Wednesday, 7 October 2026

474 जिज्ञासा

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मित्रो! पिछली पोस्ट के बिन्दु क्रमांक 32 से संबंधित मेरे प्रिय मित्र यूएम पाठक जी ने एक गंभीर जिज्ञासा का समाधान मुझसे चाहा है। यह जिज्ञासा आपकी भी हो सकती है अतः मैं उसका उत्तर इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी को भी प्रेषित कर रहा हॅूं, लाभ उठाइए-  

पाठकजी ने पूछा है कि पोस्ट के बिन्दु क्रमांक 32 में लिखा है कि ‘‘हमारा शरीर हमारे मन का ही विस्तार है’’ इसे स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

आदरणीय पाठक जी! प्रश्न पूछने के लिए हृदय से धन्यवाद। आपके प्रश्न का उत्तर देने के पहले मैं उस परमसत्ता की निर्पेक्ष अवस्था और ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में आने का संक्षिप्त विवरण देना चाहूंगा ताकि आपके प्रश्न का उचित तारतम्य जोड़ा जा सके। भारतीय दर्शन में यह माना गया है कि यदि किसी का अस्तित्व है तो वह है केवल परमसत्ता। जब वह अपनी निर्पेक्ष अवस्था में होता है तो केवल वही होता है अन्य कुछ नहींय इस समय वह अपने चिदानन्द भाव में लीन रहता है और उसकी  त्रिगुणमयी प्रकृति उसके अधीन होती है। आपको मालूम है कि त्रिगुणमयी प्रकृति के सत, रज और तम (Santient, Mutative and Static) ये तीनों गुण अपने अपने वर्चस्व को बनाए रखते के लिए परस्पर होड़ में बने ही रहते हैं। इस होड़ में जब कभी रजोगुण का प्रभाव अन्य दो गुणों पर हावी हो जाता है तब सोई हुई प्रकृति में चेतना का संचार होने लगता है और वह परमसत्ता के मन, या ‘भूमा मन’ या ‘ब्राह्मिक मन’ अर्थात् ‘‘Cosmic Mind’’ में अपने ‘‘अस्तित्व बोध’’ एक्जिटेंशियल फीलिंग, (I am OR I Exist), का आभास कराती हैं। इस आस्तित्विक बोध के जाग्रत होते ही कास्मिक माइंड में यह भाव जागृत होता है कि ‘मैं कुछ कर सकता हॅूं’ अर्थात् (Doer I) , तब प्रकृति  कास्मिक मांइड के आदेश की प्रतीक्षा करते ही परमसत्ता का विचार बनता है कि ‘‘एकोहं बहुस्याम’’ अर्थात् मैं तो अकेला हॅूं अब मैं अनेक होना चाहता हॅूं  और फिर प्रकृति उनकी आज्ञा से ही उन्हीं के मन के थोड़े से अंश में अपने तीनों गुणों को समन्वित करके इस महाब्रह्मांड ‘Multiverse’ का निर्माण क्षण भर में कर डालती है और वह परमसत्ता ‘‘Done I’’ फीलिंग का अनुभव करती है।  परम सत्ता के मन की इन जीन अवस्थाओं को तत्ववेत्ता क्रमशः महत् तत्व’, ‘अहं’ तत्व’ और ‘चित् तत्व’’ कहते हैं। ’इसीलिए कहा गया है कि यह समग्र ब्रह्मांड उस परमसत्ता के मन का ही विस्तार है। स्पष्ट है कि हमारी अपनी कोई पृथक सत्ता नहीं है हम सब उन्हीं की मानसिक तरंगों के बहुत छोटे से अंश हैं।

प्रकृति कितने ही अमाप्य विस्तार में ब्रह्मांड को रच डाले परंतु परमसत्ता के आकर्षण में वह उन्हीं की ओर खिचाव का अनुभव करता रहता है। प्रकृति के इस ‘‘एक से अनेक’’ निर्माण करने के कार्य को दर्शन में ‘संचर’ क्रिया कहते हैं। परन्तु कोई भी भौतिक निर्माण अपने मूल अस्तित्व से अनन्त काल तक दूूूूूूूर नहीं रह सकता उसे अपने मूल स्वरूप में वापस आना ही पड़ता है। इसलिए जब प्रकृति अपने इस निर्माण को समेट कर मूल अवस्था में लौटने का कार्य करने लगती है उसे दर्शन में ‘प्रतिसंचर’ क्रिया कहते हैं। इस पूरे चक्र को ‘‘ब्रह्मचक’’ या ‘‘काॅस्मिक साइकिल’’’ कहा जाता है। जब ब्रह्मचक्र का 75 प्रतिशत भाग तय होने लगता है तो विभिन्न स्तरों, जिन्हें योनियाॅ कहा जाता है से आगे बढ़ता हुआ जैविक मन अर्थात् ‘यूनिट माइंड’ की प्रधानता बढ़ने लगती है और प्रकृति अपनी पकड़ कुछ कम करती जाती है। यहाॅं फिर से वही कास्मिक माइंड के समय की चेतना यूनिट माइंड में आने लगती है जिसमें पृथक एक्जिस्टेंशियल फीलिंग,  ‘डूअर आई फीलिंग’ और ‘डन आई फीलिंग’ अर्थात् महत् तत्व, अहं तत्व और चित् तत्व के क्रमशः आते ही प्रकृति उसे वह शरीर अर्थात्‘मानव शरीर’ देती है जिससे वह अपने आप को जानने का प्रयास करते हुए मूलस्वरूप में वापस जा सके। इस प्रकार यूनिट माइंड को सक्रियता देने के लिए पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कमेंन्द्रियों युक्त यह शरीर मिल जाता है ताकि वह इनकी सहायता से परमसत्ता के आकर्षण का अनुभव करे और उन तक जाने का उपाय खोजे। इसीलिए कहा गया है कि ‘‘यह शरीर हमारे मन का ही विस्तार है।’’ दर्शन में कास्मिक माइंड के विस्तार ‘ब्रह्मांड’ को ‘‘कास्मिक चित्त’’ कहा गया है और यूनिट माइंड के विस्तार  को इस शरीर का   ‘‘यूनिट चित्त’’ कहा जाता है।

सब जानते हैं कि प्रकृति के रंगविरंगे मायावी स्वरूपों में उलझकर इकाई मन इन्हीं को सब कुछ समझकर इन्हीं में अनेक जन्मों तक उलझा रहता है और क्षण क्षण बनने वाले नए नए संस्कारों को भोगने के लिए नए नए शरीर पाकर उन्हें भोगता रहता है। जब कभी संयोग से उसके भीतर यह भाव आता है कि यह सभी भोगते हुए कितने जीवन बीत गए और उपलब्धि कुछ नहीं हुई तब वह परमसत्ता के आकर्षण में उसे खोजने लगता है और योग्य गुरु की शरण में जाकर आपना ‘‘बीजमंत्र’’ पाकर साधना करने लगता है । जिस क्षण सभी  संस्कार शून्य हो जाते हैं वह पाता है कि मै जिन्हें अपने से पृथक मानता था वह तो ‘मैं ही हॅूं।’ यह पृथकता अच्छी तरह दूर हो जाने पर आत्मानुभूतिजन्य आनन्द प्राप्त होता है। सभी प्रकार के आध्यात्मिक उपायों और साधना पूजा आदि का एकमेव उद्देश्य यही है कि ‘जन्मजन्मान्तरों की यह पृथकता दूर करना।’ इसीलिए उपनिषदें कहती हैं-

‘‘सर्वाजीवे सर्वसंस्थे वृहन्ते तस्मिन् हंसो भ्राम्यन्ते ब्रह्मचक्रे। 

पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुस्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति।’’

अर्थात् इस ब्रह्मचक्र में सभी जीव तब तक घूमते रहते हैं जब तक वे अपने आप को अपनी मूल सत्ता से पृथक मानते रहते हैं।

सादर,

डाॅ टी. आर. शुक्ल


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