कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पिछली पोस्ट से आगे....
31 दुर्गासप्तशती
ऋषि पाराशर के पुत्र व्यास के शिष्य जैमिनी, ईसा से 300 साल पहले हुए। उन्होंने अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए मांर्कंडेय से कुछ प्रश्न पूछे थे जिनका विवरण मार्कंडेय पुराण में है। इस पुराण के अंतिम 700 श्लोकों को दुर्गासप्तशती कहा जाता है। (साप्त माने सात और शती माने सौ)।सच्चाई यह है कि जैमिनी, मार्कंडेय द्वारा दिये गए उत्तरों से संतुष्ठ नहीं हुए। इसके बाद जैमिनी ने अपना अलग दर्शन प्रतिपादित किया जिसे ‘मीमांसा दर्शन’ कहा जाता है। यदि तर्क, विज्ञान और विवेक के अनुसार दुर्गासप्तशती का अध्ययन किया जाय तब जैमिनी की तरह कोई भी उने वर्णन से असहमत होगा। सभी सात सौ श्लोकों में केवल एक ही श्लोक काम का है और वह है-
‘‘सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयी जगत।
ततोहं विश्वरूपां तां नमामी परमेश्वरीम्।’’
अर्थात् इस समग्र संसार के सभी आकार और रूप देवीमय (दिव्यध्ऊर्जामय) हैं। इसलिए इस विश्व के रूप में मैं उस परमनियंत्रक दिव्यऊर्जा को प्रणाम करता हॅूं।
परन्तु कितना आश्चर्य है कि लोग सच्चाई को जाने बिना ही सामान्यतः भौतिक लाभ लेने के उद्देश्य से वर्णित काल्पनिक कहानियों के आधार पर चित्रित आकारों द्वारा अपने भक्ति भाव को प्रकट करते देखे जाते हैं!
32 पृथकता विरुद्ध एकता।
वह परमसत्ता केवल एक ही है। दार्शनिकों ने उसे अपने अपने ढंग से समझाने के लिए अनेक दार्शनिक नाम दिये हैं जैसे, परमब्रह्म, परमपुरुष, परमात्मा, आदि। वह परमसत्ता ‘स्वयंभू’ है। स्वयंभू का अर्थ है केवल ‘‘स्वयं होना’’ अर्थात् स्वयं अपने अस्तित्व को निर्धारित करना। इसलिए सभी कुछ जो हम देख पाते हैं और नहीं देख पाते, सभी कुछ उस परमसत्ता के मन के भीतर ही हैं अतः वे निर्पेक्ष हैं और पूरे ब्रह्मांण्ड का अस्तित्व उनके सापेक्ष।
जैसे, हमारा शरीर हमारे मन का ही विस्तार है उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत, गेलेक्सीज, ब्लेकहोल सहित पूरा ब्रह्माण्ड और स्पेस, टाइम आदि सब उनके मन का ही विस्तार है। हमें यह जानकर अजीब लगता है क्योंकि हम सभी उन्हें अपने से पृथक मानते हैं जबकि हम सब उन्हीं के मन के भीतर हैं। इसीलिए उपनिषदें बार बार उनसे अपनी पृथकता को भूलकर अपने ही हृदय में अनुभव करने की विधियों का पालन करने का मार्गदर्शन करती है।
जब तक हम अपने को उनसे पृथक मानते रहेंगे हम उस अमरत्व को अनुभव नहीं कर सकते। समुद्र के किनारे पर बैठकर समुद्र की गहराई का अनुभव नहीं किया जा सकता उसमें डूबना ही पड़ता है। इस तरह जब हम समुद्र के साथ अपनी एकता स्थापित कर लेते हैं तब हमें समुद्र क्या है यह अनुभूति हो जाती है। वास्तव में लोगों को पौराणिक कहानियों ने भ्रमित कर रखा है। हमें अपने तर्क, विज्ञान और विवेक का उपयोग करना चाहिए।
निरन्तर....