Friday, 17 April 2026

464 बाबा की क्लास विषय- महाभारत में महानायक कौन?

 बाबा की क्लास 

विषय- महाभारत में महानायक कौन?

क्लास में बाबा के आने के पहले आज रवि और राजू की बहस हो रही है-

रवि- राजू! तुम जानते हो कि भारत और महाभारत में क्या अन्तर है? 

राजू - इसमें कौन सी बड़ी बात है, भारत माने हमारा देश इंडिया और महाभारत माने कौरव पॉंडवों की लड़ाई और क्या?

रवि- इसमें क्या सही है? 

चंदु बीच में ही बोला अरे दोनों ही सही हैं। इसी बीच बाबा ने आकर इस प्रकार समझाया- 

बाबा-

‘महाभारत‘ केवल कौरवों  और पांडवों की लड़ाई नहीं है और न ही उसके नायक युधिष्ठिर हैं न ही दुर्योधन, उसके महानायक हैं श्रीकृष्ण। छोटे छोटे राज्यों (मगध, अंग, बंग, कलिंग) में विभाजित भारत के राजा अपने अपने स्वार्थ और वर्चस्व के लिए लड़ते रहते थे, अलग अलग धार्मिक मान्यताओं में उलझे लक्ष्यविहीन थे, इन्हीं सबके एकीकरण का महान लक्ष्य था श्रीकृष्ण का। 

भौगोलिक दूरियों, भूभागों और बिखरी जातियों को परस्पर जोड़ने  के लिए उन्होंने अंतर्जातीय विवाहों की प्रेरणा दी। पश्चिमी  भूभाग (पाञ्चाल और कुरु) के निवासी पांडवों  के सम्बन्ध को पूर्वी प्रांतों तक फैलाया। भीम का विवाह नागालैंड की मंगोल कन्या हिडिम्बा से कराया, अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा मणिपुर की मंगोल कन्या थी, कृष्ण ने स्वयं नेफा की रुक्मिणी से विवाह किया और छोटी बड़ी जातियों को मिला कर भारतीय जाति का बड़ा रूप खड़ा किया जिससे ‘एक समाज‘ गठित हो सका।

धर्म के नाम पर भी अनेक विधियां प्रचलित थीं, बड़े बड़े ऋषि मुनि थे, अनेक संप्रदाय थे, महाराज जरासंध अविद्या तंत्र के उपासक थे, महाराज जयद्रथ शैव थे, महर्षि गर्ग वैष्णव थे, मामा कंस शाक्त थे, इसके आलावा कौल साधकों का वर्ग भी था। कृष्ण ने इन सभी को पाप और पुण्य दो ध्रुवों में ध्रुवीकृत किया। महाभारत का युद्ध कराकर पाप का अंत कराया। इस प्रकार टुकड़ों में बंटे भारत और भारत के धर्म को दृढ़ प्लेटफार्म देकर बड़े आदर्श में गूँथ कर एक महान भारत बनाने का कार्य ही महाभारत है जिसके महानायक हैं श्रीकृष्ण।


Tuesday, 7 April 2026

463 बाबा की क्लास : कुछ भ्रान्तियॉं विषय : (भगवान और उनके नाम)

 बाबा की क्लास : कुछ भ्रान्तियॉं

विषय : (भगवान और उनके नाम)

इन्दु- बाबा! जब यह समस्त ब्रह्मॉंड एक ही परम सत्ता की कल्पना का विस्तार है तो अनेक लोग उसे अलग अलग नाम देकर अपने पसंद के नाम को ही सर्वश्रेष्ठ कहकर झगड़ा क्यों करते रहते हैं?

बाबा- अपने अपने संज्ञानात्मक प्रक्षेप के अनुसार अनेक लोग एक ही परमसत्ता को विभिन्न नाम दे देते हैं। आध्यात्मिक साधक को इन नामों और उनसे जुड़ी महामनस्कता के झगड़े में नहीं पड़ना चाहिये क्योंकि इन सबके भीतर एक समान आत्मा रहती है।

राजू- मैं ने कई लोगों को ‘शिव‘ और ‘नारायण‘ इन नामों पर बहस करते देखा है?

बाबा- तुमने कभी इन नामों का विश्लेषण करके देखा है? नहीं, तो चलो इनका विश्लेषण करके देखें । ‘शिव‘ का वास्तविक अर्थ क्या है, ‘शिव’ हैं अखंडसत्ता और ‘शक्ति‘ का अर्थ है क्रियात्मक सत्ता। इसलिए शिव और शक्ति एक ही वास्तविकता के दो पक्ष हैं। किसी भी क्रिया में दो सिद्धान्त होते हैं एक ज्ञानात्मक और दूसरा क्रियात्मक। मानलो आप कोई मशीन चला रहे हैं, इसमें दो सिद्धान्त हैं एक मशीन को मस्तिष्क की सहायता से दिया गया दिशानिर्देश अर्थात् संज्ञानात्मक और दूसरा मासपेशियां जो संज्ञान के दिशानिर्देश पर मशीन संचालित करतीं हैं अर्थात् क्रियात्मकता। यह ब्रह्मॉंड भी संज्ञानात्मक सिद्धान्त और क्रियात्मक सिद्धान्त दोनों से मिलकर बना है। संज्ञानात्मक सिद्धान्त हैं परमपुरुष और क्रियात्मक सिद्धान्त है परमाप्रकृति। सिद्धान्ततः यह दो पृथक सत्ताओं के होने का आभास कराता है पर आन्तरिक रूप से वे एक ही हैं। शिव और शक्ति का सम्मिलित नाम है ब्रह्म। इसी प्रकार ‘‘नारायण‘‘। यह ‘नार‘ और ‘अयन‘ इन दो शब्दों से मिलकर बना है, और उसका आन्तरिक अर्थ है परमपुरुष। नार शब्द के संस्कृत में तीन अर्थ हैं, पहला है भक्ति, जैसे नारद माने भक्ति देने वाला। दूसरा अर्थ है पानी, और तीसरा अर्थ है प्रकृति अर्थात् परम क्रियात्मक शक्ति। और, अयण माने आश्रय, इसलिये नारायण माने प्रकृति का आश्रय, परम क्रियात्मक शक्ति का आश्रय अर्थात् परमपुरुषइसलिये शिव हुए परमचेतना, नारायण भी परमचेतना हैं अतः शिव और नारायण में कोई अंतर नहीं है।

नन्दू- परन्तु एक ही सत्ता को अनेक नाम देते ही क्यों हैं जैसे कृष्ण और माधव?

बाबा- सभी लोग अपने मानसिक विचारों को शब्दों में व्यक्त करने के लिये भाषा का सहारा लेते हैं । जैसे, किसी वस्तु को देखने पर उससे आने वाली तरंगों द्वारा ऑंखों के माध्यम से मन पर जो कंपन किया जाता है उसे वह अनुभव करते हुए शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास करता है। देश काल और पात्र के अनुसार इस अभिव्यक्तिकरण में अन्तर आता जाता है और एक ही सत्ता अनेक नाम  की हो जाती है। जैसे, किसी वस्तु से निकलने वाली तरंगें किसी स्थान और समय पर किसी व्यक्ति के द्वारा ‘धव‘ ‘धव‘ ‘धव‘ का अनुभव कराती हैं तो वह उसे ‘धवल‘ अर्थात् सफेद कहने लगता है, परंतु अन्य परिवेश और स्थान पर कोई व्यक्ति उन्हीं कंपनों को अपने मानसिक संवेदन में ‘व्ह‘ ‘व्ह‘ ‘व्ह‘ अनुभव करता है तो शब्दों में व्यक्त करने के लिये वह वातावरण के अनुसार ‘व्हाइट‘ कहने लगता है। इस प्रकार सभी द्रश्यमान पदार्थों का प्रारंभिक रूप से नाम दिया जाता है। फिर व्यवहार में इन्हीं शब्दों से वाक्य विन्यास और साहित्य जन्म लेता है। अब हम अन्य नाम ‘माधव‘ लेते हैं। संस्कृत में ‘मा‘ के तीन अर्थ हैं, पहला है ‘‘नहीं‘‘ जैसे मा गच्छ, अर्थात् मत जाओ। अन्य अर्थ है इंद्रियॉं। इसलिये जीभ को भी ‘मा‘ कहते हैं, और तीसरा है परम क्रियात्मक सत्ता, परमा प्रकृति, लक्ष्मी। ‘धव‘ माने नियंत्रक या पति, इसी कारण जिस महिला का पति नहीं होता उसे विधवा कहते हैं। ‘धव‘ का अन्य अर्थ सफेद भी है। इसलिये माधव का मतलब हुआ जो परमा प्रकृति को नियंत्रित करता है अर्थात् परमपुरुष। ‘कृष्ण‘ का अर्थ है आकर्षण करने वाला, अतः वह जो विश्व ब्रह्मॉंड के संपूर्ण अस्तित्व को अपनी ओर खींच रहे हैं वह कृष्ण हैं। सभी जाने अंजाने उन्हीं के आकर्षण में बंधे हुए हैं इसलिये कृष्ण परमपुरुष हैं। इसप्रकार कृष्ण/माधव भी शिव और नारायण की तरह एक ही सत्ता को प्रदर्शित करते हैं।

रवि- तो क्या ‘राम‘ को भी इसी प्रकार समझाया जा सकता है?

बाबा- हॉं, 

 ‘राम‘ यानी, रमन्ति योगिनः यस्मिन् इति रामः अर्थात् जिसमें योगीगण रमते हैं, वह हैं राम। धातु ‘रम‘ और प्रत्यय ‘घई’। को मिलाकर राम बनता है जिसका अर्थ है परम सुन्दरता का आश्रय अर्थात् परमपुरुष। राम का अन्य अर्थ है, राति महीधरा राम अर्थात् अत्यंत चौंधियाने वाला, चमकदार अस्तित्व। परमपुरुष को सभी विद्वान अत्यंत चमकदार अर्थात् प्रकाशवान मानते हैं। अन्य अर्थ है, रावणस्य मरणम् इति रामः। रावण क्या है? आप जानते हैं कि मानव मन की सूक्ष्म और स्थूल दोनों प्रकार की प्रवृत्तियां होती हैं, केवल स्थूल प्रवृत्तियॉं  दस दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, वायव्य, नैरित्य, आग्नेय, ऊर्ध्व और अधः में अपना काम करती रहती हैं। इन दसों दिशाओं में भौतिक जगत की वस्तुओं की ओर मन के भटकने के कारण मन के भ्रष्ट होने की संभावना अधिक होती है अतः जीव मन की इस प्रकार की प्रवृत्तियों के साथ संयुक्त रहने को रावण कहते हैं। रावण को दस सिरों वाला इसीलिये माना गया है। अतः आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले साधक को क्या करना चाहिये? साधक को इन भ्रष्ट करने वाली, आत्मिक उन्नति के मार्ग में अंधेरा उत्पन्न करने वाली, प्रवृत्तियों से संघर्ष करना होगा अर्थात् रावण का वध करना होगा। रावणस्य मरणम् इति रामः, अतः साधक रावण को मारकर सार्वभौमिक सत्ता के सतत प्रवाह में आकर रामराज्य पाता है। इसलिये राम माने पुरुषोत्तम। रावण का प्रथम अक्षर ‘रा‘ मरणम का प्रथम अक्षर ‘म‘ इसलिये रावणस्य मरणम् माने राम क्योंकि जब आध्यात्मिक साधक राम का चिंतन करता है, रावण मर जाता है। इस प्रकार नारायण, शिव, माधव और राम एक ही हैं। इसलिये किसी को भी भगवान के नामों की महानता को लेकर झगड़ना नहीं चाहिये।

नन्दू- तो क्या परमपुरुष के इन्हीं नामों को इष्टमंत्र कहा जाता है?

बाबा- यदि किसी व्यक्ति को कौलगुरु ने इन नामों में से किसी एक को शक्ति सम्पन्न कर उसके इष्ट मंत्र के रूप में दिया है तो उसके लिये वही सब कुछ है अन्य नाम किसी काम के नहीं। साधक के लिये सबसे महत्वपूर्ण उसका इष्ट मंत्र ही है, उसी के चिंतन मनन और निदिध्यासन से वह परम प्रकाश पायेगा। इष्टमंत्र प्रत्येक व्यक्ति का अलग अलग होता है जो उसके संस्कारों के अनुसार चयन किया जाकर गुरुकृपा से प्राप्त होता है। यह कार्य कौलगुरु ही करते हैं क्योंकि वे ही पुरश्चरण की क्रिया में प्रवीण होते हैं। पुरश्चरण का अर्थ है शब्दों को शक्ति सम्पन्न करने की क्षमता होना। अपने अपने इष्टमंत्र का श्वास प्रश्वास की सहायता से नियमित रूपसे जाप कारते रहने का इतना अभ्यास करना होता है कि यह जाप नींद में भी चलता रहे। इसे ही साधना कहते हैं। इस स्थिति को प्राप्त होने पर ओंकार ध्वनि ;बवेउपब तीलजीउद्ध के साथ अनुनाद स्थापित करने में कठिनाई नहीं होती। अनुनाद की यही स्थिति जब स्थिर या स्थायी हो जाती है तो इसे ही समाधि कहते हैं। शक्तिमान शब्द ही मंत्र कहलाते हैं जो कौलगुरु साधक को उसके संस्कारों के अनुसार इष्टमंत्र के रूप में कृपापूर्वक देते हैं और मंत्रचैतन्य हो जाने पर अर्थात् ओंकार के साथ अनुनाद स्थापित हो जाने पर, उन्हीं की कृपा से परमपुरुष से साक्षात्कार होता है। जिसे सक्षम गुरु से इष्टमंत्र मिल गया वही धन्य है उसी का जीवन सफल है। अन्य सब तो प्रदर्शन मात्र है।


Saturday, 21 March 2026

462 बाबा की क्लास : कुछ भ्रान्तियॉं विषय - एकर्षि अग्नि या मुखाग्नि?


राजूः- कुछ लोग आग को एकर्षि अग्नि क्यों कहते हैं?

बाबा- एकर्षि उस अग्नि का नाम है जिसे प्राचीनकाल में लोग बहुत ही पवित्र मानते थे।

रवि- क्यों?

बाबा- अत्यन्त प्राचीन काल में लोग अग्नि को जानते ही नहीं थे। वे अपना जीवन कन्द, मूल, फल और कोमल हरी पत्तियॉं कच्चे मॉंस को खाकर व्यतीत करते थे। वे लोग आग उत्पन्न करने के अथवा उपयोग करने के कोई तरीके नहीं जानते थे। जंगलों में ऑंधियों के समय सूखे पेड़ों के आपस में रगड़ने से आग लग जाती थी। भय और पूज्यभाव के कारण उन्होंने इसे अग्नि देवता मान लिया। वे बिजली की तड़क और कड़क से डरते थे इसलिये इन्द्र को परम सत्ता मानकर पूजने लगे। इन्द्र का एक अर्थ ‘‘सबसे अच्छा‘‘ भी होता है। इसी प्रकार वर्फीले तूफान और वायु के देवता मरुत उनके दूसरे आराध्य देवता हुए। विशाल समुद्री लहरों के डर से वरुण देवता की पूजा करने लगे। यही उन इतिहास पूर्व लोगों के प्रमुख देवता थे। जिन लोगों ने इन्हें खोजा वे ऋषि कहलाये। आग की खोज का दिन मानव इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण है । उस समय के लोगों ने आग के पता चलने के शताब्दियों बाद इसके उपयोगों के बारे में जाना । इसके साथ ही वे दूसरे प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ हो गए। आग के अनेक उपयोग होना सीख लेने के बाद वह जीवन का अपरिहार्य अंग बन गई। 

चन्दू- लेकिन अग्नि के साथ एकर्षि जोड़ने का क्या आशय है?

बाबा- आग को उत्पन्न करना, उसको बनाये रखना, उसकी रक्षा करना और उससे दूसरों की रक्षा करना बड़ा ही कठिन कार्य था। यह कार्य कोई भी नहीं कर सकता था इसलिये कुछ ऋषियों को इसकी रक्षा करने के लिये ही नियुक्त कर दिया गया। इस प्रकार के अग्नि रक्षक ऋषियों को ‘साग्निक‘ या ‘अग्निहोत्री‘ कहा जाने लगा। इस प्रकार आग को बनाये रखने के लिये उसे पवित्र देवता मानकर उसे सन्तुष्ठ करने के लिये प्रचुर भोजन (अर्थात् पवित्र लकड़ियॉं और कुछ मंत्र आदि) दिया जाने लगा इसे बाद में हवन का नाम दिया गया। इस प्रकार के कार्य को सामान्य शब्दों में ‘यज्ञ‘ नाम दिया गया। "यज्ञ = यज + न" अर्थात् क्रिया या विशेष प्रकार का पवित्र और शुभ कार्य। यज की मूल क्रिया का अर्थ है ‘कार्य करना‘ ‘यज‘ + ‘घ´‘ = ‘याग‘। साग्निक के अस्वस्थ हो जाने या अनुपस्थित हो जाने के समय उसकी पत्नी या बेटा उस अग्नि की रक्षा का दायित्व निभाते थे और इसे लगातार ईंधन जुटाते रहते थे ताकि वह बुझ न जाये ।

इन्दु- अग्नि की खोज और संरक्षण की व्यवस्था तो आदि काल से सम्बंधित है, परंतु आपने पहले बताया है कि परिवार अर्थात् माता, पिता और पुत्र पु़त्रयों आदि की संकल्पना का व्यावहारिक रूप तो साढ़े सात हजार वर्ष पहले भगवान सदाशिव के आने के बाद ही सामने आया?

बाबा- हॉं सही है। यहॉं एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखना होगी वह यह कि भगवान शिव के आने के पूर्व समाज में विवाह नाम की कोई संस्था ही नहीं थी। माता और पिता के पारस्परिक कोई कर्तव्य निर्धारित नहीं थे माताओं को ही बच्चों की देखभाल और पालन पोषण की जिम्मेवारी उठाना पड़ती थी। इस कारण महिलाओं की प्रगति विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों की तुलना में पिछड़ती गई। शिव ने अपने तर्क और शक्ति के प्रभाव से पुरुषों को सामाजिक उत्तरदायित्व से बॉंधा। यह पहला अवसर था जब समाज में विवाह नाम की संस्था स्थापित हुई। शिव के बाद अवसरवादियों ने महिलाओं के सामाजिक स्तर को अनेक वर्गो में बॉंट दिया। जैसे,

पत्नी - इसे पति के समान ही सामाजिक और धार्मिक अधिकार दिये गए और इनके बच्चों को भी यह अधिकार विरासत में ही मिल जाता था।

जाया- इसे पति के धार्मिक अधिकारों से बंचित किया गया परन्तु उसके बच्चे पिता के  धार्मिक और सामाजिक अधिकार पा सकते थे।

भार्या - इसके विवाह को तो मान्यता प्राप्त थी परन्तु पति के किसी भी धार्मिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। उसके बच्चों को यह अधिकार प्राप्त थे क्योंकि भार्या केवल इसलिये विवाह की जाती थी ताकि वंश चल सके। इसीलिये कहा गया कि ‘‘पुत्रार्थे क्रियते भार्या‘‘ ।

कलत्र- इस प्रकार के पति पत्नी सम्बंध में कलत्र को अपने पति के धार्मिक और सामाजिक अधिकार नहीं थे और उसके बच्चों को भी यह अधिकार नहीं थे। यह प्रणाली ‘बुद्ध‘ युग से पहले प्रारम्भ हुई परन्तु प्रभाव में उनके बाद आई। इसमें पिता उच्च वर्ण का और माता निम्न वर्ण की होती तो बच्चों को माता का गोत्र ही रखना पड़ता था। यदि इस प्रकार के विवाह को सामाजिक मान्यता नहीं होती तो बच्चों को माता के गोत्र को भी नहीं दिया जाता था , उन्हें अग्नि की सुरक्षा भी नहीं दी जा सकती थी। उन्हें व्रात्य अर्थात् जाति विहीन, कहा जाता। माता यदि उच्च वर्ण की होती और विवाह को सामाजिक मान्यता होती तो उसके बच्चों को पैत्रिक धार्मिक और सामाजिक अधिकार मिलते थे और यदि माता को अपने गोत्र में अग्नि की रक्षा का अधिकार मिला था तो उसके बच्चों को भी यह अधिकार मिल जाता था।

रवि- आश्चर्य है! इतना सब गड्ड मड्ड होता रहा फिर भी महिलाएं अधिकार विहीन भी बनी रही? क्या इन कुप्रथाओं के कारण ही अनेक जातियों का उद्गम हुआ?

बाबा- इतना ही नहीं, इस प्रकार तथाकथित कुलीनों के उद्गम के साथ ही अन्य प्रथा उत्पन्न हुई जिसे ‘नियोग‘ कहा जाता था। ये कुलीन जो अनेक स्त्रियों के साथ विवाह करते थे उन्हें उन सबके भरण पोषण उचित रूपसे करने में अनेक कठिनाइयॉं आने लगीं। इस कारण कुछ स्त्रियॉं अपने पति के पास तो कुछ अपने पिता के पास रहा करतीं थीं। इन परिस्थितियों में सामाजिक रूप से अमान्य पतियों के द्वारा भी संतान उत्पन्न होने लगी जो नियोगज सन्तान कहलाती थी। इस प्रकार की सन्तान को यद्यपि अपनी माता के विवाहित पति का नाम ही पिता के रूप में मान्यता प्राप्त था परन्तु उसको सामाजिक और धार्मिक अधिकार से बंचित रखा जाता था। इस कुप्रथा से कुलीन तो बढ़ते गये परन्तु उनकी गुणवत्ता में कमी आती गई। नियोगज सन्तान को अपने मामाओं के घर ही रहना पड़ता था और उन्हें पिता की तरह अग्नि की रक्षा करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता था। यदि पिता उच्च गोत्र का और माता निम्न गोत्र की हुआ करती तो सन्तान को पिता का गोत्र और सामाजिक, धार्मिक अधिकार  मिलता था परन्तु यदि माता उच्च गोत्र की और पिता निम्न गोत्र का होता तो उत्पन्न सन्तान को माता का गोत्र और सामाजिक स्तर नहीं मिलता था। अतः यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है कि इस प्रकार की सन्तान को अग्नि की रक्षा करने का भी अधिकार नहीं होता था। इन कुप्रथाओं के कारण मानव समाज में सैकड़ों जातियों का उदय हुआ जो आज भी अभिशाप बना हुआ है।

नन्दू- बात समझ में आई, परन्तु मुखाग्नि क्या है क्या यह एकर्षि अग्नि का ही पर्याय है या इन्हीं कुप्रथाओं में से एक?

बाबा- अग्नि को संरक्षित रखने के नियम बने थे परन्तु उनमें अपवाद भी थे। कुछ ऋषि ऐसे थे जो स्वयं ही अग्नि की विभिन्न प्रकार से रक्षा करने के काम में लगे रहते थे जैसे कर्मकांड, अग्नि को जलाये रखने के लिये लकड़ियों का प्रबंध आदि। इस काम में वे अपने पुत्रों या पत्नियों का भी सहयोग नहीं लिया करते थे। इस प्रकार की अग्नि को एकर्षि अग्नि कहा जाता था और इसे बहुत ही पवित्र माना जाता था। आदि काल में मृत देह को पानी में बहा दिया जाता था, वैदिक युग के पहले और बाद तक भी मृत देह को धरती के भीतर गाड़ने की पृथा थी , परन्तु आग के अनुसंन्धान हो जाने पर भी बहुत बाद में उसे जलाया जाना उचित समझा जाने लगा। जब मृत देह को जलाने की प्रथा आई तो लोगों ने अग्नि को संरक्षित रखने वाले ऋषियों के मरने पर उन्हें जलाने के समय सोचा कि जिसने जीवन भर अग्नि की इतनी देखरेख की और मौखिक रूपसे मंत्रों के द्वारा एकर्षि अग्नि को बनाये रखा अब उनके जाने के बाद उस अग्नि को संरक्षित रखने के लिये उसके मंत्रों का लाभ नहीं मिलेगा इसलिये उनके शरीर को अग्नि में समर्पित करने के पहले अंतिम रूप से एकर्षि अग्नि को उनके मुंह से स्पर्श करना उचित होगा इसके बाद सूखी घास का संपर्क करना। इस तरह दाह संस्कार के समय अग्नि को मुह के सम्पर्क में लाने की प्रथा का प्रचलन हुआ, जिसे आजकल मुखाग्नि देना कहा जाता है। इस तरह जिनके पास एकर्षि अग्नि न भी होती वे भी और अन्य जिन्हें इससे कोई मतलब ही नहीं था वे सभी, अनिवार्यतः इस प्रथा का व्यापकता से पालन करने लगे।

इन्दु- बड़ी ही विचित्र बात है?

बाबा- हॉं। जब कोई रूढ़ि जन्म लेती है तो वह लोगों को क्रमशः अपने जाल में फॅंसाती जाती है। यह मुखाग्नि देना भी इन्हीं रूढ़ियों में से एक है। जो कर्मकॉंडी पंडित हैं उन्होंने मुखाग्नि देने का मन्त्र भी बना लिया जिसका प्राचीन एकर्षि अग्नि से लेशमात्र भी सम्बंध नहीं है। इस प्रकार अपने प्रिय के देहावसान पर उनके मुंह में अग्नि देना असामान्य लगता है वह मंत्र भी असंगत है परन्तु सामान्य लोग उस मन्त्र का  या तो अर्थ नहीं जानते या फिर भय के कारण उसे पढ़ लेते हैं। मौलिक एकार्षि अग्नि से इसका कोई भी संबंध नहीं है। वह मंत्र यह है-

कृत्वा तु दुष्कृतम कर्म जानता वाप्यजानता, मृत्युकालवशम प्राप्य नरम पंचतत्वमागतम।

धर्माधर्मसमायुक्तम् लोभमोहसमावृतम्, दहेयम सर्व गात्राणि दिव्यान लोकान सह गच्छतु।

इसका अर्थ है कि ‘‘ हो सकता है इस मृत व्यक्ति ने जानकर या अनजाने में दुष्कर्म किये हों, उसे आज मृत्यु ने वरण कर लिया है और उसने अपने को पंचतत्वों बिलीन कर दिया है। उसमें अच्छाईयॉं और बुराइयॉं दोनों ही थीं , वह लोभ और मोह में भी फॅंसा था। अब उसके पूरे शरीर को अग्नि जला डाले और उसे स्वर्ग मिले।‘‘

राजू- तो क्या आज के परिप्रेक्ष्य में इन कुप्रथाओं का पालन करना उचित होगा?

बाबा- आज का मानव अपने विवेक, तर्क और विज्ञान से इसका निर्णय करे। जो इसे पसंद करे वह इसे याद करे परन्तु जो रूढ़ियों से स्वतंत्र विचारों के लोग हैं वे तो अपने विवेक और शुद्ध विचारों के आधार पर ही कार्य करेंगे। किसी समय सतीप्रथा जैसी अमानवीय और दुष्टता भरी गतिविधियों की रूढ़ि के प्रति भी शास्त्रों की आड़ ली जाती थी। बाद में पाया गया कि वह आधार भी गलत था। बुद्धिमान और पढ़ेलिखे लोगों को सोचना चाहिए कि यह मुखाग्नि देना वॉंछनीय है या नहीं। यह सती पृथा की तरह भयंकर भले न हो परन्तु निःसन्देह यह घृणित कार्य है। एकर्षि अग्नि जो मुनियों के मुंह में रखी जाती थी वह उन्हीं के द्वारा संरक्षित की गई होती थी। आज जो अग्नि मुंह में रखी जाती है वह तो माचिस से उत्पन्न की जाती है। क्या यह इतिहास का उपहास करना नहीं है? जब महिलाएं अग्नि की रक्षा करने के योग्य ही नहीं मानी जाती थीं तो उनके मुंह में अग्नि रखे जाने का औाचित्य क्या है? जो भी हो, वैज्ञानिक युग के उन्नत बुद्धि और विवेकी लोगों को इस पर विचार करना चाहिए। 


Thursday, 5 March 2026

461बाबा की क्लास - कुछ भ्रान्तियॉं ( विषय : होली अर्थात् बसंतोत्सव)

461 बाबा की क्लास 

कुछ भ्रान्तियॉं ( विषय : होली  अर्थात् बसंतोत्सव)

रवि- बाबा! होली का यथार्थ रूप क्या वैसा ही है जो हर वर्ष हम देखते हैं, या कुछ और? 

बाबा-  लोगों ने काल्पनिक कहानियों के आधार पर कैसी कैसी विचित्र परम्पराएँ बना ली हैं कि होली के नाम पर एक दूसरे पर कीचड़/ रंग फेकते हैं , अकथनीय अपशब्द कहकर मन की भड़ास निकलते हैं और कहते हैं कि ‘‘बुरा न मानो होली है‘‘। होली के लिए चंदा बटोरकर रोड के बीचों बीच टनों लकड़ियाँ जलाकर कभी न सुधर पाने वाले रोड खराब तो करते ही हैं वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड  मिलाकर प्रदूषण फैलाते हैं, रंगों / कीचड़ भरे शरीर और कपड़ों को धोने में पानी और समय भी नष्ट करते  हैं। परंतु होली अर्थात् बसंतोत्सव का उद्देश्य बाहरी रंगों से खेलना नहीं है, उसका उद्देश्य है कि संसार की जिन वस्तुओं ने मन को पकड़ रखा है अपने रंग में जकड़ रखा है उनके रंगों को परमपुरुष को भेंट कर देना। जब तुम अपने आकर्षणों और रंगों को इस प्रकार परमपुरुष को भेंट करने के खूब अभ्यस्थ हो जाओगे तब तुम उन्हीं में मिल जाओगे, तुम्हें किसी रंग की आवश्यकता ही नहीं रहेगी तुम रंगहीन हो जाओगे, कोई रंग तुम्हें आकर्षित नहीं कर सकेगा। तुम्हारा इकाई अहं, महततत्व में मिल जायेगा और तुम्हें हर दिशा में उन्हीं का कीर्तिगान सुनाई देगा उन्हीं की भव्यता दिखाई देगी। फिर मेरे तेरे की भावना के बीच पड़ा पर्दा सदा के लिये हट जायेगा। इस अवस्था में तुम उन्हें ‘मैं‘, ‘तुम‘ अथवा ‘वह‘ कुछ भी संबोधित कर सकते हो यह इस बात पर निर्भर करेगा कि तुम्हारा उनके प्रति समर्पण भाव किस स्तर का है।

राजू- इस कार्य को सभी लोग कर सकते हैं या कोई विशेष प्रशिक्षित व्यक्ति?

बाबा- यह कार्य है तो सभी के लिये परंतु जो अष्टॉंगयोग की साधना करते हैं उन्हें इसका अभ्यास करना सरल हो जाता है। इसीलिये मैं कहता हॅूं कि अपने निर्णय और विचारों के प्रवाह में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाओ। फिर बाहरी रंगों के आकर्षण से मुक्त होकर देखोगे कि तुम्हारा मन परमपुरुष के भव्य रंग में किस प्रकार झलकने लगा है। अष्टॉंग योग  में निम्न स्तर की वृत्तियों की ओर से मन को खींच कर उस महान की ओर संचालित करने का कार्य प्रत्याहार योग अथवा वर्णार्ध्यदान कहलाता है। सभी लोग किसी न किसी कार्य या वस्तु से किसी न किसी प्रकार आकर्षित होते हैं , ज्योंही वे उससे आकर्षित होते हैं उनका मन उसके रंग में रंग जाता है। तुम उस वस्तु के रंग से अपने मन को हटाकर परमपुरुष को भेंट कर अपने मन को परमपुरुष के रंग में रंग सकते हो। यही सच्चा प्रत्याहार योग है, प्रत्याहार माने मन को उसके विषय से खींच लेना।

चंदू- आपने जो कहा है उसका वैज्ञानिक आधार क्या है?

बाबा-

- भौतिकवेत्ता  (Physicist) कहते हैं कि किसी भी वस्तु का अपना कोई रंग नहीं होता , सभी रंग प्रकाश के ही होते हैं।  प्रकाश तरंगों की विभिन्न लम्बाइयां (wave lengths) ही रंग प्रदर्शित करती  हैं। जो वस्तु प्रकाश की जिन तरंग लम्बाइयों को परावर्तित करती है वह उसी रंग की दिखाई देती है अतः यदि कोई वस्तु प्रकाश विकिरण की  सभी तरंग लम्बाइयों को परावर्तित कर दे तो वह सफेद और सभी को शोषित कर ले तो काली दिखाई देती है। सफेद और काला कोई पृथक रंग नहीं हैं।   

- मनोभौतिकी विद (psychophysicist) कहते हैं कि मन के वैचारिक कम्पनों से बनने वाली  मानसिक तरंगें (psychic waves) भी व्यक्ति के चारों ओर अपना रंग पैटर्न बनाती हैं जिसे ‘‘आभामण्डल‘‘ (ंaura) कहते हैं। अनेक जन्मों के संस्कार भी इसी पैटर्न में विभिन्न परतों में संचित रहते हैं और पुनर्जन्म के लिए उत्तरदायी होते हैं।   

- मनोआत्मिक  विज्ञानी  (psycho-spiritualists)  इन तरंगों (psychic waves) को वर्ण (colour) कहते हैं।  यह लोग यह भी कहते हैं कि जिस परमसत्ता (cosmic entity) ने यह समस्त ब्रह्माण्ड निर्मित किया है वह अवर्ण (colourless) है परन्तु इस ब्रह्माण्ड में अस्तित्व रखने वाली सभी वस्तुओं के द्वारा प्रकाश तरंगों के परावर्तन करने के अनुसार ही  वर्ण (colours) होते हैं क्योंकि ये सब उसी परमसत्ता की विचार तरंगें ही हैं।  अतः यदि उस परमसत्ता को प्राप्त करना है तो स्वयं को अवर्ण (colourless)  बनाना होगा।  इसी सिद्धांत का पालन करते हुए अष्टांगयोगी प्रतिदिन अपनी त्रिकाल संध्या में  इन वर्णो को ईशचिंतन, मनन, कीर्तन और निदिध्यासन की विधियों द्वारा उस परमसत्ता को सौंपने का कार्य करते हैं जिसे वर्णार्घ्य दान कहते हैं। बोलचाल की भाषा में वे इसे ही असली होली खेलना कहते हैं। 

नन्दू- लेकिन, आधुनिक विज्ञान के नियम तो अपेक्षतया बहुत बाद के हैं अष्टॉंगयोग विज्ञान तो बहुत पुरातन है? वर्णार्ध्यदान की पद्धति का प्रारंभ और प्रचार कैसे और कब से हुआ?

बाबा- भारतीय योगदर्शन पूर्णतः वैज्ञानिक सिद्धान्तों और मनोवैज्ञानिक विधियों पर आधारित है जो हमारे ऋषियों ने अपार पराक्रम से अनुसंधान कर हमें सौंपा है। यह लोग और कोई नहीं उन्नत श्रेणी के वैज्ञानिक ही थे। मन के रहस्यों के बारे में उन्होंने अनुभव किया कि मन के दो खंड होते हैं एक व्यक्तिनिष्ठ ;(subjective mind) और दूसरा वस्तुनिष्ठ (objective mind) । मानलो एक बिल्ली दिखाई दी, अब यदि ऑंख बंद कर उस बिल्ली को फिर से याद किया जाता है तो मन का जो भाग बिल्ली का आकार बनाने लगता है उसे वस्तुनिष्ठ मन और जो भाग केवल देखता रहता है अर्थात् साक्ष्य देता है कि हॉं बिल्ली का रूप बन गया, उसे  व्यक्तिनिष्ठ भाग कहते हैं। वस्तुनिष्ठ मन के कार्य करने का दूसरा प्रकार यह  है, मानलो अब उसकी कल्पना करते हैं जिसका अस्तित्व ही नहीं है जैसे भूत,  तो अस्तित्व न होते हुए भी जो सोचा जा रहा है कि इस अंधेरे कमरे में भूत रहता है जिसके बड़े बड़े दॉंत और उल्टे पैर होते हैं, यह बिल्कुल कल्पना है परंतु फिर भी वह वस्तुनिष्ठ मन में अपना प्रतिविंब बनाता है और इस कल्पित भूत को जो देखने का काम करता है वह भी इसी मन का व्यक्तिनिष्ठ भाग है। अनेक प्रयोगों के आधार पर ऋषियों ने अनुभव किया कि यथार्थ निर्णय करने के लिये मन के व्यक्तिनिष्ठ भाग को (अर्थात् जो देख रहा है या साक्ष्य दे रहा है), वस्तुनिष्ठ भाग  ( अर्थात् जो देखा जा रहा है) से अधिक शक्तिशाली होना चाहिये अन्यथा वस्तुनिष्ठ मन में लगातार एकत्रित होते जाने वाले यह काल्पनिक प्रतिबिम्व (पूर्वोक्त अर्थों में वर्ण या रंग)  भ्रमित करते रहते हैं और सत्य के रास्ते से दूर हटा देते हैं। इन्हीं सिद्धान्तों का व्यावहारिक स्वरूप श्रीकृष्ण ने अपने बाल सखाओं गोप और गोपियों को सबसे पहले बताया था कि किस प्रकार वस्तुनिष्ठ मन के प्रतिबिंवों अर्थात् रंगों को व्यक्तिनिष्ठ मन की सहायता से वापस परमपुरुष को भेट कर देना चाहिये क्योंकि सभी रंग उन्हीं के हैं। सभी गोप और गोपियों को सामूहिक रूप से जिस दिन यह प्रत्याहार योग या वर्णार्ध्यदान की साधना सिखाई गयी थी उसे ही बसंतोत्सव का नाम दिया गया है। उसके बाद पौराणिक काल से अनेक प्रकार के सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों के कारण इसमें अनेक विरूपतायें आ गयीं हैं और अब उसका स्वरूप कैसा हो गया है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। 


Thursday, 26 February 2026

460 बाबा की क्लास (कुछ भ्रान्तियॉ- भाग 2)

 पिछली क्लास के आगे... ..

460  बाबा की क्लास (कुछ भ्रान्तियॉ- भाग 2)

नन्दु- अनेक विशेषज्ञों का यह कहना कितना सार्थक है कि आध्यात्मिक साधना के लिये ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है?

बाबा- जो लोग ब्रह्मचर्य पालन करने के भय से साधना नहीं करते, उन्हें समझना चाहिये कि मन को वाह्य जड़ात्मक चिंतन से आन्तरिक सूक्ष्म चिंतन की ओर ले जाने का प्रयास करना ही ब्रह्मचर्य का पालन करना है। प्रकृति के प्रभाव से ही मन जड़ता की ओर जाता है और उसके प्रभाव को कम करने से वह सूक्ष्मता की ओर जाता है। मुक्ति का अर्थ है प्रकृति के प्रभाव को कम करके जड़ता से सूक्ष्मता की ओर जाना। ब्रह्म स्वभाव से सूक्ष्म हैं अतः यदि मन जड़ता की ओर होगा तो वह ब्रह्म को नहीं पा सकता इसलिये मन को सॉंसारिक जड़ पदार्थो से दूर करने का उपाय है ‘‘ ब्रह्म का चिंतन करना‘‘ जो प्रकृति का मन पर प्रभाव कम करते हुए ही किया जा सकता है क्योंकि प्रकृति ही उसे चारों ओर के जड़ पदार्थों की ओर खींचती रहती है। इसलिये ब्रह्मचर्य वह कार्य है जो प्रकृति के प्रभावों से मन को ब्रह्म की ओर ले जाने का प्रयत्न करे और ब्रह्मचारी वह है जो हमेशा ब्रह्म चिंतन में डूॅबा रहे। यह कार्य साधना का अभ्यास करने पर ही संभव है। साधारणरतः वीर्य संरक्षण को ही ब्रह्मचर्य माना जाता है पर वास्तव में अष्ट पाश और षडरिपु मन को बाहरी ओर के संसार में ही बॉंधते हैं, इन चौदह में से ‘काम‘  केवल एक है अतः जब तक यह सभी चौदह नियंत्रण में नहीं आते केवल ‘काम‘ को नियंत्रित करने मात्र से ब्रह्मचर्य का पालन करना नहीं कहला सकता। अविद्यामाया जो इन चौदह प्रकारों से मन को इतना जकड़े रहती है उससे तब तक नहीं छूटा जा सकता जबतक साधना न की जावे। इस साधना के सहारे धीरे धीरे मन अविद्या के प्रभाव से दूर होता जाता है और वही ब्रह्मचारी कहलाता है जो अविद्या के प्रभाव से मुक्त हो गया। जो साधना का अभ्यास किये बिना ही ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हैं वे केवल समय को ही नष्ट करते हैं। इसलिये ब्रह्मचर्य पालन करने के लिये पारिवारिक जीवन को त्यागने की आवश्यकता नहीं हैं। साधना का बल प्रकृति के बल से अधिक होता है अतः इसकी सहायता से कोई भी ब्रह्मचारी हो सकता है, वीर्य का रक्षण कर सकता है और बुद्धि को तीक्ष्ण बना सकता है।

रवि- बाबा! आपने अनेक बार षडरिपुओं और अष्टपाशों का संदर्भ दिया है, वे क्या हैं?

बाबा- मनुष्य का जीवन आठ प्रकार के बंधनों और छः प्रकार के शत्रुओं से घिरा रहता है ।  काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, और मात्सर्य ये षडरिपु और भय, लज्जा, घृणा, शंका, कुल, शील, मान और जुगुप्सा ये अष्ट पाश है। षड रिपु का अर्थ है छै शत्रु, इन्हें शत्रु इसलिये कहा जाता है क्योंकि ये इकाई चेतना को सूक्ष्मता की ओर जाने से रोककर स्थूलता में अवशोषित करने का कार्य करते हैं। इकाई चेतना का उच्चतम स्तर सूक्ष्म है अतः उस ओर जाने से रोकने वाला शत्रु हुआ। अष्ट पाश का अर्थ है आठ बंधन, बंधनों में बंधा हुआ कोई भी व्यक्ति अपनी गति खो देता है। स्रष्टि में हम देखते हैं कि मानव की गति स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है परंतु अष्ट पाश जैसे लज्जा घृणा और भय आदि स्थूलता से जकड़े रहने के कारण सूक्ष्मता की ओर जाने से रोके रहते हैं।

राजू- लेकिन कुछ लोग तो यह सलाह देते हैं कि साधना करना, भजन पूजन करना तो बुढ़ापे के काम हैं छोटी अवस्था से इनमें लगना बेकार है?

बाबा- कुछ लोग मानते हैं कि बुढ़ापे के लिये ही भजन कीर्तन ठीक हैं, इसलिये युवावस्था में इससे दूर ही रहते हैं पर वे यह नहीं जानते कि उनके जीवन में बुढ़ापा आयेगा भी या नहीं यह निश्चत नहीं है। बृद्धावस्था में जब शरीर कमजोर हो जाता है, नजरें कमजोर हो जातीं हैं, बीमारियॉं घेरे रहती हैं, स्मरणशक्ति कमजोर पड़ जाती है, कर्मों का फल भोगते हुए मन कुछ भी नया करने का साहस नहीं करता, ऐसी दशा में ईश्वर को केवल इसलिये पुकारना कि कष्ट से मुक्ति मिले कितना उचित है? इतना ही नहीं, जब इन झंझटों के कारण मन स्थिर नहीं हो पायेगा तो भगवान को पुकारने का कोई मूल्य नहीं । इस अवस्था में शरीर की कमजोरियों और पूर्वकाल की यादों के चिंतन में ही मन को फुरसत नहीं मिल पाती फिर ईश्वर का चिंतन कहॉं संभव होगा। यही कारण है कि बुढ़ापे में साधना का अभ्यास कर पाना संभव ही नहीं हो पाता यदि प्रारंभ से ही उस ओर मन को लगाने का अभ्यास न किया जाये। बांस के पेड़ को उसकी युवावस्था में इच्छानुसार मोड़ना सरल होता है, बहुत पुराना हो जाने पर मोड़ने से वह टूट जाता है, यही हाल साधना का होता है प्रारंभ से ही अभ्यास करना सफलता देता है बुढ़ापे में नहीं।

रवि- यह सुख और दुख क्या हैं?

बाबा- सॉंसारिक भोगों को पाकर मन बड़ा प्रसन्न होता है और न पाने पर दुखी । पर, जब मन उन्हें चाहे ही नही ंतो उनके पाने या न पाने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इच्छा होने पर भी जब वह प्राप्त न हो तो और अधिक दुख होता है और मन को विचलित करता है। जैसे शराबी को यदि शराब न मिले तो उसे अपार कष्ट अनुभव होगा पर गैरशराबी पर इसके मिलने या न मिलने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । साधना करने की प्रणाली का अभ्यास सक्षम गुरु के द्वारा इस प्रकार कराया जाता है कि वह अतीन्द्रिय रूप से मन को जड़ पदार्थों की ओर जाने से रोक देता है और भौतिक पदार्थों की चाह समाप्त हो जाती है। कुछ लोग सोचते हैं कि साधना करने पर भौतिक आनन्द और सुख सुविधाएं छिन जायेंगी उनका यह विचार अविवेकपूर्ण है और वे जो इन सुख सुविधाओं को जीवन का आवश्यक अंग मानते हैं वे भी गलती करते हैं।

क्रमशः... ..


Wednesday, 25 February 2026

459 - बाबा की क्लास (कुछ भ्रान्तियॉ- भाग 1)

 459 - बाबा की क्लास (कुछ भ्रान्तियॉ- भाग 1)

रवि- बाबा! कुछ लोगों का मानना है कि अमुक संत के पास सिद्धि है और वे किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं, कष्ट दूर कर सकते हैं, घटनायें टाल सकते हैं? यह कैसे होता है?

बाबा- यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया बराबर और विपरीत दिशा में होती है बशर्ते टाइम, स्पेस और पर्सन में परिवर्तन न हो । इस नियम  के माध्यम से प्रकृति का उद्देश्य यह  शिक्षा देना होता है कि बुरे कार्यों से दूर रहना चाहिये। पर कुछ लोग साधना से प्राप्त बल के द्वारा इसे दूर करने का प्रयास करने में इस विधिमान्य नियम को भूल जाते हैं और समझते हैं कि वे कल्याण कर रहे हैं। कर्मफल तो कर्म करने वाले को भोगना ही पड़ेगा, चाहे कितना बड़ा भक्त क्यों न हो वह इसे नहीं रोक सकता यदि वह ऐंसा करता है तो वह भोले भाले लोगों को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं माना जायेगा। यह हो सकता है कि कर्मफल का दंड भोगने का समय कुछ आगे टल जाये पर वह भोगना ही पड़ेगा चाहे उसे फिर से जन्म क्यों न लेना पड़े, क्योंकि हो सकता है कि दंड भोग के समय, व्यक्ति के मन में साधना कर मुक्ति की जिज्ञासा जाग जाये परंतु साधना सिद्धि प्राप्त व्यक्ति अपने बल से उसका कष्ट दूर करने का प्रयास करे तो यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध होने के कारण वह कल्याणकारी नहीं माना जायेगा वरन् वह दंड का भागीदार माना जायेगा।  इसलिये पराशक्तियों का उपयोग करना ईशनिंदा ही माना जायेगा क्योंकि यह प्रकृति के नियमों को चुनौती देकर उन्हें उदासीन करना ही कहलायेगा। पराशक्तियों के उपयोग से पानी पर चल सकते हैं, आग में चल सकते हैं, असाध्य बीमारियों को दूर कर सकते हैं, चमत्कार दिखा सकते हैं पर यह प्रकृति के स्थापित संवैधानिक नियमों की अवहेलना होगी और उस पराशक्ति के उपयोगकर्ता को कर्मफल भोगना ही पड़ेगा।


नन्दू- एक दिन राजू के पिता कह रहे थे कि उनके गुरुजी बहुत उच्च स्तर के हैं और वह जिस पर कृपा कर दें तो उसे मुक्ति मोक्ष तत्काल मिल जाता है, उसे कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं होती?

बाबा- कुछ लोग यह भ्रान्त धारणा पाल लेते हैं कि उनके गुरु तो पहॅुंचे हुए हैं, उनकी कृपा से वे मुक्त हो जायेंगे उन्हें साधना की क्या आवश्यकता? पर वे गलती करते हैं क्योंकि मुक्ति बिना प्रयास के नहीं मिल सकती। गुरु की कृपा के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती परंतु यह बात भी सही है कि गुरुकृपा पाने की योग्यता भी तो होना चाहिये केवल तभी कृपा मिल सकती है। गुरु कृपा पाने के लिये ही शिष्य को , विश्वास और भक्तिभाव से साधना करने के लिये गुरु सतत निर्देश देते हैं।


इंदु- परंतु बाबा! भक्त गण हमेशा दुखी ही देखे जाते हैं ,शायद इसीलिये लोग आध्यात्म से दूर ही रहना चाहते हैं?

बाबा- आध्यात्मिक साधना करने वाले भक्त अपने कर्मफलों को भोगने के लिये पुनः जन्म नहीं लेना चाहते अतः वे इसी जन्म में मुक्त होने की उत्कंठा से शेष बचे सभी संस्कारों के प्रभावों को शीघ्र ही इसी जन्म में भोग लेना चाहते हैं अतः यदि उन्हें साधना करने में समस्यायें/कष्ट आते हैं तो इसे शुभ संकेत माना जाना चाहिये क्यों कि यह उनके कर्मफल का भोग तेजी से ही हो रहा होता है।


चंदू- तो क्या साधना करने और अविद्या माया के जंजाल से बचने के लिये जंगल में जाना आवश्यक है? क्योंकि यहॉं तो सॉंसारिक लोग, कष्ट पा रहे साधकों पर व्यंग करते हुए हॅंसते ही है?

बाबा- अविद्या माया का अर्थ है अष्टपाश और षडरिपुओं का समाहार, अतः अविद्यामाया से दूर भाग कर उससे बचा नहीं जा सकता। उससे बचने के लिये मन को सूक्ष्मता की ओर प्रत्यावर्तित करना पड़ता है। जैसे, किसी घाव के ऊपर मंडराने वाली मक्खियों को दूर भगाना ही पर्याप्त समाधान नहीं है घाव को भरने का भी प्रयत्न करना होगा। महान गुरु के द्वारा सिखाई गयी साधना की विधि घाव भरने वाली मरहम है इसी की सहायता से कोई भी अविद्या को दूर भगाकर मुक्त हो सकता है। अविद्यामाया के हटने पर साधना के समय आने वाले सभी व्यवधान समाप्त हो जाते हैं। चूंकि यही एकमात्र विधि है जो अविद्या को दूर करती है अतः घर में रहते हुए सरलता से की जा सकती हैं, भले अविद्या प्रारंभ में कुछ व्यवधान करे पर एक बार हार जाने के बाद वह आध्यात्म साघना में रुकावट नहीं डालती। घर में रहकर साधना करने में, उनकी तुलना में अधिक सुविधा होती है जो घर छोड़कर जंगल में जाकर अभ्यास करते हैं। सत्य की पहचान कर लेने पर लोगों की हॅंसी या व्यंग करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।


रवि- बाबा! कुछ लोग किसी स्थान विशेष जैसे तीर्थ आदि, में जाकर साधना करने की सलाह देते हैं यह कितना उचित है?

बाबा- यह भेदभाव करना कि किसी स्थान विशेष पर साधना करने में सुविधा होती है या कोई स्थान साधना के लिये खराब है यह उचित नहीं है यह तो ब्रह्म को भागों में बॉंटना हुआ। सभी कुछ तो ब्रह्म की ही रचना है अतः किसी को अच्छा या बुरा कहना ब्रह्म को ही अच्छा या बुरा कहना हुआ, इसप्रकार तो स्रष्टि की शेष रचनाओं के साथ एकत्व रख पाना कठिन होगा। ब्रह्म के लिये सभी स्थान एक से ही हैं अतः ब्रह्म साधना कहीं भी की जा सकती है। संसार को छोड़कर साधना के लिये जंगल या अन्य स्थान को जाना अतार्किक है और संसार के छूट जाने के भय से साधना न करना अविवेकपूर्ण है । 

शेष अगली क्लास में....



Thursday, 12 February 2026

बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 15)

 पिछली पोस्ट से आगे ...

बाबा की क्लास ( महासम्भूति श्रीकृष्ण- 15)


राजू- लेकिन जीवधारी तो असंख्य हैं मनुष्यों की सख्या भी धरती पर कम नहीं है, धरती के अलावा अन्य ग्रहोंपर भी जीवन सम्भव है तो फिर परमपुरुष को सभी से व्यक्तिगत रूपसे जुड़कर आनन्द पाना किस प्रकार सम्भव होता है?

बाबा-  परमपुरुष ओतयोग और प्रोतयोग से सबसे जुड़े रहते हैं। ओतयोग का अर्थ है व्यक्तिशः जुड़ना और प्रोतयोग का अर्थ है सामूहिक रूपसे जुड़ना। बृजगोपाल ओतयोग से और पार्थसारथी प्रोतयोग से सब से जुड़े रहे। समाजिक चेतना को भीतर तक हिला देने के लिये छः घटकों की आवश्यकता होती है, आध्यात्मिक आदर्श, सामाजिक द्रष्टिकोण, सामाजिक आर्थिक सिद्धान्त, साहित्य और निर्देशक। कृष्ण ने अपने समय में उच्चस्तरीय सामाजिक चेतना जाग्रत की और बताया कि सभी के मिलजुल कर रहने से ही सामाजिक प्रगति हो सकती है पृथक पृथक रहकर नहीं। इसीलिये उन्होंने सामान्य जीवन को स्वाभाविक रूपसे उन्नत किये जाने पर बल दिया और जो भी इसके मार्ग में बाधक बना उसे समाप्त कर दिया। इस प्रकार कृष्ण की सामाजिक चेतना से कुछ लोगों के आनन्द में बाधा भले ही पहुंॅची हो पर इससे नन्दन विज्ञान का क्षेत्र और विस्त्रित हो गया।


इन्दु- परन्तु पार्थसारथी से तो केवल राजा लोग ही मिल पाते थे ?

बाबा- सत्य है, पर पार्थसारथी के निकट आकर लोग अपने मन की तरंग लम्बाई में बृद्धि का अनुभव करते थे। वे उनका स्मरण और चिन्तन करने पर भी अपनी तरंग लम्बाई में बृद्धि होने से आनन्द का अनुभव करते थे जो सामाजिक चेतना के जाग्रत होने पर ही सम्भव था। पार्थसारथी के अनन्त सद्गुणों के चिन्तन में लोग उन्हीं में खो जाते थे, परमपुरुष का इस प्रकार चिन्तन करते उन्हीं में खो जाना रहस्यवाद कहलाता है। इस प्रकार सभी लोग उनसे अपना व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाये थे और केवल उन्हीं के सम्बन्ध में सोचना और उन्हीं का नाम सुनना चाहते थे जो प्रकट करता है कि वे नन्दन विज्ञान के स्वयं जन्मदाता थे अतः नन्दन विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में उनका परीक्षण कौन कर सकता है ? 

रवि- कुछ लोग मोहनविज्ञान की चर्चा करते पाए जाते हैं और कहते हैं कि कृष्ण तो सबको मोह लेते थे, यह क्या नन्दन विज्ञान से अलग है ?

बाबा- नन्दन विज्ञान में आनन्द का आदान प्रदान होता है, पर मोहन विज्ञान इससे भिन्न है। निःसन्देह मानवता ने इसके थोड़े से पक्ष को अनुभव किया है पर यह विज्ञान विशिष्ठ रूप से परमपुरुष से संबंधित है कृष्ण से सम्बंधित है। यहॉं कृष्ण से तात्पर्य दोनों बृज और पार्थसारथी कृष्ण से है। मोहन विज्ञान में ये दोनों एकसाथ मिल जाते हैं। मोहन विज्ञान में परमपुरुष, मनुष्यों को तन्मात्राओं या एक्टोप्लाज्मिक आकर्षण से अपने निकट खींचते हैं अथवा अन्य लोग उनके अनवरुद्ध आकर्षण से खिंचे चले जाते हैं। कृष्ण अपने आन्तरिक प्रेम से लोगों को अपने निकट खींचते हैं, मन में वे लोग सोचते हैं कि नहीं जाऊँगा, नहीं जाऊँगा पर फिर भी आकर्षण इतना अधिक होता है कि न चाहते हुए भी उनकी ओर चले जाते हैं यह है मोहन विज्ञान। नन्दन विज्ञान और मोहन विज्ञान में यही अन्तर है। यहॉं कृष्ण ही परमसत्ता होते हैं अन्य कोई नहीं और वे भक्तों को अपने व्यक्तिगत सम्बंधों से आकर्षित करते हैं। संसार से जुड़े होने के कारण तन्मात्राओं से परिचित लोगों को इन्हीं से परमपुरुष आकर्षित करते हैं पर ये तन्मात्रायें भौतिक संसार से सम्बंधित होती हैं मानसिक संसार से संबंधित नहीं होती हैं। परमपुरुष का जब गहराई से चिन्तन किया जाता है तो भक्त एक्टोप्लाजिमक सैलों से निकलने वाली गन्ध तन्मात्राओं को भौतिक संसार की तरह ही अनुभव करता है। इसी प्रकार रुप, रस, स्पर्श और शब्द तन्मात्राओं के बारे में भी घटित होता है। एक्टोप्लाज्मिक संसार में कृष्ण कहते हैं आओ, आना ही पड़ेगा ,तुम आने के लिये रोक नहीं सकते। पास आ जाने पर उनके सुन्दर रूपको देखकर ऑंखें चौंधिया जाती हैं तथा भक्त का प्रत्येक अंग अपने भीतर कृष्णमय ही अनुभव करता है और फिर उनसे पृथक नहीं रह सकता। इस प्रकार परमपुरुष तन्मात्राओं के माध्यम से सबको अपने अधिक निकट ले आते हैं, मोहन विज्ञान का यही सार तत्व है।

चन्दू- यह बृन्दावन क्या है?

बाबा- भक्तगण भौतिक बृन्दावन में नहीं वरन् भाव के बृन्दावन में यात्रा करते हैं। कृष्ण ने कहा भी है कि आघ्यात्मिक बृन्दावन छोड़कर वे एक कदम भी कहीं नहीं जाते। इस प्रकार भक्त के हृदय के बृन्दावन में बृजगोपाल और पार्थसारथी दोनों मिलकर एक हो जाते हैं और परमपुरुष का लीलानन्द पक्ष, नित्यानन्द पक्ष में बदल जाता है। इसलिये उत्तम यह है कि मोहन तत्व के आभास होते ही बिना देर किये उनकी शरण में आ जाना चाहिये।