Sunday, 10 January 2016

42 बाबा की क्लास (कर्मफल)

42 बाबा की क्लास (कर्मफल)

राजू- अनेक लोग कहते हैं कि बुरे काम करने वालों को भगवान दंड देते हैं ?

बाबा- भगवान कोई दंडाधिकारी नहीं हैं जो विभिन्न धाराओं के अनुसार केवल दंड देने के लिये ही बैठे हैं, वास्तव में वह अपनी विचार तरंगों के मूर्तरूप इस स्रष्टि चक्र को चलाने के लिये प्रकृति को उत्तरदायित्व देकर अपनी लीला का आनन्द ले रहे हैं । इसलिये प्रत्येक मनुष्य को अपने किये  अच्छे या बुरे कर्मों का फल प्रकृति ही क्रमानुसार उपलब्ध कराती रहती है, और कर्ता को भोगना ही पड़ता है।

चंदू- तो हम यह  कैसे जाने कि कोई कर्म अच्छा है या बुरा?

बाबा-  अच्छे कार्य वे हैं जो प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए, चेतना के परावर्तन को विस्तारित करते हैं, यह विद्यामाया के द्वारा प्रेरित होते हैं। बुरे कार्य अविद्यामाया से प्रेरित होते हैं। वे कार्य जो प्रकृति के नियमों के विपरीत होते हैं और चेतना के परावर्तन को फीका कर देते हैं बुरे कार्य हैं।

रवि- लेकिन किसी को भी पहले से यह मालूम नहीं होता कि कौन सा कार्य प्रकृति के अनुकल है या प्रतिकूल फिर भी कर्म तो करते ही जाते हैं तब इस प्रकार के कष्ट से कैसे बचा जा सकता है?

बाबा- प्रकृति के नियमों का पालन करने के लिये विद्यामाया के सहयोगी विवेक और वैराज्ञ हैं जो इस प्रकार के उत्तम कार्य कराने में सहायता करते हैं। अच्छे और बुरे में भेद करने की क्षमता को विवेक कहते हैं, जैसे अलकोहल का नशे के रूप में उपयोग बुरा और दवा के रूप में उपयोग अच्छा, यह ज्ञान विवेक कहलायेगा। इस तरह एक ही बस्तु के अलग अलग उपयोग करने से वह अच्छी या बुरी मानी जाती है। वैराज्ञ का अर्थ संसार को छोड़ कर एकान्त में अत्यंत सादगी से तपस्वी जीवन जीना नहीं है, यह तो प्रत्येक वस्तु का समुचित उपयोग करते हुए उसे समझने का साधन प्राप्त करने का प्रयास है। इसलिये वैराज्ञ का पालन करने के लिये विवेक का रहना आवश्यक  है। विवेक और वैराज्ञ से विस्तारित चेतना के प्रभाव से प्रकृति का बंधन ढीला हो जाता है अतः कर्मफल के भोगने के कष्ट का अनुभव नहीं होता।

इंदु- बाबा! इससे पहले आपने बताया था कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होने के कारण कर्मफल भोगना ही पड़ता है। इससे कोई भी बच नहीं सकता, अपने अपने कर्मों का फल स्वयं को ही भोगना पड़ता है। परंतु अनेक लोग ऐसे भी है जो कर्मफल भोगने से बचने के लिये अन्य तरीके जैसे ग्रहशान्ति , हवन आदि से प्रायश्चित  करना आदि ,अपनाते हैं, उनकी ये विधियाॅं कितनी सार्थक  होती है और क्या वे इस कर्मफल के भोगने से बच पाते हैं ?
बाबा- कुछ लोगों का विश्वास  है कि ग्रहशान्ति  करने और प्रायश्चित करने  में या हवन करने से वे कर्मफल भोगने से बच जावेंगे। उनका यह विश्वास  गलत है क्योंकि प्रकृति के नियमों के अनुसार प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होना अनिवार्य है, मन अपनी सामान्य अवस्था में तभी आ पायेगा जब वह प्रतिक्रिया प्राप्त कर ले । प्रकृति के इस नियम को कोई नहीं बदल सकता। परंतु कर्मफल भोगने की गति को धीमा या तेज किया जाना संभव है जो मन को वापस सामान्य अवस्था में ले आएगा। जैसे, मानलो किसी कर्मफल को भोगने में एक माह लगता है तो विद्यातंत्र की सहायता से उसे एक दिन में या एक वर्ष में पूरा करना संभव है जो इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे कितना त्वरित किया गया है या मंदित, परंतु उसे पूर्णरूप से समाप्त करना कभी भी संभव नहीं है। किसी को एक माह में वापस करने की शर्त पर एक सौ रुपये दिये गये तो यह संभव है कि कर्ज देने वाला एक माह की जगह एक वर्ष में वापस करने को राजी हो जावे पर उधार लिया गया धन तो वापस करना ही पड़ेगा। ऋण वापस करने की अवधि में परिवर्तन संभव है पर धन वापस करने से माफी नहीं हो सकती। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति के खाते में एक सौ पचास रुपये  इस शर्त पर जमा किये गये हैं कि वह पाॅंच रुपये प्रति दिन की दर से खर्च करेगा तो वह चाहे उन्हें एक दिन में ही खर्च कर दे या शर्त के अनुसार  एक माह में व्यय करे, जमा किया गया धन जमा कर्ता के द्वारा ही उपयोग किया जावेगा अन्य के द्वारा नहीं, वह एक दिन में करे या एक माह में।

नंदू- बाबा! जब कर्मफल भोगना ही पड़ता है तो विद्यातन्त्र ऐंसा क्या करता है कि वह कर्मफल भोगने की गति को तेज या धीमा कर दे?
बाबा- विद्याताॅंत्रिक क्रियायें, विवेक और वैराज्ञ पूर्वक कर्म करने को प्रेरित करती हैं जिससे विस्तारित चेतना के प्रभाव से प्रकृति का बंधन ढीला हो जाता है अतः कर्मफल के भोगने के कष्ट का अनुभव नहीं होता है। परंतु कर्मफल का भोगना या भाग्य नहीं बदला जा सकता। कर्मफल तो व्यक्ति को भोगना ही पड़ेगा हाॅं भोग करने के समय को लंबा या छोटा किया जा सकता है। जैसे, ऋणकर्ता को एक साथ रुपये लौटाने में अधिक मानसिक कष्ट होगा परंतु किश्तों  में लौटाने पर समय अधिक लगेगा पर मानसिक कष्ट की मात्रा समय के विस्तार में अधिक प्रतीत नहीं होगी। इस प्रकार विद्यातंत्र की सहायता से कष्ट भोगने के समय का विस्तार हो जाने से कष्ट की तीब्रता घट जाने पर लगता है कि कर्मफल नहीं भोगना पड़ा। उदाहरणार्थ, किसी के भविष्य में हाथ टूटने की घटना होना है तो उसे इसके स्तर की मानसिक पीड़ा भोगना पड़ेगी, परंतु विद्यातंत्र साधना से उसके हाथ के टूटने को रोका जाकर उतना ही मानसिक कष्ट भुगतने के लिये छोटी छोटी घटनाओं में बदलकर लम्बे समय तक चलाया जा सकता है परंतु उसे समाप्त नहीं किया जा सकता। कष्ट लंबे समय तक छोटी छोटी घटनाओं में बदल गया जैसे, हाथ में पहले खरोंच आ जाये फिर बीमार पड़ जाये आदि, उसे कष्ट भले ही किश्तों  में भोगना पड़े पर जब तक हाथ टूटने के कष्ट के बराबर मानसिक कष्ट नहीं भोग लिया जावेगा तब तक कर्मफल समाप्त नहीं होगा। जिस प्रकार कर्मफल भोगने का समय बढ़ाया जाना संभव है उसी प्रकार उसे घटाना भी संभव है। यही कारण है कि वे लोग जो इसी जीवन में मुक्त होने के लिये परम पुरुष की साधना करते हैं वे कष्ट और सुख अतिशीघ्रता से अनुभव करते हैं जिससे वे यथा संभव कम समय में अपने कर्मफल को भोग लें। इस तरह उन्हें आगे भोगने के लिये और प्रकृति के बंधन में फॅंसाने के लिये कुछ भी नहीं बचता।

रवि- कुछलोग सोचते हैं कि बुरे कामों के परिणाम भोगने से बचने के लिये उन्हें अच्छे  कामों द्वारा   संतुलित करना चाहिए अर्थात् यदि अच्छे और बुरे कर्म बराबर बराबर हो जावेंगे तो फिर उनके परिणाम एकदूसरे को उदासीन कर देंगे और फिर भोगने के लिये कुछ न बचेगा। क्या यह सही है?

बाबा- यह न तो होता है और न ही संभव है। यह स्पष्ट किया जा चुका है कि चाहे अच्छे कर्म हों या बुरे वे मन पर अपना प्रभाव डालकर उसमें विरूपण उत्पन्न करते हैं। मन को पूर्वावस्था में आने के लिये अर्थात् इस विरूपण को दूर करने के लिये बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होना आवश्यक  है। इसलिये बुरे कार्य को करने से हुआ मन का विरूपण अच्छे कार्य से नहीं दूर किया जा सकता क्योंकि वह मन पर अन्य प्रकार का  विरूपण ही उत्पन्न करेगा। प्रत्येक कार्य की स्वतंत्र बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होना चाहिए। स्वतंत्र क्रिया से जब मन का प्रत्येक विरूपण हट जाता है तो व्यक्ति को क्रमागत रूप से अच्छे या बुरे कर्म के अनुसार पृथक पृथक परिणाम भोगना पड़ता है। इसलिये  कोई भी व्यक्ति बुरे काम के परिणाम अच्छे कामों से उदासीन नहीं कर सकता। अच्छे काम का अच्छा और बुरे काम का बुरा परिणाम अलग अलग अनुभव किया जाता है यह प्रकृति का नियम है। इसप्रकार,  यह सिद्ध हुआ कि कर्मफल का भोगना टाला नहीं जा सकता। भगवान को दोष देना या परिणाम से बचने के लिये उनसे प्रार्थना करना केवल मूर्खता है। जिसने कर्म किया है उसे ही फल भोगना होगा। यदि तुम आग में हाथ डालते हो तो वह जलेगा ही वैसे ही प्रकृति का यह भी नियम है कि कर्म की प्रतिक्रिया होगी ही, भगवान उसके लिये दोषी नहीं हैं उसके लिये कर्म का कर्ता ही उत्तरदायी है।

इंदु- बाबा! भगवान की स्तुति और प्रार्थना से कर्मफल भोगने में कुछ कन्शेसन  तो मिलता होगा?

बाबा- प्रार्थना में कोई वाॅंछित बस्तु की चाह होती है अर्थात् यह एक प्रकार से  परम सत्ता के पास किसी लाभ के लिये भेजे जाने वाली पवित्र याचिका ही है। याचिकाकर्ता सोचता है कि उसे जो चाहिये है वह ईश्वर से  माॅंग ले क्योंकि वह, केवल अपनी इच्छा से ही उसकी पूर्ति कर सकते हैं। प्रार्थना से या माॅंगकर, क्या वह ईश्वर  को यह बताना नहीं चाहता कि उसके पास जो नहीं है वह प्राप्त हो जाये। इसका क्या यह अर्थ नहीं है कि वह ईश्वर  को याद दिला रहा है कि जिन चीजों से उसे वंचित रखा गया है वे दी जावें अन्यथा प्रार्थना की कोई आवश्यकता  नहीं थी। मानलो कोई व्यक्ति इस विश्वास  के साथ कि केवल भगवान ही मुझे धन दे सकते हैं, प्रार्थना करता है तो क्या यह, प्रकट नहीं करता कि ईश्वर  ने उसके साथ भेदभाव किया है क्योंकि जब केवल ईश्वर  ही धन दे सकता है तो उसने अन्य सब को दिया पर उसे वंचित रखा। अतः यह तो ईश्वर  पर आक्षेप लगाना और उसकी गलती बताना ही सिद्ध हुआ। इससे केवल यही अनुमान लगाया जा सकता है कि ईश्वर  ने भेदभाव कर किसी को धनी और किसी को गरीब बनाया है। अतः जब प्रार्थना से यह निष्कर्ष निकलता है तो प्रार्थना करना व्यर्थ है। किये गये कर्म का फल स्वयं को भोगना पड़ता है ईश्वर  पर आरोप लगाना अज्ञानता है। आग में हाथ डालने से वह अवश्य  ही जलेगा प्रार्थना से उसे बचाया नहीं जा सकता, क्योंकि प्रार्थना स्वीकार करने पर या तो ईश्वर  को आग के जलाने के गुण को समाप्त करना पड़ेगा या फिर हाथ की संरचना में परिवर्तन कर ऐंसा बनाना पड़ेगा कि वह न जले, जो कि असंभव है। ईश्वर  की रचना में कोई  त्रुटि नहीं है क्योंकि उसकी छोटी या बड़ी सभी चीजें अपने अपने धर्म का पालन करतीं हैं, अन्यथा प्रत्येक पद पर अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती। इसलिये किसी की प्रार्थना को स्वीकार करने के लिये ईश्वर  अपने नियमों में परिवर्तन नहीं करेंगे। इसलिये प्रार्थना कर कुछ माॅंगने से केवल समय ही नष्ट होगा, वह भाग्य नहीं बदल सकती। स्तुति करना भी ईश्वर  के गुणों की भजन या गीत गाकर प्रशंसा  करना ही है। इसे चापलूसी करने से अधिक कुछ नहीं माना जा सकता। जब कोई कुछ देने के योग्य होता है तो याचक उसकी प्रशंसा  कर चापलूसी करता है। इसी प्रकार ईश्वर  से कुछ पानें के लिये उसे याद कराना कि वे अंतर्यामी हैं, सर्वशक्तिमान हैं,  कृपालु हैं, कल्याणकारी हैं क्या चापलूसी नहीं है? इसलिये स्तुति भी प्रार्थना की तरह अप्रभावी होती है और केवल समय नष्ट करती है।

रवि-  जो लोग भक्त कहलाते हैं और ईश्वर  की भक्ति करते हैं वह भी तो प्रार्थना और स्तुति ही करते हैं तो उनका यह कर्म आपके अनुसार व्यर्थ ही हुआ?

बाबा-  भक्ति इनसे भिन्न है। भक्ति शब्द  संस्कृत  के 'भज्' और 'क्तिन' को संयुक्त करने पर बनता है, जिसका अर्थ है ‘‘ प्रेमपूर्वक पुकारना‘‘ यह स्तुति या चापलूसी या प्रार्थना नहीं है। यह ईश्वर  को प्रेम से पुकारना है।आप कह सकते हैं , इस पुकार का क्या औचित्य है? वास्तव में स्रष्टि में इकाई चेतना को सगुण ब्रह्म ने अवसर दिया है कि वह अपने सार्वभौमिक मूल स्तर में वापस आने का प्रयास कर सकती हैं जो उन्हें प्रेम से पुकारने पर ही संभव होता है। परम सत्ता की ओर जाने का एकमात्र रास्ता उन्हें प्रेम पूर्वक पुकारने के अलावा दूसरा नहीं है। मानव मन का स्वभाव यह है कि वह वैसा ही हो जाता है जैसा वह विचार करता है, जैसे कोई सोचता रहे कि वह पागल हो जावे तो वह वास्तव में पागल हो जावेगा क्योंकि उसके मन में वही विचार गूॅंजते रहते है। इसलिये इकाई चेतना जो परम चेतना की ओर तेजी से जाना चाहती है उसे उसके प्रति समर्पित होना होगा, इसे ही भक्ति  या उसे प्रेम से पुकारना कहते हैं। इकाई चेतना बार बार यह दुहराती है कि ‘‘मैं वही हूॅं‘‘ अतः समर्पित भाव से एक दिन वह परम चेतना ही हो जाती है। भक्ति का मतलब प्रार्थना या स्तुति करना नहीं है। पर कुछ लोग यह कहते है कि परम चेतना में मिल जाना या मुक्ति की चाह रखना भी एक प्रकार की प्रार्थना ही है। परंतु यह ऐंसा नहीं है, क्योंकि ईश्वर  ने मनुष्य को इसी उद्देष्य से बनाया है कि वह उसी की तरह परम स्तर पर वापस आये। अतः जब यह ईश्वर  की ही इच्छा है तो जो भक्ति के द्वारा ईश्वर  की इच्छा पूरा करने का प्रयत्न करता है उसे प्रार्थना करने की आवश्यकता  नहीं है। इसलिये भक्ति ही वह तरीका है जिसमें कोई भी परम चेतना में शीघ्र ही पूरी तरह समर्पित होकर परम पद पा सकता है। कर्मफल के भोग से बचने का कोई उपाय है ही नहीं, इसलिये बुरे काम छोड़ कर , जो दुख भोग रहे हैं उन से शिक्षा लेकर अच्छे काम में लग जाओ। जैसे हाथ को आग में डालने पर जलना ही पड़ेगा कोई प्रार्थना उसे नहीं रोक सकती अतः आगसे जलने से बचने का एक ही उपाय है कि हाथ को आग से बाहर खींच लो। इसी प्रकार जब बुरे कर्म होंगे ही नही तो बुरे परिणाम भी नहीं भोगने पड़ेंगे। कर्मफल भोगने संबंधी कठोर नियम प्रकृति ने मानवता की भलाई के लिये ही बनाया है। सगुण ब्रह्म के द्वारा स्रष्टि निर्माण करने का उद्देश्य प्रत्येक इकाई को मुक्त करने का है अतः  इस अर्थ में उन्हें सबसे अधिक लाभदायक माना जाना चाहिये। स्पष्ट है कि मनुष्य अज्ञानता के कारण ही कष्ट पाता है और ईश्वर  को दोष देता है। परंतु ज्ञानी लोग कष्टों से शिक्षा लेकर बुरे कामों से दूर रहते हैं।

Monday, 4 January 2016

41 बाबा की क्लास (कर्मविज्ञान)

41 बाबा की क्लास (कर्मविज्ञान)
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इंदु- बाबा! सभी लोग प्रायः यह कहते अवश्य  पाये जाते हैं कि कर्मफल भोगना ही पड़ता है, क्या कर्म के पीछे          भी कोई विज्ञान कार्य करता है?
बाबा- इस विज्ञान को समझने के लिये पहले उससे संबंधित मनोविज्ञान की इस शब्दावली और उनकी           परिभाषाओं को समझना  होगा जैसे ,
शम्भूलिंग: संसार के निर्माता की अलौकिक इच्छा से यह संसार चल रहा है। दर्शनशास्त्र  में परमपुरुष  की
                 इच्छा को शम्भूलिंग कहा गया है।
प्रत्ययमूलक कर्म: स्वतंत्रता पूर्वक किया गया कार्य, अर्थात् मूल कार्य(original action)
संस्कारमूलक कर्म: परिस्थितियों के दबाव में आभारी होकर किया गया कार्य, अर्थात् मूल कार्य
         की प्रतिक्रिया, (reaction to the original action) । व्यक्ति की परोक्ष इच्छा उसे,  ब्रह्माॅड में मूल क्रिया के
          कारण उत्पन्न असंतुलन को संतुलित करने के लिये, साधन बन जाती है।
अभिलाषा: अविद्या माया के प्रभाव से जब मन पर सांसारिकता की तरंगें प्रभावी होती हैं तो वह
         अपनी जड़ता में सीमित रहता है, इस स्थिति को अभिलाषा कहते हैं।
संकल्प: जब अभिलाषा की जडें गहरी हो जातीं हैं और मानसिक तरंगें द्रढ़तापूर्वक कार्य रूप में
         बदलना चाहतीं हैं, उसे संकल्प कहते हैं।
कृति: जब मन, प्राणेन्द्रिय और कर्मेंद्रिय के साथ जुड़कर कार्य करने लगता है तो उसे कृति कहते हैं।
अवधान: जब मन, प्राणेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय के साथ मिलकर विस्तारित होने लगता है तो उसे अवधान
        (advertence) कहते हैं।
        अभिलाषा, संकल्प, कृति, और अवधान सभी कर्म ही हैं। अवधान को तीन भागों में बाॅंटा गया है। अनवधान(inadvertence), चैत्तिकप्रत्यक्ष (perception), और प्रत्यय (conception)। जब भूतकालीन प्रत्यय स्मरणशक्ति के आधार पर पुनः मन में आ जाता है उसे तत्वज्ञान कहते हैं। तत्वज्ञान कई प्रकार के हो सकते हैं। जब साधना करते हुए जड़ मन (crude mind) सूक्ष्ममन (subtle mind) में  और सूक्ष्म मन, कारण मन (causal mind)  में मिलकर अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है तो इससे उत्पन्न नयापन वस्तुओं को पूर्णतः भिन्न प्रकार से अनुभव कराने लगता है, इस नये प्रकार से अनुभव किये गये चैत्तिक प्रत्यक्ष को तत्वज्ञान या सिद्धज्ञान कहते हैं।
रवि- कर्म से उत्पन्न सुख और दुख की अनुभूति किसे होती है? किसी व्यक्ति का जीवन कैसा होगा यह कैसे निर्धारित होता है?
बाबा- सुख और दुख की अनुभूति केवल मानसिक क्षेत्र में ही होती है क्योंकि वहीं पर मानसिक अनुभवों के कंपन संचित होते हैं। इस सुख और दुख की अनुभूति से ही संस्कार (reactive momenta) उत्पन्न होते हैं। इसी से वासना या इच्छाएं भी जन्म लेती हैं और इन्हीं इच्छाओं के कारण कर्म करना पड़ता है। क्रिया और इच्छा को पृथक नहीं किया जा सकता। यदि मिट्टी का घड़ा, इच्छा को प्रकट करे तो  उसमें भरा पानी, प्रत्ययमूलक कर्म को प्रकट करेगा। पानी घड़े का ही रूप ले लेता है। पानी रूपी कर्म को इच्छा रूपी घड़े से बाहर निकालने की पद्धति साधना कहलाती है, वह क्रिया जिसमें इच्छारूपी घड़े का आकार बनता है कर्माशय ( bundle of reactive momenta) कहलाता है। मनुष्य का जीवन कैसा होगा यह उसके संस्कारों के बंडल की प्रकृति पर निर्भर करता है।
नन्दू- आध्यात्मिक कर्म जैसे साधना और उससे उत्पन्न परिणाम जैसे समाधि आदि से क्या कर्म बंधन होता है?
बाबा- आध्यात्मिक क्रियाएं या प्रतिक्रियायें जैसे समाधि और साधना, सुख और दुख से ऊपर होती हैं अतः उनसे कर्मबंधन नहीं होता। जब कर्मकम्पन इच्छा के क्षेत्र में घुस जाते हैं तो इसे संस्कार अर्थात् reaction in potentiality  कहते हैं। संस्कारों का क्षय, मूल क्रियाओं के कंपनों के समान शक्तिशाली और विपरीत होने पर ही हो सकता हैं। एक जन्म के संस्कार अगले जन्म के संस्कारमूलक कर्म के द्वारा क्षय होते हैं क्योंकि किसी के संस्कार उसके जीवनकाल में परिपक्व तब तक नहीं होते जब तक इंद्रियाॅं , प्राण और मन अलग नहीं हो जाते। यही कारण है कि किसी के संस्कारों का भोग उसी जीवन में  नहीं होता। क्रिया प्रवाह की समाप्ति पर ही प्रतिक्रिया प्रारंभ होती है और क्रिया की समाप्ति वासनाभाॅंड( pot of desires) के संपर्क में आने और प्रतिक्रिया प्रारंभ होने के क्षण होती है, यही कारण है कि वर्तमान जीवन में संस्कार भोगते समय हम यह नहीं पहचान पाते कि यह पिछले किस कार्य का परिणाम हैं।
राजू- कुछ कर्मो का पता नहीं चलता पर उनका परिणाम भोगना पड़ता है और कुछ लोग यह कहते पाये जाते हैं कि अपने कर्मों का दंड भोग रहा है यह क्या है?
बाबा-  इन्हें दो प्रकार से समझाया जाता है-
1. अद्रष्टवेदनीय कर्म:  जब पूर्व जन्म के कर्मों की प्रकृति जाने बिना प्रतिक्रिया अनुभव होती है उसे अद्रष्टवेदनीय कर्म या भाग्य कहते हैं। जैसे कोई सद्गुणी व्यक्ति प्रचंड दुख भोगने लगे या कोई दुष्ट व्यक्ति अत्यंत सुखी जीवन जीने लगे।
2. द्रष्टवेदनीय कर्म:  जब किसी गंभीर बीमारी, छल से  या किसी महापुरुष के संपर्क से कुंडलनी के जागृत होने से मन अस्थिर रूप से ज्ञानेन्द्रियों , कर्मेंन्द्रियों और प्राणेन्द्रिय से अलग हो जाता है तो संस्कारों का बंडल पक जाता है और व्यक्ति इसी जन्म में अपने किये का परिणाम भोगने लगता है इसे द्रष्टवेदनीय कर्म कहते हैं। परंतु यह विरला ही होता है, सामान्यतः हम अपने पूर्व जन्म के संस्कार ही इस जन्म में भोगते हैं।
यदि किसी के पिछले जन्म के और वर्तमान जन्म के संस्कार समान हैं तो वह पिछले और इस जन्म के संस्कार साथ साथ भोगने लगता है पर यदि पिछले जन्म से इस जन्म के संस्कार भिन्न होते हैं तो पहले पिछले जन्म के और फिर इस जन्म के संस्कार भोगना पड़ते हैं। मूल कर्माें की प्रकृति के अनुसार ही प्रतिक्रिया होती है, यदि कोई व्यक्ति किसी बीमार, ईमानदार , किसी के आश्रित या सन्त को कष्ट देता है तो वह उसी तीव्रता की प्रतिक्रिया तत्काल भोगेगा क्योंकि बीमार, सन्त, आश्रित आदि, गलत कर्म करने वाले के मूलकार्यों को कभी भी विरोध नहीं करते। चाहे अच्छे हों या बुरे जबतक सभी संस्कारों का क्षय नहीं हो जाता मुक्ति मिलना संभव नहीं है।
रवि- इस प्रकार तो कर्म लगातार जन्म लेते जायेंगे और क्षय भी होते जायेंगे ? यह क्रम कब रुकेगा? रुकेगा भी या नहीं?
बाबा-जब तक शरीर है तब तक कर्म रहेगा अतः आध्यात्मिक साधक को सावधान रहकर नये संस्कारों को वासनाभांड में प्रवेश  नहीं होने देना चाहिए। उचित और लगातार ब्रह्म चिंतन और साधना से वासनाभाॅंड को विशुद्ध चेतना से भरे रहने पर नये संस्कारों को प्रवेश  करने से रोका जा सकता है। लगातार ईशचिंतन करते रहने से नये संस्कारों का जन्म नहीं होगा और पुराने जल्दी ही क्षय हो जावेंगे। सच्चा साधक सुख और दुख दोनों से अप्रभावित रहता है।
अष्टाॅंगयोग की साधना से अपनी सभी इंद्रियों और इच्छाओं को परमचेतना की ओर प्रेषित करते रहने पर कर्माशय में चेतना का प्राधान्य हो जाता है और आसन, प्राणायाम आदि करने से मन और प्राणों पर उचित नियंत्रण हो जाता है, इस तरह मन शुद्ध हो जाता है। इसे 'अनुभव' कहते हैं। मन के शुद्ध हो जाने पर वह धीरे धीरे अनुभव करने लगता है कि वह शरीर नहीं है, इस सजगता के लिये 'प्रज्ञा' कहा जाता है, प्रज्ञा को सात्विक बनाये हुए जब वासनाभांड में चेतना लबालब भर जाती है तो साधक के पुनः जन्म लेने की संभावना कम हो जाती है वह 'दग्धबीजवत' हो जाता है। कर्माशय के चेतना से भरे होने पर वासनाभाॅड फिर भी रह जाता है जिसे परमपुरुष के चरणों में पूर्णतः समर्पित होकर उन्हें ही सौंपना पड़ता है जो लगातार उन्हीं के चिंतन करते रहने से संभव होता है। उनका इस प्रकार से लगातार चिंतन करते रहना "पुरुषख्याति" कहलाता है। इसप्रकार जब वासनाभाॅंड सहित सबकुछ परम पुरुष को सौप दिया जाता है तो साधक पूर्णरूप से परम पुरुष में ही मिल जाता है। इसे ही मुक्ति, मोक्ष कहते हैं।

Sunday, 27 December 2015

40 बाबा की क्लास (संस्कार)

40 बाबा की क्लास (संस्कार)
नन्दू- बाबा! आपने अनेक बार अपनी वार्ता में ‘संस्कार‘ शब्द का उच्चारण किया है यह क्या है? क्या अन्य लोग जिन संस्कारों की बात करते हैं उनसे यह भिन्न होते हैं?

बाबा- नन्दू! अन्य लोग जिन संस्कारों के संबंध में बातें करते हैं वे केवल अच्छी आदतें और व्यवहार अर्थात् आचरण के अर्थ में ही होते हैं परंतु योगविज्ञान में संस्कार, प्रत्येक व्यक्ति के मन पर प्रत्येक क्षण उसके विचारों और क्रियाओं के द्वारा अंकित किये जा रहे प्रभावों अर्थात् (reactive momenta) को कहा गया है। चूंकि मन एक लगातार परिवर्तनशील क्रियात्मक अवयव है इसलिये उसमें इसके पूर्व की स्थितियों के सभी परिवर्तनों के परिणाम संचित रहते हैं क्योंकि प्रत्येक स्थिति अपने पूर्व की स्थितियों का परिणाम होती है। इन्हें ही संस्कार कहते हैं जो इकाई मन को संवेग (momentum) प्रदान कर आगे सक्रिय रखते हैं। 

रवि- फिर तो हम  आजीवन संस्कारों का ही निर्माण और भोग करते है?

बाबा- हाॅं! जिन संस्कारों के भोगने का अवसर आ जाता है तो उन्हें भोगना ही पड़ता है और जो नहीं भोग पाते उन्हें भोगने के लिये हमारा मन उचित अवसर तलाशता रहता है चाहे इसके लिये कितने ही जन्म क्यों न लेना पड़ें।

राजू- इनका प्रारंभ कब से होता है और ये कब समाप्त होते हैं, समाप्त होते भी हैं या नहीं क्योंकि आपके अनुसार यह तो जन्म जन्मान्तर तक चलने वाली प्रक्रिया है?

बाबा- चूॅंकि सभी प्रकार के पूर्व परिणामों, ब्रह्मचक्र अर्थात् संचर और प्रतिसंचर के लिये ब्राह्मिक मन  (cosmic mind) ही कारण होता है अतः इकाई मन को उसी का आकर्षण और अधिक त्वरित करता जाता है।  प्रकृति के सक्रिय होने के प्रथम विंदु से संचर क्रिया के अंतिम अर्थात् जड़ पदार्थों के निर्माण होने तक यह संवेग ब्रह्म मन के द्वारा ही दिया गया है। जिस प्रथम अवस्था में इकाई मन में  अहम तत्व और महत्तत्व नहीं था वहाॅं कोई संस्कार भी नहीं था और वह ब्रह्म चक्र के केन्द्र की ओर बढ़ता जा रहा था। पर  आगे की स्थितियों में जीव इकाई मन, पौधों और प्राणियों के रूपमें अपने में क्रमशः  अहं को विकसित करता गया जो उसकी मानसिक क्रियाओं को नियंत्रित करता रहा और इस प्रकार उसके संस्कार बनने लगे। इसी के उन्नत क्रम में मनुष्य आया जो प्रतिसंचर में बढ़ते हुए अपने दिव्य लक्ष्य परमपुरुष की ओर जाने के साथ साथ वापस विपरीत प्रतिसंचर और संचर मार्ग को भी अपना सकता है और मनुष्य से नीचे के प्राणी या निर्जीव के संस्कारों को भी अपने मन में ग्रहण कर संचित रख सकता है। इस प्रकार सामान्य जीव प्रकृति के सहारे प्रतिसंचर में आगे ही बढ़ता है क्योंकि उसका अहं बहुत कम होता है, पर मनुष्य का अहं अधिक होने के कारण वह आगे पीछे कहीं भी जा सकता है। 

रवि- तो क्या हमसब अपने पूर्व संस्कारों को भोगने के लिये ही जन्में हैं? यदि हाॅं, तो फिर हमारी भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति की चेष्टायें व्यर्थ ही हैं?

बाबा- पेड़ पौधे और पशु  अपनी प्रगति में प्रकृति के अनुसार ही चलते हैं उनका अपना स्वतंत्र इच्छायें या मत कुछ नहीं होता परंतु मनुष्य के स्तर पर जीव अपना स्वतंत्र विचार और इच्छायें रख सकते हैं इसीलिये वे अपने संस्कार निर्मित करते हैं और क्षय भी कर सकते हैं। आध्यात्मिक चेष्टायें सभी प्रकार के संस्कारों को क्षय करने और नये संस्कार जन्म न ले पायें इसीलिये ही की जाती हैं। 

इंदु- बाबा! यह सब कैसे होता रहता है?

बाबा-   प्रतिसंचर गति में इकाई संरचना को किसी वस्तु के साथ अपना साम्य स्थापित करने के लिये मानसिक और भौतिक तरंगों में संतुलन के साथ साथ प्राणों में संतुलन स्थापित होना अनिवार्य होता है इस संतुलन के अभाव में इनमें इकाई संरचना का स्थायित्व नहीं रह सकेगा। अतः इन मानसिक और भौतिक तरंगों के साम्य अथवा असाम्य होने पर संचर क्रिया में आगे उन्नति या पीछे की ओर अवनति होती है। जैसे किसी कुत्ते का मनुष्यों का सामीप्य पाने पर उसकी मानसिक तरंग दैर्घ्य  में बृद्धि होते  जाने पर एक स्तर पर वह अपने कुत्ते वाले शरीर के साथ संतुलन नहीं बिठा पायेगा और उसे उस शरीर को छोड़कर अन्य उपयुक्त और उन्नत तरंगदैर्घ्य  वाले शरीर को पाने की तलाश  करना होगी। इस प्रकार कुत्ता को उसके मन में उन्नत तरंग के स्थायी हो जाने पर मरना पड़ेगा। इसी प्रकार यदि किसी मनुष्य की मानसिक तरंगे उसकी भौतिक देह के साथ संतुलन नहीं बना पाती तो उसका मानसिक शरीर भौतिक शरीर को त्याग कर उस शरीर को खोजने लगेगा जिसके साथ उसकी मानसिक तरंगों का संतुलन हो सके अतः वह अपनी मानसिक तरंगों के अनुसार आगे उन्नत मानव या नीचे अवनत पशु  या पेड़ के शरीर को पा सकता है।

राजू- तो क्या हम इस विज्ञान का जनसामान्य के लाभ के लिये भी उपयोग कर सकते हैं?

बाबा- बिलकुल, इसके लिये बहुत अभ्यास की आवश्यकता होती है। कहने का अर्थ यह है कि संस्कार जनित उन्नत तरंग दैर्घ्य  का अनुसरण, निम्न स्तर के जीव को उच्च स्तर पर और निम्न तरंगदैर्घ्य  के अनुसरण से उच्च स्तर का मनुष्य, निम्न स्तर के प्राणी की देह में चला जाता है। इस तरह एक डाक्टर यदि इस विज्ञान को जान कर किसी व्यक्ति को दवाओें के आधार पर उसकी भौतिक तरंगदैर्घ्यों  को संतुलन में लाकर बढ़ा दे तो उसका जीवन काल बढ़ा सकता है पर यदि उसने व्यक्ति की मानसिक शरीर की तरंगदैर्घ्य   में बृद्धि कर दी तो फिर वह उस मनुष्य को किसी और मनुष्य में बदल डालेगा। मिस्टर ‘‘एक्स‘‘ मिस्टर ‘‘वाय‘‘ हो जावेंगे। इसलिये शरीर के उचित संचालन के लिये मानसिक शरीर, भौतिक शरीर और प्राण इन तीनों में सुसंतुलन होना अनिवार्य है।

रवि- यह तो बड़ा ही विचित्र है! मुझे तो यही समझ में नहीं आ रहा कि यह सब जानकर अब हमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं?

बाबा- तुम लोगों को यह तो स्पष्ट हो गया है कि यह ब्रह्माॅंड सगुण ब्रह्म की मानसिक तरंगों का प्रवाह है जो संचर और प्रतिसंचर गतियों में लगातार गतिशील रह कर ब्रह्मचक्र (cosmic cycle) कहलाता है। हमारा जीवन केवल इसी जन्म और मृत्यु तक सीमित नहीं है वरन् वह ब्रह्मचक्र  के सभी स्तरों की पूर्वोक्त तरंगों अर्थात् स्पेस टाइम में बंधकर गेेलेक्सियों तारों और पंचभूतों के साथ पौधों और प्राणियों में से होता हुआ अभी इस मनुष्य स्तर पर आ पाया है और उसे अपने मूल उद्गम (origin) तक पहुॅंचना है तभी उसकी यह यात्रा पूरी होगी। मनुष्य के स्तर पर आकर यह स्वतंत्रता है कि या तो बचा हुआ रास्ता आगे बढ़कर पूरा करे या पीछे लौट कर इन्हीं जीवजंतुओं और पेड़पौधों में से होकर फिर से लाखों वर्षों तक ठोस द्रव गैस और प्लाज्मा अवस्थाओं में भटकता रहे। चूंकि यह जन्म पिछले लाखों जन्मों का परिणाम है अतः स्वाभाविक रूप से उन सबके अभुक्त संस्कारों (unrequited reactive momenta)  का बोझ हमें ढोते जाना होगा जब तक कि वे समग्रतः समाप्त नहीं हो जाते। यह संस्कार हमारे सोच विचार और कर्मों के अनुसार लगातार प्रत्येक क्षण बनते और क्षय होते रहते हैं। इन संस्कारों से मुक्त होना तभी संभव हो सकता है जब नये संस्कार बन ही न पायें और पुराने जल्दी से जल्दी समाप्त हो जायें। मृत्यु के समय जिस प्रकार के संस्कारों का समूह भोगने के लिये बचा रहेगा उसी के अनुसार अनुकूल अवसर आने पर ही प्रकृति हमें उस प्रकार का शरीर उपलब्ध करायेगी और तब तक हमें अपने संस्कारों का बोझ लादकर मानसिक शरीर या सूक्ष्म शरीर (luminous body) में रहते हुए ही आकाश (space) में भटकते रहना होगा। साधना ही वह प्रक्रिया है जिसका अनुसरण कर हम नये संस्कारों को जन्म लेने से रोक सकते हैं और पुराने संस्कारों को शीघ्रातिशीघ्र  समाप्त कर सकते हैं। संस्कारों के शून्य हो जाने पर हम वापस अपने असली घर में पहुंच जाते हैं जो देश , काल ( time and space) से मुक्त परमानन्द अवस्था है। साधना क्या है और कैसे की जाती है यह कौल गुरु ही सिखा सकते हैं वे बताते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति विशेष के द्वारा, ब्राह्मिक भाव लेकर कार्य करने से नये संस्कार जन्म नहीं  ले पाते , किस प्रकार के इष्टमंत्र से पिछले सभी संस्कारों को अभ्यास द्वारा क्षय किया जाता है और हमारे इस मानव शरीर में प्रसुप्त देवत्व को जाग्रत कर हम कैसे अपने चिदानन्द स्वरूप को पा सकते हैं।

Sunday, 20 December 2015

39 बाबा की क्लास (माया)

39
बाबा की क्लास (माया)
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रवि- बाबा! कुछ विद्वान लोग कहते हैं कि यह संसार ही मिथ्या है ये जो कुछ दिखाई देता है वह सब माया है, इसका क्या अर्थ है?

बाबा- जिन विद्वानों ने जगत को मिथ्या कहा है वे यह तब कह पाये जब उन्होंने आत्मसाक्षात्कार कर लिया। उन्होंने  इस अवस्था को  अनुभव किया और यह कहा कि ‘ब्रह्म सत्यम जगद्मिथ्या‘ अर्थात् ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्या। इसे दर्शनशास्त्र  में मायावाद कहा गया है।

नन्दू- मेरी तो समझ के बाहर है, जो स्पष्ट दिखाई दे रहा है , जिसके अस्तित्व का हम आप और सभी अनुभव करते हैं उसे मिथ्या कैसे कहा जा सकता है?

बाबा- नन्दू ! तुम्हारा कहना गलत नहीं है। हमें पहले ‘सत्य‘ की परिभाषा को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये तभी तो असत्य या मिथ्या को समझ सकेंगे, ठीक है? सत्य क्या है, बताओ? नहीं जानते?

रवि- सत्य माने जो जैसा है वैसा ही और मिथ्या माने जो अपने मूलस्वरूप से भिन्न हो वह।

बाबा- ठीक कहा, ‘सत्य‘ अपरिवर्तनशील होता है, प्रत्येक स्थिति में एक सा, एकरस। परंतु ‘असत्य या मिथ्या‘ परिवर्तनशील होता है। जो अपरिर्विर्तत रहता है उसे निर्पेक्ष सत्य और जो परिवर्तित होता है उसे सापेक्षिक सत्य कहते हैं। तुम लोग जानते हो कि यह ब्रह्माॅंड उस एक ही 'परमसत्ता' के परम मन अर्थात् कास्मिक माइंड की विचार तरंगों के अलावा कुछ नहीं है अतः निर्पेक्ष या परमसत्य तो केवल परमपुरुष ही हैं अन्य सब का अस्तित्व उनके सापेक्ष ही है इसलिये यह जगत सापेक्षिक सत्य है परंतु अज्ञानवश  हम इसे निर्पेक्ष सत्य मानकर उसके स्वाभाविक परिवर्तनों से प्रभावित होकर सुख दुख का अनुभव करते हैं और मैं- मेरा तथा तू - तेरा के चक्कर में पड़ जाते हैं।

राजू- बाबा! परंतु विद्वान महापुरुषों  ने तो इसे स्पष्टतः मिथ्या कहा है और ‘माया‘ अर्थात् इल्यूजन कहकर दूर रहने का संदेश  बार बार दिया है।

बाबा- श्रुति में माया के सम्बन्ध में कहा गया  है ‘ घातना अघातना पतीयसी माया‘ अर्थात् ‘‘जो है, वह न होने और जो नहीं है, उसे होने जैसा अनुभव कराने वाली  सत्ता माया कहलाती है।" इस संसार में सभी कुछ निश्चित  समय के लिये ही अस्तित्व में रह पाता है परंतु हमें अनुभव यही होता है कि यह सब हमारे साथ सदा ही रहेगा यही भ्रम माया के नाम से जाना जाता है।

चंदू- बड़ी विचित्र बात है! हम हैं भी और नहीं भी, इसे कैसे समझें? इस जगत और माया को हम किस प्रकार समझ सकते हैं?

बाबा- इसीलिये तो निर्पेक्ष अवस्था का अनुभव करने वाले महापुरुष इसे मिथ्या कहने लगते हैं। जगत को दार्शनिकगण  ‘सापेक्षिक सत्य‘ कहते हैं जो विद्यामाया और अविद्या माया के द्वारा अपना अस्तित्व बनाये रखता है। यह वैसा ही है जैसे वृत्ताकार गति करने वाले किसी पिंड पर संतुलन बनाये रखने के लिये तुरंत दो बल सक्रिय हो जाते हैं एक केन्द्र की ओर अर्थात् सेन्ट्रीपीटल और दूसरा केन्द्र के बाहर की ओर अर्थात् सेन्ट्रीफ्यूगल। ब्रह्माॅंड के केन्द्र में परमपुरुष की ओर विद्यामाया और बाहर की ओर अविद्यामाया सक्रिय रहती है। हमें यह अष्ट पाषों और षडरिपुओं के जाल में उलझाकर अपने अस्तित्व को बनाये रखती है। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य  इन आठों बंधनों और छहों शत्रुओं से लगातार संघर्ष करते हुए अपने मूल स्वरूप अर्थात् केन्द्र स्थित परमपुरुष की ओर लौट जाना है जहाॅं से कभी हम उनकी विचार तरंगों के रूप में  अर्थात् ब्रह्म चक्र में आये और सूक्ष्म से स्थूल और स्थूल से सूक्ष्म रूपों में लगातार चक्कर लगा रहे हैं।

इंदु- हमारे  छह शत्रु और आठ बंधन कौन कौन से हैं बाबा?

बाबा- शायद  तुम पिछली क्लासों में उपस्थित नहीं थीं , इसे पहले बताया जा चुका है ,फिर से समझ लो। मनुष्य का जीवन आठ प्रकार के बंधनों और छः प्रकार के शत्रुओं से घिरा रहता है ।  काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, और मात्सर्य ये षडरिपु और भय, लज्जा, घृणा, शंका, कुल, शील, मान और जुगुप्सा ये अष्ट पाश  है। षड रिपु का अर्थ है छै शत्रु, इन्हें शत्रु इसलिये कहा जाता है क्योंकि ये इकाई चेतना को सूक्ष्मता की ओर जाने से रोककर स्थूलता में अवशोषित करने का कार्य करते हैं। इकाई चेतना का उच्चतम स्तर सूक्ष्म है अतः उस ओर जाने से रोकने वाला शत्रु हुआ। अष्ट पाश  का अर्थ है आठ बंधन, बंधनों में बंधा हुआ कोई भी व्यक्ति अपनी गति खो देता है। स्रष्टि में हम देखते हैं कि मानव की गति स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है परंतु अष्ट पाश  जैसे लज्जा, घृणा और भय ..  आदि स्थूलता से जकड़े रहने के कारण सूक्ष्मता की ओर जाने से रोके रहते हैं।

रवि- जब इतने प्रबल शत्रु और बंधन सब के साथ हैं तो उन से कहाॅं तक संघर्ष किया जाये? अपने मूलस्वरूप में वापस हो पाना संभव ही नहीं है?

बाबा- ऐसा नहीं है रवि! इन से किया जाने वाला यही संघर्ष ही साधना करना या पूजा करना कहलाता है। अविद्या माया, विरोधात्मक बल उपरोक्त प्रकार से लगाती अवश्य है  परंतु वह हमारी आध्यात्मिक अग्रगति में सहायता करने के लिये ही यह करती है।  जैसे, धरती पर चलते समय घर्षण बल हमारी गति का विरोध करता है परंतु जब हम फिर भी आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं तो यही सहायक बन जाता है, यदि यह विरोध न हो तो हम आगे चल ही नहीं सकते । चिकने तल पर चलकर देखना यह तथ्य समझ में आ जायेगा। 

नन्दू- तो क्या हमें विद्यामाया का ही सहारा लेना चाहिये और अविद्यामाया से दूर रहना चाहिये?

बाबा- नहीं, केवल एक किसी के सहारे हमें अपने संघर्ष में सफलता नहीं मिल सकती । हमें सम्यक रूपसे अविद्यामाया की मदद लेते हुए विद्यामाया का साथ देना चाहिये। यदि हम  केवल विद्या की उपासना करेंगे तो जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें भोजन, वस्त्र ,आवास आदि कौन जुटायेगा? इन्हें आवश्यकतानुसार प्राप्त करने के लिये ही अविद्या का सहारा लेना पड़ता है । यदि केवल अविद्या की उपासना करेंगे तो यहीं फंसे रहेंगे । श्रुतियों में कहा गया है ‘‘ अंधं तमः प्रविश्यन्ति ये अविद्यामुपासते, ततो भूय ऐव ते तमो य उ विद्यायांरताः ।‘‘ अर्थात् जो केवल अविद्या की उपासना करते हैं वे अंधे कुए में ही अपने को फेकते हैं और जो केवल विद्या की उपासना करते हैं वे उससे भी अधिक गहरे अंधे कुए में अपने को फेक देते हैं। अतः स्पष्ट है कि सम्यक  अविद्या का उपयोग कर विद्या की उपासना करने से ही हम अपनी आध्यात्मिक प्रगति कर सकते हैं। इसलिये यह जगत मिथ्या नहीं सापेक्षिक सत्य है।

Wednesday, 16 December 2015

38 संकल्प

संकल्प
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  ‘‘ अभी तक जितनी लड़कियाॅं देखीं हैं उनमें से जिसे कल देख कर आये हैं मुझे तो वह सबसे अच्छी व सुंदर लगी, अपने ‘हर्ष‘ को भी पसंद आई, दोनों इंजीनियर हैं एक ही कंपनी में काम भी करते हैं, एक सी सेलरी भी है, मैं तो कहती हॅूं आज ही लड़की वालों से आगे की बात कर  शुभ लग्न देखकर विवाह सम्पन्न कर दो, देरी करना उचित नहीं है‘‘
‘‘ मैं भी यही सोचता हॅूं।  यदि ‘हर्ष‘ का भी यही विचार है तो फिर मैं बात आगे बढ़ाता हॅूं।‘‘

‘‘ हेलो, पाॅंडे जी ! मैं त्रिपाठी,  हमें लड़की पसंद है, अब आगे की रूपरेखा के संबंध में बात करना है, यदि आप यहाॅं आ जायें तो अच्छा होगा‘‘
‘‘ ओहो, नमस्कार त्रिपाठी जी!, मैं आपके आदेश  का पालन करनें हेतु अभी आपके पास हाजिर होता हॅूं । ... ... ...

‘‘   आइये, आइये पाॅंडे जी! यहाँ  बैठिये।  - - -  वास्तव में, मैं यह जानना चाह रहा था कि आपका संकल्प क्या है?‘‘
‘‘ आदरणीय! मेरा संकल्प तो यह है कि, भगवान ने मुझे लड़कियाॅं ही दी हैं इसलिये उन्हें लड़कों के समान ही शिक्षित कर आत्मनिर्भर बना दॅूं, बस, धीरे धीरे वही पूरा करता जा रहा  हॅूं।‘‘
‘‘ अरे पाॅंडे जी! वह तो सभी करते हैं, मैं तो इस विवाह के संबंध में किये गये आपके संकल्प के बारे में पूछ रहा था अर्थात् कितना खर्च करने का विचार है?‘‘
‘‘आप ही बता दें कि आप कम से कम कितना खर्च करना चाहते हैं‘‘
‘‘  इस जमाने में दस से पन्द्रह लाख तो साधारण लोग भी खर्च कर देते हैं फिर हमारा स्तर तो,,, आप जानते ही हैं‘‘
‘‘ महोदय! जहाॅं तक मैं जानता हॅूं, ‘संबंध‘ का अर्थ है ‘सम प्लस बंध‘, अर्थात् दोनों परिवारों की ओर से प्रेम और आकर्षण के एक समान बंधन, इक्वल बाॅडस् आफ लव एन्ड अफेक्शन , इसलिये आप जो भी खर्च निर्धारित करेंगे हम दोनों परिवार बराबर बराबर बाॅंट लेंगे, ठीक है?‘‘
‘‘ अच्छा, पाॅंडे जी! फिर तो हमें इस विकल्प पर विचार करना पड़ेगा, नमस्कार!‘‘

Sunday, 13 December 2015

37 बाबा की क्लास (उपवास)

बाबा की क्लास (उपवास)
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रवि-  बाबा! आज हमें उपवास के संबंध में बताईये यह क्या है, और इसका महत्व भी है या केवल प्रदर्शन  ही करते हैं लोग? 

बाबा- उपवास का अर्थ है निकट बैठना,( उप= निकट, वास = बैठना) । किसके निकट बैठना, ईश्वर  के निकट बैठना। समझे? परंतु , अधिकाॅंश  लोग उपवास का अर्थ निकालते हैं भोजन का त्याग करना और फलफूल खाना, या दिन भर भोजन त्याग कर रात में मन चाहा सुस्वादु भोजन करना। लेकिन इसे उपवास नहीं कह सकते क्योंकि केवल भोजन का त्याग करने को संस्कृत में कहते हैं ‘अनशन‘ या ‘निराहार‘, और भोजन त्याग कर केवल फलफूल खाने को कहते हैं ‘फलाहार‘।

नन्दू-  जब उपवास का अर्थ है ईश्वर  के निकट वैठना, तो भोजन के त्याग करने का कोई औचित्य ही नहीं है?

बाबा-  उपवास का सीधा संबंध स्वास्थ्य से है, मानव शरीर जीववैज्ञानिक मशीन है उसके प्रत्येक अंग को समय समय पर विश्राम देने के लिये भोजन का त्याग कर शरीर के पाचन तंत्र की सफाई करना आवश्यक होता  है। भोजन न करने पर अन्य सभी अंग आराम करते हैं और मन सक्रिय रहता है इसलिये उसे उचित आराम देने के लिये ईश्वर के  चिंतन में लगाकर उनके निकट बैठाना पड़ता है । इसलिये उपवासों के दिन ही  ईश्वर  चिंतन के लिये सर्वोत्तम दिन होते हैं। वास्तव में हम जो भोजन प्रतिदिन करते हैं उसका, पाचनतंत्र के विभिन्न अवयवों के द्वारा परिमार्जन किया जाकर मस्तिष्क के लिये उचित भोजन तैयार किया जाता है जो लसिका  या लिम्फ  कहलाता है। हमारे मस्तिष्क के ‘एक्टोप्लाज्मिक सैल‘ इसी से सक्रिय होते  हैं, इनकी संख्या पूरे ब्रह्माॅंड के कुल तारों की संख्या से अधिक होती है। इनकी आधी संख्या के बराबर न्यूरान होते हैं जो सोचने विचारने के लिये तथा आधे ‘ग्लायल सैल‘ कहलाते हैं जो न्यूरान्स को सक्रिय बनाये रखने में सहायता करते हैं। आधुनिक शोधों से पता चला है कि आइंस्टीन के स्तर के विद्वानों के ब्रेन सैल भी अधिकतम 9 से 10 प्रतिशत ही सक्रिय पाये गये हैं शेष उदासीन। इससे ही अंदाज लगाया जा सकता है कि जिनके शतप्रतिशत ब्रेनसैल सक्रिय होंगे वे इस दुनियाॅ में किस स्तर पर कहलायेंगे। इससे यह स्पष्ट होता है कि वह लिंफ ही है जिसका सदुपयोग कर हम अपने ब्रेन सैलों को अधिकाधिक संख्या में सक्रिय बना सकते हैं।

राजू-  तो बाबा! इसका अर्थ क्या यह नहीं है कि हमें अधिकाधिक भोजन करना चाहिये जिससे हमारे अधिक से अधिक ब्रेन सैल सक्रिय हो जायें ? भोजन आखिर क्यों त्यागा जाये?

बाबा- ऋषियों ने इस संबंध में एक और रहस्योद्घाटन किया है वह यह कि एक माह में जो भोजन हम करते हैं  उससे बनने वाले लिंफ को ये क्रमशः सक्रिय होते जाने वाले सैल पूरा उपयोग में नहीं ला पाते और चार दिन के भोजन से बनने वाले लिंफ के बराबर लिंफ अतिशेष हो जाता है जो पुरुषों में ‘सीमेन‘ के रूप में और महिलाओं में ‘ ओवा‘ के रूप में बदलकर नष्ट होता रहता है। इसी अतिशेष लिंफ को पूर्ण रूपेण लाभदायी बनाने के लिये माह में चार दिन उपवास करने का उपाय निकाला गया । इसके लिये प्रत्येक माह की दोनों एकादशियाॅं और अमावश्या  तथा पूर्णिमा को उपवासों के लिये उपयुक्त दिन माना गया है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक पक्ष की इन तिथियों के बीच चंद्रमा, पृथ्वी के अधिक निकट आ जाता है जो जलीयतत्व अर्थात  एक्वस फेक्टर  को आकर्षित करता है जिससे हमारे मन पर ज्वार भाटे जैसे उत्तेजक विचार आने लगते हैं। अतः उन दिनों यदि निर्जल उपवास रखा जाता है तो अतिशेष लिंफ सीमेन में नहीं बदल पायेगा और नष्ट होने से बच जायेगा तथा अन्य लिंफ सक्रिय ब्रेन सैल्स के द्वारा पूर्ववत  अवशोषित किया जाकर उपयोग में ले लिया जायेगा। नैष्ठिक ब्रह्मचारियों और संन्यासियों के लिये लिंफ की एक भी बूंद नष्ट नहीं होनें देनें के निर्देशों  का पालन करना होता है। ग्रहस्थों अर्थात् प्राजापत्य ब्रह्मचारियों को  इस अतिशेष लिंफ का ही उपयोग केवल संतानोत्पत्ति के लिये करने के निर्देश  हैं। वर्तमान युग के लोगों में विशेषतः युवा वर्ग में लिंफ के महत्व की जानकारी नहीं होती अतः अवांछित उत्तेजक विचारों के आने पर वे अनियंत्रित होकर अनैतिक और समाज विरोधी गतिविधियों में लग जाते हैं जिससे अपना जीवन तो नष्ट करते ही हैं वे समाज का भी अनेक प्रकार से अहित करते हैं।

चंदू-  बाबा! क्या उपवास करने के लिये किसी विशेष विधि का पालन करना भी निर्धारित है या नहीं?

बाबा- उपवास प्रारंभ करने और समाप्त करने के लिये भी विहित प्रक्रिया का पालन करना चाहिये, इसमें सूर्योदय से सूर्योदय तक भोजन और पानी का त्याग करना चाहिये परंतु यदि कोई बीमारी हो तो बीच बीच में  केवल जल पिया जा सकता है। जिस दिन उपवास करना हो उसकी पूर्व संध्या को आधा भोजन ही करना चाहिये। उपवास का पूरा दिन साधना और ईश्वर प्रणिधान में लगाना चाहिये जिसमें स्वाध्याय, चिंतन, मनन और निदिद्यासन भी बीच बीच में करते रहना चाहिये क्योंकि यही विधियाॅं हैं जो मन को ईश्वर  के अधिक निकट ले जाती हैं। उपवास तोड़ते समय दो या तीन नीबू हल्के गर्म, एक लिटर पानी में निचोड़ कर दो चम्मच नमक डालकर गुनगुने पानी को धीरे धीरे पूरा पी चुकने के आधे घंटे बाद फिर आधा लिटर सादा पानी पीने पर यदि टायलेट जाने की इच्छा न हो तो कुछ मिनटों में आधा लिटर सादा पानी और पीना चाहिये और टायलेट के आसपास ही चलते फिरते रहना चाहिये, अगले आधे घंटे में रुक रुक कर  तीन या चार बार टायलेट जाना पड़ सकता है जिसमें पेट का रुका हुआ सभी दूषित पदार्थ पानी की तरह पतला होकर बाहर हो जायेगा।  इसे डायरिया मानकर डरें नहीं।  जब स्वच्छ पानी की तरह यूरिन/शौच आने लगे  तब इसके बाद फिर टायलेट नहीं जाना पड़ेगा । स्नान कर दो या तीन केले खा लेना चाहिये और आधे घंटे के बाद हल्का भोजन खिचड़ी आदि ही लेना चाहिये, इसके एक दो घंटे बाद पूरा भोजन करना चाहिये। इस प्रकार पेट की सफाई हो जायेगी और ईश्वर  चिंतन भी , जो कि उपवास की परिभाषा के अनुकूल है।
इस प्रकार उपवास में लगभग 36 घंटे तक निराहार रहना पड़ता है परंतु जो इतनी लंबी अवधि तक नहीं रह सकते हैं वे कम सम कम 24 घंटे के अनुसार इस विधि को व्यवस्थित कर सकते हैं। 
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Sunday, 6 December 2015

36 बाबा की क्लास (इष्ट मंत्र)

36 बाबा की क्लास (इष्ट मंत्र)
रवि- बाबा! आपने अनेक बार ‘मंत्र‘ और ‘इष्टमंत्र‘ इन शब्दों का उल्लेख अपनी चर्चाओं में किया है, क्या ये दोनों अलग अलग हैं? वास्तव में ये हैं क्या?

बाबा-  यह समग्र ब्रह्माॅंड विराट मन (cosmic mind)  की विचार तरंगों का प्रवाह है। इसलिये इसका प्रत्येक छोटा बड़ा घटक कंपनकारी है। इसके घटकों में स्वाभाविक विभिन्नता प्रकट करती है कि वे सब अपनी अपनी पृथक आवृत्तियाॅं (frequencies) अथवा तरंग लम्बाइयां  (wave lengths)  रखते हैं । प्रत्येक इकाई अस्तित्व की आवृत्ति उसकी मूल आवृत्ति  (fundamental frequency) या बीज मंत्र या इष्टमंत्र कहलाती है। यदि किसी इकाई मन  (unit mind)  को उसकी मूल आवृत्ति ज्ञात करा दी जाये और विराट मन की मूलआवृत्ति के साथ अनुनाद (resonance) स्थापित करने को कहा जाये तो वह समग्र ब्रह्माॅंड के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेगा और उस परमसत्ता के साथ अपना एक्य स्थापित कर लेगा। योगविज्ञान (spiritual science) इसी सिद्धान्त पर आधारित है। मंत्र वह है जिसके मनन करने से मुक्ति मिले, ‘‘मननात् तारयेत यस्तु सः मंत्रः प्रकीर्तितः‘ ।

चंदू- तो साधना करना क्या है? और आत्मसाक्षात्कार करना क्या है?

बाबा- कोई व्यक्ति जो परम सत्ता से साक्षात्कार करने का अभिलाषी होता है  उसे सक्षम गुरु द्वारा उसकी मूल आवृत्ति से परिचय कराया जाता है जिसे इष्टमंत्र कहते हैं, इष्टमंत्र की सहायता से अपने लक्ष्य और अभीष्ट को पाने के लिये किया जाने वाला प्रयास साधना करना कहलाता है और अपनी मूल आवृत्ति को विराटमन की आवृत्ति के साथ अनुनादित कर लेना आत्मसाक्षात्कार कहलाता है।

नन्दू- क्या इष्टमंत्र को विशेष प्रकार से बनाया जाता है या कोई निर्धारित विधि होती है?

बाबा- सक्षम गुरु किसी सुपात्र का चयन कर ही उसके संस्कारों के अनुकूल ऐंसा इष्टमंत्र चुनते हैं जिससे लक्ष्य की ओर जाने का स्पष्ट अर्थ निकलता हो , जो केवल दो अक्षरों का हो और उसे श्वाश प्रश्वाश   के साथ सरलता से जाप क्रिया में प्रयुक्त किया जा सकता हो। इसके बाद उसे शक्तिसंपन्न कर शिष्य को प्रदान करते हैं। इष्टमंत्र प्राप्त करने की यह क्रिया दीक्षा प्राप्त करना कहलाती है। इसके प्राप्त होते ही पिछले सभी जन्मों के संस्कार क्षय होना प्रारंभ हो जाते हैं ।

रवि- इष्टमंत्र की पहचान करना और उसे शक्तिसम्पन्न करना यह तो विरले गुरु ही कर पाते होंगे?

बाबा-  हाॅं, साधक के लिये सबसे महत्वपूर्ण उसका इष्टमंत्र ही है, उसी के चिंतन, मनन और निदिध्यासन से वह परम प्रकाश  पाता है। इष्टमंत्र प्रत्येक व्यक्ति का अलग अलग होता है जो उसके संस्कारों के अनुसार चयन किया जाकर सद्गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। यह कार्य कौलगुरु ही करते हैं क्योंकि वे ही पुरश्चरण की क्रिया में प्रवीण होते हैं। पुरश्चरण का अर्थ है शब्दों को शक्ति सम्पन्न करने की क्षमता होना। अपने अपने इष्टमंत्र का  श्वाश प्रश्वाश  की सहायता से नियमित रूपसे जाप करते रहने का इतना अभ्यास करना होता है कि यह जाप नींद में भी चलता रहे। इस स्थिति को प्राप्त होने पर ओंकार (cosmic sound)  के साथ अनुनाद स्थापित करने में कठिनाई नहीं होती। अनुनाद की यही स्थिति जब स्थिर या स्थायी हो जाती है तो इसे ही समाधि कहते हैं। शक्तिमान शब्द  ही मंत्र कहलाते हैं जो कौलगुरु साधक को उसके संस्कारों के अनुसार इष्टमंत्र के रूप में कृपापूर्वक देते हैं और मंत्रचैतन्य हो जाने पर अर्थात् उपरोक्तानुसार ओंकार के साथ अनुनाद स्थापित हो जाने पर, उन्हीं की कृपा से परमपुरुष से साक्षात्कार होता है। जिसे सक्षम गुरु से इष्टमंत्र मिल गया वही धन्य है उसी का जीवन सफल है। अन्य सब तो प्रदर्शन मात्र है।