Sunday, 20 March 2016

54 बाबा की क्लास (होली: बसंतोत्सव)

54 बाबा की क्लास  (होली: बसंतोत्सव)
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रवि- बाबा! होली आने वाली है इसका यथार्थ रूप क्या वैसा ही है जो हर वर्ष हम देखते हैं, या कुछ और? 
बाबा-  लोगों ने काल्पनिक कहानियों के आधार पर कैसी कैसी विचित्र परम्पराएँ बना ली हैं कि होली के नाम पर एक दूसरे पर कीचड़/ रंग फेकते हैं , अकथनीय अपशब्द कहकर मन की भड़ास निकलते हैं और कहते हैं कि ‘‘बुरा न मानो होली है‘‘। होली के लिए चंदा बटोरकर रोड के बीचोंबीच टनों लकडि़याँ जलाकर कभी न सुधर पाने वाले रोड खराब तो करते ही हैं वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड  मिलाकर प्रदूषण फैलाते हैं, रंगों / कीचड़ भरे शरीर और कपड़ों को धोने में पानी और समय भी नष्ट करते  हैं। परंतु होली अर्थात् बसंतोत्सव का उद्देश्य  बाहरी रंगों से खेलना नहीं है, उसका उद्देषश्य  है कि संसार की जिन वस्तुओं ने मन को पकड़ रखा है अपने रंग में जकड़ रखा है उनके रंगों को परमपुरुष को भेंट कर देना। जब तुम अपने आकर्षणों और रंगों को इस प्रकार परमपुरुष को भेंट करने के खूब अभ्यस्थ हो जाओगेे तब तुम उन्हीं में मिल जाओगे, तुम्हें किसी रंग की आवश्यकता ही नहीं रहेगी तुम रंगहीन हो जाओगे, कोई रंग तुम्हें आकर्षित नहीं कर सकेगा। तुम्हारा इकाई अहं, महततत्व में मिल जायेगा और तुम्हें हर दिशा  में उन्हीं का कीर्तिगान सुनाई देगा उन्हीं की भव्यता दिखाई देगी। फिर मेरे तेरे की भावना के बीच पड़ा पर्दा सदा के लिये हट जायेगा। इस अवस्था में तुम उन्हें ‘मैं‘, ‘तुम‘ अथवा ‘वह‘ कुछ भी संबोधित कर सकते हो यह इस बात पर निर्भर करेगा कि तुम्हारा उनके प्रति समर्पण भाव किस स्तर का है।

राजू- इस कार्य को सभी लोग कर सकते हैं या कोई विशेष प्रशिक्षित व्यक्ति?
बाबा- यह कार्य है तो सभी के लिये परंतु जो अष्टाॅंगयोग की साधना करते हैं उन्हें इसका अभ्यास करना सरल हो जाता है। इसीलिये मैं कहता हॅूं कि अपने निर्णय और विचारों के प्रवाह में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाओ। फिर बाहरी रंगों के आकर्षण से मुक्त होकर देखोगे कि तुम्हारा मन परमपुरुष के भव्य रंग में किस प्रकार झलकने लगा है। अष्टाॅंग योग  में निम्न स्तर की वृत्तियों की ओर से मन को खींच कर उस महान की ओर संचालित करने का कार्य प्रत्याहार योग अथवा वर्णार्ध्यदान कहलाता है। सभी लोग किसी न किसी कार्य या वस्तु से किसी न किसी प्रकार आकर्षित होते हैं , ज्योंही वे उससे आकर्षित होते हैं उनका मन उसके रंग में रंग जाता है। तुम उस वस्तु के रंग से अपने मन को हटाकर परमपुरुष को भेंट कर अपने मन को परमपुरुष के रंग में रंग सकते हो। यही सच्चा प्रत्याहार योग है, प्रत्याहार माने मन को उसके विषय से खींच लेना।

चंदू- आपने जो कहा है उसका वैज्ञानिक आधार क्या है?
बाबा-
- भौतिकवेत्ता  (physicists) कहते हैं कि किसी भी वस्तु का अपना कोई रंग नहीं होता , सभी रंग प्रकाश के ही होते हैं।  प्रकाश तरंगों की विभिन्न लम्बाइयां (wave lengths) ही रंग प्रदर्शित करती  हैं। जो वस्तु प्रकाश की जिन तरंग लम्बाइयों को परावर्तित करती है वह उसी रंग की दिखाई देती है अतः यदि कोई वस्तु प्रकाश विकिरण की  सभी तरंग लम्बाइयों को परावर्तित कर दे तो वह सफेद और सभी को शोषित कर ले तो काली दिखाई देती है। सफेद और काला कोई पृथक रंग नहीं हैं।   

- मनोभौतिकी विद (psycho-physicist) कहते हैं कि मन के वैचारिक कम्पनों से बनने वाली  मानसिक तरंगें (psychic wave) भी व्यक्ति के चारों ओर अपना रंग पैटर्न बनाती हैं जिसे ‘‘आभामण्डल‘‘ (aura) कहते हैं। अनेक जन्मों के संस्कार भी इसी पैटर्न में विभिन्न परतों में संचित रहते हैं और पुनर्जन्म के लिए उत्तरदायी होते हैं।   
 - मनोआत्मिक  विज्ञानी  (psycho-spiritualists)  इन तरंगों ( wave patterns) को वर्ण (colours) कहते हैं।  यह लोग यह भी कहते हैं कि जिस परमसत्ता (cosmic entity) ने यह समस्त ब्रह्माण्ड निर्मित किया है वह अवर्ण (colourless) है परन्तु इस ब्रह्माण्ड में अस्तित्व रखने वाली सभी वस्तुओं के द्वारा प्रकाश तरंगों के परावर्तन करने के अनुसार ही  वर्ण (colours) होते हैं क्योंकि ये सब उसी परमसत्ता की विचार तरंगें ही हैं।  अतः यदि उस परमसत्ता को प्राप्त करना है तो स्वयं को अवर्ण  बनाना होगा।  इसी सिद्धांत का पालन करते हुए अष्टांगयोगी प्रतिदिन अपनी त्रिकाल संध्या में  इन वर्णो को ईशचिंतन, मनन, कीर्तन और निदिध्यासन की विधियों द्वारा उस परमसत्ता को सौंपने का कार्य करते हैं जिसे वर्णार्घ्य  दान कहते हैं। बोलचाल की भाषा में वे इसे ही असली होली खेलना कहते हैं। 

नन्दू- लेकिन, आधुनिक विज्ञान के नियम तो अपेक्षतया बहुत बाद के हैं अष्टाॅंगयोग विज्ञान तो बहुत पुरातन है? वर्णार्घ्य दान  की पद्धति का प्रारंभ और प्रचार कैसे और कब से हुआ?
बाबा- भारतीय योगदर्शन  पूर्णतः वैज्ञानिक सिद्धान्तों और मनोवैज्ञानिक विधियों पर आधारित है जो हमारे ऋषियों ने अपार पराक्रम से अनुसंधान कर हमें सौंपा है। यह लोग और कोई नहीं उन्नत श्रेणी के वैज्ञानिक ही थे। मन के रहस्यों के बारे में उन्होंने अनुभव किया कि मन के दो खंड होते हैं एक व्यक्तिनिष्ठ (subjective mind) और दूसरा वस्तुनिष्ठ (objective mind) । मानलो एक बिल्ली दिखाई दी, अब यदि आॅंख बंद कर उस बिल्ली को फिर से याद किया जाता है तो मन का जो भाग बिल्ली का आकार बनाने लगता है उसे वस्तुनिष्ठ मन और जो भाग केवल देखता रहता है अर्थात् साक्ष्य देता है कि हाॅं बिल्ली का रूप बन गया, उसे  व्यक्तिनिष्ठ भाग कहते हैं। वस्तुनिष्ठ मन के कार्य करने का दूसरा प्रकार यह  है, मानलो अब उसकी कल्पना करते हैं जिसका अस्तित्व ही नहीं है जैसे भूत,  तो अस्तित्व न होते हुए भी जो सोचा जा रहा है कि इस अंधेरे कमरे में भूत रहता है जिसके बड़े बड़े दाॅंत और उल्टे पैर होते हैं, यह बिल्कुल कल्पना है परंतु फिर भी वह वस्तुनिष्ठ मन में अपना प्रतिविंब बनाता है और इस कल्पित भूत को जो देखने का काम करता है वह भी इसी मन का व्यक्तिनिष्ठ भाग है। अनेक प्रयोगों के आधार पर ऋषियों ने अनुभव किया कि यथार्थ निर्णय करने के लिये मन के व्यक्तिनिष्ठ भाग को (अर्थात् जो देख रहा है या साक्ष्य दे रहा है), वस्तुनिष्ठ भाग  ( अर्थात् जो देखा जा रहा है) से अधिक षक्तिषाली होना चाहिये अन्यथा वस्तुनिष्ठ मन में लगातार एकत्रित होते जाने वाले यह काल्पनिक प्रतिबिम्व (पूर्वोक्त अर्थों में वर्ण या रंग)  भ्रमित करते रहते हैं और सत्य के रास्ते से दूर हटा देते हैं। इन्हीं सिद्धान्तों का व्यावहारिक स्वरूप श्रीकृष्ण ने अपने बाल सखाओं, गोप और गोपियों को सबसे पहले बताया था कि किस प्रकार वस्तुनिष्ठ मन के प्रतिबिंवों अर्थात् रंगों को व्यक्तिनिष्ठ मन की सहायता से वापस परमपुरुष को भेट कर देना चाहिये क्योंकि सभी रंग उन्हीं के हैं। सभी गोप और गोपियों को सामूहिक रूप से जिस दिन यह प्रत्याहार योग या वर्णार्घ्य दान  की साधना सिखाई गयी थी उसे ही बसंतोत्सव का नाम दिया गया है। उसके बाद पौराणिक काल से अनेक प्रकार के सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों के कारण इसमें अनेक विरूपतायें आ गयीं हैं और अब उसका स्वरूप कैसा हो गया है यह बताने की आवश्यकता नहीं  है। 

Sunday, 13 March 2016

53 बाबा की क्लास (अष्टाॅंगयोग -3)

( मित्रो पिछली क्लासों में अष्टाॅंगयोग के चार सोपानों, यम , नियम, आसन, और प्राणायाम पर विस्त्रित चर्चा की जा चुकी है, आज हम इसके आगे के शेष चारों सोपानों पर  चर्चा करेंगे )

53 बाबा की क्लास (अष्टाॅंगयोग -3)
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राजू-  बाबा! अभी तक के चारों सोपान तो लगातार कठिन ही होते गये हैं, पांचवाॅं सोपान तो सरल है या और कठिन?
बाबा- पहले समझ लो फिर विचार करना कि सरल है या कठिन। पाॅंचवें स्तर को कहते हैं ‘‘ प्रत्याहार‘‘ ।  इसमें मन को उसके विषयों से हटाकर उसे निर्धारित विंदु पर स्थिर करने का अभ्यास किया जाता है। तुम लोग जानते हो कि हमारा मन पाॅंच ज्ञानेन्द्रियों (आॅंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) तथा पाॅंच कर्मेन्द्रियों (वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और पायु)  की सहायता से सभी काम करता है और सदैव चलायमान रहता है। परंतु यह इंद्रियाॅं, सभी प्रकार की वाह्य सूचनाओं को पाॅंच प्रकार की तन्मात्राओं की सहायता से ही प्राप्त कर पाती हैं। ये तन्मात्रायें शब्द, स्पर्श , रूप, रस और गंध के माध्यम से उन तक पहुॅच पाती हैं अतः यदि धीरे धीरे अभ्यास करते हुए इन तन्मात्राओं से उत्सर्जित होने वाले संवेदनों को मन तक पहुंचने से रोकने का प्रयास करना होता है । इसी अभ्यास का नाम प्रत्याहार है। योग मार्ग में प्रवीण आचार्यगण इस संबंध में अपने अपने अनुभव के अनुसार विभिन्न प्रकार की  विधियों को उपयोग में लाते पाये गये हैं ।

रवि- तो हम लोगों को इस का अभ्यास किस प्रकार करने में सरलता होगी?
बाबा- सरल और कठिन की अवधारणा को ही भूल जाओ। सभी कार्य प्रारंभ में कठिन लगते हैं परंतु अभ्यास की निरंतरता उन्हें सरल कर देती है। तुम लोग पूछ सकते हो कि कैसे भूल जाओ; जिस कार्य की जो प्रकृति है उसे तो अनुभव करना ही पड़ेगा? हाॅं, इसी अनुभूति को अभ्यास के द्वारा धीरे धीरे कम किया जा सकता है जिसके लिये किये गये सभी प्रयास प्रत्याहार की परिधि में आयेंगे। जैसे ‘शब्द तन्मात्रा‘‘ अर्थात् ध्वनि। कोई भी ध्वनि हो वह कानों के माध्यम से ही मन तक पहुंचेगी अतः कानों तक उसे पहुंचने के रास्ते को बंद करने का  उपाय करना अनिवार्य होगा, यही उपाय करने का कार्य प्रत्याहार की परिधि में आयेगा, जैसे कमरे को बंद करना, ध्वनि अवरोधकों का उपयोग करना आदि । धीरे धीरे इन संवेदनों के प्रति मन स्वयं उपेक्षा भाव लेने का अभ्यस्थ होता जाता है और एक ऐसी  स्थिति आती है कि कोई कितना ही शोरगुल क्यों न करता रहे वह उससे प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार के अन्य उपायों द्वारा अन्य तन्मात्राओं को मन तक पहुंचने से रोका जा सकता है। परंतु , अचानक इस प्रकार वाह्य संवेदनों से विच्छेदित  मन और अधिक विचलित होने लगता है अतः उसे  यदि उचित स्थान पर वैठा कर उचित कार्य दे दिया जाये तो वह कुछ देर के लिये शांत हो जायेगा, इसके बाद वह फिर से दिये गये कार्य और स्थान को छोड़कर भागना चाहेगा परंतु  बौद्धिक स्पंदनों से उसे बार बार याद दिलाना होता है कि भौतिक जगत की तुच्छ वस्तुऐं तुम्हारा लक्ष्य नहीं हैं तुम्हारा लक्ष्य तो महान है, विराट है आदि। उसे इसी प्रकार के सतत प्रयास से एक ही स्थान पर लगातार देर तक बैठाने का अभ्यास कराते कराते वह स्थिर हो जाता है और आगे के सोपान तक जाने के लिये तैयार हो जाता है। इस कार्य में ही सबसे अधिक समय लगता है, परंतु एक बार जब मन पर नियंत्रण हो जाता है तो फिर आगे बढ़ना सरल हो जाता है।

इंदु- इसके आगे उसे किस सोपान पर पहुंचाना पड़ता है?
बाबा- अगला सोपान ‘‘धारणा‘‘ कहलाता हैं, इसकी परिभाषा है ‘‘ देशबंधस्चित्तस्य धारणा‘‘ अर्थात् शरीर के किसी क्षेत्र विशेष में मन को द्रढ़ता पूर्वक बाॅंधे रखना । इसका आशय यह है कि शरीर में स्थित उसके मुख्य पाॅंच घटकों पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश  के ऊर्जा केन्द्रों पर मन को वैठा कर उन चक्रों या केन्द्रों से संबंधित दिये गये मंत्र पर पृथक पृथक चिंतन कराना। योग के प्रबुद्ध आचार्य इन चक्रों को  मंत्रों की सहायता से उनका शुद्धीकरण करने की विधियाॅं भी बताते हैं, जिससे मन को देर तक स्थिर बनाये रखने में सहायता मिलती है। इस कार्य को चक्रशोधन कहते हैं। इस स्तर पर पूर्वोक्त घटकों पर उनके मंत्र का आघात करने से ऊर्जाकेन्द्र सक्रिय हो जाते हैं। यहाॅं ऊर्जा केन्द्रों के सक्रिय हो जाने पर अनेक प्रकार की सिद्धियाॅं मन को लुभाने लगती हैं जिनसे बड़ी सावधानी के साथ सतर्क रहना पड़ता है अन्यथा अहंकार का बढ़ता प्रभाव, किये गये सब पराक्रम पर पानी फेर देता है और पतन की ओर गति हो जाती है। अनेक उच्च स्तर पर पहुंच चुके  महात्मा लोग सिद्धियों के चक्कर में पतित होते देखे गए हैं।

नन्दू- बाबा! इसके आगे का स्तर क्या है ?
बाबा- इसके आगे का स्तर कहलाता है ‘‘ध्यान‘‘। पतंजली के अनुसार ‘तत्र प्रत्यत्यैकतानता ध्यानम्‘ अर्थात् परम लक्ष्य की ओर मन का सतत प्रवाह बनाये रखना। इसलिये ध्यान परमपुरुष पर किया गया इस प्रकार का चिंतन है जिसमें मन बिना किसी अवरोध या रुकावट के उनकी ओर लगातार बढ़ता जाता है। इसमें वैज्ञानिक तथ्य यह है कि साधक अपनी मूल आवृत्ति (fundamental frequency) अर्थात् इष्ट मंत्र की सहायता से परमपुरुष की मूल आवृत्ति (cosmic frequency) के साथ समानान्तरता लाने का अभ्यास करता है। इस स्तर पर गुरु का सतत मार्गदर्शन  आवश्यक  होता है। परम सत्ता की मूल आवृत्ति को विद्वान योगाचार्योें ने ‘ओंकार ध्वनि‘ (cosmic sound) कहा है, इसके साथ व्यक्तिगत इष्टमंत्र की सहायता से होने वाला अनुनाद (resonance) ही परम लक्ष्य तक पहॅुंचाता है।

रवि- बाबा! धारणा और ध्यान के मूलतत्व क्या हैं इन्हें फिर से समझा दीजिये और यह भी बता दीजिये कि  इनमें अंतर क्या है, और इसके आगे क्या है?
बाबा - ठीक है, इसे ध्यान पूर्वक समझ लो। चित्त का लक्षण अपने विषय का रूप ग्रहण करने का होता है जो वह ग्राहिका और विक्षेपिका नामक क्रियाओं के द्वारा कर पाता है, ग्राहिका ज्ञानेद्रियों और विक्षेपिका कर्मेन्द्रियों के द्वारा सम्पन्न होती हैं। इस प्रकार पहले वह संवेदना ग्रहण करता है फिर उसे कार्य रूप देता है। अतः चित्त के अपने विषय के अनुरूप आकार ग्रहण करने के गुण को धारणा अर्थात् पकड़ना कहते हैं। चूंकि आकार संवेदनों द्वारा ग्रहण किया जाता है अतः वह सतत नहीं होता क्योंकि संवेदनायें सतत नहीं होती परंतु उनकी तेज गति से होने के कारण हमें  सतत होते प्रतीत होती हैं। इसलिये धारणा गतिशील नहीं होती स्थिर होती है। ध्यान भी धारणा की  तरह चित्त की ही अवस्था है, परंतु ध्यान बाहरी विषय का नहीं होता इसलिये, इसे बाहरी संवेदनाओं की आवश्यकता  नहीं होती और यहाँ  किन्हीं दो संवेदनाओं में अंतर न होने के कारण चित्त में बने आकार का ध्यान सतत होता है तैल धारावत्। अतः ध्यान का अर्थ हुआ स्थायी स्मरण, विना रुकावट के स्मरण। ध्यान की प्रक्रिया इतनी सतत होती है कि पूरी क्रियात्मकता इसके सातत्य को बनाये रखने में ही व्यय हो जाती है इसलिये ध्यान में अन्य सब क्रियायें समाप्त हो जाती हैं। और जब क्रियायें समाप्त हो जातीं हैं तो मन भी समाप्त हो जाता है इसे ही समाधि कहते हैं, ‘‘कर्म समाधि ‘‘। यही अष्टाॅंगयोग का आठवाॅं और अंतिम सोपान है। इस प्रकार धारणा और ध्यान दोनों में बहुत भिन्नता है भले ही वे दोनों चित्त से ही उत्पन्न होते हैं। धारणा में चित्त वाह्य वस्तुओं का आकार ग्रहण करता है जबकि ध्यान में सब कुछ आन्तरिक होता है। धारणा स्थिर होती है जबकि ध्यान गतिशील। धारणा में क्रिया हो सकती है पर ध्यान में नहीं । धारणा तमोगुणी होती है जबकि ध्यान रजोगुणी। ध्यान में अंतिम रूप से क्रिया समाप्त हो जाती है जिसका उद्देश्य  सतोगुणी समाधि प्राप्त होने पर पूरा होता है।

इंदु- हमें समाधि का अनुभव प्राप्त करने के लिये अपने को किस प्रकार तैयार करना चाहिये?
बाबा- समाधियाॅं अनेक प्रकार की होती हैं, परंतु सभी का रसास्वादन करने के लिये मूलभूत आवश्यकता  होती है, मन के विभिन्न कोशों  का शुद्धिकरण । मन के पंच कोशों  को पूर्णतः विकसित कर लेने पर ही वहाॅं पहुंचने और अनुभव करने में सरलता होती है। समुचित आसनों के अभ्यास करते रहने में ‘अन्नमय कोश ‘, यम और नियम के पालन करने में ‘काममय कोश ‘  प्राणायाम के नियमित अभ्यास से ‘मनोमय कोश ‘ प्रत्याहार के अभ्यास से ‘अतिमानस कोश ‘ धारणा के अभ्यास से ‘विज्ञानमय कोश ‘ ध्यान  के अभ्यास से ‘हिरण्यमय कोश ‘ पूर्ण रूपसे शुद्ध हो जाते हैं। इसके बाद, केवल ध्यान समाधि ही आत्म दर्शन  कराती है। इसलिये पवित्र व्यक्ति वे हैं जो पंचकोशों  को शुद्ध करने में नियमित रूपसे जुटे हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट ही है कि मानव अस्तित्व तो पाॅंच कोशों  का होता है परंतु आध्यात्मिक साधना आठ स्तरों की होती है। इन आठों स्तरों का सही सही अभ्यास करना ही धर्म है, जो भी सिद्धान्त इन पंचकोशों  के शुद्धिकरण के संबंध में समुचित जानकारी नहीं दे पाते वे धर्म नहीं मतवाद ही कहलाते हैं ।

Sunday, 6 March 2016

52 बाबा की क्लास (अष्टाॅंगयोग -2)

( मित्रो पिछली क्लास में अष्टाॅंग योग के दो सोपानों पर चर्चा की जा चुकी है, आज हम इसके आगे चर्चा करेंगे )
52 बाबा की क्लास (अष्टाॅंगयोग -2)
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रवि- बाबा! यह दूसरा स्तर तो पहले स्तर से भी कठिन लगता है, शायद इसी कठिनाई से डरकर लोग इससे दूर ही रहना चाहते हैं?
बाबा- प्रारंभ में तो सभी कुछ कठिन लगता है, परंतु एक बार अच्छी तरह इसका महत्व और प्रक्रिया को सही ढंग से समझ लेने पर सब कुछ सरल हो जाता है। इसके आगे आता है तीसरा स्तर जिसे ‘‘आसन‘‘ कहागया है और एक बार विस्तार से तुमलोगों को इसके बारे में पहले बताया भी जा चुका है ।

इंदु- हाॅं बाबा! परंतु हम चाहते हैं कि फिर से उसे दुहरा दिया जाये तो सभी स्तरों के साथ याद रखने में सहायता मिलेगी?
बाबा-  मानव शरीर विज्ञानी कहते हैं कि शरीर के स्वस्थ संचालन हेतु प्रकृति ने इसमें अनेक ग्रंथियाॅं और उपग्रंथियाॅं ‘‘अर्थात् ग्लेंडस् और सबग्लेंडस्‘‘ बनाई हैं जिनसे निकलने वाले ग्रंथिरस ‘‘अर्थात् हार्मोन्स‘‘ के माध्यम से यह शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाये रखता है। संस्कृत में इन्हें चक्र और लेटिन में प्लेक्सस कहते हैं।
योगासन वे सरल भौतिक स्थितियाॅं हैं जो ग्रंथियों और ऊर्जा केन्द्रों को हारमोन्स का स्राव करने हेतु अनुकूल परिस्थितियाॅं पैदा करती हैं। इनसे ग्रंथियों का दोष दूर होता है और वृत्तियों पर नियंत्रण होता है। आसन ग्रंथियों को, ग्रंथियाॅं हारमोन्स को और हारमोन्स वृत्तियों को नियंत्रित करते हैं। ये शरीर में लचीलापन लातीं हैं। शरीर और मन में संतुलन रखती हैं। मन को जड़ चिंतन से दूर करती हैं। उच्च और सूक्ष्म साधना करने के लिये मन को तैयार करतीं हैं। आसनों के प्रकार प्रमुखतः ये हैं-
1 सर्वांगासन -शारीरिक स्वास्थ्य के लिये।
2 ध्यानासन- मन को नियंत्रित करने और ध्यान के लिये जैसे पद्मासन, बद्धपद्मासन, सिद्धासन और वीरासन। 3 मुद्रा- यह कठिन आसन होते हैं जो उचित साॅंस लेने और नियंत्रण के लिये किये जाते हैं।
4 बन्ध- ये केवल षरीर के भीतर की दस वायुओं को प्रभावित करते हैं।
5 वेध- ये सभी नाडि़यों और वायुओं को प्रभावित करते हैं।
प्रत्येक चक्र से मनुष्य के संस्कार या ‘प्रोपेन्सिटीज‘ भी जुड़े रहते हैं जो योगासनों के नियमित अभ्यास करने से नियंत्रित होते हैं। संस्कारों के नियंत्रण से विचार भी नियंत्रित होने लगते हैं, क्योंकि सभी योगासनें या तो ग्लेंडस् पर दवाव डालती हैं या दवाव कम करती हैं। जैसे मयूरासन में मणीपुर चक्र के चारों और दवाव बनने से उसपर और संबंधित उपग्रंथियों पर भी धनात्मक प्रभाव पड़ता है अतः वे सब संतुलित हारमोन्स का स्राव कारने लगती हैं जिससे जन्मजात प्रवृत्तियाॅं भी नियंत्रित होने लगती हैं। उदाहरणार्थ, यदि किसी को सभाओं में या वाद विवाद प्रतियोगिता में बोलने में डर लगता है और यदि वह मयूरासन नियमित रूप से करने लगे तो यह भय समाप्त हो जायेगा।
हारमोन्स का अधिक स्राव होने से प्रोपेन्सिटीज अधिक सक्रिय होती हैं और कम स्राव होने पर कम, इसलिये योगासनों के नियमित अभ्यास करने पर हारमोन्स के स्राव को आवश्यकतानुसार कम या अधिक किया जा सकता है। थायराइड और पैराथायराइड ग्लेंडस्  अर्थात् ‘‘विशुद्धचक‘‘ एवं आज्ञा चक्र अर्थात् ‘‘पिट्युटरी ग्लेंड‘‘ दोनों बौद्धिक विकास के लिये,  और लिंफेटिक ग्लेंडस्  अर्थात् मूलाधार , स्वाधिष्ठान और मणीपुर चक्र भौतिक विकास के लिये उत्तरदायी होते हैं। शीर्षासन सभी के लिये हानिकारक है, शीर्ष पर सहस्त्रार चक्र या पीनियल ग्लेंड होता है जो ध्यान की उचित विधियों के अनुसार अभ्यास करके सक्रिय किया जाता है न कि शीर्षासन से। इसके सक्रिय होने से सभी प्रोपेन्सिटीज और पूरा शरीर नियंत्रण में आ जाता है।
चक्रों और प्रोपे्रन्सिटीज पर नियंत्रण करने की यौगिक पद्धति का अनुसंधान 2000 वर्ष पूर्व  महान संन्त अष्टावक्र ने किया था और अपने निष्कर्षों को अष्टावक्रसंहिता नामक ग्रंथ में लिखा था। हमें मनमाने तरीके से इन्हें नहीं करना चाहिये वरन् जानकार व्यक्ति के मार्गदर्शन में ही अभ्यास करना चाहिये अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

चंदू-  बाबा! हमें कौन से आसन करना चाहिये?
बाबा-  सर्वांगासन छात्रों के लिये सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा मत्स्येन्द्रासन, भुजंगासन, शषकासन, बज्रासन और वीरासन भी यथा समय करना चाहिये।
आसन के बाद अष्टाॅंगयोग में अगला स्तर आता है ‘‘प्रणायाम‘‘ का, इसे भी एक बार विस्तार से बताया जा चुका है।

रवि- जब आसनों को दुहरा कर नवीन कर दिया गया है तो प्रणायाम को भी क्यों न नवीनीकृत किया जावे?
बाबा- स्वाभाविक श्वास  पर नियंत्रण करने का कार्य अष्टाॅंग योग में अनिवार्य घटक माना गया है, संस्कृत में इसे प्राणायाम कहते हैं। वह विधि जिससे प्राण (vital fluid) अर्थात् प्राण के दसों प्रकार प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, क्रकर, देवदत्त और धनन्जय, इन सब पर नियंत्रण किया जाता है प्राणायाम कहलाती है। यदि आप हर प्रकार के ज्ञान को आत्मसात कर पाने की अपनी शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं तो प्राणों को अधिकतम विस्थापन अर्थात् आयाम (amplitude)  देने की यह वैज्ञानिक विधि सीखना चाहिये जिससे मन को एक विंदु पर केन्द्रित करना सरल हो जाता है। यह शरीर के अनेक रोगों को दूर करने के भी काम आता है , परंतु किसी भी प्रकार के प्राणायाम को बिना उचित मार्गदर्शक  के करना वर्जित है। प्राणायाम को  साधारण, सहज, विशेष और अन्तः इन चार प्रकारों में विभाजित किया गया है ।

रवि- प्राणायाम की सही विधि क्या है?
बाबा- साधारण प्राणायाम की विधि में आॅंखें बंद कर सिद्धासन या पद्मासन में बैठकर आसन शुद्धि करने के बाद मन को अष्टाॅंगयोग के आचार्य के द्वारा बताये गये बिंदु पर मन को स्थिर करके चित्त शुद्धि करने के बाद अपने इष्ट मंत्र के पहले अक्षर पर चिंतन करते हुए दाॅंये हाथ के अंगूठे से दायीं नासिका को दबाये हुए वाॅंयी नासिका से धीरे धीरे गहरी श्वास भीतर खींचना चाहिये और इस समय सोचना चाहिये कि अनन्त ब्रह्म जो हमारे चारों ओर है उसके किसी विंदु से अनन्त जीवनीशक्ति भीतर प्रवेश  कर रही है। पूर्ण श्वास  भर जाने के बाद वाॅंयीं नासिका को मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अंगुली से बंद करते हुए दाॅयीं नासिका से अंगूठे को हटा कर श्वास  को धीरे धीरे बाहर करते हुए सोचना चाहिये कि अनन्त जीवनीशक्ति अनन्त ब्रह्म में वापस जा रही है और साथ साथ अपने इष्ट मंत्र के दूसरे अक्षर पर चिंतन करते रहना चाहिये। यह ध्यान रखना चाहिये कि श्वास  लेते हुए या छोड़ते हुए आवाज नहीं हो । पूरी श्वास  निकल जाने के बाद अब दाॅयीं नासिका से धीरे धीरे पूरी श्वास  लेते हुए उसी प्रकार इष्ट मन्त्र  चिंतन करते हुए अंगूठे को उसी प्रकार दबा कर अंगुलियों को हटाकर श्वास  को पूर्णतः बाहर कर देना चाहिये । यह एक प्राणायाम हुआ।

चंदू- तो क्या इसकी न्यूनतम और अधिकतम संख्या निर्धारित है?
बाबा- हाॅं, एक सप्ताह तक केवल तीन प्राणायाम दोनों समय करना चाहिये, फिर प्रति सप्ताह एक एक की वृद्धि करते हुए अधिकतम सात प्राणायाम करने की सलाह दी जाती है। प्राणायाम को एक दिन में अधिकतम चार बार तक किया जा सकता है। जो नियमित रूप से दो बार प्राणायाम कर रहे हों और किसी दिन वे तीनबार करना चाहते हैं तो कर सकते हैं पर उन्हें अचानक चार बार प्राणायाम नहीं करना चाहिये । इसलिये उचित यही है कि पहले पहले दोनों समय तीन और फिर एक सप्ताह बाद क्रमशः  एक एक बढ़ाते हुए अधिकतम सात की संख्या तक ही करना चाहिये। फिर भी कोई यदि किसी दिन निर्धारित संख्या में प्राणायाम नहीं कर पाया हो तो सप्ताह के अंत में उतनी संख्या बार प्राणायाम करके क्षतिपूर्ति कर लेना चाहिये। यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि धूल, धुएं और दुर्गंध से दूर रहें तथा अधिक शारीरिक श्रम न करें। इसका अभ्यास प्रारंभ करने के समय प्रथम दो माह तक पर्याप्त मात्रा में दूध और उससे बनी सामग्री का उपयोग भोजन में करना चाहिये।

Sunday, 28 February 2016

51 बाबा की क्लास (अष्टाॅंगयोग -1)

51 बाबा की क्लास (अष्टाॅंगयोग -1)
रवि- अभी तक के विवरण से तो यही ज्ञात होता है कि विद्यातन्त्र और उपनिषदों में वर्णित अद्वितीय, निष्कल, सच्चिदानन्दघनसत्ता अर्थात् परमपुरुष को पाने के उपायों को तथ्यों सहित कोई भी पद्धति , पूर्णतः सम्मिलित नहीं कर पाती वरन् एक दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयासों में आडम्बर और परस्पर वैमनस्यता को ही बढ़ावा देती है। क्या ऐंसा कोई उपाय नहीं है जो इन में समुचित समन्वय कर आदर्श  पद्धति के रूप में स्वीकार किया जा सके?
बाबा- वास्तव में यह विभिन्न पद्धतियाॅं काल क्रम के प्रभाव से उसी एक ही आदर्श  पद्धति जिसे ‘अष्टाॅंगयोग‘ के नाम जाना जाता है, से खंड खंड होकर अलग अलग हो गई हैं इन्हें फिर से यथावत जोड़ कर ही पुरातन आदर्श  को पाया जा सकता है।
राजू- तो आप हमें उसी सम्पूर्ण और आदर्श  विधि को क्यों नहीं बताते , इन अपूर्ण विधियों को अपना कर हम क्यों उलझें ?
बाबा- हम तो वास्तव में उस सम्पूर्ण पद्धति को ही अच्छी तरह समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं, परंतु वर्तमान में प्रचलित इन सभी विधियों से परिचय कराने का उद्देश्य  केवल यह है कि इन पर एक बार चिंतन कर यह समझ लिया जाय कि इनमें दार्शनिक  और व्यावहारिक स्तर की क्या कमी है जिससे बाद में हमारी गति में ये किसी प्रकार की बाधा या भ्रम उत्पन्न न कर सकें।
नन्दू- लेकिन अब तो हमें वर्तमान में प्रचलित सभी पद्धतियों के कमजोर पक्षों का पता चल ही गया है अतः अब क्या उसी आदर्श  और सम्पूर्ण पद्धति पर चर्चा करना उचित नहीं होगा?
बाबा- हाॅं बिलकुल। ‘अष्टाॅंगयोग‘‘ का अर्थ है योग की वह पद्धति जिसके आठ स्तर होते है। ‘अष्ट‘ का अर्थ है आठ और ‘अंग‘ का अर्थ है भाग या स्तर। यदि इन आठों स्तरों पर सही ढंग से अभ्यास किया जाता है तो बहुत ही कम समय में वाॅंछित उपलब्धि प्राप्त हो जाती है। अब तुम लोग इन आठों स्तरों को ठीक ढंग से समझ लो और फिर नियमित रूपसे उनका अभ्यास करने में जुट जाओ।
इसके आठ स्तर क्रमशः  ये है:- 1 यम, 2 नियम, 3 आसन, 4 प्रणायाम, 5 प्रत्याहार, 6  धारणा, 7 ध्यान, और 8 समाधि। इनका क्रमानुसार नियमित अभ्यास करने पर लगातार प्रगति करते हुए समाधि के स्तर पर आत्मसाक्षात्कार होता है। पहले जिन जिन पद्धतियों की चर्चा की गयी है उनके मूलतत्व इन्हीं आठ स्तरों पर यथोचित ढंग से जुड़े हुए हैं ।
इन्दु- तो इन आठों भागों को जल्दी से समझा दीजिये जिससे हम आज से ही उनका पालन करने लगे?
बाबा- हाॅं ठीक कहा परंतु इन्हें जल्दी जल्दी समझने की गलती न करना, इन्हें एक एक कर ढंग से हृदय में बैठाना होगा फिर उनका पालन करने में कोई कठिनाई नहीं जायेगी । इसके पहले स्तर ‘यम‘ को ही पाॅंच भागों में बाॅंटा गया है, वे हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इन्हें अलग अलग ठीक ढंग से समझ लो-
अहिंसा- इसका अर्थ है मन, कर्म और वचन से किसी भी प्राणी को शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट न देना। प्राणी से तात्पर्य है जिसमें भी जीवन है अर्थात् पेड़ पौधे भी उसी में सम्मिलित हैं। अर्थात् न तो मानसिक न वाणी और न शारीरिक रूपसे ऐंसा कोई कार्य करेंगे जिससे किसी को किसी भी स्तर पर कष्ट पहुंचे।
राजू- यह तो बड़ा ही कठिन है, इसे शतप्रतिशत व्यवहार में नहीं लाया जा सकता?
बाबा- इसी लिये तो कहा है कि जल्दी जल्दी में कुछ समझ में नहीं आयेगा, अब अहिंसा के पालन करने का व्यावहारिक पक्ष समझ लो। तुम लोग सोच सकते हो कि इस प्रकार तो सभी का जीना ही मुश्किल  हो जायेगा, क्योंकि खेती बाड़ी करने वालों से तो इसका पालन हो ही नहीं सकता, उन्हें तो पेड़ पौधों और प्राणियों की हिंसा करना पड़ेगी। तो फिर क्या किया जाये क्योंकि खेती न करने पर तो किसी को भी भोजन नहीं मिलेगा? इतना ही नहीं हमारे शरीर की त्वचा के सैल हमारी गतिविधियों से मरते रहते हैं, श्वास  के साथ वायु और वातावरण में उपस्थित सूक्ष्म वेक्टेरिया मरते हैं, अनेक ऐंसे भी हैं जो हमारे भोजन को पचाने और उसे अन्य रूपान्तरण करने में सहायक होते हैं इसलिये मरते रहते हैं। और भी अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं जिससे लगता है कि इस अहिंसा का पालन तो संभव ही नहीं है। यहाॅं अहिंसा को पालन करने के लिये हमें ‘वैष्णवाचार‘ का सिद्धान्त सहायक होता है, ‘‘वह यह कि यह सभी कुछ ‘द्रश्य  अथवा अद्रश्य ‘ उस परमसत्ता की ही विचार तरंगें हैं, वह प्रत्येक परमाणु में ओत प्रोत है इसी लिये वह विष्णु है‘‘ अतः यदि प्रत्येक छोटे बड़े कार्य को प्रारंभ करने के पूर्व हम "ब्रह्म भाव" धारण कर लें तो अहिंसा की श्रेणी में नहीं आयेंगे और कर्म बंधन से मुक्त रहेंगे। यथा खेतों में हल चलाते समय मन में यह भावना द्रढ़ करना होगी कि ब्रह्म रूपी खेतों में बीजारोपण का ब्राह्मिक कार्य किया जा रहा है। आदि।
परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि कोई भी हमारे जीवन को क्षति पहुंचाने के उद्देश्य  से हम पर आघात करता  है तो हम आत्म रक्षा नहीं करेंगे, वरन् ब्राह्मिक भाव लेते हुए हम ‘‘शाक्ता चार ‘‘ का पालन करेंगे, जिसमें अपनी पूरी शक्ति से उस नकारात्मकता के विरुद्ध संघर्ष करेंगे। हमारे छः प्रकार के शत्रुओं ( काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य) और आठ प्रकार के बंधनों( भय, लज्जा, घृणा, शंका, जुगुप्सा, कुल, शील और मान) को काटने के लिये हमें शाक्ताचार का सहयोग लेना ही पड़ेगा। इस तरह अहिंसा का व्यावहारिक पालन करने के लिये संयुक्त रूप से यथा समय वैष्णवाचार और शाक्ताचार का प्रयोग करने पर कर्म बंधन हमें नहीं बाॅंध पायेगा।
राजू- बाबा! इस अष्टाॅंग योग के पहले भाग के केवल  पाॅंचवें  हिस्से ने ही  इतना भयभीत कर दिया है कि आगे की कल्पना करने से ही डर लगने लगा है?
बाबा- नहीं, ऐंसा बिलकुल नहीं है, सही ढंग से समझ लेने पर सब कुछ सरल हो जाता है। अब, इसके आगे आता है ‘‘सत्य‘‘ । सत्य का अर्थ है जो कभी बदलता नहीं हो वह। इसे निर्पेक्ष सत्य कहते हैं। परमपुरुष ही केवल निर्पेक्ष सत्य हैं। हम सभी इस जगत में स्थान और समय से बंधे हैं अतः हमें सापेक्षिक सत्य से ही काम लेना पड़ता है। सापेक्षिक सत्य स्थान, समय और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित हो जाता है। किसी की प्राण रक्षा करने में , व्यापक समाज हित में बोला गया असत्य भी सत्य ही माना जाता है। एक ही कार्य किसी के लिये सत्य और किसी के लिये परिस्थितियों वश  असत्य हो जाता है। इसलिये निस्वार्थ, सार्वजनिक हित और कल्याण की भावना को ध्यान में रखते हुए ही प्रत्येक कार्य करने का निर्देश  है। इसके आगे है ‘‘ अस्तेय‘‘ । इसका अर्थ है बिना अनुमति के किसी की कोई भी वस्तु न लेना, अर्थात् चोरी न करना। यहाॅं ध्यान रखने योग्य यह है कि किसी की कोई वस्तु के संबंध में मन में अपवित्र विचार आना भी अस्तेय के विरुद्ध ही आता है। इसलिये विचारों का सात्विक बनाये रखना सदा ही वाॅंछनीय होता हैं। इसके बाद आता है ‘‘ब्रह्मचर्य‘‘ जिसका अर्थ है सदा ही ब्राह्मिक भाव में बने रहना, उसी में विचरण करना। सामान्यतः लोग वीर्य रक्षण को ही ब्रह्मचर्य मानते हैं जो दो प्रकार का होता है, एक होता है नैष्ठिक जिसे पूर्णतः सन्यासी पालन करते हैं, और दूसरा होता है प्राजापत्य जिसे ग्रहस्थों को पालन करने के निर्देश  हैं । इसके बाद यम का अंतिम पद होता है ‘‘अपरिग्रह‘‘ जिसका अर्थ है आवश्यकता  से अधिक वस्तुओं या धन का संग्रह न करना।
इंदु- बाबा! सावधानी से देखा जाय तो, यदि सभी लोग केवल ‘‘यम‘‘ के पाॅंचों भागो का ही पालन ईमानदारी से करने लगें तो समाज की नब्बे प्रतिशत समस्यायें अपने आप हल हो सकती हैं?
बाबा- क्यो नहीं ? यह व्यवस्था ऋषियों ने लंबे शोध के उपरान्त ही बनाई है लेकिन लोभियों और स्वार्थ पीडि़त लोगों ने ही इसमें अनेक विसंगतियाॅं और विकृतियाॅं बना दी हैं।
राजू- अष्टाॅंगयोग का दूसरा स्तर क्या है बाबा! क्या वह भी इतना ही क्लिष्ट है?
बाबा- हाॅं, दूसरा स्तर है ‘‘नियम‘‘ इसके भी पाॅंच अवयव हैं। ये हैं, शौच, संतोष, स्वाध्याय, तप और ईश्वर  प्रणिधान। ‘‘शौच‘‘ का अर्थ है शरीर और मन दोनों की सफाई रखना। शरीर  को तो साबुन और पानी से साफ कर लेते हैं परंतु मन को साफ रखने के लिये पवित्र विचारों को सदैव मन से चिंतन करते रहना होता है, जिसमें ब्राह्मिक भाव लिये रहने पर मन स्वच्छ बना रहता है। यदि कभी परिस्थितियों वश  कलुषित विचार आ भी जायें तो तत्काल ब्राह्मिक भाव आरोपित कर उन्हें उदासीन करने का प्रयत्न करना चाहिये। इसके बाद है ‘‘संतोष‘‘ अर्थात् प्रत्येक अच्छी या बुरी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति में मन में संतुलन बनाये रखना, किसी भी प्रकार से मन को उद्विग्न  और उद्वेलित न होने देना। इसके आगे है ‘‘स्वाध्याय‘‘ अर्थात् सद् साहित्य का अध्ययन करते रहना, जब भी थोड़ा सा समय मिले उसका सदुपयोग सद्साहित्य को पढ़ने में ही लगाना। अगला नियम है ‘‘तप‘‘ अर्थात् प्रत्येक परिस्थिति में मन और वाणी पर संयम बनाये रखने का अभ्यास करना। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि असामान्य परिस्थितियाॅं निर्मित कर शरीर को कष्ट देना ( जैसे कुछ लोग हठ पूर्वक एक पैर पर खड़े रहनें या आग के सामने शरीर को तपाने , पानी में डूबे रहने आदि को तप कहते हैं) । और अंतिम नियम है ‘‘ईश्वर  प्रणिधान‘‘ अर्थात् ‘इष्टमंत्र‘ की सहायता से ‘इष्टचक्र‘ पर आघात कर उसे सक्रिय करना। इसे अष्टाॅंगयोग के प्रतिष्ठित आचार्य ही सिखाते हैं। इसे दोनों समय नियमित रूप से करना होता है जिससे आगे के स्तरों पर जाने में सरलता मिलती है। यह शैवाचार के अन्तर्गत आता है।
(-अगले स्तरों पर चर्चा क्रमशः  दूसरे भाग में अगली क्लास  में  देखिये -)

Wednesday, 24 February 2016

50 कथा

50 कथा
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‘‘ पंडित जी महाराज! आपकी कथा में लगभग रोज ही इस बात की चर्चा होती है कि वह परमसत्ता परमेश्वर अनन्त है, असीम है अमाप्य है, अद्वितीय है, परंतु कृपा कर यह बतायें कि उसे इन मनुष्यों के द्वारा मंदिरों में कैद कर सीमित स्थान में कैसे बाॅंध दिया जाता है?‘‘
‘‘ यह तो बिलकुल सही है, ‘वह‘ अनन्त है। और, उसे पूरी तरह कोई भी आज तक जान ही नहीं पाया, शास्त्र कहते हैं कि केवल ‘वही‘ अपने आप को पूरी तरह जानते हैं।‘‘
‘‘ वही तो मैं पूछ रहा हॅूं कि अनन्त सत्ता का मंदिर तो उनकी सीमाओं से बड़ा ही होना चाहिये , अन्यथा वे उसके भीतर कैसे बैठ सकेंगे?‘‘
‘‘इस बहस में अपना समय और बुद्धि खर्च न करो! हमलोग, ‘उनके‘ लिये क्या मंदिर बनायेंगे जिन्होंने हमें ही नहीं इस समग्र ब्रह्माॅंड को अपनी कल्पना से ही बना रखा है। यह सभी कुछ ‘उनके‘ ही भीतर है। यथार्थतः मंदिर तो उन स्थानों को कहा जाता है जहाॅं पर कुछ देर के लिये सामूहिक रूपसे शान्तिपूर्वक बैठ कर हम परमार्थ पर चिंतन कर सकें , परस्पर इस विषय पर चर्चा कर सकें कि क्या केवल जन्म से मृत्यु तक ही जीवन सीमित है, या इसके अलावा भी कुछ है?‘‘
‘‘ तो फिर यह नियम कानून , निषेध, प्रतिरोध, भेदभाव , संघर्ष और तनाव किस कारण से उत्पन्न हुए हैं?‘‘
‘‘ यह सब, सच्चाई से दूर रहने वाले स्वार्थी तत्वों द्वारा अच्छी तरह बनाया गया व्यवसाय है जो अपनी अलग अलग आभासी दुनिया के निर्माण में दिन रात लगे हैं।‘‘

Sunday, 21 February 2016

49 बाबा की क्लास (साधना पद्धतियाॅं)

49 बाबा की क्लास (साधना पद्धतियाॅं)

 रवि- समस्या  यह है कि परमपुरुष को पाने की अनेक मानसिक क्रियाएं और पद्धतियाॅं हैं अतः ऐंसा करना याहिये, वैसा करना चाहिये, यह कहना तो सरल है पर किया कैसे जाय? वह विधि कौनसी है जिसका  पालन करने पर ब्रहम् के साथ एकीकरण हो जाता है?
बाबा- आध्यात्मविज्ञान के पुरोधा ऋषियों ने अपने अनुभवों के आधार पर अष्टाॅंगयोग की विधि को प्रतिपादित कर मनुष्यों को नयी दिशा  दी थी पर कालक्रम में अनेक विद्वानों ने अपने अपने मत और संप्रदायों की अहंकार भरी भावनाओं से उस विधि में अनेक विकृतियाॅं कर डाली और सरलता लाने के प्रयास में खंड खंड में विभाजित कर उसे अप्रभावी कर डाला। कुछ विद्वानों ने वामाचार और कुछ ने दक्षिणाचार को अपनाया।
नन्दू- यह वामाचार और दक्षिणाचार क्या हैं बाबा?
बाबा- लक्ष्य हो या नहीं अंधकार के विरुद्ध संघर्ष करता जाऊंगा और अंत में माया नष्ट कर सिद्धि लाभ करूंगा इस भावना को वामाचार कहते हैं, इसमें साधक को विपत्ति में पड़ने और अधोगति में जाने की संभवना होती है क्योंकि वामाचारी साधक अपनी अर्जित शक्तियों का दुरुपयोग करने लगता है और पशुत्व  की ओर गति कर बैठता हैं। दक्षिणाचार में साधक प्रकृति से अनुनय विनय कर प्रकृति को वश  में करना चाहते हैं। वे कहते हें कि हे प्रकृति! तुम अपना अंधकार समेट लो और मेरे लिये मार्ग बना दो। इस प्रकार क्या किसी की खुशामद से मुक्ति पाई जा सकती है? खुशामद भीरु का लक्षण है। शक्तिशाली व्यक्ति, भीरु की खुशामद से प्रसन्न हो कुछ सुविधा दे सकता है पर पूरी स्वाधीनता नहीं दे सकता ।
राजू- तो इन से श्रेष्ठ क्या कुछ नहीं है?
बाबा- इन विधियों के दोषों को दूर करने के लिये आया मध्यमाचार। इस के अनुसार विद्या की सहायता से संघर्ष करते हुए अविद्या को हरा कर, विद्या और अविद्या दोनों को त्याग कर ब्रह्म की चरमावस्था में स्थित होना पड़ता है।
इंदु- बाबा! इस मध्यमाचार में बहुत कठिन विधियों का प्रयोग किया जाता है या सरल? वे कौन सी हैं?
बाबा- मध्यमाचार की अवधारणाओं के आधार पर मुख्यतः यह  पद्धतियाॅं प्रचलित  हैंः-
 (1) शैवाचार (2) शाक्ताचार (3) वैष्णवाचार (4) गणपत्याचार (5) सौराचार।
शैवाचार का लक्ष्य शिवसमाधि अर्थात् आत्मसाक्षात्कार है, इसमें बाहरी वृत्तियों को आन्तरिक करते हुए अंत में परमात्मा में मिलाने का अभ्यास किया जाता है। ‘‘यच्छेद्वांग्मनसो प्रज्ञस्तद्यच्छेद् ज्ञानात्मनि, ज्ञानात्मनि महती नियच्छेद् तद्यच्छेद्छान्तात्मनि‘‘। अर्थात् मन को बाहरी सभी अकर्षणों से भीतर खींचकर अहं तत्व में फिर अहं तत्व को महत तत्व में और महत तत्व को आत्म तत्व में मिला देना चाहिये। इसका अभ्यास विभिन्न स्तरों पर गुरु अपनी देखरेख में कराते हैं।
शाक्ताचार के अनुसार तामसिक शक्ति को भवानी या कालिका शक्ति में मिलना चाहिए जिसका बीजमंत्र ‘‘सम्‘‘ है, इसमें से राजसिक शक्ति को निकालकर भैरवीशक्ति में मिलानाचाहिये जिसका बीज मंत्र है ‘‘शम्‘‘। ( भैरवीशक्ति का अर्थ है ऊर्जा की क्रियाशील अवस्था। ऊर्जा का बीजमंत्र है ‘‘रम्‘‘। सभी लोग भौतिक जगत की उपलब्धियों के साथ ऊर्जा को भी सक्रिय रखना चाहते हैं अतः नाम और यश  के प्रेरक (श़ + र = श्र ) और स्त्रींलिंग में यह हुआ श्री, इसे आधार मानकर ही भारत में नाम के आगे श्री लगाने का प्रचलन हुआ। आजकल इस अर्थ में श्री किसी के पास नहीं है फिर भी सभी के नाम के पूर्व में श्री लगाते हैं।) इससे सात्विक शक्ति को खींचकर कौषिकीशक्ति में मिला देना चाहिये। पौराणिक शाक्ताचार के ये क्रमागत पद हैं जिन पर चलकर साधक लाभ पाता है। यहां कालिकाशक्ति का आशय दार्शनिक  है, शिव की पत्नी काली अथवा बौद्ध और शिवोत्तर तंत्र की कालिकाशक्ति से इसका कोई संबंध नहीं।
वैष्णवाचार में विश्व  की सभी वस्तुओं में विष्णु को व्याप्त मानकर उपासना की जाती है, ‘विस्तारः सर्वभूतस्य विष्णोर्विश्वमिदम जगत्, द्रष्टव्यमआत्मवत् तस्माद्भेदेन विचक्षनैः। अर्थात् यह विस्त्रित द्रश्य और अद्रश्य प्रपंच सभी कुछ विष्णु ही है अतः स्वयं सहित सभी में उनको अनुभव करने का अभ्यास करना चाहिये।
गणपत्याचार में प्राचीनकाल के समूह नेतृत्व वाले गणपति को चुनकर समूह के स्थान पर विश्व  के नेता का भाव दिया गया और इन्हें ही परमपुरुष के रूपमें उपासना हेतु कहा गया है। परंतु आजकल इन्हें काल्पनिक आकार प्रकार देकर आडम्बर फैलाया जाता है।
सौराचार मूलतः सूर्य की उपासना से संबंधित है जो दक्षिण रूस के सेक्डोनिया से आये ब्राह्मणों की उपासना पद्धति है। सेक्डोनियन ब्राह्मण वेद या अन्य कोई पद्धति नहीं मानते थे वे केवल ज्योतिष और आयुर्वेद को ही मान्यता देते थे । उनके सूर्य ही उपास्य देवता थे क्योंकि वे मानते थे कि सूर्य से ही पृथ्वी, चंद्र और अन्य ग्रहों की उत्पत्ति हुई है अतः विश्व  के नियन्ता सूर्य ही हैं। यह मत सीमित क्षेत्रों में ही माना गया।
इस प्रकार पौराणिक मान्यताओं को व्यापक प्रसार नहीं मिल पाया क्योंकि इसके कुछ भागों को दार्शनिक  मान्यता थी और कुछ को नहीं। यह विवरण प्रकट करता है कि विद्यातन्त्र और उपनिषदों में वर्णित अद्वितीय, निष्कल, सच्चिदानन्दघनसत्ता, परमपुरुष को पाने के उपायों को तथ्यों सहित कोई भी पद्धति , पूर्णतः सम्मिलित नहीं कर पाती वरन् एक दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयासों में आडम्बर और परस्पर वैमनस्यता को ही बढ़ावा देती है।

Sunday, 14 February 2016

48 बाबा की क्लास (मतवाद और मत)

48 बाबा की क्लास (मतवाद और मत)

इंदु-  बाबा! भारत सहित संसार में अनेक प्रकार के मत और सिद्धान्त प्रचलित हैं जो एक दूसरे के प्रति उदार नहीं हैं इसलिये इन्हें समझने के लिये क्या करना चाहिये?
बाबा- संसार में प्रचलित सभी मतों पर विचार करने के लिये सबसे पहले अपने कामन सेंस का उपयोग करो, फिर तर्क का , फिर विवेक और विज्ञान का। इस प्रकार प्राप्त परिणाम को स्वीकार करो अन्य सब को भूल जाओ।

नन्दू- भारत में प्रचलित पातंजल और साॅंख्य सिद्धान्त भी लगभग समान बातें करते हैं परंतु फिर भी विद्वान उन्हें अलग अलग मानते हैं?
बाबा- चलो इन सिद्धान्तों पर अभी बतायी गयी विधि से विश्लेषण  करें। ‘पातंजल‘ और ‘‘साॅंख्य‘‘ दोनों ही अनेक ‘‘पुरुषों‘‘में विश्वास  रखते हैं और मानते हैं कि ब्रह्माॅंड प्रकृति के द्वारा निर्मित किया गया है। पर यह सही नहीं है, क्योंकि मन के बिना भोग नहीं हो सकता, जबकि उनके अनुसार पुरुषों के पास मन ही नहीं होता अतः प्रकृति के द्वारा ब्रह्माॅंड के निर्माण करने से वे संतुष्ठ नहीं हो सकते। वे यह भी मानते हैं कि प्रकृति, पुरुष से अलग है। यह भी सत्य नहीं है क्यों कि वह पुरुष की ऊर्जा है ठीक उसी प्रकार जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति है जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। साॅंख्य में  ईश्वर  नहीं है अतः निरीश्वरवाद  कहलाता है पर पातंजल ईश्वर  में विश्वास  करता हैं पर ब्र्रह्म में नहीं अतः वह सैश्वरवाद  कहलाता है।

रवि- इसी प्रकार बौद्ध और जैन मत भी एकरूपता नहीं दर्शाते , लगता है दोनों ही अपूर्ण हैं?
बाबा- भगवान बुद्ध ने पूरे संसार में बड़ी ही समस्या उत्पन्न कर दी है विशेषतः दुखवाद का सिद्धान्त और अहिंसा की गलत परिभाषा देकर। यही कारण है कि मेडीकल साईंस की प्रगति सैकड़ों वर्ष पिछड़ गयी। यही नहीं बौद्ध धर्म के द्वारा लोग भीरु हो गये। यही बात भगवान महावीर के जैन धर्म की भी है। ये दोनों ही धर्म समय की कसौटी पर खरे नहीं उतर सके। गौतम बुद्ध ईश्वर  के बारे में स्पष्ट मत नहीं दे सके और न ही यह बता सके कि जीवन का अंतिम उद्देश्य  क्या है, इतना ही नहीं वे अपने सिद्धान्तों पर आधारित मानव समाज का भी निर्माण नहीं कर सके। महावीर जैन ने भी सबसे पहले निर्ग्रन्थवाद  अर्थात् नग्न रहने पर बहुत जोर दिया। आदिकाल के लोग अपने शरीर को नहीं ढंकते थे परंतु मौसम के अनुसार वे  अपने शरीर को ढंकने लगे। अब जब कि वे अपने श रीर को ढंकने के अभ्यस्थ हो गये तो उन्हें नग्न रहने में शर्म आने लगी। इसलिये महावीर का मत  जनसमान्य  का समर्थन नहीं पा सका। इसके अलावा उन्होंने दया और क्षमा करने पर बहुत अधिक बल दिया, उन्होंने यह सिखाया कि अपने जानलेवा शत्रु साॅंप और विच्छू को भी क्षमा कर देना चाहिये । इस शिक्षा के कारण लोगों ने समाज के शत्रुओं से लड़ना छोड़ दिया। इस प्रकार महावीर और बुद्ध की शिक्षायें यद्यपि भावजड़ता पर आधारित नहीं थीं  और न ही उन्होंने लोगों को जानबूझकर गलत दिशा  दी, परंतु कुछ समय के बाद वे असफल हो गये क्यों कि उनकी शिक्षायें पर्याप्त व्यापक और संतुलित नहीं थीं।  इसके वावजूद, सत्य के अनुसन्धानकर्ताओं द्वारा  बुद्ध की ‘अष्टाॅंग योग‘ और ‘चक्षुना संवरो साधो‘ तथा अन्य विवेकपूर्ण शिक्षाओं को मान्यता दी गयी  है। महावीर की शिक्षा ‘‘ जिओ और जीने दो‘‘ को भी मान्यता दी गई है परंतु इस का अर्थ यह नहीं है कि इन दोनों चिंतकों की समग्र विचार धाराओं को मान्यता दी गई है।

राजू- परंतु इसी प्रकार तो मुस्लिम, क्रिश्चियन  और ज्यू आदि में भी समानता सी ही दिखती है?
बाबा- भयबोध विश्वासों (sematic faith)   जैसे, मुस्लिम , क्रिश्चियन  और ज्यू आदि में क्रिश्चियन  की सामाजिक संरचना थोड़ी सी इन दोनों से भिन्न है पर इनका धार्मिक साहित्य पुरानी अरबी में है और हिब्रू उनकी समानान्तर भाषा है। इन में अन्य किसी धर्म या विश्वास  के प्रति कोई आदर नहीं है। इनका कोई दर्शन  नहीं है केवल कट्टर धार्मिक सोच है, वे मानते हैं कि यह सब ईश्वर  के वाक्य हैं जिन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती। इनमें ‘‘शैतान‘‘ का भय दिखाया गया है और स्वर्ग नर्क की अवधारणा को माना गया है। प्रोटेस्टेंटों, जिनका विचार कुछ भिन्न है , को छोड़कर  अन्य कोई भी आत्मा का परागमन स्वीकार नहीं करता। उनका विश्वास  है कि पैगम्बर या अवतारों द्वारा पाप को क्षमा किया जा सकता है। नर्क का भय दिखा कर तीनों में शोषण को ही प्रमुखता दी गयी है।

रवि- इनके सिद्धान्तों का  कुछ तार्किक विश्लेषण  क्यों न किया जाये?
बाबा- ठीक है। यदि उनका धार्मिक साहित्य ईश्वर  के द्वारा सीधे ही कहा गया है और वे मानते हैं कि ईश्वर  का कोई आकार नहीं है तो यह कैसे संभव है? क्यों कि शब्दों को कहने के लिये गला और मुंह चाहिये जो आकार के बिना संभव नहीं है, अतः या तो उनका ईश्वर  निराकार नहीं है या फिर उनका साहित्य ईश्वर  के शब्द नहीं है। इन तीनों में ब्रह्माॅंड के उत्पन्न करने का कारण स्पष्ट नहीं किया गया है। वे केवल मानते हैं कि संसार ईश्वर  की पूजा के लिये बनाया गया है पर यह भी कहते हैं कि ईश्वर  दयालु है। जब ईश्वर  दयालु है तो उसकी कृपा पाने के लिये वह अपनी पूजा क्योें कराना चाहते है? यह तो उसकी साधारण मनुष्य जैसी प्रकृति ही मानी जायेगी जो कि वाॅंछनीय नहीं है। क्रिश्चियन  कहते हैं कि जीसस ईश्वर  के पुत्र हैं, परतु जब उनका ईश्वर  निराकार है तो उनका पुत्र कैसे हो सकता है, इस तर्क का वे कोई उत्तर नहीं दे पाते। तीनों धर्म यह मानते हैं कि शैतान वह सब करता है जो ईश्वर  के कार्य के विपरीत होता है जिसका सीधा अर्थ है कि शैतान भी उतना ही शक्तिशाली है जितना ईश्वर । इस प्रकार दो पृथक शक्तियों का अस्तित्व पाया जाना स्वीकृत हुआ अतः इस प्रकार के ईश्वर  को सर्वशक्तिमान नहीं कहा जा सकता। इसलिये शैतान का पृथक अस्तित्व माना जाना अतार्किक है।

नन्दू- इनमें यह भी माना गया है कि शैतान का अस्तित्व संसार के निर्माण के पहले से ही है अर्थात् शैतान का निर्माण ईश्वर  के द्वारा नहीं हुआ है?
बाबा- अर्थात वह नकारात्मक शक्ति है, अतः दो प्रकार के ईश्वर  प्राप्त होते हैं एक अच्छा और दूसरा बुरा। अब प्रश्न  उठता है कि क्या ईश्वर  वहाॅं पाया जा सकता है जहाॅं शैतान उपस्थित हो? इस प्रकार, दोनों प्रकार के कथन एक दूसरे के विपरीत हो जाते हैं। इन मतों के अनुसार जो ईश्वर  की पूजा नहीं करता उसे नर्क में फेक दिया जाता है जहाॅं से कभी वापस नहीं आ सकते, यह भी अतार्किक है क्योंकि किसी को भी हमेशा  के लिये बंधन में नहीं रखा जा सकता। वे कहते हैं कि संसार को ईश्वर  ने बनाया पर यह नहीं बताते कि किस पदार्थ से बनाया, इस प्रकार ईश्वर  और संसार दो अलग अलग अस्तित्व हुए। अब यदि संसार ईश्वर  का हिस्सा नहीं है तो वह शैतान का हिस्सा हुआ, पर  शैतान को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर स्रष्टि का केन्द्र नहीं माना गया है अतः संसार उसका हिस्सा नहीं हो सकता। इस प्रकार तीन ईश्वर  हुए , एक तो असली, दूसरा शैतान और तीसरा वह पदार्थ जिससे संसार का निर्माण हुआ। इन धर्मों का एक समान उद्गम भयपूर्ण नर्क से हुआ है जो इनके अस्तित्व को बनाये रखने का कारण है। इस विश्लेषण  से स्पष्ट होता है कि ये सब ‘मत‘ या विचारधारायें ही है इन्हें दर्शन  की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।