Tuesday, 28 July 2026

466 कुछ महत्वपूर्ण जानने योग्य शब्द-

 कुछ महत्वपूर्ण जानने योग्य शब्द-

1-प्रार्थना- 

जब कोई व्यक्ति स्वार्थवष या विना स्वार्थ के अविभक्त मन से अपने आराध्य के प्रति गहरे मन से बिना किसी बाहरी सामग्री के साथ अत्यंन्त आदर प्रकट करता है तो उसे प्रार्थना कहते हैं।

2-भगवान-

जिस प्रकार ज्ञान जिसके पास होता है उसको ज्ञानवान, बल जिसके पास होता है उसे बलवान, धन जिसके पास होता है वह धनवान कहलाता है उसी प्रकार जिसके पास ‘भग’ हो वह भगवान कहलाता है।  परन्तु ‘‘भग’’ का क्या अर्थ है ?

भग के दो अर्थ हैं। 

एक तो यह कि ‘गच्छति यस्मिन, आगच्छति यस्मात्,‘ अर्थात् वह सत्ता जिससे किसी भी अस्तित्व का उद्गम हुआ है और अन्त में जिसमें पहुंच जाता है। 

और दूसरा जिसमें इन छः गुणों का समाहार हो...

‘‘ऐश्वर्यं च समग्रं च वीर्यं यशासः श्रियः, ज्ञानवैराज्ञ संयुक्तं शन्नाम भग इति उक्तम्।’’

ऐश्वर्य का अर्थ है आठों प्रकार की सिद्धियाॅं. अर्थात् अणिमा, गरिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और अन्तर्यामित्व ।

वीर्य का दार्शनिक अर्थ है, जो जितनी जल्दी वाह्य विषयों पर से अपने मन को हटाकर एक बिंदु पर केन्द्रित कर लेता है उसे वीर्यवान कहते हैं। सामान्यतः जिसकी उपस्थिति मात्र से  लोगों में भय व्याप्त हो वह भी साहित्य में वीर्यवान कहलाता है।

यशासः का अर्थ है यश और अपयश दोनों।

श्री का अर्थ है सभी प्रकार की आर्थिक और भौतिक सम्पन्नता।

ज्ञान का अर्थ है भूत, वर्तमान और भविष्य सबका ज्ञान।

वैराग्य का अर्थ है किसी भी भौतिक वस्तु में आकर्षण न होना  अर्थात् रागरहित होना।

इस प्रकार जिस किसी में भी ये छः गुण है वह भगवान है। इसलिये भगवान कहीं सातवें आसमान में नहीं रहते वह हमारे सबके भीतर साक्ष्य देने वाली सत्ता के रूप में रहते हैं । अभ्यास और वैराग्य के द्वारा कोई भी उपरोक्त गुणों को प्राप्त कर भगवान हो सकता है। यदि कोेई अपने को भगवान कहता है या कुछ लोग यह कहते हैं कि अमुक व्यक्ति भगवान है तो उपरोक्त छः गुणों के आधार पर जाॅंच करने पर यदि सही पाया जाता है तो उसे यह विषेषण  दिया  जा सकता है अन्यथा नहीं।


3. ऋषि-

तर्क विज्ञान और विवेक के आधार पर प्रकृति के रहस्यों को जानने की चेष्टा करते हुए जिन्होनें अपने इस ज्ञान को ववहारिक स्वरूप दिया है उन्हें ऋषि कहा गया है। वेदों के ज्ञान को संकलित करने में इनका अपूर्व योगदान है।

4..मुनि- 

लगातार अपने इष्ट मंत्र को मन ही मन में दुहराते रहने को मनन करना कहते हैं। जो कोई भी इस मनन कार्य में निपुण हो जाते हैं वे मुनी कहलाते हैं।

5.पंडित- 

वैदिक संस्कृत में एक क्रिया है ‘‘पंडा’’ । इसे इस प्रकार पारिभाषित किया बया है- ‘अहं ब्रह्मास्मिीति तामितः प्राप्तः स पंडा’ अर्थात् मैं ब्रह्म हॅूं इस प्रकार की बुद्धि जिसकी हो चुकी है वह है ‘पंडा’ और जिसने अपने अभ्यास से यह अच्छी तरह अनुभव कर लिया है वह है ‘पंडित’ तथा जो इसे अनुभव करने के लिए सतत प्रयासरत है वह है ‘पांडेय’। आप अपने आस पास और परिचितों में ढूड़िए कि जो अपने को पंडित या पांडेय लिखते या कहते हैं वे इस परिभाषा में फिट बैठते भी हैं कि नहीं?

6.आचार्य- 

अपने आचरण के द्वारा शिक्षा देने वाले को आचार्य कहा जाता है, ‘‘आचरणात् पाठयति यह सः आचार्यः’’ आपको अनेक लोग मिल जाएंगे जो अपने को आचार्य लिखते या कहलाना पसंद करते हैं परन्तु जांच कीजिए कि क्या वे इस परिभाषा के अनुकुल फिट बैठते हैं?

7.जी- 

वैदिक काल में शिक्षा, ज्ञान और आयु में अपने से वरिष्ठ जो कोई भी होते थे उन्हें आदर देने के लिए ‘‘आर्य’’ शब्द के साथ संबोधित किया जाता था। यजुर्वेदिक काल में ‘य’ का उच्चारण ‘ज’ हो गया, जैसे यज्ञ को जज्ञ कहने लगे, योग को जोग। इस तरह आर्य सम्बोधन ‘आर्ज’ में बदल गया। भारत में अरबी भाषा के प्रभावसे यह ‘अजी’ हो गया और फिर बचा केवल ‘जी’। आजकल सभी लोग किसी को आदर देने के लिए उसके नाम या सरनाम के पीछे जी लगाते हैं।

8.मंत्र- 

जिसके मनन करने से मुक्ति मिले उसे मंत्र कहते हैं, ‘‘मननात् तरयेत यः स मंत्रः’’।

9.तंत्र- 

जो मन को जड़ता से खीचकर दिव्यता की ओर ले जाकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है वह तंत्र कहलाता है। ‘‘ तन् जडयात् तारयेत् यस्तु स तंत्रः परिकीर्तितः।’’ 


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