Saturday, 1 August 2026

467 Some important words continued

 13.श्री-   ऊर्जा का बीजमंत्र है ‘‘रम्‘‘। सभी लोग भौतिक जगत की उपलब्धियों के साथ ऊर्जा को भी सक्रिय रखना चाहते हैं अतः नाम और यश के प्रेरक ‘‘श‘‘के साथ ऊर्जा की क्रियाशीलता के प्रेरक ‘‘र‘‘ को जोड़ने पर श़ + र = श्र, और स्त्रींिलंग में यह हुआ श्री, इसे आधार मानकर ही भारत में नाम के आगे श्री लगाने का प्रचलन हुआ। आजकल इस अर्थ में ‘श्री‘ किसी के पास नहीं है फिर भी सभी के नाम से पूर्व श्री लगाते हैं और यह आदर देने का सूचक बन गया है।

14.देवता- वास्तव में ‘‘ जिस किसी का भी का व्यक्तित्व और आदर्श एक समान हो जाते हैं वह देवता कहलाता है।’’ ऋषि याज्ञवल्क्य के अनुसार, ‘‘द्योतते क्रीडते यस्मात् उदयते द्योतते दिवि, तस्मात् देव इति प्रोक्तव्यम् स्तूयते सर्व देवताम्।’’ अर्थात् देवता तो केवल वही है जिसमें उदय अस्त होने वाले, दिन को प्रकाशित करने वाले सभी पिंड प्रकाशित होकर क्रीडा करते रहते हैं, इसीलिए अन्य सभी इतर देवता उनकी ही स्तुति करते रहते हैं। 

15. रिद्धि-सिद्धि- लगातार अपने इष्ट मंत्र के साथ ईश्वर प्रणिधान करते करते जब भक्त को इशोपलब्धि नहीं होती है तब ‘‘रस साधना ’’ का सहारा लेना पड़ता है जिसमें  मूल भावना यह होती है कि व्यक्तिगत इच्छायें, वाॅंछायें और सभी कुछ परमपुरुष की ओर संप्रेषित करना है क्योंकि वही एकमात्र चिदानन्द रस का प्रवाह हैं।  इस प्रकार रस साधना में पूर्णता होना ‘‘ रिद्धि ‘‘ और ‘‘सफलता प्राप्त होना‘‘ सिद्धि कहलाती है। शास्त्रों में इसे रासलीला कहा गया है। जिस किसी अस्तित्व की रचना हुई है वह सब परमपुरुष की इच्छा से ही उन्हीं का चक्कर लगा रहा है। किसी का अध्ययन, बुद्धि और व्यक्तिगत स्तर, सब कुछ व्यर्थ हो जाते हैं जब तक उन्हें परमपुरुष की ओर संप्रेषित नहीं किया जाता । इस परम सत्य को जानने के बाद चतुर व्यक्ति यह कहते हुए आगे बढ़ता जाता है कि है, ‘‘परमपुरुष मुझे कुछ नहीं चाहिए मेरे इसी जीवन में आपकी इच्छा पूरी हो।‘‘

17. रासलीला- रासलीला का अर्थ सभी लोग नहीं जानते और जो लोग थोड़ा बहुत  जानते हैं वह ठीक ढंग से समझा नहीं पाते। वास्तव में यह साधना का एक प्रकार है जिसमें अपनी सभी मनोभावनायें अपने इष्ट की ओर संचालित करना होती हैं। चूंकि यह कार्य मानसिक रूप से अधिक और शारीरिक रूप से कम संबंधित होता है इसलिये इसे समझ पाना सभी के लिये संभव नहीं होता । कृष्ण ने सर्वप्रथम कुछ उन्नत भक्तों, जिन्हें गोप कहा जाता है, को यह साधना शरदपूर्णिमा के दिन सिखाई थी और वे सभी इसे सीखकर इतने आनन्दित हुए थे कि भक्तिरस के प्रवाह में नाचने कूदने लगे। उन्हें लगता था कि उनका इष्ट अर्थात् कृष्ण भी प्रत्येक के साथ नाच रहा है। चैतन्य महाप्रभु के बारे में भी कहा जाता है कि वे रससाधना में पारंगत थे अतः साधना करते करते वे रस प्रवाह में नाचते कूदते रास्मे में दौड़ने लगते थे, उनके पीछे पीछे अन्य भक्तगण भी भागते थे। यही रासलीला का प्रभाव है।


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