Thursday, 21 July 2022

385 व्याघ्रकृत्तिमवसानम और विश्वाद्यम् विश्वबीजम शिव


शिव के ध्यान मंत्र में उन्हें ‘व्याघ्रकृत्तिमवासनम्’ कहा गया है। व्याघ्र का अर्थ है शेर या ‘टाइगर’, कृत्तिम का अर्थ है चर्म या चमड़ा और वसानम् का अर्थ है वस्त्र या पहनावा। अर्थात् वे शेर के चमड़े को पहना करते थे। जैन दर्शन के प्रभावी काल में कुछ अज्ञानियों ने शिव को दिगम्बर मान लिया जब कि ध्यान मंत्र में स्पष्ट है कि वे व्याघ्रचर्म पहना करते थे, इसी कारण अनेक नामों में से उनका एक नाम ‘कृत्तिवास‘ भी है। 

इसी मंत्र में उन्हें विश्वाद्यम् और विश्वबीजम् भी कहा गया है। विश्वाद्यम् अर्थात् विश्व आद्यम् अर्थात् विश्व में सबसे पहले। और विश्वबीजम् अर्थात् विश्व को उत्पन्न करने के बीज स्वरूप। शिव को परमपुरुष मानने का कारण यह है कि उनमें परमसत्ता के सभी गुण हैं और वे हमारे बिल्कुल निकट हैं अतः उन्हें परमपिता कहना न्यायसंगत है। वे पुरुषोत्तम हैं, प्रथम पुरुष है, परम शिव हैं और वे विश्वाद्य अर्थात् बृह्मॉंड के उद्गम है। विश्व के उद्गम का कारण भी इन्हीं प्रथम पुरुष में है, आदिशिव ही अपने निष्कलत्व को सकलत्व में मात्र इच्छा से ही रूपान्तरित कर देते हैं। आदिशिव की इच्छा के विना प्रकृति कोई भी रचना नहीं कर सकती। इसलिये विश्व के मूल कारण आदिशिव हैं न कि प्रकृति। ध्यान मंत्र में यह स्पष्ट कहा है कि शिव ही विश्व के बीज हैं।


Sunday, 17 July 2022

384 चारुचंद्रावतंसं शिव

 

शिव के ध्यान मंत्र में उन्हें ‘‘चारुचंद्रावतंसं’’ अर्थात् सुंदर चंद्रमा (चारुचंद्र) जिनका मुकुट(अवतंस) है ऐसा कहा गया है। क्या सचमुच शिव के सिर पर चंद्रमा का मुकुट था? इस संबंध में सच्चाई को इस प्रकार समझ सकते हैं, मानव शरीर में सूक्ष्म ऊर्जा के अनेक केन्द्र और उपकेन्द्र हैं जिन्हें चक्र या पद्म या ऊर्जा केन्द्र कहते हैं इन चक्रों से विभिन्न प्रकार के हारमोन्स उत्सर्जित होते रहते हैं जो विभिन्न वृत्तियों को नियंत्रित करते हैं। इन वृत्तियोंके नियंत्रक विंदु जिनकी संख्या 50 है वे इन 9 चक्रों में अपने अपने रंग और ध्वनि के साथ स्थित होते हैं। ये पचास ध्वनियां ही मूल स्वर और व्यंजन के रूप में हम सभी उच्चारित करते हैं। सामान्यतः उच्च स्थित चक्र से निकलने वाला हारमोन निम्न स्थित चक्रों को अपने रंग और ध्वनि से प्रभावित करता है। सर्वोच्च स्थित सहस्रार चक्र निम्न स्थित सभी चक्रों को प्रभावित कर 1000 वृत्तियोंको नियंत्रित करता है। सहस्रार से निकलने वाला यह हारमोन मानव मन और हृदय को अवर्णनीय आनन्द की अनुभूति कराता है जिससे आत्मिक उन्नति होती है और मनुष्य विचारमुक्त अवस्था में आ जाता है। यह दिव्य अमृत प्रत्येक व्यक्ति के सहस्रार से निकलता रहता है पर मनुष्यों का मन प्रायः भौतिकवादी मामलों या वस्तुओं के चिंतन में ही उलझा रहता है इसलिये वह वहीं पर अवशोषित हो जाता है नीचे के चक्रों को प्रभावित नहीं कर पाता है। परंतु यदि इस हारमोन के उत्सर्जन के समय व्यक्ति आध्यात्मिक चिंतन में मन को लगाये रहे तो वह आध्यात्मिक उन्नति कर आनंददायी बेहोशी का अनुभव करता है और बाहर से लोग उसे देखकर समझने लगते हैं कि यह तो शराबी है। शिव हमेशा इसी उच्च अवस्था में ही रहते थे अतः अनेक लोग जो भांग, अफीम आदि का नशा किया करते थे वे प्रचारित करने लगे कि शिव भी इन नशीली चीजों का उपयोग करते हैं। अन्य लोग सोचते थे कि चंद्रमा की 16 कलाओं में से प्रतिपदा से पूर्णिमा तक प्रतिदिन एक एक दिखाई देती है पर सोलहवीं कभी नहीं। इसी सोलहवीं कला से अमृत निकलता है, इसे ‘अमाकला‘ नाम भी दिया गया है। इसी से निकलने वाले अमृत के प्रभाव से शिव अपने आप में ही मग्न रहा करते हैं इसलिये अनेक लोगों का मत था कि यह अद्रश्य सोलहवीं चंद्र कला शिव के ही मस्तक पर होना चाहिये, इसीलिए उन्हें ‘‘चारुच्रद्रावतंसं’’ कहा गया है। सहस्रार के इस दिव्य अमृत के उत्सर्जन से शिव अपने वाह्य जगत और अन्य आवश्यकताओं से अनजान,  भोलेभाले दिखाई पड़ते थे अतः उन्हें लोग भोलानाथ भी कहने लगे थे।


Friday, 15 July 2022

383 हिप्नोटिज्म अर्थात् ‘आउटर सजैशन’’

  

मनोविज्ञान(साइक्लाजी) में, जब किसी एक व्यक्ति के ‘मन’ के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के मन पर लगातार विशेष प्रकार के संवेदनों की आवृत्तियॉं डाली जाती हैं तब इसे ‘‘आउटर सजैशन’’ कहा जाता है। जब बाहरी संसार की वस्तुओं की तथ्यात्मकता को हमारे ब्रेन के ‘‘एक्टोप्लाज्मिक’’ सैलों द्वारा विषयगत बना लिया जाता है तो हम कहते हैं कि हमने उसे जान लिया या समझ लिया है। यदि इन एक्टोप्प्लाज्मिक सैलों की ऊर्जा या ज्ञान शक्ति को किसी व्यक्ति विशेष के मन पर केन्द्रित कर दिया जाय तो वह व्यक्ति भी वही सोचेगा और समझेगा जो एक्टोप्लाज्मिक सैलों को नियंत्रित करने वाला व्यक्ति समझाना चाहेगा। ज्ञान का यह क्षेत्र ‘योग मनोविज्ञान’ के अन्तर्गत आता है और यह विद्या संस्कृत में राक्षसी विद्या और अंग्रेजी में ‘हिप्नोटिज्म’ कहलाती है। कुछ लोग इन सैलों के नियंत्रण का अभ्यास कर उसका दुरुपयोग करने लगते हैं और भूतप्रेतों के नाम से लोगों को डराने लगते हैं। बाहरी संसार में उनकी गतिविधियों के प्रभाव अनुभव भी किये जाते हैं। इनसे मुक्त होने का एक मात्र उपाय है उस व्यक्ति के एक्टोप्लाज्मिक सैलों के संतुलन को बिगाड़ देना। परन्तु कैसे? इसका एक दृष्टान्त रामायण में इस प्रकार दिया गया है। 

‘‘अंगद जब रावण से मिलने पहंॅुचे तो दरवार में रावण के साथ साथ उन्नीस मंत्री और रावण का पुत्र इंद्रजीत अर्थात् मेघनाथ बैठे थे। सभी मंत्रियों ने अंगद को भ्रमित करने के लिए एक साथ सोचना प्ररंभ कर दिया कि उनका आकार भी रावण के समान हैं। सबों के मन से निकलने वाली मानसिक तरंगों ने अंगद के मन को चक्कर में डाल दिया, उसे बीस रावण दिखाई देने लगे। मेघनाद मंत्रियों की तरह नहीं सोच रहा था अतः वह अपने ही रूप में दिखाई दे रहा था अन्य सभी बिलकुल रावण की तरह ही दिखाई दे रहे थे। उनके भौतिक शरीर बिलकुल स्थिर थे। अंगद ने असली रावण को पहिचानने के लिए ट्रिक का उपयोग करते हुए मेघनाद से पूछा, मित्र इंद्रजीत! इस सभा में मैं 20 रावण देख रहा हूंॅ क्या ये सभी तुम्हारे पिता हैं? यह सुनकर सभी मंत्रियों को गुस्सा आ गया और उनके मन के तथ्यात्मक खंडों (अर्थात् एक्टोप्लाज्मिक सैलों)) की स्थिरता भंग हो गई और वे अपने मौलिक रूप में दिखाई देने लगे।’’

कुछ अविद्या तांत्रिकों को इन एक्टोप्लाज्मिक सैलों की सहायता से दूसरों के घरों में हड्डियां फेकने, गंदगी फेकने या तोड़फोड़ करने के किस्से प्रायः जब तब सुनाई देते हैं। सामान्य लोग समझते हैं कि यह सब भूतों के काम हैं। परन्तु सावधानी से 50 मीटर की परिधि में ढूंड़ा जाय तो किसी एकान्त कोने में अविद्या तान्त्रिक सीधा बैठा इन मानसिक सैलों को आदेश देता मिल जाएगा। इसके प्रपंच को हटाने के लिए बिना डरे उसे जोर से हिलाकर सिर में आघात करना होगा तब उसका खेल तुरंत समाप्त हो जाएगा। बाहरी तथ्यात्मकता को विषयगत बनाने के लिए हमें अपने एक्टोप्लाज्मिक सैलों की ऊर्जा को केन्द्रित कर परमपुरुष की ओर संचारित करना चाहिए जिनके जान लेने पर फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता।


382 निखिलभयहरम् शिव

  382 निखिलभयहरम् शिव

भगवान शिव के ध्यान मंत्र में उन्हें ‘‘निखिलभयहरम्’’ कहा गया है। असीमित या अबाधित अस्तित्व को निखिल या अखिल कहते हैं अर्थात् सबके भय को नष्ट करने वाला । जीवन के अनेक क्षेत्रों में मनुष्य अनेक चीजों से डर पाल लेते हैं। पशु  भी अपने शत्रुओं से डरते हैं। वर्तमान में मनुष्यों के भौतिक स्तर के भय में कमी आई है पर मानसिक स्तर में भय की बृद्धि हुई है। शिव ने मनुष्यों और पशुओं दोनों को निर्भय करने के लिये अनेक कदम उठाये। बीमारियों से निपटने हेतु चिकित्सा विज्ञान को विकसित किया, शत्रुओं से निपटने के लिये अनेक हथियार बनाये, मानसिक भय को दूर करने के लिये ज्ञान की अनेक शाखाओं को विकसित किया और आत्मिक भय को हटाने के लिये तंत्रविज्ञान को स्थापित किया। पशुओं और पौधों  को सुरक्षा देना, पालना और पोषण करना भी उन्होंने सिखाया, इसी लिये उन्हें संसार के दुख/भयहर्ता के नाम से जाना जाता है।


Sunday, 3 July 2022

381 पंचानन और त्रिनेत्र शिव

 

शिव के ध्यान मंत्र में उन्हें ‘पंचवक्त्रम् त्रिनेत्रम्’ अर्थात जिसके पॉच मुंह और तीन नेत्र हों वह। क्या शिव के सचमुच पॉच मुंह थे? नहीं, एक ही मुख से पॉच प्रकार का भाव प्रदर्शन कर लोगों का हित करते थे। चित्र में दिखाने के लिये मुख्य मुंह बीच में, कल्याण सुंदरम् कहलाता है और सबसे दायीं ओर का मुंह दक्षिणेश्वर। कल्याण सुंदरम् और दक्षिणेश्वर  के बीच में ईशान। सबसे बायीं ओर वामदेव और वामदेव तथा कल्याण सुन्दरम् के बीच में कालाग्नि। दक्षिणेश्वर का स्वभाव मध्यम कठोर, ईशान और भी कम कठोर, कालाग्नि सबसे कठोर, परंतु कल्याणसुदरम् में कठोरता बिल्कुल नहीं, वह सदा ही मुस्कराते हैं। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है, मानलो किसी ने कुछ गलती की, दक्षिणेश्वर  कहेंगे, तुमने ऐंसा क्यों किया? इसके लिये तुम्हें दंडित किया जायेगा। ईशान कहेंगे तुम गलत क्यों कर रहे हो क्या तुम्हें इसके लिये दंडित नहीं किया जाना चाहिये? कालाग्नि कहेंगे, तुम गलत क्यों कर रहे हो ? मैं तुम्हें कठोर दंड दूंगा, तुम्हारी गलतियों को सहन नहीं करूंगा, और क्षमा नहीं करूंगा। वामदेव कहेंगे, बड़े दुष्ट हो, मैं तुम्हें नष्ट कर दूंगा, जलाकर राख कर दूंगा। और, कल्याणसुदरम हंसते हुए कहेंगे, ऐसा मत करो तुम्हारा ही नुकसान होगा। इस प्रकार पॉच तरह के भावों को प्रकट कर शिव सभी का कल्याण करते थे जिससे शिव को ‘पंचवक्त्रम’्  कहा जाता है।

अब प्रश्न है कि पॉच मुंह वाले के दस नेत्र न होकर तीन ही क्यों? ‘त्रिनेत्रम्’ कहने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका एक ही मुंह है अतः दस ऑखें नहीं हो सकती। तो तीन कैसे?  इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। मनुष्यों का अचेतन मन सभी गुणों और ज्ञान का भंडार है। अपनी अपनी क्षमता के अनुसार लोग जाग्रत या स्वप्न की अवस्था में इस अपार ज्ञान का कुछ भाग अचेतन से अवचेतन में और उससे भी कम अवचेतन से चेतन मन तक ला पाते हैं। परंतु सभी व्यक्ति असीमित ज्ञान को अचेतन मन से अवचेतन या चेतन मन में नहीं ला सकते हैं। यदि कोई ऐसा कर सकता है तो यह क्रिया  ‘‘ज्ञान को ज्ञाननेत्र से देखना‘‘ कहलाती हैं। यही ‘ज्ञाननेत्र‘ तृतीय नेत्र के नाम से जाना जाता है। शिव त्रकालदर्शी थे, अनन्त ज्ञान के भंडार थे क्योंकि उनका ‘ज्ञाननेत्र’ बहुत ही विकसित था। चित्रों में इसे दोनों भौहों के बीच दिखाया जाता है। अतः ध्यान मंत्र में उन्हें त्रिनेत्रम् कहा गया है।


Tuesday, 28 June 2022

380 भूलना प्राकृतिक वरदान

 

यदि भूलना एक वरदान न होता तो, मनुष्य जबकि एक जन्म के बोझ में ही इतना दबा रहता है अनेक जन्मों का बोझ एक साथ  इस जीवन में  कैसे उठाता? मनुष्य का इतिहास,  आशायें , शोक निराशायें सब कुछ सूक्ष्म मन में संचित रहते है । ‘क्रूडमन और सूक्ष्ममन’ (crude and subtle mind) के बेचैन बने रहने के पर कारणमन(causal mind) अपना दावा नहीं करता परन्तु, पिछले सभी जन्मों का पूरा पूरा लेखा क्रमागत रूप से ‘कारणमन’ (causal mind) में संचित होता जाता है। इस प्रकार मन में संचित प्रत्येक सतह अपने अपने जीवन की होती है और चित्रमाला की तरह बनी रहती है जब तक कि वे सब संस्कार भोगकर समाप्त नहीं हो जाते हैं। साधना के द्वारा जब क्रूडमन को सूक्ष्ममन में और सूक्ष्ममन को कारणमन में निलंबित करने का अभ्यास हो जाता है तो साधक अपने पिछले जन्मों का क्रमशः द्रश्य देख सकता है बिलकुल सिनेमा की तरह। दूसरों के पिछले जन्म को देख पाना स्वयं के पिछले जन्मों को देख पाने से सरल होता है, पर क्या यह करना उचित होगा? नहीं । यह भी ईश्वरीय विधान है, पिछले जन्म को जानने पर आगे बढ़ने के लिये मिल रहे अवसरों का लाभ नहीं मिल पाता और अवसाद में ही जीवन निकल जाता है।

पिछले जन्मों की स्पष्ट स्मृति केवल तीन प्रकार की स्थितियों में ही हो सकती है, 1, जिनका व्यक्तित्व अच्छी तरह उन्नत हो, 2, जो स्वेछा से पूर्ण सचेत होकर मरे हों, 3, जो दुर्घटना में मरे हों। इस स्थिति में भी 12 या 13 वर्ष की आयु तक ही यह स्मरण रह पाता है अन्यथा उस व्यक्ति को दुहरा व्यक्तित्व जीना पड़ता है जो पुनः मृत्यु का कारण बनता है। जो व्यक्ति 12/13 साल तक पिछले जन्म की घटनाओं को याद रख पाते हैं वे संस्कृत में यतिस्मर कहलाते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने मन को  एक विंदु पर केन्द्रित कर दे तो उसे अपने पिछले जन्म का सब कुछ याद आ सकता है यदि उसके पिछले संस्कार अपूर्ण रहे हों। पर इस प्रकार का परिश्रम करने का कोई उपयोग नहीं बल्कि उस पराक्रम को परमपुरुष को अनुभव करने में ही लगाना चाहिये उसे जान लेने पर सब कुछ ज्ञात और प्राप्त हो जाता है, पिछले इतिहास को जान लेने से क्या मिलेगा?


Monday, 13 June 2022

379 राज्य, देश, राष्ट्र, राष्ट्रवाद और आध्यात्म


यह विश्वास कि लोगों का एक समूह इतिहास, परम्परा, भाषा, जातीयता या जातिवाद और संस्कृति के आधार पर स्वयं को एकीकृत करता है, राष्ट्रवाद (nationalism) कहलाता है। इन सीमाओं के कारण निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि लोगों को अपने निर्णयों के आधार पर अपना स्वयं का संप्रभु राजनीतिक समुदाय अर्थात् ’राष्ट्र’ स्थापित करने का अधिकार है। परन्तु दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो इस कसौटी पर खरा उतरता हो। इस आधार पर यदि दुनिया का नक्शा लिया जाए, तो पृथ्वी का हर इंच राष्ट्र की सीमाओं के भीतर विभाजित हो जाएगा। राष्ट्रवाद के आधार पर बना राष्ट्र कल्पना में तब तक बना रहता है जब तक कि वह राष्ट्र, राज्य में नहीं बदल जाता। पिछली दो शताब्दियों के दौरान राष्ट्रवाद एक ऐसे सम्मोहक राजनीतिक सिद्धान्त के रूप में उभरा है जिसने इतिहास रचने में योगदान किया है। इसने उत्कट निष्ठाओं के साथ-साथ गहरे विद्वेषों को भी प्रेरित किया है। इसने जनता को जोड़ा है तो विभाजित भी किया है। इसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाने में मदद की है तो यह विरोध, कटुता और युद्धों का कारण भी रहा है।

‘‘प्रउत दर्शन’’ के अनुसार हमारा न तो राष्ट्र है और न राष्ट्रधर्म। इसका कारण जानने के लिये सबसे पहले हमें अपने इतिहास में जाकर यह समझना होगा कि राष्ट्र और राष्ट्रधर्म होता क्या है। राष्ट्र न तो किसी राज्य के निवासियों से, न भाषा से और न ही रीतिरिवाजों, जीवन शैलियों, जाति , धर्म आदि में से किन्हीं दो या दो से अधिक घटकों के होने से बनता है। ‘‘राष्ट्र’’ है एक अवधारणा एक सेन्टीमेन्ट। भारत में इस प्रकार के सेन्टीमेन्ट्स बनते और नष्ट होते रहे हैं जैसे, आर्यों के आने पर आर्य और अनार्य दो सेन्टीमेंन्ट थे और परस्पर संघर्ष में दोनों मिल गये और भारत, सेन्टीमेन्ट के बिना राष्ट्र नहीं बन पाया। बौद्ध और अबौद्धों के सेन्टीमेन्ट्स के संघर्ष से शंकराचार्य का ब्राह्मण सेन्टीमेन्ट आया परन्तु बौद्धों की पराजय के साथ ब्राह्मण सेन्टीमेन्ट भी परस्पर विभाजित हो जाने से अधिक नहीं जी पाया और भारत फिर राष्ट्र बनते बनते रह गया। जब तक इनके बीच सेन्टीमेन्ट था बाहर से मुस्लिम नहीं आ पाये। मुस्लिमों का अपना जीने का ढंग, भाषा, पहनावा, धर्म और रीतिरिवाजों से नया मुस्लिम सेन्टीमेन्ट आया परन्तु उन्होंने भी आर्यो जैसी अनार्यो पर शोषण की नीति, या जैसे ब्राह्मणों ने बौद्धों के विरुद्ध शोषण की नीति, ही अपनाई । अतः इसके विरुद्ध मुस्लिम विरोधी सेन्टीमेन्ट जागा और दो प्रकार के राष्ट्र बनने लगे एक पर्सियन पर आधारित मुस्लिम और दूसरा संस्कृत पर आधारित हिन्दु। इस प्रकार प्रबल मुस्लिम बिरोधी सेन्टीमेन्ट उत्पन्न हुआ और हिन्दु राष्ट्र बना। परन्तु एकसाथ दो दो राष्ट्र अधिक समय तक नहीं चल सकते अतः आर्यो और अनार्यों की तरह इनमें भी पारस्परिक भाषा, पहनावा और रहन सहन आदि में परिवर्तन आने लगा और फिर से सेन्टीमेन्ट की कमी आ गयी। इसी प्रकार भारत में तीसरी बार सेन्टीमेन्ट की कमी आई जिसका लाभ अंग्रेजों ने उठाया और उन्होंने भी पूर्व में आगन्तुक विदेशियों की तरह शोषण की ही नीति अपनाई जिसके बिरुद्ध पूरे भारत ने नया सेन्टीमेन्ट अंग्रेजों को हटाने के लिये उत्पन्न किया जिससे स्वतन्त्र राष्ट्र के लिये आन्दोलन प्रारम्भ हुआ और नये राष्ट्र का निर्माण हुआ। 

स्पष्ट है कि हम राजनैतिक रूप से स्वतंत्र अवश्य हुए हैं पर अर्थिक रूप से नहीं। राजनैतिक आजादी का सबसे बड़ा दुर्गुण यह है कि इसमें भेदभाव और आर्थिक शोषण की पराकाष्ठा होने से जनसामान्य सुखी नहीं रह पाता। वर्तमान में सबसे खतरनाक प्रकार का शोषण है बौद्धिक और मनोआर्थिक शोषण। इसमें पहले लोगों को मानसिक रूपसे कमजोर करते हुए अपंग बनाया जाता है, फिर आर्थिक शोषण किया जाता है। जैसे, सबसे पहले स्थानीय लोगों की भाषा और संस्कृति को दबाया जाता है, इसके बाद बड़े पैमाने पर छद्मसंस्कृति को गंदे साहित्य में प्रचारित प्रसारित किया जाता है जिससे युवावर्ग का मन उस ओर विशेष प्रकार से आकर्षित होता है। इसके बाद महिलाओं पर अनेक प्रकार के बंधन लगाकर उन्हें आर्थिक रूपसे पुरुषों पर आश्रित बनाये रखा जाता है। अमनोवैज्ञानिक शिक्षा प्रणाली जिसमें निहित स्वार्थों की भागीदारी होती है उसको चुना जाता हैं। धर्म को नकारा जाता है। समाज को अनेक जातियों और समूहों में विभाजित कर दिया जाता है। सभी प्रकार के संचार और प्रचार साधनों जैसे न्यूजपेपर, टेलीविजन, रेडियो आदि पर पूँजीपतियों का नियंत्रण होता है। इन परिस्थितियों में धर्मान्धता का अस्त्र फेककर नागरिकों में सच्चे राष्ट्रवाद का सेंटीमेंट कैसे जगाया जा सकता है?

परन्तु यदि स्वतन्त्रता संग्राम, राजनैतिक स्वतंत्रता के स्थान पर आर्थिक स्वतंत्रता के लिये लड़ा जाता तो भारत का विभाजन नहीं होता। अब, हिन्दु और मुस्लिम दो अलग अलग सेन्टीमेन्ट्स फिर आ गये हैं। इस गलती के बाद भाषा के आधार पर राज्यों को सीमांकित करना, राष्ट्रभाषा के प्रश्न को हल न करना, और उच्च अध्ययन में स्थानीय भाषा को माध्यम के रूप में स्वीकार करना, जैसी अनेक गलतियों का परिणाम यह है कि पूर्वकाल से चली आ रही शोषण की प्रवृत्ति और बढ़ती जा रही है तथा भ्रष्टाचार अपनी चरमसीमा पर जा चुका है। इस अवस्था में एक बार राष्ट्र फिर खो गया है और नया सेन्टीमेन्ट मॉंगता है। वह सेन्टीमेन्ट हो सकता है शोषण और भ्रष्टाचार के बिरुद्ध। इसलिये भारत के लोग यदि अपने बौद्धिक दिवालियापन को पाले रहने का लालच छोड़कर सभी प्रकार के शोषण और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सेन्टीमेन्ट जनसामान्य में जगाते हैं तो यह सम्भव है कि एक नये राष्ट्र, ‘‘शोषणरहित भारत राष्ट्र’’ का निर्माण हो । परन्तु ध्यान रहे, यह भी सदैव स्थायी नहीं रह सकेगा क्योंकि शोषणमुक्त राष्ट्र बन जाने के बाद शोषण के विरुद्ध कार्यरत सेंटीमेंट समाप्त हो जाएगा अतः समाज को एकीकृत बनाए रखने के लिये नया सेंटीमेंट ‘‘आध्यात्मिक विरासत और ब्रहमांडीय आदर्श विचारधारा’’ लाना होगा वही मनुष्यों को एकता के सूत्र में बांधे रह सकेगा और ‘‘भारत राष्ट्र’’ सही अर्थ में विश्वगुरु कहलाने का हकदार हो सकेगा।