Thursday, 27 August 2026

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 कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु पिछली पोस्ट से आगे-

23. जय हो- हम सभी के पास इन तेतीस देवताओं अर्थात् ऊर्जा केन्द्रों का समूह होता है जिसे केवल एक ही परमनियंत्रक सत्ता जिसे ब्रह्म कहते हैं नियंत्रित करता है अतः मनुष्यमात्र का कर्तव्य है कि इनकी सहायता से अपनी तमोगुणी और रजोगुणी प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष कर सत्य में प्रतिष्ठित होने की विजय प्राप्त करे और अपने जीवन के मुख्य लक्ष्य इस परमपुरुष तक पहॅुंचने का कर्म करे। जितने भी महापुरुष हुए है और जिन्हें हम देवतुल्य पूजते हैं वे सभी भी हमारी ही तरह सामान्य रहे हैं परंतु उन्होंने सभी जड़ प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष कर विजय पायी और अद्वितीय कहलाये। उनकी जय बोलने का अर्थ यह है कि हम अपनी ही जय बोलते हैं और अपेक्षा करते हैं कि उनकी ही तरह हम अपने आदर्श और व्यक्तित्व को समेकित करने में सफलता पायें।

24 ऋक 

 ऋषियों के द्वारा संग्रहित प्रारंभिक ज्ञान को केवल एक वेद अर्थात् ऋग्वेद कहा जाता था । ऋक़ क्विप =ऋक । वैदिक क्रिया ऋक का अर्थ है ‘ महिमामंडन करना ’ (गीत से या सामान्य भाषा में) ‘‘ऋक’’ का संस्कृत में अर्थ है ‘स्तवन’ करना। प्राचीन समय में साधु लोग प्रकृति के विभिन्न रूपों को किसी न किसी देवता का खेल मानते थे अतः उन्होंने उनके लिए स्तवन या भजन करना प्रारंभ किया। जब उन्होंने उषा, इन्द्र, पर्जन्य, मातरिष्वा, वरुण आदि के भजन गाए तब उन्हें ‘साम’ कहा गया। उस समय तक लिपि का अनुसंधान नहीं हुआ था इसलिए शिष्य अपने गुरु से मौखिक शिक्षा को ग्रहण किया करते थे। ये सत्य के वचन थे, ज्ञान के वचन थे अतः उन्हें जानकर तत्कालीन असंस्कृत लोग संस्कृति के प्रकाश की ओर बढ़ने लगे इसलिए उन्हें ‘वेद’ या ‘ज्ञान’ कहा गया।

25 वेद 

वैदिक क्रिया ‘विद’ का अर्थ है ‘‘जानना’’ इस में ‘अल’ प्रत्यय जोड़ने से ‘वेद’ शब्द बनता है जिसका अर्थ है ‘‘ज्ञान’’। शब्द ‘वेद’ का लिखित रूप देखकर कुछ स्वर-विज्ञानियों का विचार है कि इसे ‘घञ’ प्रत्यय लगाकर बनाया गया हैय तो भी, यही सही है कि उसे ‘अल’ प्रत्यय लगाकर बनाया गया है और वह पुल्लिंग है। चूँकि लिपि के अभाव में उसे गुरु से मौखिक सुनकर याद रखा जाता था इसलिए उसका दूसरा नाम ‘श्रुति’ है। श्रु़ क्तिन= श्रुति। क्रिया ‘श्रु’ का अर्थ है, सुनना। इसलिए श्रुति का एक अर्थ है ‘कान’  और इसीलिए कहा गया है कि जो कान से सुनकर याद रखा गया है वह है ‘वेद’ । वेदों के सबसे पुराने भाग के प्रत्येक श्लोक को ‘ऋक’ कहा गया है, जब अनेक श्लोकों को एक साथ रखकर किसी विचार को प्रदर्शित किया जाता है तो उसे कहा गया है ‘सूक्त’  और अनेक सूक्तों को संग्रहित कर बनाया गया है ‘मंडल’।

26 ऋग्वेद

ऋग्वेद बहुत पुराना है इसके अतिरिक्त यह भी निश्चित है कि कृष्णद्वैपायन व्यास ने वेदों को उनकी प्राचीनता के अनुसार सबसे पुराना, मध्य, और पश्चात्वर्ती, इन तीन अलग अलग भागों में बहुत पहले विभाजित कर दिया था और  उन्हें क्रमशः ऋक, यजुः और अथर्व नाम दिया गया।। ऋग्वेद का रचनाकाल लगभग पन्द्रह हजार वर्ष से दस हजार वर्ष पूर्व के बीच का है जबकि यजुर्वेद का दस हजार से सात हजार वर्ष के बीच का और अथर्ववेद का सात से पाॅंच हजार वर्ष के बीच का माना जाता है। सामवेद कोई वेद नहीं है, शब्द ‘साम’ का अर्थ है ‘गीत या भजन’। सामवेद को पूर्वोक्त सभी वेदों के संगीत वाले भाग को अलग कर एक साथ प्रस्तुत किया गया जिसे सामवेद का नाम दिया गया है। अर्थात् सामवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद सभी में पाया जाता है। 

जैन साहित्य में वेदों विशेषतः सामवेद का उल्लेख मिलता है जो कि तत्कालीन प्राकृत भाषा में लिखा गया है। वर्धमान महावीर 2500 वर्ष से कुछ पहले हुए थे और प्राकृत भाषा का उद्गम चार से पाॅंच हजार वर्ष के बीच हुआ। इस प्रकार वेदों का जो भी भाग सबसे बाद का माना जाय वह निश्चय ही पाॅंच हजार वर्ष से कम पुराना नहीं हैं। जहाॅं तक जैन साहित्य का संबंध है उसका कुछ भाग वर्धमान महावीर के पहले, कुछ पश्चात्वर्ती जैन सन्तों के द्वारा रचित हुआ था तो भी वे किसी भी प्रकार से पाॅंच हजार वर्ष से पहले के नहीं हैं।


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