Friday, 17 April 2026

464 बाबा की क्लास विषय- महाभारत में महानायक कौन?

 बाबा की क्लास 

विषय- महाभारत में महानायक कौन?

क्लास में बाबा के आने के पहले आज रवि और राजू की बहस हो रही है-

रवि- राजू! तुम जानते हो कि भारत और महाभारत में क्या अन्तर है? 

राजू - इसमें कौन सी बड़ी बात है, भारत माने हमारा देश इंडिया और महाभारत माने कौरव पॉंडवों की लड़ाई और क्या?

रवि- इसमें क्या सही है? 

चंदु बीच में ही बोला अरे दोनों ही सही हैं। इसी बीच बाबा ने आकर इस प्रकार समझाया- 

बाबा-

‘महाभारत‘ केवल कौरवों  और पांडवों की लड़ाई नहीं है और न ही उसके नायक युधिष्ठिर हैं न ही दुर्योधन, उसके महानायक हैं श्रीकृष्ण। छोटे छोटे राज्यों (मगध, अंग, बंग, कलिंग) में विभाजित भारत के राजा अपने अपने स्वार्थ और वर्चस्व के लिए लड़ते रहते थे, अलग अलग धार्मिक मान्यताओं में उलझे लक्ष्यविहीन थे, इन्हीं सबके एकीकरण का महान लक्ष्य था श्रीकृष्ण का। 

भौगोलिक दूरियों, भूभागों और बिखरी जातियों को परस्पर जोड़ने  के लिए उन्होंने अंतर्जातीय विवाहों की प्रेरणा दी। पश्चिमी  भूभाग (पाञ्चाल और कुरु) के निवासी पांडवों  के सम्बन्ध को पूर्वी प्रांतों तक फैलाया। भीम का विवाह नागालैंड की मंगोल कन्या हिडिम्बा से कराया, अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा मणिपुर की मंगोल कन्या थी, कृष्ण ने स्वयं नेफा की रुक्मिणी से विवाह किया और छोटी बड़ी जातियों को मिला कर भारतीय जाति का बड़ा रूप खड़ा किया जिससे ‘एक समाज‘ गठित हो सका।

धर्म के नाम पर भी अनेक विधियां प्रचलित थीं, बड़े बड़े ऋषि मुनि थे, अनेक संप्रदाय थे, महाराज जरासंध अविद्या तंत्र के उपासक थे, महाराज जयद्रथ शैव थे, महर्षि गर्ग वैष्णव थे, मामा कंस शाक्त थे, इसके आलावा कौल साधकों का वर्ग भी था। कृष्ण ने इन सभी को पाप और पुण्य दो ध्रुवों में ध्रुवीकृत किया। महाभारत का युद्ध कराकर पाप का अंत कराया। इस प्रकार टुकड़ों में बंटे भारत और भारत के धर्म को दृढ़ प्लेटफार्म देकर बड़े आदर्श में गूँथ कर एक महान भारत बनाने का कार्य ही महाभारत है जिसके महानायक हैं श्रीकृष्ण।


Tuesday, 7 April 2026

463 बाबा की क्लास : कुछ भ्रान्तियॉं विषय : (भगवान और उनके नाम)

 बाबा की क्लास : कुछ भ्रान्तियॉं

विषय : (भगवान और उनके नाम)

इन्दु- बाबा! जब यह समस्त ब्रह्मॉंड एक ही परम सत्ता की कल्पना का विस्तार है तो अनेक लोग उसे अलग अलग नाम देकर अपने पसंद के नाम को ही सर्वश्रेष्ठ कहकर झगड़ा क्यों करते रहते हैं?

बाबा- अपने अपने संज्ञानात्मक प्रक्षेप के अनुसार अनेक लोग एक ही परमसत्ता को विभिन्न नाम दे देते हैं। आध्यात्मिक साधक को इन नामों और उनसे जुड़ी महामनस्कता के झगड़े में नहीं पड़ना चाहिये क्योंकि इन सबके भीतर एक समान आत्मा रहती है।

राजू- मैं ने कई लोगों को ‘शिव‘ और ‘नारायण‘ इन नामों पर बहस करते देखा है?

बाबा- तुमने कभी इन नामों का विश्लेषण करके देखा है? नहीं, तो चलो इनका विश्लेषण करके देखें । ‘शिव‘ का वास्तविक अर्थ क्या है, ‘शिव’ हैं अखंडसत्ता और ‘शक्ति‘ का अर्थ है क्रियात्मक सत्ता। इसलिए शिव और शक्ति एक ही वास्तविकता के दो पक्ष हैं। किसी भी क्रिया में दो सिद्धान्त होते हैं एक ज्ञानात्मक और दूसरा क्रियात्मक। मानलो आप कोई मशीन चला रहे हैं, इसमें दो सिद्धान्त हैं एक मशीन को मस्तिष्क की सहायता से दिया गया दिशानिर्देश अर्थात् संज्ञानात्मक और दूसरा मासपेशियां जो संज्ञान के दिशानिर्देश पर मशीन संचालित करतीं हैं अर्थात् क्रियात्मकता। यह ब्रह्मॉंड भी संज्ञानात्मक सिद्धान्त और क्रियात्मक सिद्धान्त दोनों से मिलकर बना है। संज्ञानात्मक सिद्धान्त हैं परमपुरुष और क्रियात्मक सिद्धान्त है परमाप्रकृति। सिद्धान्ततः यह दो पृथक सत्ताओं के होने का आभास कराता है पर आन्तरिक रूप से वे एक ही हैं। शिव और शक्ति का सम्मिलित नाम है ब्रह्म। इसी प्रकार ‘‘नारायण‘‘। यह ‘नार‘ और ‘अयन‘ इन दो शब्दों से मिलकर बना है, और उसका आन्तरिक अर्थ है परमपुरुष। नार शब्द के संस्कृत में तीन अर्थ हैं, पहला है भक्ति, जैसे नारद माने भक्ति देने वाला। दूसरा अर्थ है पानी, और तीसरा अर्थ है प्रकृति अर्थात् परम क्रियात्मक शक्ति। और, अयण माने आश्रय, इसलिये नारायण माने प्रकृति का आश्रय, परम क्रियात्मक शक्ति का आश्रय अर्थात् परमपुरुषइसलिये शिव हुए परमचेतना, नारायण भी परमचेतना हैं अतः शिव और नारायण में कोई अंतर नहीं है।

नन्दू- परन्तु एक ही सत्ता को अनेक नाम देते ही क्यों हैं जैसे कृष्ण और माधव?

बाबा- सभी लोग अपने मानसिक विचारों को शब्दों में व्यक्त करने के लिये भाषा का सहारा लेते हैं । जैसे, किसी वस्तु को देखने पर उससे आने वाली तरंगों द्वारा ऑंखों के माध्यम से मन पर जो कंपन किया जाता है उसे वह अनुभव करते हुए शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास करता है। देश काल और पात्र के अनुसार इस अभिव्यक्तिकरण में अन्तर आता जाता है और एक ही सत्ता अनेक नाम  की हो जाती है। जैसे, किसी वस्तु से निकलने वाली तरंगें किसी स्थान और समय पर किसी व्यक्ति के द्वारा ‘धव‘ ‘धव‘ ‘धव‘ का अनुभव कराती हैं तो वह उसे ‘धवल‘ अर्थात् सफेद कहने लगता है, परंतु अन्य परिवेश और स्थान पर कोई व्यक्ति उन्हीं कंपनों को अपने मानसिक संवेदन में ‘व्ह‘ ‘व्ह‘ ‘व्ह‘ अनुभव करता है तो शब्दों में व्यक्त करने के लिये वह वातावरण के अनुसार ‘व्हाइट‘ कहने लगता है। इस प्रकार सभी द्रश्यमान पदार्थों का प्रारंभिक रूप से नाम दिया जाता है। फिर व्यवहार में इन्हीं शब्दों से वाक्य विन्यास और साहित्य जन्म लेता है। अब हम अन्य नाम ‘माधव‘ लेते हैं। संस्कृत में ‘मा‘ के तीन अर्थ हैं, पहला है ‘‘नहीं‘‘ जैसे मा गच्छ, अर्थात् मत जाओ। अन्य अर्थ है इंद्रियॉं। इसलिये जीभ को भी ‘मा‘ कहते हैं, और तीसरा है परम क्रियात्मक सत्ता, परमा प्रकृति, लक्ष्मी। ‘धव‘ माने नियंत्रक या पति, इसी कारण जिस महिला का पति नहीं होता उसे विधवा कहते हैं। ‘धव‘ का अन्य अर्थ सफेद भी है। इसलिये माधव का मतलब हुआ जो परमा प्रकृति को नियंत्रित करता है अर्थात् परमपुरुष। ‘कृष्ण‘ का अर्थ है आकर्षण करने वाला, अतः वह जो विश्व ब्रह्मॉंड के संपूर्ण अस्तित्व को अपनी ओर खींच रहे हैं वह कृष्ण हैं। सभी जाने अंजाने उन्हीं के आकर्षण में बंधे हुए हैं इसलिये कृष्ण परमपुरुष हैं। इसप्रकार कृष्ण/माधव भी शिव और नारायण की तरह एक ही सत्ता को प्रदर्शित करते हैं।

रवि- तो क्या ‘राम‘ को भी इसी प्रकार समझाया जा सकता है?

बाबा- हॉं, 

 ‘राम‘ यानी, रमन्ति योगिनः यस्मिन् इति रामः अर्थात् जिसमें योगीगण रमते हैं, वह हैं राम। धातु ‘रम‘ और प्रत्यय ‘घई’। को मिलाकर राम बनता है जिसका अर्थ है परम सुन्दरता का आश्रय अर्थात् परमपुरुष। राम का अन्य अर्थ है, राति महीधरा राम अर्थात् अत्यंत चौंधियाने वाला, चमकदार अस्तित्व। परमपुरुष को सभी विद्वान अत्यंत चमकदार अर्थात् प्रकाशवान मानते हैं। अन्य अर्थ है, रावणस्य मरणम् इति रामः। रावण क्या है? आप जानते हैं कि मानव मन की सूक्ष्म और स्थूल दोनों प्रकार की प्रवृत्तियां होती हैं, केवल स्थूल प्रवृत्तियॉं  दस दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, वायव्य, नैरित्य, आग्नेय, ऊर्ध्व और अधः में अपना काम करती रहती हैं। इन दसों दिशाओं में भौतिक जगत की वस्तुओं की ओर मन के भटकने के कारण मन के भ्रष्ट होने की संभावना अधिक होती है अतः जीव मन की इस प्रकार की प्रवृत्तियों के साथ संयुक्त रहने को रावण कहते हैं। रावण को दस सिरों वाला इसीलिये माना गया है। अतः आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले साधक को क्या करना चाहिये? साधक को इन भ्रष्ट करने वाली, आत्मिक उन्नति के मार्ग में अंधेरा उत्पन्न करने वाली, प्रवृत्तियों से संघर्ष करना होगा अर्थात् रावण का वध करना होगा। रावणस्य मरणम् इति रामः, अतः साधक रावण को मारकर सार्वभौमिक सत्ता के सतत प्रवाह में आकर रामराज्य पाता है। इसलिये राम माने पुरुषोत्तम। रावण का प्रथम अक्षर ‘रा‘ मरणम का प्रथम अक्षर ‘म‘ इसलिये रावणस्य मरणम् माने राम क्योंकि जब आध्यात्मिक साधक राम का चिंतन करता है, रावण मर जाता है। इस प्रकार नारायण, शिव, माधव और राम एक ही हैं। इसलिये किसी को भी भगवान के नामों की महानता को लेकर झगड़ना नहीं चाहिये।

नन्दू- तो क्या परमपुरुष के इन्हीं नामों को इष्टमंत्र कहा जाता है?

बाबा- यदि किसी व्यक्ति को कौलगुरु ने इन नामों में से किसी एक को शक्ति सम्पन्न कर उसके इष्ट मंत्र के रूप में दिया है तो उसके लिये वही सब कुछ है अन्य नाम किसी काम के नहीं। साधक के लिये सबसे महत्वपूर्ण उसका इष्ट मंत्र ही है, उसी के चिंतन मनन और निदिध्यासन से वह परम प्रकाश पायेगा। इष्टमंत्र प्रत्येक व्यक्ति का अलग अलग होता है जो उसके संस्कारों के अनुसार चयन किया जाकर गुरुकृपा से प्राप्त होता है। यह कार्य कौलगुरु ही करते हैं क्योंकि वे ही पुरश्चरण की क्रिया में प्रवीण होते हैं। पुरश्चरण का अर्थ है शब्दों को शक्ति सम्पन्न करने की क्षमता होना। अपने अपने इष्टमंत्र का श्वास प्रश्वास की सहायता से नियमित रूपसे जाप कारते रहने का इतना अभ्यास करना होता है कि यह जाप नींद में भी चलता रहे। इसे ही साधना कहते हैं। इस स्थिति को प्राप्त होने पर ओंकार ध्वनि ;बवेउपब तीलजीउद्ध के साथ अनुनाद स्थापित करने में कठिनाई नहीं होती। अनुनाद की यही स्थिति जब स्थिर या स्थायी हो जाती है तो इसे ही समाधि कहते हैं। शक्तिमान शब्द ही मंत्र कहलाते हैं जो कौलगुरु साधक को उसके संस्कारों के अनुसार इष्टमंत्र के रूप में कृपापूर्वक देते हैं और मंत्रचैतन्य हो जाने पर अर्थात् ओंकार के साथ अनुनाद स्थापित हो जाने पर, उन्हीं की कृपा से परमपुरुष से साक्षात्कार होता है। जिसे सक्षम गुरु से इष्टमंत्र मिल गया वही धन्य है उसी का जीवन सफल है। अन्य सब तो प्रदर्शन मात्र है।