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34 भगवानों के नाम पर बनाए गए रूप, आकर और प्रकार।
शायद आपको मालूम है कि भगवानों के नाम पर जितने भी रूप आकर और प्रकार बताए गए हैं वे सभी पौराणिक कथाओं के आधार पर ही मूर्तिकारोंध्चित्रकारों ने बनाए हैं । चूंकि पुराण ऐतिहासिक नहीं हैं वे काल्पनिक कथाओं के आधार पर ईश्वर को समझाने और लोक शिक्षा देने का महर्षि वेद व्यास का प्रयास मात्र हैं परन्तु सबने उन्हें सत्य मान लिया और कर्मकांड के अनुसार पूजा करने लगे।
शायद आपको यह भी ज्ञात होगा कि अठारह पुराण लिखने के बाद वेदव्यास जी को लगा कि उनसे तो बहुत बड़ी भूल हो गई। कौन सी भूल? एक नहीं तीन तीन भूलें हुई हैं।
उन्होंने जो लिखा है अपनी इन तीन भूलों के बारे में वह इस प्रकार है-
रूपं रूपविवर्जतस्यभवतो यत्ध्यानेन कल्पितम्।
व्यापित्वं च निराकृतान भगवतो यत्तीर्थादिना।
अव्यक्ताः निर्वचनिहिताः अखिलोगुरो दूरी कृता यन्मया।
क्षन्तव्यं जगदीशो तद्विकलता दोषत्रयमत्कृतम।
अर्थात्, तुम्हारा कोई रूप नहीं फिर भी मैंने अपनी कल्पना से अनेक रूप दे दिए। तुम सर्वत्र व्याप्त हो फिर भी मैंने तुम्हें काल्पनिक तीर्थों में बिठाया। तुम्हारा वर्णन नहीं किया जा सकता फिर भी मैं ने अलग अलग 18 ग्रंथों में वर्णन कर सभी को अलग अलग पात्रों के रूप में दूर दूर कर दिया।
लेकिन हे जगदीश! हे जगद्गुरो! मैंने यह लोक शिक्षा के लिए ही किया है परन्तु मेरे इन तीन दोषों के लिए मुझे क्षमा कर देना, मुझे बहुत ही विकलता का अनुभव हो रहा है।
इसके बाद व्यास जी ने लिखना बंद कर दिया।
35 पूजा की विधियाॅं
पूजा अथवा पूजन-
जब कोई व्यक्ति स्वार्थवश या बिना स्वार्थ के अविभक्त मन से अपने आराध्य के प्रति अपना अत्यंन्त आदर प्रकट करता है जिसमें बाहरी तौर पर फूल, बेलपत्र, चंदन, गंगाजल तुलसी, केला, चावल आदि अर्पण करता है या इन वस्तुओं का नहीं भी अर्पण करता है तो उसे पूजा या पूजन कहते हैं।
अर्चा या अर्चना-
जब कोई व्यक्ति स्वार्थवश अपने आराध्य के प्रति अपना अत्यंन्त आदर प्रकट कर बाहरी तौर पर फूल, बेलपत्र, चंदन, गंगाजल, तुलसी, केला, चावल आदि अर्पण करता है तो इसे अर्चा या अर्चना कहते हैं।
प्रार्थना-
जब कोई व्यक्ति स्वार्थवश या विना स्वार्थ के अविभक्त मन से अपने आराध्य के प्रति गहरे मन से बिना किसी बाहरी सामग्री के साथ अत्यंन्त आदर प्रकट करता है तो उसे प्रार्थना कहते हैं।
विधिपूजन-
ऊपर वर्णित पूजा की विधियाॅं धार्मिक कर्मकांडियों द्वारा अनेक भागों में कराई जाती हैं जैसे, अंगन्यास, करन्यास, आचमन, शिखाबंधन, आवाहन, माल्यदान, तिलकधारण, और विसर्जन। इस प्रक्रिया सहित पूजन करने को विधिपूजन कहते हैं।
उपासना -
उप का अर्थ है समीप या निकट, और आसना का अर्थ है वैठना। इस प्रकार उपासना का अर्थ हुआ निकट बैठना। पर किसके निकट? अपने आराध्य के निकट बैठने के कार्य को कहेंगे उपासना। इस कार्य को दार्शनिक भाषा में ईश्वरप्रणिधान भी कहते हैं।
आराधना-
राधाभाव बहुत ही उच्च स्तर का भक्तिभाव है यह किसी महिला का नाम नहीं है जिसे पुकार कर बुलाया जा सके। यौगिक विधियों के सतत अभ्यास और ईश्वरप्रणिधान के लगातार प्रयास से यह भाव अपने आप प्रकट होंता है। स्पष्ट है कि राधा भाव को जाग्रत करने के लिये किये गये उपायों को आराधना कहते हैं। इसलिए आन्तरिक रूप से भक्ति के उच्चतम स्तर पर जब मन उस परम सत्ता के साथ लय होने लगता है तो जो भाव उत्पन्न होता है उसे राधा भाव कहते हैं। इसलिए ‘राधा- राधा’ चिल्लाने से कुछ नहीं होगा।
ब्रह्मसद्भाव-
वह विशेष प्रकार की पूजा जो निस्वार्थ भाव से बिना किसी वाह्य सामग्री के साथ अपने आराध्य के ध्यान में की जाती है उसे ब्रह्म चिंतन या ब्रह्मसद्भाव कहते हैं। पूजा का सर्वोत्तम प्रकार यही है।
ओम- ब्रह्मांड के उत्पन्न होने के समय जो ध्वनि हुई उसे ‘ओंकार घ्वनि’ या ‘कास्मिक साउंड आफ क्रिएशन’ कहते हैं। यह तब से अभी भी उसी स्तर पर बनी हुई है। जो कोई भी उस परमसत्ता का निस्वार्थ ध्यान, चिंतन ,मनन करता है वह इस ध्वनि को सुन सकता है। वास्तव में ध्यान जब परिपक्व होने लगता है तो यह सुनाई देती है और इसको सुनते हुए ही साधक को उसके उद्गम की ओर मन को ले जाना होता है। सभी प्रकार के भजन पूजन का लक्ष्य इस उद्गम तक जाना और उसे अनुभव करना ही होता है। स्पष्ट है कि ओम ओम चिल्लाने से कुछ नहीं होता वह तो अनुभव करने की चीज है। उपनिषदें कहती हैं ‘‘ तदेकम् अजरं अमृतमं अभयं ओमित्य अनुभूय’’। अर्थात् उस अजर अमर अभय और एकमेव सत्ता को ओम के द्वारा अनुभव करो।
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