Tuesday, 7 December 2021

362 द्रौपदी

 महाभारत कालीन द्रौपदी के संबंध में कुछ विद्वानों को अनेक प्रकार के भ्रम पैदा हो गए हैं और वे साहित्य की मनमानी व्याख्या कर दूसरों को भी भ्रमित करते देखे जा सकते हैं। इस संबंध में मेरा विचार इस प्रकार है-

1. हमारे समृद्ध प्राचीन संस्कृत साहित्य की सौदर्य हैं उसके छंद, अलंकार, अन्योक्तियॉं, व्यंग्योक्तियॉं और अतिशयोक्तियॉं। इन पर सावधानीपूर्वक ध्यान दिये बिना उसका रसास्वादन कर पाना कठिन है। अन्य तथ्य यह भी है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व में घटित घटनाओं का अध्ययन यदि हम आज के संदर्भ में करना चाहते हैं तो हमें मनोयोग से उस काल की सामाजिक व्यवस्थाओं, प्रचलित प्रथाओं, मान्यताओं, भौगोलिक और सांस्कृतिक विषमताओं पर  अपने विवेकपूर्ण चिंतन को ले जाना होता है अन्यथा स्वयं भ्रमित होते हैं और दूसरों को भी भ्रमित करते हैं।‘‘द्रौपदी के पांच नहीं एक ही पति था,’’ इस लेख के लेखक ने भी यही भूल की है। 

2. सर्वविदित है कि वैदिक युग में तात्कालिक सामाजिक व्यवस्था में बहुपति प्रथा, बहुपत्निप्रथा, बहुसंतान प्रथा, नियोग प्रथा आदि की सामाजिक स्वीकृति थी भले ही आज के समाजविज्ञान की दृष्टि से इसे उचित नहीं कहा जा सकता। महाभारत काल के आने तक नियोग प्रथा, बहुपत्नि प्रथा और बहुसंतान प्रथा प्रचलन में बनी रही, पर बहुपति प्रथा कुछ जनजातीय राज्यों जैसे तत्कालीन उत्तर भारत की मंगोल जाति जिसे पिशाच कहा जाता था, में प्रचलित थी। आज भी तिब्बत और लद्दाख की कुछ जातियों में यह पाई जाती है। महाभारत के सभी पात्रों की एक से अधिक पत्नियॉं, बहुत संतान या नियोगज सन्तान और कुछ पात्रों में बहुपतियों का पाया जाना तात्कालिक सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप ही था जिसे अनुचित नहीं माना जा सकता। धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर तथा पांचों पांडव नियोगज संतान ही थे। कुन्ती के वैवाहिक पति पांडु थे परन्तु विवाह पूर्व उन्होंने सूर्य से कर्ण और विवाह के बाद यम से युधिष्ठिर, वायु से भीम और अग्नि से अर्जुन को जन्म दिया। इस प्रकार उनके भी पांच पति हुए।

3. द्रौपदी थीं पांचाल देश (गंगा के उत्तरी में हिमालय के ऊपरी क्षेत्र से आज के बुदौन, फर्रुखाबाद तथा उत्तरप्रदेश के इस भाग से जुडे़ जिलों तक फैला जनजातीय भूभाग) के नरेश द्रुपद की पुत्री जिसका नाम कृष्णा था पर द्रुपद की पुत्री के कारण लोग द्रौपदी और पांचाल देश की पुत्री होने के कारण पांचाली नाम से भी पुकारते थे। यह सही है कि पांचों पाडव भाई  द्रौपदी के पति थे जिनसे प्रत्येक से क्रमशः एक एक वर्ष के अन्तर पर एक एक पुत्र थे जिनके नाम हैं, प्रतिविन्ध्य, सुतलोक, श्रुतकर्म, शतनिक और श्रुतसेन। महाभारत के आदिपर्व के हराहरण पर्व के अध्याय 220 में द्रौपदी के पॉंचों पुत्रों और अभिमन्यु के जन्म संस्कार के वर्णन में यह दिया गया है। द्रौपदी और कुन्ति दोनों ही पंचकन्याओं में स्थान पाती हैं क्योंकि वे दोनों ही श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं।

4. लेखक द्वारा जिन श्लोकों का उद्धरण देकर अपना मत पुष्ट करना चाहा गया है उन्हें स्पष्ट करते समय तात्कालिक परिस्थतियों (अज्ञातवास) और साहित्यिक व्यंगोक्तियों पर ध्यान नहीं दिया जाकर एक पक्षीय रूपान्तरण कर दिया गया है। भीम और द्रौपदी के संवाद में द्रौपदी का कथन ‘‘ क्या पूछते हो! युधिष्ठिर की पत्नि होकर दुख न पाऊं, यह कैसे हो सकता है?’’ यह व्यंगोक्ति नहीं तो और क्या है? कीचक के सामने भीम का कथन, ‘‘ आज मैंने अपने भाई की पत्नि का अपमान करने वाले को दंड देकर उऋण हो मन को शांत किया।’’ यह भी लेखक ने स्थान और परिस्थिति पर ध्यान न देकर अपने एकपक्षीय चिंतन के समर्थन में मान लिया जबकि सर्वविदित है कि राजा विराट के पास ये सभी अपनी पहिचान छिपाकर नाम बदलकर युधिष्ठिर को बड़ा भाई और द्रौपदी को उनकी पत्नी बताकर संरक्षण पाये थे। जरा सोचिए कीचक के सामने क्या वे अपने को द्रौपदी का पति बताकर उक्त कथन को कह सकते थे?


Wednesday, 1 December 2021

361 नजर

 361

निशिदिन 

व्यस्त वंचनाओं में 

सुनते कर्कश कलरव,

मृत्यु समय पर्यन्त 

सुसज्जित

गीततान न गा पाई।


तरस तरस कर 

धीरज धर धर 

मन को बोध कराके,

झॉंकी भी 

जिनने न कभी उन दिव्य 

कल्पनाओं की देखी।


दत्तचित्त रह 

नित्य परिश्रम में 

निज को न निहारा,

सुना उलहना 

निठुर भूख का 

आस ‘शॉंत‘ की देखी।


ध्यान जरा 

उनका भी कर लो 

धन अट्टालिका वालो,

जिनने कभी स्वप्न में भी 

निज तन पर 

नजर न फेकी।


सब कहते हैं 

झुग्गियॉ जिनको

वे हैं उनकी जगहें,

शामें जिनकी थकी हुई हैं

कराह रहीं हैं सुबहें।


मान शहर का ‘दाग‘

मिटाने तुले 

लोग.. 

उनकी दिया बत्ती, 

सृष्टि के इस अभिन्न अंग की 

करुण दशा को 

सदा ही घेरे नई विपत्ति।


आज तुम्हारा 

जो है अपना

कल होगा औरों का,

इसे समझ कर आज, 

अभी से

करो मदद इन सबकी।

- डॉ टी आर शुक्ल, सागर मप्र।

10ः05ः1970


Sunday, 15 August 2021

360 सहज नैतिकता और आध्यात्मिक नैतिकता


मनुष्य स्वाभाविक रूप से नैतिक है पर समय के प्रभाव से कुटिलता ने उसके जीवन में स्थान पा लिया और वह अनैतिक होता चला गया। जब किसी के मन में यह बोध दृढ़ होंता है कि ‘‘ मैंने अपराध नहीं किया है, आज भी नहीं करता हॅूं और भविष्य में भी नहीं करूंगा’’ तो उसमें नैतिक बल अवश्य  ही जागेगा। गुंडे, बदमाश , चोर और नशाखोर व्यक्ति शारीरिक रूप से कितने ही बलशाली हों पर उनमें नैतिक बल नहीं होता इसीलिए पुलिस को देखते ही डर जाते हैं। नैतिक व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर भले हो पर पुलिस से वह भयभीत नहीं होगा। 

सहजनैतिक व्यक्ति यदि प्रतिज्ञा करेगा तो पूरी करने में कसर नहीं छोड़ेगा, किसी ने उसका उपकार किया है तो उसे भूलेगा नहीं वरन् कृतज्ञ रहेगा। सहज नैतिक व्यक्ति को कुटिल लोग अपने कपट जाल में फंसा कर उनका शोषण करते देखे जाते हैं। इस प्रकार के अनेक उदाहरण है जिनमें किसी व्यक्ति को संकट में फंसाया जाकर उसे बचा लेना और बाद में उसकी कृतज्ञता का लाभ उठाकर अपना उल्लू सीधा करना आदि। सहजनैतिक व्यक्तियों में आध्यात्मिक नैतिकता की कमी होने से वे कुटिल लोगों के चंगुल में फंसे रहने को विवश  हो जाते हैं। 

आध्यात्मिक नैतिकता उत्पन्न करने के लिए सहजनैतिक व्यक्ति को ब्रह्म साधना पद्धति का अनुसरण करने की आवश्यकता  होती है जिसका सुयोग विरले लोगों को ही होता है। इस पद्धति से जीवन यापन करने वालों की बुद्धि अत्यंत उन्नत हो जाती है जिससे वे किसी भी भ्रमजाल में नहीं फंसते। सहतनैतिक व्यक्ति आदर के पात्र हैं उनके पास नैतिक बल होता है पर आध्यात्मिक नैतिक व्यक्ति के पास नैतिक बल के साथ बुद्धि का बल भी होता है अतः वे देश  काल और पात्र के अनुसार अपने को व्यवस्थित करते हुए अपने नैतिक बल का उपयोग कर सकते हैं।

किसी भी युग में कुटिल और धूर्त लोगों की कमी नहीं रही, आज भी उन्हीं का वर्चस्व देखा जाता है। प्रतिज्ञाओं से भरे महाभारत काल में तो सहजनैतिक लोगों के अनेक उदाहरण मिलते हैं। जैसे, भीष्म और कर्ण दोनों ही महान, अजेय योद्धा और धार्मिक व्यक्ति थे पर थे केवल सहजनैतिक। भीष्म का कहना था कि उन्होंने दुर्योधन का अन्न खाया है इसलिए दुष्ट होते हुए भी युद्ध में उसका साथ देंगे। कर्ण भी दुर्योधन के उपकारों से दबे थे अतः सहजनैतिकता से ही उसके हर विचार को न चाहते हुए भी सहमति देते थे और युद्ध भी उसी के पक्ष में लड़े। यदि ये दोनों आध्यात्मिक नैतिकता का उपयोग करते तो कह सकते थे कि देखो दुर्योधन! तुमने हमारे ऊपर बहुत उपकार किए हैं जिनके हम कृतज्ञ हैं इसलिए यह सुझाव दे रहे हैं कि अनीति पर चलना छोड़ दो अन्यथा हम तुम्हारा साथ नहीं दे सकते।

सहजनैतिकों और आध्यात्मिक नैतिकों में बस यही अन्तर है।


Wednesday, 11 August 2021

359 युधिष्ठिर

  युधिष्ठिर  अर्थात् जो व्यक्ति युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी मानसिक रूप से स्थिर रहता है, उद्वेलित नहीं होता है वह युधिष्ठिर है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में अनगिनत ब्लेक होल, गेलेक्सियां, तारे और उल्काएं लगातार उत्पात मचाते रहते हैं परन्तु आकाश  अर्थात् ‘स्पेस’ किसी भी प्रकार से उद्वेलित नहीं होता वह सदा ही एकरस बना रहता है इसलिए वह युधिष्ठर है। विद्यातन्त्र में पांचों पांडवों को पंचतत्व का रूपक दिया गया है, इसके अनुसार युधिष्ठिर आकाश  तत्व को प्रदर्शित करते  हैं। महाभारत में युधिष्ठिर  से अन्य अनेक प्रश्न  पूछने वाले यक्ष ने जब यह पूछा कि धर्मतत्व का सही सही मार्गदर्शन  करने वाला रास्ता कौन सा है? तब युधिष्ठिर ने कहा, इसमें बड़ा ही कन्फ्युजन है क्योंकि यदि श्रुतियों के रास्ते को माने तो वे चार चार हैं उनमें से किसके अनुसार चलें यह कहना कठिन है क्योंकि उनमें एकरूपता नहीं है। यदि स्मृतियों पर विचार करें तो यही विरोधाभास उनमें भी है और इतना ही नहीं जिन्हें हम आदर्श मार्गदर्शक   मानते हैं उन ऋषिमुनिगणों में भी किन्हीं दो महानुभावों का सिद्धान्त एकसमान नहीं पाया जाता हैं। 

इसलिए मेरे विचार में तो सही रास्ता वही है जिसका अनुसरण करते हुए अनेक लोग साधारण अवस्था से ऊपर उठकर महापुरुषों के रूप में समाज में आज भी आदर पाते है।

Friday, 30 July 2021

358 गोप


वृन्दावन के गोपगण, कृष्ण के अन्तरंग सखा थे। वे अपनी गाय भैंस चराने और कृष्ण के साथ खेलते हुए अधिक आनन्दित होते थे। उन्हें यह नहीं मालूम था कि कृष्ण इस विश्व  ब्रह्माण्ड के नियामक, प्राण पुरुष, पुरुषोत्तम हैं। उन्हें यह बड़ी बड़ी बातें जानने की आवश्यकता  ही नहीं थी। वे तो केवल यह जानते थे कि कृष्ण कन्हैया केवल उनका सबसे प्रिय है, उनका अभिन्न है, वे उससे पृथक नहीं हो सकते। जब अक्रूर के साथ कृष्ण मथुरा जाने लगे तब वे सभी उनके रथ के पहिए के नीचे लेट गए और कहने लगे कि वे उन्हें बृज से जाने नहीं देंगे। पर कृष्ण की तो अपनी योजनाएं थीं अतः वे अवश्य ही जाएंगे और बताइए, गोप गोंपियां उन्हें रोक रही हैं। अक्रूर के बहुत समझाने पर भी बात न बनी तो वे केवल इस बात पर कम्प्रोमाइज करने को सहमत हो गई कि यदि कृष्ण कह दें कि वे लौट कर वृन्दावन वापस आएंगे तो पहिए के नीचे से वे सब हट जाएंगे। अब कृष्ण आज के राजनेताओं की तरह झूठ तो बोल नहीं सकते थे, उन्हें वोट तो पाना नहीं था कि वे झूठा आश्वासन  देे देते। वे जानते थे कि वे अब वापस नहीं आएंगे, उन्हें तो बड़े बड़े काम करना हैं अतः उन्होंने अपने उन भाभुक भक्तों को भावमयी भाषा में ही कहा ‘‘मेरा शरीर बृज से दूर रह सकता है पर मेरा मन सदा बृज की धूल में लोटता रहेगा।’’ बस, इस भावप्रवण मधुरिमा ने भक्त गोपगोपियों का मन गदगद कर दिया। गोप का अर्थ होता है, ‘‘गोपायते इति सः गोपाः’’। यानी, वे व्यक्ति जिनके जीवन का एकमेव उद्देश्य  परमपुरुष को आनन्दित करना है वे हैं गोप। भक्ति के अनेक प्रकारों में से सर्वश्रेष्ठ प्रकार है ‘रागात्मिका भक्ति’ इसमें भक्त की भावना यह होती है कि मुझे चाहे जितना कष्ट मिले मेरे प्रभु मेरी ओर से आनन्दित ही रहें। गोप गोपियाॅं रागात्मिका भक्ति की श्रेणी में आती हैं।


Wednesday, 28 July 2021

357 परम्परा


ऐसे अनेक लोग समाज में मिल जाएंगे जो परंपरा के नाम पर वह सब कुछ लादे रहते हैं जो आज के समय मेें औचित्यहीन हो चुका होता है। चाहे सड़ा गला दुर्गंध युक्त समान हो या निरर्थक हो चुके सिद्धान्त वे उन्हें परम्परा के नाम पर सहेज कर रखना चाहते हैं। कोई यदि तर्क पूर्वक उन्हें समझाना चाहे तो वे आक्रामक होकर उसे असंस्कृत कहने में भी नहीं चूकते। वास्तव में वे परम्परा और संस्कृति को समानार्थी मानने लगते हैं। सर्वविदित है कि समाज का अर्थ है जो एक समान उद्देश्य  को लेकर लगातार आगे बढ़ते रहना चाहता है ‘‘समाने ईजति यः सः समाजः’’। अर्थात् वही लोग आगे बढ़कर उत्तरोत्तर प्रगति कर सकते हैं जो समयानुकूल अद्यतन ज्ञान के द्वारा अपने को परिमार्जित करते रहने का गुण विकसित कर लेते हैं। परन्तु पूर्वोक्त परम्परावादी केवल मानसिक रोगी ही कहला सकते हैं क्योंकि वे जानबूझकर अपनी प्रगति में स्वयं बाधक बन जाते हैं। मनुष्य की आवश्यकताओं और मानसिक विकास के अनुरूप प्रत्येक युग में सामाजिक व्यवस्थाओं में सहज भाव से परिवर्तन होते रहते हैं। समाज की गतिशीलता रुक जाए तो समाज का ढांचा ही चकनाचूर हो जाएगा। आज का हिंदु समाज खोखली परम्पराओं को लादे अपनी गतिशीलता को रुद्ध करके प्रतिदिन ध्वंस की ओर अग्रसर हो रहा है और भविष्य में निश्चिन्ह  होने को उन्मुख है। आवश्यकता  है पुरानी पड़ चुकी अतार्किक, अवैज्ञानिक और अविवेकपूर्ण परम्पराओं के नाम पर अंधविश्वास  फैलाकर लोगों को भ्रमित करने के स्थान पर उन्हें वैज्ञानिक सोच के साथ समय के अनुकूल परिवर्तित कर तदनुसार चलना और चलाना। 


Tuesday, 13 July 2021

356 मन कैसे कार्य करता है?


मन के दो खंड होते हैं, एक व्यक्तिनिष्ठ (subjective mind)  और दूसरा वस्तुनिष्ठ (objective mind) .  मानलो एक बिल्ली दिखाई दी, अब यदि आँख  बंद कर उस बिल्ली को फिर से याद किया जाता है तो मन का जो भाग बिल्ली का आकार बनाने लगता है उसे वस्तुनिष्ठ मन और जो भाग केवल देखता रहता है अर्थात् साक्ष्य देता है कि बिल्ली का रूप बन गया, उसे व्यक्तिनिष्ठ भाग कहते हैं।

इस प्रकार सभी के पास वस्तुनिष्ठ मन है अर्थात् मन का वह भाग है जो सोचने की वस्तुनिष्ठता रखता है, अब देखना यह है कि यह वस्तुनिष्ठ मन कार्य कैसे करता है। मानलो कोई पोस्टआफिस के बारे में सोचता है तो पोस्ट आफिस उसके वस्तुनिष्ठ मन में है और यदि कोई मेंढक या मच्छर के बारे में सोचता है तो वह मच्छर, मेंढक के वस्तुनिष्ठ मन में है। इसलिये किसी के द्वारा किसी वस्तु के संबंध में सोचने का अर्थ हुआ उसके वस्तुनिष्ठ मन के द्वारा उस वस्तु का आकार या रूप ग्रहण कर लेना।

इसके अलावा यह वस्तुनिष्ठ मन भी दो प्रकार से कार्य करता है, एक तो वह जो किसी देखी गई वस्तु जैसे बिल्ली को फिर से आँख  बंद कर देखने पर वह वस्तुनिष्ठ मन बिल्ली का प्रतिविंब बना लेता है। इसी वस्तुनिष्ठ मन के कार्य करने का दूसरा प्रकार यह  है, मानलो अब उसकी कल्पना करते हैं जिसका अस्तित्व ही नहीं है जैसे भूत,  तो अस्तित्व न होते हुए भी जो सोचा जा रहा है कि इस अंधेरे कमरे में भूत रहता है जिसके बड़ेबड़े दाॅंत और उल्टे पैर होते हैं, यह बिल्कुल कल्पना है परंतु फिर भी वह वस्तुनिष्ठ मन में अपना प्रतिविंब बनाता है और इस कल्पित भूत को जो देखने का काम करता है वह भी इसी मन का व्यक्तिनिष्ठ भाग है। अधिकाॅंश  मनोवैज्ञानिक बीमारियाॅं इसी दूसरे प्रकार के काल्पनिक चिंतन का परिणाम होती हैं। जब, कि प्रारंभिक अवस्था में चेतन मन अपनी ज्ञानेन्द्रियों  की सहायता से देखे जा रहे कल्पित भूत को परख लेता है कि सचमुच में भूत है भी कि नहीं तब अंत में  पाता है कि कोई भूत नहीं है और जो आभास हो रहा था वह मात्र कल्पना थी। यही सही भी है। इसका अर्थ यह है कि यथार्थ निर्णय करने के लिये मन का व्यक्तिनिष्ठ भाग (अर्थात् जो देख रहा है या साक्ष्य दे रहा है), वस्तुनिष्ठ भाग  (अर्थात् जो देखा जा रहा है) से अधिक शक्तिशाली होना चाहिये ।

अब यदि कहीं इसका उलटा हो जाये, अर्थात् वस्तुनिष्ठ भाग की शक्ति व्यक्तिनिष्ठ भाग से अधिक हो जाये तब इस अवस्था में वह व्यक्ति भूत का होना ही सही कहेगा।  यदि यह एक या दो बार ही होता है तो उसे समझाया जा सकता है परंतु यदि सोचने वाले के व्यक्तिनिष्ठ भाग को उसके वस्तुनिष्ठ भाग ने अपने चंगुल में ले लिया है तो यह वही अवस्था होती है जहाॅं से मनोवैज्ञानिक बीमारियाॅं जन्म लेती हैं। वह अपने हृदय से मानने लगता है कि भूत सचमुच होता है। काल्पनिकता उसके लिये जीवन्तता में बदल जायेगी और वह भयंकर मनोवैज्ञानिक बीमारी से ग्रस्त हो जायेगा।