयते द्योतते दिवि, तस्मात् देव इति प्रोक्तव्यम् स्तूयते सर्व देवताम्।’’ अर्थात् देवता तो केवल वही है जिसमें उदय अस्त होने वाले, दिन को प्रकाशित करने वाले सभी पिंड प्रकाशित होकर क्रीडा करते रहते हैं, इसीलिए अन्य सभी इतर देवता उनकी ही स्तुति करते रहते हैं। 

15. रिद्धि-सिद्धि- लगातार अपने इष्ट मंत्र के साथ ईश्वर प्रणिधान करते करते जब भक्त को इशोपलब्धि नहीं होती है तब ‘‘रस साधना ’’ का सहारा लेना पड़ता है जिसमें  मूल भावना यह होती है कि व्यक्तिगत इच्छायें, वाॅंछायें और सभी कुछ परमपुरुष की ओर संप्रेषित करना है क्योंकि वही एकमात्र चिदानन्द रस का प्रवाह हैं।  इस प्रकार रस साधना में पूर्णता होना ‘‘ रिद्धि ‘‘ और ‘‘सफलता प्राप्त होना‘‘ सिद्धि कहलाती है। शास्त्रों में इसे रासलीला कहा गया है। जिस किसी अस्तित्व की रचना हुई है वह सब परमपुरुष की इच्छा से ही उन्हीं का चक्कर लगा रहा है। किसी का अध्ययन, बुद्धि और व्यक्तिगत स्तर, सब कुछ व्यर्थ हो जाते हैं जब तक उन्हें परमपुरुष की ओर संप्रेषित नहीं किया जाता । इस परम सत्य को जानने के बाद चतुर व्यक्ति यह कहते हुए आगे बढ़ता जाता है कि है, ‘‘परमपुरुष मुझे कुछ नहीं चाहिए मेरे इसी जीवन में आपकी इच्छा पूरी हो।‘‘

17. रासलीला- रासलीला का अर्थ सभी लोग नहीं जानते और जो लोग थोड़ा बहुत  जानते हैं वह ठीक ढंग से समझा नहीं पाते। वास्तव में यह साधना का एक प्रकार है जिसमें अपनी सभी मनोभावनायें अपने इष्ट की ओर संचालित करना होती हैं। चूंकि यह कार्य मानसिक रूप से अधिक और शारीरिक रूप से कम संबंधित होता है इसलिये इसे समझ पाना सभी के लिये संभव नहीं होता । कृष्ण ने सर्वप्रथम कुछ उन्नत भक्तों, जिन्हें गोप कहा जाता है, को यह साधना शरदपूर्णिमा के दिन सिखाई थी और वे सभी इसे सीखकर इतने आनन्दित हुए थे कि भक्तिरस के प्रवाह में नाचने कूदने लगे। उन्हें लगता था कि उनका इष्ट अर्थात् कृष्ण भी प्रत्येक के साथ नाच रहा है। चैतन्य महाप्रभु के बारे में भी कहा जाता है कि वे रससाधना में पारंगत थे अतः साधना करते करते वे रस प्रवाह में नाचते कूदते रास्मे में दौड़ने लगते थे, उनके पीछे पीछे अन्य भक्तगण भी भागते थे। यही रासलीला का प्रभाव है।


Tuesday, 28 July 2026

466 कुछ महत्वपूर्ण जानने योग्य शब्द-

 कुछ महत्वपूर्ण जानने योग्य शब्द-

1-प्रार्थना- 

जब कोई व्यक्ति स्वार्थवष या विना स्वार्थ के अविभक्त मन से अपने आराध्य के प्रति गहरे मन से बिना किसी बाहरी सामग्री के साथ अत्यंन्त आदर प्रकट करता है तो उसे प्रार्थना कहते हैं।

2-भगवान-

जिस प्रकार ज्ञान जिसके पास होता है उसको ज्ञानवान, बल जिसके पास होता है उसे बलवान, धन जिसके पास होता है वह धनवान कहलाता है उसी प्रकार जिसके पास ‘भग’ हो वह भगवान कहलाता है।  परन्तु ‘‘भग’’ का क्या अर्थ है ?

भग के दो अर्थ हैं। 

एक तो यह कि ‘गच्छति यस्मिन, आगच्छति यस्मात्,‘ अर्थात् वह सत्ता जिससे किसी भी अस्तित्व का उद्गम हुआ है और अन्त में जिसमें पहुंच जाता है। 

और दूसरा जिसमें इन छः गुणों का समाहार हो...

‘‘ऐश्वर्यं च समग्रं च वीर्यं यशासः श्रियः, ज्ञानवैराज्ञ संयुक्तं शन्नाम भग इति उक्तम्।’’

ऐश्वर्य का अर्थ है आठों प्रकार की सिद्धियाॅं. अर्थात् अणिमा, गरिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और अन्तर्यामित्व ।

वीर्य का दार्शनिक अर्थ है, जो जितनी जल्दी वाह्य विषयों पर से अपने मन को हटाकर एक बिंदु पर केन्द्रित कर लेता है उसे वीर्यवान कहते हैं। सामान्यतः जिसकी उपस्थिति मात्र से  लोगों में भय व्याप्त हो वह भी साहित्य में वीर्यवान कहलाता है।

यशासः का अर्थ है यश और अपयश दोनों।

श्री का अर्थ है सभी प्रकार की आर्थिक और भौतिक सम्पन्नता।

ज्ञान का अर्थ है भूत, वर्तमान और भविष्य सबका ज्ञान।

वैराग्य का अर्थ है किसी भी भौतिक वस्तु में आकर्षण न होना  अर्थात् रागरहित होना।

इस प्रकार जिस किसी में भी ये छः गुण है वह भगवान है। इसलिये भगवान कहीं सातवें आसमान में नहीं रहते वह हमारे सबके भीतर साक्ष्य देने वाली सत्ता के रूप में रहते हैं । अभ्यास और वैराग्य के द्वारा कोई भी उपरोक्त गुणों को प्राप्त कर भगवान हो सकता है। यदि कोेई अपने को भगवान कहता है या कुछ लोग यह कहते हैं कि अमुक व्यक्ति भगवान है तो उपरोक्त छः गुणों के आधार पर जाॅंच करने पर यदि सही पाया जाता है तो उसे यह विषेषण  दिया  जा सकता है अन्यथा नहीं।


3. ऋषि-

तर्क विज्ञान और विवेक के आधार पर प्रकृति के रहस्यों को जानने की चेष्टा करते हुए जिन्होनें अपने इस ज्ञान को ववहारिक स्वरूप दिया है उन्हें ऋषि कहा गया है। वेदों के ज्ञान को संकलित करने में इनका अपूर्व योगदान है।

4..मुनि- 

लगातार अपने इष्ट मंत्र को मन ही मन में दुहराते रहने को मनन करना कहते हैं। जो कोई भी इस मनन कार्य में निपुण हो जाते हैं वे मुनी कहलाते हैं।

5.पंडित- 

वैदिक संस्कृत में एक क्रिया है ‘‘पंडा’’ । इसे इस प्रकार पारिभाषित किया बया है- ‘अहं ब्रह्मास्मिीति तामितः प्राप्तः स पंडा’ अर्थात् मैं ब्रह्म हॅूं इस प्रकार की बुद्धि जिसकी हो चुकी है वह है ‘पंडा’ और जिसने अपने अभ्यास से यह अच्छी तरह अनुभव कर लिया है वह है ‘पंडित’ तथा जो इसे अनुभव करने के लिए सतत प्रयासरत है वह है ‘पांडेय’। आप अपने आस पास और परिचितों में ढूड़िए कि जो अपने को पंडित या पांडेय लिखते या कहते हैं वे इस परिभाषा में फिट बैठते भी हैं कि नहीं?

6.आचार्य- 

अपने आचरण के द्वारा शिक्षा देने वाले को आचार्य कहा जाता है, ‘‘आचरणात् पाठयति यह सः आचार्यः’’ आपको अनेक लोग मिल जाएंगे जो अपने को आचार्य लिखते या कहलाना पसंद करते हैं परन्तु जांच कीजिए कि क्या वे इस परिभाषा के अनुकुल फिट बैठते हैं?

7.जी- 

वैदिक काल में शिक्षा, ज्ञान और आयु में अपने से वरिष्ठ जो कोई भी होते थे उन्हें आदर देने के लिए ‘‘आर्य’’ शब्द के साथ संबोधित किया जाता था। यजुर्वेदिक काल में ‘य’ का उच्चारण ‘ज’ हो गया, जैसे यज्ञ को जज्ञ कहने लगे, योग को जोग। इस तरह आर्य सम्बोधन ‘आर्ज’ में बदल गया। भारत में अरबी भाषा के प्रभावसे यह ‘अजी’ हो गया और फिर बचा केवल ‘जी’। आजकल सभी लोग किसी को आदर देने के लिए उसके नाम या सरनाम के पीछे जी लगाते हैं।

8.मंत्र- 

जिसके मनन करने से मुक्ति मिले उसे मंत्र कहते हैं, ‘‘मननात् तरयेत यः स मंत्रः’’।

9.तंत्र- 

जो मन को जड़ता से खीचकर दिव्यता की ओर ले जाकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है वह तंत्र कहलाता है। ‘‘ तन् जडयात् तारयेत् यस्तु स तंत्रः परिकीर्तितः।’’ 


Wednesday, 20 May 2026

465 ‘‘बाबा की क्लास’’ (विषय:- अमृतत्व)

 


शिष्य:- बाबा! हम लोगों ने अनेक स्थानों पर पढ़ा है और रसायन में भी पढ़ाया जाता है कि अनेक पदार्थ हैं जो विषैले होते हैं जिनके खाने पर मृत्यु हो जाती है, और इनके विपरीत स्वभाव के पदार्थ भी होते हैं जिनका उपयोग करने या खाने से व्यक्ति पर इनका असर घट जाता है?

बाबा - सभी पदार्थों का अपना अपना अपना गुणधर्म होता है , एक पदार्थ किसी के लिये विष तो दूसरे के लिये अमृत होता है।

शिष्य - बस बाबा! हम लोग आज यही समझने आये हैं कि हमने ‘अमृत‘ नामक वस्तु की अनेक चर्चायें सुनी हैं परंतु , क्या सचमुच उसका भौतिक अस्तित्व होता है जैसा कि विष का?

बाबा - ठीक कहा, पर अमृत तुम्हारे भीतर ही है बाहर नहीं, उसे समझने के लिये चिंतन करना होगा। इसलिये मैं तुम लोगों को अपने समय के मूर्धन्य, कुशाग्रबुद्धि आचार्य और शास्त्रार्थ में अपराजेय शीर्ष कोटि के विद्वान ऋषि याज्ञवल्क्य जी का द्रष्टान्त सुनाकर इसे स्पष्ट करना चाहता हॅूं सुनो -

याज्ञवल्क्य जी, ग्रहस्थ आश्रम त्याग कर सन्यास लेने लगे तब उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों, कात्यायिनी और मैत्रेयी से अनुमति लेते हुए कहा -

 ‘‘तुम दोनों मेरे पश्चात् सम्पत्ति पर विवाद न करो इसलिये मुझे बताओ किसे क्या चाहिये है, मैं अपने सामने ही बंटवारा कर दूॅं।‘‘  कात्यायिनी ने अपनी लम्बी सूची बनाकर दे दी परंतु मैंत्रेयी ने कहा, ‘‘ भगवन्! धन दौलत से भरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी मुझे मिल जाये, तो क्या मैं अमर हो सकती हॅूं?‘‘

याज्ञवल्क्य बोले, ‘‘ नहीं, जैसे धन सम्पन्न लोगों का जीवन होता है वैसे ही तुम्हारा जीवन हो जायेगा, धन से अमर होने की आशा करना व्यर्थ है।‘‘

मैत्रेयी बोली, ‘‘ जिसे पाकर मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर क्या करूंगी ? आप तो मुझे अमृतत्व का जो भी साधन जानते हों वही बताते जाइये।

वह बोले - मैत्रेयी! मेरी इन बातों पर चिंतन करना, यही अमृतत्व का रास्ता बतायेंगी। 

‘‘पति के प्रयोजन के लिये पति प्रिय नहीं होता अपने ही प्रयोजन के लिये पति प्रिय होता है। स्त्री के प्रयोजन के लिये स्त्री प्रिया नहीं होती अपने ही प्रयोजन के लिये स्त्री प्रिया होती है। पुत्र के प्रयोजन के लिये पुत्र प्रिय नहीं होता अपने ही प्रयोजन के लिये पुत्र प्रिय होता है। धन के प्रयोजन के लिये धन प्रिय नहीं होता अपने ही प्रयोजन के लिये धन प्रिय होता है। पशुओं के प्रयोजन के लिये पशु प्रिय नहीं होते अपने ही प्रयोजन के लिये पशु प्रिय होते हैं। सब के प्रयोजन के लिये सब प्रिय नहीं होते अपने प्रयोजन के लिये ही सब प्रिय होते हैं। अतः अपना आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान करने योग्य है। आत्मा का दर्शन हो जाने पर अप्राप्त, प्राप्त हो जाता है, और अज्ञात, ज्ञात हो जाता है।‘‘

इस प्रकार के अनेक उदाहरण देने के बाद भी जब मैत्रेयी ने कहा कि मुझे विशेष कुछ समझ में नहीं आया, तब वे बोले-

‘‘ मैत्रेयी! मन में भेद रहने पर ही अन्य व्यक्ति, अन्य को देखता, सूंघता,रसास्वादन करता, सुनता, मनन करता, और स्पर्श करता है परंतु जिसे सब कुछ आत्ममय ही हो गया वह किसके द्वारा किसे देखे, सुने, सूंघे, अभिवादन करे, मनन करे? जिसके द्वारा मनुष्य इन सब को जान पाता है उसे किसके द्वारा जाने, किस साधन से जाने? वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, उसका नाश नहीं होता, वह व्यथित और क्षीण नहीं होता। मैत्रेयी! विज्ञाति के विज्ञाता को किसके द्वारा जाने? अर्थात जिसके कारण हम यह सब जान पाते हैं उसे किस के द्वारा जानें? बस इतना चिंतन करना, यही अमृतत्व है।‘‘