Wednesday, 7 October 2026

475 QUEST

 33

Friends! My dear friend, Mr. U.M. Pathak, has sought clarification regarding a significant point raised in my previous post (Point No. 32). Since this question might be on your minds as well, I am sharing the answer with all of you through this post—please benefit from it.

Mr. Pathak asked for an explanation of the statement made in Point No. 32: "Our body is merely an extension of our mind."

Answer—

Respected Mr. Pathak! Heartfelt thanks for asking this question. Before answering it, I would like to briefly describe the absolute state of the Supreme Consciousness and the emergence of the universe, so that the context of your question can be properly established. Indian philosophy holds that if anything truly exists, it is solely the Supreme Consciousness. In its absolute state, only the Supreme Consciousness exists—nothing else; at this stage, it remains immersed in a state of pure consciousness and bliss (*Chidananda*), with its *Trigunatmika Prakriti* (Nature composed of three attributes) under its control. As you know, the three attributes of this Nature—*Sattva*, *Rajas*, and *Tamas* (Sentient, Mutative, and Static)—are constantly vying with one another to assert their dominance. Amidst this interplay, whenever the influence of *Rajoguna* (the mutative attribute) prevails over the other two, consciousness begins to permeate the dormant Nature; it then evokes a sense of "existential feeling" (the realization of "I am" or "I exist") within the mind of the Supreme Consciousness—referred to as *Bhuma Man* or *Brahmik Man*, or simply the "Cosmic Mind." As this existential awareness awakens, the sentiment "I can do something"—representing the "Doer I"—arises within the Cosmic Mind. Simultaneously, the Supreme Entity conceives the thought, "Eko'ham Bahusyam" (I am one; let Me become many). Acting upon this command, Nature—by harmonizing its three attributes (*Gunas*) within a minute fraction of that very Mind—instantly creates this vast Multiverse, and the Supreme Entity experiences the feeling of the "Done I." Philosophers term these three states of the Supreme Entity's mind as *Mahat-tattva*, *Aham-tattva*, and *Chit-tattva*, respectively. Thus, it is said that the entire universe is merely an expansion of the Supreme Entity's mind. Clearly, we possess no separate existence of our own; we are all but infinitesimal fragments of His mental waves.

No matter how vast the expanse of the universe Nature creates, it remains perpetually drawn toward the Supreme Entity. In philosophy, this process of Nature evolving from "one to many" is termed *Sanchar*. However, no physical creation can remain separated from its primordial source indefinitely; it is destined to return to its original state. Consequently, when Nature begins to withdraw its creation and revert to the primordial state, the process is known as *Pratisanchar*. This entire cycle is called the *Brahma-chakra* or the "Cosmic Cycle." As the cycle progresses through 75 percent of its course, the biological mind—or "Unit Mind"—begins to gain prominence while evolving through various levels known as *Yonis*, and Nature gradually loosens its hold. Here, the consciousness of the Cosmic Mind once again enters the unit mind. As the distinct existential feeling, the ‘doer-I’ feeling, and the ‘done-I’ feeling—corresponding respectively to *Mahat Tattva* (intellect), *Aham Tattva* (ego), and *Chitta Tattva* (mind-stuff)—emerge, *Prakriti* (Nature) grants it a body—specifically the ‘human body’—so that it may strive to know itself and return to its original essence. Thus, to activate the unit mind, it receives a body equipped with five sensory organs and five motor organs, enabling it to experience the attraction of the Supreme Entity and seek the means to reach It. That is why it is said, "This body is merely an extension of our mind." In philosophy, the expansion of the Cosmic Mind—the universe—is termed the "Cosmic *Chitta*," while the expansion of the unit mind is referred to as the "Unit *Chitta*."

It is well known that the unit mind, becoming entangled in the colorful, illusory forms of *Prakriti* and mistaking them for everything, remains ensnared in them for countless lifetimes; it repeatedly acquires new bodies to experience the new *samskaras* (mental impressions) that are constantly being formed. When, by chance, the realization dawns that so many lives have passed in these worldly experiences without achieving anything of true worth, it begins to seek the Supreme Entity, drawn by Its attraction. It then takes refuge in a competent Guru, receives its *Beeja Mantra* (seed mantra), and commences *Sadhana* (spiritual practice). The moment all *samskaras* are eradicated, it realizes that the entities it once considered separate from itself are, in fact, "none other than I." Once this sense of separation is completely dispelled, the bliss born of self-realization is attained. The sole objective of all spiritual practices, worship, and disciplines is to "eliminate this sense of separation that has persisted across countless lifetimes." That is why the Upanishads declare:

‘‘सर्वाजीवे सर्वसंस्थे वृहन्ते तस्मिन् हंसो भ्राम्यन्ते ब्रह्मचक्रे।

पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुस्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति।’

Savajiive sarvsansthe vrahante tasmin hanso bhramyate bragmchakre.

Prithgaatmanam apostleram ca matva justastatastenamritvameti.”

"In that vast *Brahma-chakra* (Cosmic Cycle)—which encompasses all living beings and sustains the entire universe—the *Hamsa* (the individual soul) wanders." That is, all living beings continue to rotate in this Brahmachakra as long as they consider themselves separate from their original being.

Regards,

Dr. T.R. Sukul

474 जिज्ञासा

 33 

मित्रो! पिछली पोस्ट के बिन्दु क्रमांक 32 से संबंधित मेरे प्रिय मित्र यूएम पाठक जी ने एक गंभीर जिज्ञासा का समाधान मुझसे चाहा है। यह जिज्ञासा आपकी भी हो सकती है अतः मैं उसका उत्तर इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी को भी प्रेषित कर रहा हॅूं, लाभ उठाइए-  

पाठकजी ने पूछा है कि पोस्ट के बिन्दु क्रमांक 32 में लिखा है कि ‘‘हमारा शरीर हमारे मन का ही विस्तार है’’ इसे स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

आदरणीय पाठक जी! प्रश्न पूछने के लिए हृदय से धन्यवाद। आपके प्रश्न का उत्तर देने के पहले मैं उस परमसत्ता की निर्पेक्ष अवस्था और ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में आने का संक्षिप्त विवरण देना चाहूंगा ताकि आपके प्रश्न का उचित तारतम्य जोड़ा जा सके। भारतीय दर्शन में यह माना गया है कि यदि किसी का अस्तित्व है तो वह है केवल परमसत्ता। जब वह अपनी निर्पेक्ष अवस्था में होता है तो केवल वही होता है अन्य कुछ नहींय इस समय वह अपने चिदानन्द भाव में लीन रहता है और उसकी  त्रिगुणमयी प्रकृति उसके अधीन होती है। आपको मालूम है कि त्रिगुणमयी प्रकृति के सत, रज और तम (Santient, Mutative and Static) ये तीनों गुण अपने अपने वर्चस्व को बनाए रखते के लिए परस्पर होड़ में बने ही रहते हैं। इस होड़ में जब कभी रजोगुण का प्रभाव अन्य दो गुणों पर हावी हो जाता है तब सोई हुई प्रकृति में चेतना का संचार होने लगता है और वह परमसत्ता के मन, या ‘भूमा मन’ या ‘ब्राह्मिक मन’ अर्थात् ‘‘Cosmic Mind’’ में अपने ‘‘अस्तित्व बोध’’ एक्जिटेंशियल फीलिंग, (I am OR I Exist), का आभास कराती हैं। इस आस्तित्विक बोध के जाग्रत होते ही कास्मिक माइंड में यह भाव जागृत होता है कि ‘मैं कुछ कर सकता हॅूं’ अर्थात् (Doer I) , तब प्रकृति  कास्मिक मांइड के आदेश की प्रतीक्षा करते ही परमसत्ता का विचार बनता है कि ‘‘एकोहं बहुस्याम’’ अर्थात् मैं तो अकेला हॅूं अब मैं अनेक होना चाहता हॅूं  और फिर प्रकृति उनकी आज्ञा से ही उन्हीं के मन के थोड़े से अंश में अपने तीनों गुणों को समन्वित करके इस महाब्रह्मांड ‘Multiverse’ का निर्माण क्षण भर में कर डालती है और वह परमसत्ता ‘‘Done I’’ फीलिंग का अनुभव करती है।  परम सत्ता के मन की इन जीन अवस्थाओं को तत्ववेत्ता क्रमशः महत् तत्व’, ‘अहं’ तत्व’ और ‘चित् तत्व’’ कहते हैं। ’इसीलिए कहा गया है कि यह समग्र ब्रह्मांड उस परमसत्ता के मन का ही विस्तार है। स्पष्ट है कि हमारी अपनी कोई पृथक सत्ता नहीं है हम सब उन्हीं की मानसिक तरंगों के बहुत छोटे से अंश हैं।

प्रकृति कितने ही अमाप्य विस्तार में ब्रह्मांड को रच डाले परंतु परमसत्ता के आकर्षण में वह उन्हीं की ओर खिचाव का अनुभव करता रहता है। प्रकृति के इस ‘‘एक से अनेक’’ निर्माण करने के कार्य को दर्शन में ‘संचर’ क्रिया कहते हैं। परन्तु कोई भी भौतिक निर्माण अपने मूल अस्तित्व से अनन्त काल तक दूूूूूूूर नहीं रह सकता उसे अपने मूल स्वरूप में वापस आना ही पड़ता है। इसलिए जब प्रकृति अपने इस निर्माण को समेट कर मूल अवस्था में लौटने का कार्य करने लगती है उसे दर्शन में ‘प्रतिसंचर’ क्रिया कहते हैं। इस पूरे चक्र को ‘‘ब्रह्मचक’’ या ‘‘काॅस्मिक साइकिल’’’ कहा जाता है। जब ब्रह्मचक्र का 75 प्रतिशत भाग तय होने लगता है तो विभिन्न स्तरों, जिन्हें योनियाॅ कहा जाता है से आगे बढ़ता हुआ जैविक मन अर्थात् ‘यूनिट माइंड’ की प्रधानता बढ़ने लगती है और प्रकृति अपनी पकड़ कुछ कम करती जाती है। यहाॅं फिर से वही कास्मिक माइंड के समय की चेतना यूनिट माइंड में आने लगती है जिसमें पृथक एक्जिस्टेंशियल फीलिंग,  ‘डूअर आई फीलिंग’ और ‘डन आई फीलिंग’ अर्थात् महत् तत्व, अहं तत्व और चित् तत्व के क्रमशः आते ही प्रकृति उसे वह शरीर अर्थात्‘मानव शरीर’ देती है जिससे वह अपने आप को जानने का प्रयास करते हुए मूलस्वरूप में वापस जा सके। इस प्रकार यूनिट माइंड को सक्रियता देने के लिए पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कमेंन्द्रियों युक्त यह शरीर मिल जाता है ताकि वह इनकी सहायता से परमसत्ता के आकर्षण का अनुभव करे और उन तक जाने का उपाय खोजे। इसीलिए कहा गया है कि ‘‘यह शरीर हमारे मन का ही विस्तार है।’’ दर्शन में कास्मिक माइंड के विस्तार ‘ब्रह्मांड’ को ‘‘कास्मिक चित्त’’ कहा गया है और यूनिट माइंड के विस्तार  को इस शरीर का   ‘‘यूनिट चित्त’’ कहा जाता है।

सब जानते हैं कि प्रकृति के रंगविरंगे मायावी स्वरूपों में उलझकर इकाई मन इन्हीं को सब कुछ समझकर इन्हीं में अनेक जन्मों तक उलझा रहता है और क्षण क्षण बनने वाले नए नए संस्कारों को भोगने के लिए नए नए शरीर पाकर उन्हें भोगता रहता है। जब कभी संयोग से उसके भीतर यह भाव आता है कि यह सभी भोगते हुए कितने जीवन बीत गए और उपलब्धि कुछ नहीं हुई तब वह परमसत्ता के आकर्षण में उसे खोजने लगता है और योग्य गुरु की शरण में जाकर आपना ‘‘बीजमंत्र’’ पाकर साधना करने लगता है । जिस क्षण सभी  संस्कार शून्य हो जाते हैं वह पाता है कि मै जिन्हें अपने से पृथक मानता था वह तो ‘मैं ही हॅूं।’ यह पृथकता अच्छी तरह दूर हो जाने पर आत्मानुभूतिजन्य आनन्द प्राप्त होता है। सभी प्रकार के आध्यात्मिक उपायों और साधना पूजा आदि का एकमेव उद्देश्य यही है कि ‘जन्मजन्मान्तरों की यह पृथकता दूर करना।’ इसीलिए उपनिषदें कहती हैं-

‘‘सर्वाजीवे सर्वसंस्थे वृहन्ते तस्मिन् हंसो भ्राम्यन्ते ब्रह्मचक्रे। 

पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुस्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति।’’

अर्थात् इस ब्रह्मचक्र में सभी जीव तब तक घूमते रहते हैं जब तक वे अपने आप को अपनी मूल सत्ता से पृथक मानते रहते हैं।

सादर,

डाॅ टी. आर. शुक्ल


Sunday, 4 October 2026

473 कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पिछली पोस्ट से आगे....

 कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पिछली पोस्ट से आगे....

31  दुर्गासप्तशती

 ऋषि पाराशर के पुत्र व्यास के शिष्य जैमिनी, ईसा से 300 साल पहले हुए। उन्होंने अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए मांर्कंडेय से कुछ प्रश्न पूछे थे जिनका विवरण मार्कंडेय पुराण में है। इस पुराण के अंतिम 700 श्लोकों को दुर्गासप्तशती कहा जाता है। (साप्त माने सात और शती माने सौ)।सच्चाई यह है कि जैमिनी, मार्कंडेय द्वारा दिये गए उत्तरों से संतुष्ठ नहीं हुए। इसके बाद जैमिनी ने अपना अलग दर्शन प्रतिपादित किया जिसे ‘मीमांसा दर्शन’ कहा जाता है। यदि तर्क, विज्ञान और विवेक के अनुसार दुर्गासप्तशती का अध्ययन किया जाय तब जैमिनी की तरह कोई भी उने वर्णन से असहमत होगा। सभी सात सौ श्लोकों में केवल एक ही श्लोक काम का है और वह है-

‘‘सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयी जगत। 

ततोहं विश्वरूपां तां नमामी परमेश्वरीम्।’’ 

अर्थात् इस समग्र संसार के सभी आकार और रूप देवीमय (दिव्यध्ऊर्जामय) हैं। इसलिए इस विश्व के रूप में मैं उस परमनियंत्रक दिव्यऊर्जा को प्रणाम करता हॅूं।

परन्तु कितना आश्चर्य है कि लोग सच्चाई को जाने बिना ही सामान्यतः भौतिक लाभ लेने के उद्देश्य से वर्णित काल्पनिक कहानियों के आधार पर चित्रित आकारों द्वारा अपने भक्ति भाव को प्रकट करते देखे जाते हैं!

32 पृथकता विरुद्ध एकता।

वह परमसत्ता केवल एक ही है। दार्शनिकों ने उसे अपने अपने ढंग से समझाने के लिए अनेक दार्शनिक नाम दिये हैं जैसे, परमब्रह्म, परमपुरुष, परमात्मा, आदि। वह परमसत्ता ‘स्वयंभू’ है। स्वयंभू का अर्थ है केवल ‘‘स्वयं होना’’ अर्थात् स्वयं अपने अस्तित्व को निर्धारित करना। इसलिए सभी कुछ जो हम देख पाते हैं और नहीं देख पाते, सभी कुछ उस परमसत्ता के  मन के भीतर ही हैं अतः वे निर्पेक्ष हैं और पूरे ब्रह्मांण्ड का अस्तित्व उनके सापेक्ष।

जैसे, हमारा शरीर हमारे मन का ही विस्तार है उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत, गेलेक्सीज, ब्लेकहोल सहित पूरा ब्रह्माण्ड और स्पेस, टाइम आदि सब उनके मन का ही विस्तार है। हमें यह जानकर अजीब लगता है क्योंकि हम सभी उन्हें अपने से पृथक मानते हैं जबकि हम सब उन्हीं के मन के भीतर हैं। इसीलिए  उपनिषदें बार बार उनसे अपनी पृथकता को भूलकर अपने ही हृदय में अनुभव करने की विधियों का पालन करने का मार्गदर्शन करती है।

जब तक हम अपने को उनसे पृथक मानते रहेंगे हम उस अमरत्व को अनुभव नहीं कर सकते। समुद्र के किनारे पर बैठकर समुद्र की गहराई का अनुभव नहीं किया जा सकता उसमें डूबना ही पड़ता है। इस तरह जब हम समुद्र के साथ अपनी एकता स्थापित कर लेते हैं तब हमें समुद्र क्या है यह अनुभूति हो जाती है। वास्तव में लोगों को पौराणिक कहानियों ने भ्रमित कर रखा है। हमें अपने तर्क, विज्ञान और विवेक का उपयोग करना चाहिए।

निरन्तर....

Wednesday, 16 September 2026

472 कुछ महत्वपूर्ण तथ्य.. पिछली पोस्ट से आगे..

 


कुछ महत्वपूर्ण तथ्य.. पिछली पोस्ट से आगे...

28 रूढ़ीवादी पंडित और वेद

ऋग्वेद को प्राचीन काल में प्रमुख वेद माना जाता था केवल इसलिए नहीं कि वह सबसे पुराना था वरन् इसलिए कि वैदिक दीक्षा ऋग्वेद के सावित्र ऋक पर न्यूनाधिक रूप से आधारित थी। आध्यात्मिक साधक के लिए भौतिक संसार और आध्यात्मिक संसार में संतुलन बनाए रखकर आगे बढ़ने के क्षेत्र में सहायक होने के दृष्टिकोण से यजुर्वेद, ऋग्वेद का अतिक्रमण कर जाता है। यजुर्वेद में शब्दों का उच्चारण और ध्वनि विज्ञान, ऋग्वेद से बिलकुल भिन्न है। यजुर्वेद, तन्त्र के अधिक निकट है और अथर्व भी लगभग हर पद पर तन्त्र से मिश्रित पाया जाता है। एक समय तो ऐसा था जब रूढ़ीवादी पंडितों ने अथर्ववेद के अनुयायियों को सामाजिक रूप से वहिष्कृत कर दिया था और वे कहते थे कि 

‘‘ अथर्वान्नाम मा भुन्जीथाः’’

अर्थात् अथर्ववेद के अनुयायियों का भोजन स्वीकार नहीं करना चाहिए, कितना आश्चर्य है ! ! !


29 ‘मामेकम् शरणम् ब्रज’

मैंने अनेक विद्वानों को इस श्लोक के आधार पर कृष्ण की आलोचना करते सुना है। उनका मानना है कि कृष्ण कहते हैं कि सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरे धर्म की शरण में आ जाओ यही सर्वश्रेष्ठ है। आइए इन विद्वानों के इस कथन पर विचार करें-

संस्कृत में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने अर्थात् ‘चलने’ के अर्थं में प्रयुक्त किये जाने वाले अनेक शब्द हैं जैसे,

गच्छ- गच्छति, सामान्यतः चलना या जाना। चल्- चलति, सामान्य रूप में चलना। चर्-चरति, खाते हुए चलना। अट्- अटति, पर्यटति, ज्ञान पाने के लिए चलना। ब्रज्- ब्रजति, आनन्द पूर्वक चलना।

सामान्यतः संसार के सभी दार्शनिक विचार उस परमसत्ता की ओर जाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जिसने इस समग्र सृष्टि को रचा है। कुछ कहते हैं वह स्वर्ग में रहता है और हम सबसे श्रेष्ठ है, हमें उसे प्रसन्न रखना चाहिए अन्यथा वह हमें दंडित कर नर्क की यातनाएं देगा । कुछ कहते हैं कि वह मंदिरों या तीर्थों में रहता है वहॉं जाकर हमें अपनी सुख समृद्धि की प्रार्थना करना चाहिए। कुछ कहते हैं कि वह तो सर्वव्यापी हैं उन्हें कहीं ढूॅंड़ने की जरूरत नहीं है। कुछ के अनुसार वह हमारे भीतर ही हैं अतः उन्हें अपने मन की गहराई में ही खोजना चाहिए। कुछ कहते हैं कि यह समग्र ब्रह्मॉंड उन परमपुरुष के मन की विचार तरंगे है अतः हम सभी उनकी ही विचार तरंगों के छोटे से भाग हैं इसलिए उनसे पृथक नहीं हैं उन्हीं के भीतर हैं। जब सब कुछ उन्हीं के भीतर है बाहर कुछ नहीं तो वह तो हमारे परमपिता हुए अतः, हमें अपना पृथक अस्तित्व भूलकर उनकी ओर प्रेमपूर्वक प्रसन्नता से चलने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य जीवन का एकमात्र यही लक्ष्य है। 

सच है, अपने पिता से डरने का क्या कारण? आनन्दपूर्वक उनका चिन्तन, मनन और निदिद्यासन (अर्थात् उनकी समीपता का अनुभव करना और ध्यान करना) करते हुए उनकी ओर जाने का कार्य ही कीर्तन, भजन, पूजन, साधन, उपासन और आराधन कहलाता है, अन्य सब व्यर्थ है। इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं कि ‘‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शरणम् ब्रज’’ अर्थात्, पृथकता, चिन्ता, भय और रोना (ये सब द्वितीयक धर्म, यानी सभी उपधर्म) छोड़कर, केवल मेरी ओर (प्राथमिक धर्म यानी प्रधान धर्म) आनन्दपूर्वक चले आओ । यदि चलते हुए गिरने से चोट लग जाए तो तुम्हारा पिता गुणकारी मरहम लगा कर ठीक कर देगा, धूल को पोंछ कर स्वच्छ कर देगा, चिन्ता की कोई बात नहीं । यही समझाने के लिए उन्होंने पूर्वोक्त लगभग समानार्थी शब्दों में से  ‘‘ब्रज्’’, ब्रजति अर्थात् ‘‘आनन्द पूर्वक चलना’’ को ही अपने कथन में प्रयुक्त किया है।

परन्तु, देखो तो! वह लगातार बुला रहे हैं और हम, डरकर उनसे दूर भागते जा रहे हैं प्रकृति के हर क्षण बदलते मायावी स्वरूपों से आकर्षित होकर । इस विचित्र दुनिया के सतत रूपान्तरित होते वर्णक्रम को हमने सबकुछ मान लिया है! ! !

निरंन्तर...


Monday, 31 August 2026

471 विचारणीय महत्वपूर्ण शब्द पिछली पोस्ट से आगेः

 


विचारणीय महत्वपूर्ण शब्द पिछली पोस्ट से आगेः-

27 गायत्री,  

 वेदों में मुख्यतः सात प्रकार के छंद पाए जाते हैं, गायत्री, उष्णिक, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, ब्रहती, जगती, और पॅंक्ति। इसके अलावा वैदिक भाषा में कोई सर्वस्वीकृत व्याकरण नहीं थी अतः छंद और प्रचलित अलिखित व्याकरण के बीच भिन्नताओं को इस नियम के अनुसार समाधान किया जाता था कि व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार छंद को काट छॉंट कर घटा बढ़ाकर ध्वनि को व्यवस्थित कर सकता था जिससे वह छंद यथावत बना रहे। एक उदाहरण स्वीकृत ऋक 310/62 का है, जिसे सामान्यतः गायत्री मंत्र कहा जाता है, जो यथार्थतः सावित्र ऋक है। गायत्री एक विशेष छंद का नाम है, मंत्र का अर्थात् ऋक का नहीं। इस गायत्री में परमपुरुष को ‘‘सविता’’ के नाम से संबोधित किया गया है। इस शब्द की व्युत्पत्ति है , सु +त्रन् = त्रक  इसलिए इसे ‘‘सावित्र ऋक’’ कहा गया है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के एक सूक्त में कहा गया है कि 

नासदासीन्नो सदासीतदानीम, नासीद्राजो न व्योमा परो यत।

इसका प्रारंभ शब्द ‘नासद’ से किया गया है इसलिए इसका नाम हुआ ‘नासदीय सूक्त’ । पूर्वोक्त ‘सावित्र ऋक’ गायत्री छंद में रचा गया है जिसमें आठ शब्दॉंश होते हैं। इसकी तीन लाइनें हैं इसलिए कुल चौबीस शब्दॉंश हैं। ऋक इस प्रकार है,

तत्सवितुर्वरेण्यम

भर्गो देवस्य धीमही

धियो यो नः प्रचोदयात्।

‘‘अर्थात्, परम पिता, जिसने सृष्टि को सात स्तरों ( लोकों ) में निर्मित किया है, उसके दिव्य तेज का हम ध्यान करते हैं जिससे वह हमारी बुद्धि को शुद्ध कर आनन्दित पथ की ओर जाने में मार्गदर्शन करे।’’

अब यदि हम इस ऋक का विश्लेषण करें तो दूसरी लाइन में आठ शब्दॉंश- भर, गो, दे, व, स्य, धी, म और ही ; तथा तीसरी लाइन में भी आठ शब्दॉंश - धि, यो, यो, नः, प्र, चो, द और यात् पाए जाते हैं। परन्तु पहली लाइन में केवल सात शब्दॉंश - तत् स, वि, तुर, व, रे, और न्यं पाए जाते हैं अर्थात् इस लाइन में एक शब्दॉंश की कमी है अतः इसे उच्चारित करने के समय आज अथवा तत्समय भी तत्कालीन प्रचलित अलिखित व्याकरण नियमों का उल्लंघन होता है। इसलिए इसे इस प्रकार उच्चारित किया जाता है कि आठ शब्दॉंश हो जाएं, जैसे, तत् स, वि, तुर, व, रे, नि, अम् ।

मंत्र के प्रारंभ में ‘‘ओम् भूर्भुवः स्वः ओम् ’’ जोड़ दिया जाता है और अन्त में ओम् जोड़ा जाता है। यह मूलतः ऋग्वेद में नहीं है, ये अथर्ववेद में है। यह मंत्र परमब्रह्म के सप्त लोकों की सृष्टि का सामूहिक अभिव्यक्तिकरण है- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, और सत्य। परन्तु जहॉं स्थूल , सूक्ष्म और कारण नामक लोकों को संक्षिप्त रूप में प्रयुक्त किया जाता है वहॉं केवल ‘‘भूभुर्वः.स्वः’’ इन तीन नामों का ही उच्चारण किया जाता है जिनके लिए ‘‘महाव्याहृति’ (अर्थात् परमोच्चारण) शब्द का उपयोग किया जाता था। ये मूलतः ऋग्वैदिक ‘सावित्र ऋक’ के भाग नहीं हैं। सावित्र ऋक के उच्चारण का अभ्यास करने के लिए 

‘‘ ओम भूभुर्वः स्वः 

ओम् तत्सवितुर्वरेण्यं 

भर्गो  देवस्य धीमही 

धियो यो नः प्रचोदयात् ओम्’’

 इस प्रकार महाव्याहृति को जोड़कर ‘‘सावित्र ऋक ’’ का अर्थ प्रबल किया जाता है। इसे जोड़ने का कारण यह है-  महाव्याहृति के जोड़ने पर मंत्र का अर्थ स्पष्ट हो जाता है जैसे, ‘‘इन भूः भुवः स्वः अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण लोकों में हम सविता (अर्थात् परमपिता) के प्रखर तेज का ध्यान कर रहे हैं जिससे वह हमारी ‘धी’ अर्थात् बुद्धि को सच्चाई के रास्ते पर चल पाने में मार्गदर्शन करें ।’’ परमपुरुष से इस मंत्र के द्वारा आध्यात्मिक दिशा पाने के लिए प्रेरणा पाने का प्रयत्न करना ‘‘वैदिक दीक्षा’’ कहलाता है। बाद में जब व्यक्ति आध्यात्मिक रास्ते पर चलने के लिए तत्संबंधी उचित निर्देश पा जाता है तो इसे ‘‘तान्त्रिकी दीक्षा’’ कहते हैं।


Thursday, 27 August 2026

470 विचारणीय महत्वपूर्ण शब्द पिछली पोस्ट से आगेः

 कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु पिछली पोस्ट से आगे-

23. जय हो- हम सभी के पास इन तेतीस देवताओं अर्थात् ऊर्जा केन्द्रों का समूह होता है जिसे केवल एक ही परमनियंत्रक सत्ता जिसे ब्रह्म कहते हैं नियंत्रित करता है अतः मनुष्यमात्र का कर्तव्य है कि इनकी सहायता से अपनी तमोगुणी और रजोगुणी प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष कर सत्य में प्रतिष्ठित होने की विजय प्राप्त करे और अपने जीवन के मुख्य लक्ष्य इस परमपुरुष तक पहॅुंचने का कर्म करे। जितने भी महापुरुष हुए है और जिन्हें हम देवतुल्य पूजते हैं वे सभी भी हमारी ही तरह सामान्य रहे हैं परंतु उन्होंने सभी जड़ प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष कर विजय पायी और अद्वितीय कहलाये। उनकी जय बोलने का अर्थ यह है कि हम अपनी ही जय बोलते हैं और अपेक्षा करते हैं कि उनकी ही तरह हम अपने आदर्श और व्यक्तित्व को समेकित करने में सफलता पायें।

24 ऋक 

 ऋषियों के द्वारा संग्रहित प्रारंभिक ज्ञान को केवल एक वेद अर्थात् ऋग्वेद कहा जाता था । ऋक़ क्विप =ऋक । वैदिक क्रिया ऋक का अर्थ है ‘ महिमामंडन करना ’ (गीत से या सामान्य भाषा में) ‘‘ऋक’’ का संस्कृत में अर्थ है ‘स्तवन’ करना। प्राचीन समय में साधु लोग प्रकृति के विभिन्न रूपों को किसी न किसी देवता का खेल मानते थे अतः उन्होंने उनके लिए स्तवन या भजन करना प्रारंभ किया। जब उन्होंने उषा, इन्द्र, पर्जन्य, मातरिष्वा, वरुण आदि के भजन गाए तब उन्हें ‘साम’ कहा गया। उस समय तक लिपि का अनुसंधान नहीं हुआ था इसलिए शिष्य अपने गुरु से मौखिक शिक्षा को ग्रहण किया करते थे। ये सत्य के वचन थे, ज्ञान के वचन थे अतः उन्हें जानकर तत्कालीन असंस्कृत लोग संस्कृति के प्रकाश की ओर बढ़ने लगे इसलिए उन्हें ‘वेद’ या ‘ज्ञान’ कहा गया।

25 वेद 

वैदिक क्रिया ‘विद’ का अर्थ है ‘‘जानना’’ इस में ‘अल’ प्रत्यय जोड़ने से ‘वेद’ शब्द बनता है जिसका अर्थ है ‘‘ज्ञान’’। शब्द ‘वेद’ का लिखित रूप देखकर कुछ स्वर-विज्ञानियों का विचार है कि इसे ‘घञ’ प्रत्यय लगाकर बनाया गया हैय तो भी, यही सही है कि उसे ‘अल’ प्रत्यय लगाकर बनाया गया है और वह पुल्लिंग है। चूँकि लिपि के अभाव में उसे गुरु से मौखिक सुनकर याद रखा जाता था इसलिए उसका दूसरा नाम ‘श्रुति’ है। श्रु़ क्तिन= श्रुति। क्रिया ‘श्रु’ का अर्थ है, सुनना। इसलिए श्रुति का एक अर्थ है ‘कान’  और इसीलिए कहा गया है कि जो कान से सुनकर याद रखा गया है वह है ‘वेद’ । वेदों के सबसे पुराने भाग के प्रत्येक श्लोक को ‘ऋक’ कहा गया है, जब अनेक श्लोकों को एक साथ रखकर किसी विचार को प्रदर्शित किया जाता है तो उसे कहा गया है ‘सूक्त’  और अनेक सूक्तों को संग्रहित कर बनाया गया है ‘मंडल’।

26 ऋग्वेद

ऋग्वेद बहुत पुराना है इसके अतिरिक्त यह भी निश्चित है कि कृष्णद्वैपायन व्यास ने वेदों को उनकी प्राचीनता के अनुसार सबसे पुराना, मध्य, और पश्चात्वर्ती, इन तीन अलग अलग भागों में बहुत पहले विभाजित कर दिया था और  उन्हें क्रमशः ऋक, यजुः और अथर्व नाम दिया गया।। ऋग्वेद का रचनाकाल लगभग पन्द्रह हजार वर्ष से दस हजार वर्ष पूर्व के बीच का है जबकि यजुर्वेद का दस हजार से सात हजार वर्ष के बीच का और अथर्ववेद का सात से पाॅंच हजार वर्ष के बीच का माना जाता है। सामवेद कोई वेद नहीं है, शब्द ‘साम’ का अर्थ है ‘गीत या भजन’। सामवेद को पूर्वोक्त सभी वेदों के संगीत वाले भाग को अलग कर एक साथ प्रस्तुत किया गया जिसे सामवेद का नाम दिया गया है। अर्थात् सामवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद सभी में पाया जाता है। 

जैन साहित्य में वेदों विशेषतः सामवेद का उल्लेख मिलता है जो कि तत्कालीन प्राकृत भाषा में लिखा गया है। वर्धमान महावीर 2500 वर्ष से कुछ पहले हुए थे और प्राकृत भाषा का उद्गम चार से पाॅंच हजार वर्ष के बीच हुआ। इस प्रकार वेदों का जो भी भाग सबसे बाद का माना जाय वह निश्चय ही पाॅंच हजार वर्ष से कम पुराना नहीं हैं। जहाॅं तक जैन साहित्य का संबंध है उसका कुछ भाग वर्धमान महावीर के पहले, कुछ पश्चात्वर्ती जैन सन्तों के द्वारा रचित हुआ था तो भी वे किसी भी प्रकार से पाॅंच हजार वर्ष से पहले के नहीं हैं।


Sunday, 23 August 2026

469 कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय विंदु पिछली पोस्ट से आगेः-

 कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय विंदु पिछली पोस्ट से आगेः-

21. आत्मा - वह जो हमें अपने होने का साक्ष्य देता है, वही आत्मा है। वह हमारे भीतर ही रहता है। हम सभी अपने अपने अस्तित्व का अनुभव करते हैं पारस्परिक सापेक्षता से। यदि अन्य कोई भी न हों तो यह कैसे जानोगे? यही बात समझने की है। केंचुआ जानता है कि वह केंचुआ है। पेड़ जानता है कि वह पेड़ है। पर सूर्य नहीं जानता कि वह सूर्य है। जबकि सूर्य से ही ऊर्जा पाने वाले हम सब सूर्य के बारे में बहुत कुछ जानते हैं और जानने की कोशिश कर रहे हैं। किसी को उसके अस्तित्व का बोध और साक्ष्य देने वाली सत्ता को ही जीवात्मा कहते हैं। आष्चर्य यह है कि हम इसे भूलकर, अन्य सब याद रखने और पाने के प्रयास में, अनेक जन्मों तक आवागमन के चक्र में भटकते हुए  कष्ट पाते रहते हैं।

22. तेतीस करोड़ देवता-  देवताओं की संख्या के संबंध में सच्चाई यह है कि हमारे शरीर के संचालन के लिये प्रकृति ने तेतीस करोड़ नर्व सैल और नर्व फाइवर्स बनाये हैं जिन्हें नियंत्रित करने के लिये कुल तेतीस नाड़ियाॅं या ऊर्जा केन्द्र ही प्रधान होते हैं । ये परस्पर अपने व्यक्तित्व और आदर्श से ओतप्रोत होने के कारण देवता कहलाते हैं। जो कुछ मनुष्य षरीर के भीतर है वही ब्रह्मांड में गेलेक्सियों, तारों, वनस्पतियों और जीवधारियों के रूप में भी है।

इन्ही ऊर्जा केन्द्रों में एकादश रुद्र, रुद्र का अर्थ है रुलाना। (अर्थात् ये हैं, पाॅंच ज्ञानेन्द्रियाॅं, पाॅंच कर्मेद्रियाॅं और एक मन कुल ग्यारह) कहते हैं। जब कोई व्यक्ति अपना शरीर छोड़ देता है तो ये एकादश अवयव भी एक एक कर चले जाते हैं और संबंधीजन रोने लगते हैं। चूंकि ये सबको अंत में रुलाते हैं इस लिये रुद्र कहलाते हैं। 

द्वादश आदित्य,  आदित्य का अर्थ है ‘लेना‘ चूंकि साल के बारह माह धीरे धीरे व्यक्ति की आयु को लेते जाते हैं अतः आदित्य कहलाते हैं। (अर्थात इनमें वर्ष के बारह माह सम्मिलित होते हैं वही आदित्य हैं)

अष्ट वसु , (अर्थात वास स्थान ), चूंकि जीव का वासस्थान भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाष, सूर्य, चंद्र और अंतरिक्ष, इन आठ स्थानों में माना गया है अतः ये अष्ट वसु कहलाते हैं।

एक इंद्र अर्थात् ऊर्जा या कर्मशक्ति और 

एक प्रजापति अर्थात् यज्ञ या कर्म ।

इस प्रकार इनकी कुल संख्या (11+12+8+1+1 =33) तेतीस हैं। यह, जब देह में  होते हैं तब दैहिक देवता और ब्रह्म में होने पर में ब्राह्मी देवता कहलाते हैं । इसलिये जो देह में है वही ब्रह्माॅंड में भी है, यह कहा जाता है।