Tuesday, 20 October 2026

477 ‘‘माया और क्वान्टम थ्योरी’’// ‘‘नीलकंठ सदाशिव’’

 मेरे विद्वान मित्रों ने कल "माया" को "क्वान्टम थ्योरी" से समझाने और सदाशिव को नीलकंठ कहलाने का कारण पूछा है। उत्तर नीचे दिए गए हैं पढ़ कर चिंतन करें और लाभ उठाएं।

मित्रो! इन महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक प्रश्नों को पूछने के लिए धन्यवाद।

‘‘माया और क्वान्टम थ्योरी’’

माया को क्वान्टम थ्योरी से समझा पाना, ह्युमन माइंड से जो कि यूनिट माइंड है, संभव प्रतीत नहीं होता क्योंकि ‘माया’ एक  दार्शनिक शब्दावली के अतिरिक्त कुछ नहीं है जो ‘काॅस्मिक माइंड’ की कल्पना है। इस संबंध में विद्वान कहते हैं कि ‘‘ घातना अघातना पतीयसी माया’’ अर्थात्, जो नहीं है परन्तु उसे होने का आभास कराती है, वह है माया। अब सोचिए, यह माया क्या ‘‘मिरेज’’ की तरह ही नहीं है कि जिसमें दूर पानी भरा दिख रहा है पर पास जाने पर अदृश्य हो जाता है। बृहद और व्यापक दृष्टिकोण से सोचने पर हम सब और पूरा काॅसमस उस कास्मिक माइंड के भीतर ही है जिसे अभी हमारे यूनिट माइंड ने आधुनिक भौतिक विज्ञान के सिद्धान्तों से नहीं समझ पाया है। हाॅं कोशिशें जारी हैं और अभी पदार्थ से ऊर्जा के बीच के संबंधों को जब हम क्वान्टम सिद्धान्तों से समझाते हैं तो पदार्थ से जीवन के बीच वे सिद्धान्त लागू नहीं हो पाते। अभी कुछ शोधों में प्रमाणित करने की चेष्टा की गई है कि पदार्थ (इलेक्ट्रान) से पूर्व की अवस्था जीवन के उद्गम का क्षेत्र है जहाॅं ‘माइक्रोवाइटम’ (नई टर्म) को प्रभावी बताया गया है। यह कहा गया है कि लाखों माइक्रोवाइटा मिलकर एक इलेक्ट्रान बनाते हैं। यदि अब क्वान्टम सिद्धान्त और माइक्रोवाइटम सिद्धान्त को एकीकृत किया जा सके तभी ‘‘पदार्थ, मन और ऊर्जा’’ के बीच उचित तारतम्य स्थापित करते हुए कास्मिक माइंड के साथ संबंध बनाया जा सकता है। सपष्टतः तभी हम इस माया के अस्तित्व पर भी प्रकाश डाल सकेंगे।

‘‘नीलकंठ सदाशिव’’

आज से 7000 साल पहले जब भगवान सदाशिव इस धरती पर आए तब मनुष्य परस्पर कुरीतियों और वैमनस्यता में एक दूसरे से सदा ही संघर्ष करते रहते थे। उनकी आध्यात्मिक प्रगति अवरुद्ध हो गई थी। बुराइयों का जहर समाज में लगातार फैल रहा था अतः शिव ने उन सभी बुराईयों को समाप्त कर व्यवस्थित जीवन शैली का प्रतिपादन कर सभी लोगों में आनन्द भर दिया। ‘‘समाज’’ और ‘‘विवाह’’ आदि की संकल्पना शिव की ही देन है। उनके संरक्षण में मानव ही नहीं पशुपक्षी और दानव भी अपने को सुरक्षित अनुभव करते थे। उनकी सरलता, साधुता और तेजस्विता के कारण लोग कहने लगे कि सदाशिव ने समाज की सभी बुराइयों का जहर स्वयं पीकर हमें सुखी कर दिया, निर्भय कर दिया। इस संबंध में पौराणिक समुद्रमंथन जैसी अनेक कहानियां भी प्रचलित हैं जिसके अनुसार योगबल से शिव ने इस जहर को अपने गले से नीचे नहीं जाने दिया अतः उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। इसलिए मेरा कहना है कि कहानियों पर मत जाइए, मानव समाज के लिए भगवान शिव के योगदान को परखिए और उनकी शिक्षाओं के अनुसार जीवन जीने का विज्ञान सीखने का प्रयास कीजिए।सादर

डाॅ टी.आर.शुक्ल


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