कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय विंदु पिछली पोस्ट से आगेः-
21. आत्मा - वह जो हमें अपने होने का साक्ष्य देता है, वही आत्मा है। वह हमारे भीतर ही रहता है। हम सभी अपने अपने अस्तित्व का अनुभव करते हैं पारस्परिक सापेक्षता से। यदि अन्य कोई भी न हों तो यह कैसे जानोगे? यही बात समझने की है। केंचुआ जानता है कि वह केंचुआ है। पेड़ जानता है कि वह पेड़ है। पर सूर्य नहीं जानता कि वह सूर्य है। जबकि सूर्य से ही ऊर्जा पाने वाले हम सब सूर्य के बारे में बहुत कुछ जानते हैं और जानने की कोशिश कर रहे हैं। किसी को उसके अस्तित्व का बोध और साक्ष्य देने वाली सत्ता को ही जीवात्मा कहते हैं। आष्चर्य यह है कि हम इसे भूलकर, अन्य सब याद रखने और पाने के प्रयास में, अनेक जन्मों तक आवागमन के चक्र में भटकते हुए कष्ट पाते रहते हैं।
22. तेतीस करोड़ देवता- देवताओं की संख्या के संबंध में सच्चाई यह है कि हमारे शरीर के संचालन के लिये प्रकृति ने तेतीस करोड़ नर्व सैल और नर्व फाइवर्स बनाये हैं जिन्हें नियंत्रित करने के लिये कुल तेतीस नाड़ियाॅं या ऊर्जा केन्द्र ही प्रधान होते हैं । ये परस्पर अपने व्यक्तित्व और आदर्श से ओतप्रोत होने के कारण देवता कहलाते हैं। जो कुछ मनुष्य षरीर के भीतर है वही ब्रह्मांड में गेलेक्सियों, तारों, वनस्पतियों और जीवधारियों के रूप में भी है।
इन्ही ऊर्जा केन्द्रों में एकादश रुद्र, रुद्र का अर्थ है रुलाना। (अर्थात् ये हैं, पाॅंच ज्ञानेन्द्रियाॅं, पाॅंच कर्मेद्रियाॅं और एक मन कुल ग्यारह) कहते हैं। जब कोई व्यक्ति अपना शरीर छोड़ देता है तो ये एकादश अवयव भी एक एक कर चले जाते हैं और संबंधीजन रोने लगते हैं। चूंकि ये सबको अंत में रुलाते हैं इस लिये रुद्र कहलाते हैं।
द्वादश आदित्य, आदित्य का अर्थ है ‘लेना‘ चूंकि साल के बारह माह धीरे धीरे व्यक्ति की आयु को लेते जाते हैं अतः आदित्य कहलाते हैं। (अर्थात इनमें वर्ष के बारह माह सम्मिलित होते हैं वही आदित्य हैं)
अष्ट वसु , (अर्थात वास स्थान ), चूंकि जीव का वासस्थान भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाष, सूर्य, चंद्र और अंतरिक्ष, इन आठ स्थानों में माना गया है अतः ये अष्ट वसु कहलाते हैं।
एक इंद्र अर्थात् ऊर्जा या कर्मशक्ति और
एक प्रजापति अर्थात् यज्ञ या कर्म ।
इस प्रकार इनकी कुल संख्या (11+12+8+1+1 =33) तेतीस हैं। यह, जब देह में होते हैं तब दैहिक देवता और ब्रह्म में होने पर में ब्राह्मी देवता कहलाते हैं । इसलिये जो देह में है वही ब्रह्माॅंड में भी है, यह कहा जाता है।
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