Monday, 2 October 2023

415 देश की अपूर्णीय क्षति!

415 देश की अपूर्णीय क्षति!

आजकल प्रायः अनेक विद्वान चर्चा करते हैं कि हमारे पूर्वज ऋषियों के पास बहुत पहले से चिकित्सा, इंजीनियरिंग, एअरोनाटिक्स आदि का ज्ञान था। यह सत्य भी है परन्तु प्रश्न यह है कि वह ज्ञान कहॉं चला गया, हम उसे संरक्षित क्यों नहीं रख पाए? आइए इसका कारण खोजें।
जब मूल सिद्धान्तों को भूलकर अपने वर्चस्व के लिए मनमाने सिद्धान्तों को प्रधानता दी जाने लगती है तो स्वाभाविक रूप से आडम्बर जन्म लेता है और मूल सिद्धान्तों के पालनकर्ताओं को हेय समझा जाने लगता है। भारतीय दर्शन के अनुसार प्रकृति अपने तीन गुणों सत्व, रज और तम में पारस्परिक संतुलन के आधार पर अपनी गतिविधियां जारी रखती है जिससे कहीं पर सत्व की अधिकता हो तो अन्य दोनों रज और तम की आनुपातिक रूप से कमी होती है और इस प्रकार के जीव सात्विक कहलाते हैं जबकि अन्य गुणों की प्रधानता जिनमें होती है वे क्रमशः राजसिक और तामसिक कहलाते हैं। सपष्ट है कि एक ही परिवार में कोई राजसिक कोई तामसिक और कोई सात्विक हो सकता है परन्तु उनमें आपस में घृणा नहीं होती। पूर्वकाल में कुछ अहंकार ग्रस्त लोगों ने तामसिक गुणों के लोगों को घृणित मानकर उन्हें सामाजिक महत्व से वंचित कर दिया और ‘राक्षस’ कहकर पुकारने लगे। अब यदि राक्षस कुल के किसी व्यक्ति ने कोई अच्छा कार्य किया तब भी वह समाज के तथाकथित सात्विकों द्वारा ग्राह्य नहीं माना जाता था अतः हमारे देश में इन तथाकथित राक्षस प्रवृत्ति के लोगों के द्वारा प्राप्त विद्याओं और किये गए अनुसंधानों को भुलाया जाता रहा है।
हमारा पुराना साहित्य इस प्रकार के दृष्टान्तों से भरा पड़ा है। यह उदाहरण देखिए, पूर्वकाल में बंगाल और झारखंड के एक भूभाग के राजा अनुभवसेन की पत्नी कर्कटी तमोगुणी अर्थात् तथाकथित राक्षसी थी परन्तु वह चिकित्सा के क्षेत्र में लगातार अनुसंधान करती रहती थी। उनका पुत्र सुतनुक आदर्श चरित्र का जनहितकारी वैद्य था। इस प्रकार राजा और उनका पुत्र सात्विक परन्तु पत्नी राक्षसी प्रवृत्तियों की मानी गई। कर्कटी ने अपनी प्रयोगशाला में कर्कट रोग जिसे आज केंसर कहा जाता है की खोज कर ली थी परन्तु तत्कालीन संकीर्ण सोच के सात्विकों ने उसे मान्यता नहीं दी इतना ही नहीं जब वह अपनी प्रयोगशाला में शवों का परीक्षण कर रही थी तो इस समूह के लोगों ने उसे यह कहकर वहीं जला दिया कि वह नरमांस भक्षण के लिये शवों को एकत्रित करती रहती है। अर्थात् उसे राक्षसी कहकर मार डाला गया। कहा जाता है कि कर्कटी की प्रयोगशाला में रखे शवों और अन्य रसायनों के साथ उसके जलने से जो भी गैसें उत्पन्न हुई उनसे ‘कॉलेरा’ अर्थात् हैजा (संस्कृत में विसूचिका) और ‘डायबिटीज’ अर्थात् मधुमेह रोग फैला। इसके साथ ही कॉलेरा और केंसर की औषधि भी विलुप्त हो गई। आयुर्वेद, चिकित्सा और सर्जरी के क्षेत्र में पुराने भारत का ज्ञान इसी निरर्थक सोच के कारण नष्ट होता गया ।
यह सर्वविदित है कि लिपि का ज्ञान न होने के कारण उस समय वेदों के ज्ञान को सुन सुन कर एक दूसरे को दिया जाता था इसीलिये उन्हें श्रुति भी कहा जाता है। परन्तु जब लिपि का ज्ञान हो चुका तब भी परम्परावादी तत्कालीन विद्वानों ने लिखने नहीं दिया क्योंकि वेदों को सुनकर ही एक दूसरे को सिखाने की परम्परा को वे बदलना नहीं चाहते थे। परिणाम यह हुआ कि बहुत सा ज्ञान याद ही नहीं रखा जा सका और जानकार पृथ्वी छोड़कर चले गए। ऋषि अथर्वा ने बड़ी कठिनाई से इन लोगों से छिप छिप कर अपने साथियों और शिष्यों अंगिरा, अंगिरस, वैदर्भि आदि के साथ वेदों को लिखा जिसे बाद में वेदव्यास ने कालक्रम के अनुसार चार भागों में विभाजित किया।
इसी प्रकार की दकियानूसी विचारधारा का वर्तमान समय का ही उदाहरण है, वह घटना जब अंग्रेजों के शासन में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव बढ़ा तब उसी अवधि में अड़ियल मुल्लाओं के एक समूह ने अंग्रेजी भाषा के खिलाफ एक फतवा जारी किया कि ‘‘यह एक अपवित्र भाषा है क्योंकि यह बाएं से दाएं लिखी जाती है। अगर मुसलमानों ने इसे सीख लिया तो वे अपनी धार्मिक पहचान खो देंगे और ईसाई बन जाएंगे।’’ मुस्लिम विद्वानों के इस रवैये का भारतीय मुसलमानों पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ा। बाद में उन्हें क्षति पूर्ति करने के लिए ही अलीगढ़ में मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना करनी पड़ी।
स्पष्ट है कि जब तक हम तर्क और विज्ञान पर आधारित विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता का समुचित उपयोग कर ऊंचनीच की भावना को दूर करना नहीं सीख लेते हमारे इस प्रकार के दम्भ का कोई मूल्य नहीं कि हम पूर्वकाल में कितने ज्ञान सम्पन्न थे।

Sunday, 13 August 2023

414 कुत्सित विचारों पर नियंत्रण कैसे हो ?


जब लोग भौतिक उपभोग की सामग्री के अंधाकर्षण से अपना सामान्य ज्ञान ही खो डालते हैं तो वे सीमित साधनों में ही असीमित आनन्द की तलाश करने लगते हैं और अस्थायी वस्तुओं को स्थायी समझने की भूल करने लगते हैं। इस प्रकार वे अपनी सभी जीवन्तता क्षय कर डालते हैं और यह भूल जाते हैं कि इस संसार की कोई वस्तु स्थायी नहीं है। कभी कभी तथाकथित पढ़े लिखे लोग कहते हैं कोई बात नहीं मैं इन वस्तुओं का पूरी तरह उपभोग नहीं कर पाऊंगा, परंतु मेरे पोते पोतियॉ तो कर सकेंगे। यह विचार अविद्यामाया के द्वारा प्रेरित होता है और इस अविद्या माया का सॉंकेतिक नाम है रावण।

रामायण में रावण का नाम आता है यह पौराणिक ग्रंथ है इतिहास नहीं, परंतु उसमें वर्णित शिक्षायें महत्वपूर्ण हैं। इसमें रावण को दस सिरों वाला दर्शाया गया है। यह मनुष्य के वहिर्मुखी स्वभाव को प्रदर्शित करता है जो विभिन्न दिशाओं में जड़ता की ओर ही सक्रिय रहता है। अर्थात् परमसत्ता के केन्द्र से बाहर की ओर सेन्ट्रीफ्यूगल बल से विक्षेपित बना रहता है। इस प्रकार जब मन आन्तरिक प्रवाह से भटककर आलस्य, द्वेष, लोभ या अन्य पतनोन्मुख बलों से जकड़ने लगता है तो कहा जाता है कि वह अपने आन्तरिक रावण के फंदे में फंस गया है।

मानव मन में सूक्ष्म और क्रूड दोनों प्रकार की प्रवृत्तियॉं होती हैं, सूक्ष्म प्रवृत्तियों का रुख अन्तर्मुखी और क्रूड प्रवृत्तियों का रुख वहिर्गामी होता है। कू्रड प्रवृत्तियॉं पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण, ऊर्ध्व और अधः इन छः प्रदिशाओं और ईशान, वायु, अग्नि और नैऋत्य इन चार अनुदिशाओं में अर्थात् सभी दशों दिशाओं में सक्रिय रहती हैं और ये इकाई जीव को सांसारिकता में ही फंसाये रखना चाहती हैं । यही क्रूड प्रवृत्तियॉं ही रावण के दस मुंह हैं। सूक्ष्म आन्तरिक प्रवृत्तियॉं आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर ले जाती हैं जो राम कहलाती  हैं। इस प्रकार प्रत्येक जीवधारी के पास राम और रावण होते हैं। राम और रावण का संघर्ष सबके जीवन में चलता रहता है रावण भौतिक जगत में उलझाये रखना चाहता है और राम आत्मोन्नति के रास्ते पर ले जाना चाहता है। अतः हमें प्रत्येक क्षण सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि रावण की प्रवृत्तियॉं धीरे धीरे अपना शिकार बनाती हैं। जैसे,  छात्र परीक्षा में नकल करने से पहले यह नहीं सोचता कि वह पकड़ा जा सकता है, चोर को चोरी करने के लिए जाने से पहले पकड़े जाने का भय नहीं लगता, समाजनेता अपने गलत कार्यों के प्रकाशित हो जाने का भय नहीं पालते आदि अनेक उदाहरण है जो रावण की प्रवृत्तियों को धीरे धीरे बढ़ाते हुए जीवन नष्ट करने के लिये कार्य करती हैं। इसलिये प्रारंभ से ही इनसे सतर्क रहना लाभदायी होता है, तभी राम की रावण पर विजय हो पाती है। इस दशमुखी रावण पर सरलता से विजय पाना संभव है यदि हम परमपुरुष की शरण में पूरे हृदयसे चले जायें। जब कभी भी रावणी वृत्ति का विचार आता है हम तत्काल उसे राम अर्थात् परमपुरुष की ओर मोड़ दें, रावण का तुरन्त अन्त हो जायेगा। परमपुरुष की सहायता के बिना दसमुखी रावण को परास्त करना बड़ा कठिन है।

Tuesday, 11 July 2023

413 जगत मिथ्या

 प्रश्न- कुछ विद्वान लोग कहते हैं कि यह संसार मिथ्या है! ये सब कुछ माया है! इसका क्या अर्थ है?

उत्तर- जिन विद्वानों ने जगत को मिथ्या कहा है वे यह तब कह पाये जब उन्होंने आत्मसाक्षात्कार कर लिया। उन्हांने इस अवस्था में अनुभव किया और यह कहा कि ‘ब्रह्म सत्यम जहद्मिथ्या‘ अर्थात् ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्या। इसे दर्शनशास्त्र में मायावाद कहा गया है।

आप तर्क दे सकते हैं कि जो स्पष्ट दिखाई दे रहा है, जिसके अस्तित्व का हम आप और सभी अनुभव करते हैं उसे मिथ्या कैसे कहा जा सकता है?

इसे समझने के पहले हमें ‘सत्य‘ की परिभाषा को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये तभी तो असत्य या मिथ्या को समझ सकेंगे।

सत्य माने जो जैसा है वैसा ही और मिथ्या माने जो अपने मूलस्वरूप से भिन्न हो वह। परन्तु ‘सत्य‘ अपरिवर्तनशील होता है, प्रत्येक स्थिति में एक सा एकरस। परंतु ‘असत्य या मिथ्या‘ परिवर्तनशील होता है। जो अपरिर्विर्तत रहता है उसे निर्पेक्ष सत्य और जो परिवर्तित होता है उसे सापेक्षिक सत्य कहते हैं।

यह ब्रह्मॉंड उस एक ही परमसत्ता के परम मन अर्थात् कास्मिक माइंड की विचार तरंगों के अलावा कुछ नहीं है अतः निर्पेक्ष या परमसत्य तो केवल परमपुरुष ही हैं अन्य सब का अस्तित्व उनके सापेक्ष ही है इसलिये यह जगत सापेक्षिक सत्य है परंतु अज्ञानवश हम इसे निर्पेक्ष सत्य मानकर उसके स्वाभाविक परिवर्तनों से प्रभावित होकर सुख दुख का अनुभव करते हैं और मैं मेरा तथा तू तेरा के चक्कर में पड़ जाते हैं।

परंतु अब आप कह सकते हैं कि विद्वानों ने तो इसे स्पष्टतः मिथ्या कहा है और ‘माया‘ अर्थात् इल्यूजन कहकर दूर रहने का संदेश बार बार दिया है।

ठीक है, श्रुति में माया का अर्थ क्या है? ‘ घातना अघातना पतीयसी माया‘ अर्थात् ‘‘जो है, वह न होने और जो नहीं है, उसे होने जैसा अनुभव कराती है‘‘ वह सत्ता माया कहलाती है। इस संसार में सभी कुछ निश्चित समय के लिये ही अस्तित्व में रह पाता है परंतु हमें अनुभव यही होता है कि यह सब हमारे साथ सदा ही रहेगा यही भ्रम माया के नाम से जाना जाता है।

इसीलिये तो निर्पेक्ष अवस्था का अनुभव करने वाले महापुरुष इसे मिथ्या कहने लगते हैं। जगत को दार्शनिकगण ‘सापेक्षिक सत्य‘ कहते हैं जो विद्यामाया और अविद्या माया के द्वारा अपना अस्तित्व बनाये रखता है। यह वैसा ही है जैसे वृत्ताकार गति करने वाले किसी पिंड पर संतुलन बनाये रखने के लिये तुरंत दो बल सक्रिय हो जाते हैं एक केन्द्र की ओर अर्थात् सेन्ट्रीपीटल और दूसरा केन्द्र के बाहर की ओर अर्थात् सेन्ट्रीफ्यूगल। ब्रह्मॉंड के केन्द्र में परमपुरुष की ओर विद्यामाया और बाहर की ओर अविद्यामाया सक्रिय रहती है। हमें यह अष्ट पाशों (भय, लज्जा, घृणा, शंका, कुल, शील, मान और जुगुप्सा ये अष्ट पाश )और षडरिपुओं ( काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, और मात्सर्य ये षडरिपु)के जाल में उलझाकर अपने अस्तित्व को बनाये रखती है। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य इन आठों बंधनों और छहों शत्रुओं से लगातार संघर्ष करते हुए अपने मूल स्वरूप अर्थात् केन्द्र स्थित परमपुरुष की ओर लौट जाना है जहॉं से कभी हम उनकी विचार तरंगों के रूप में अर्थात् ब्रह्म चक्र में आये और सूक्ष्म से स्थूल और स्थूल से सूक्ष्म रूपों में लगातार चक्कर लगा रहे हैं। इकाई चेतना का उच्चतम स्तर सूक्ष्म है अतः उस ओर जाने से रोकने वाला शत्रु हुआ। अष्ट पाश का अर्थ है आठ बंधन, बंधनों में बंधा हुआ कोई भी व्यक्ति अपनी गति खो देता है। स्रष्टि में हम देखते हैं कि मानव की गति स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है परंतु अष्ट पाश जैसे लज्जा घृणा और भय आदि स्थूलता से जकड़े रहने के कारण सूक्ष्मता की ओर जाने से रोके रहते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि जब इतने प्रबल शत्रु और बंधन सब के साथ हैं तो उन से कहॉं तक संघर्ष किया जाये? अपने मूलस्वरूप में वापस हो पाना संभव ही नहीं है?

बात सही है अतः इन से किया जाने वाला यही संघर्ष ही साधना करना या पूजा करना कहलाता है। अविद्या माया, विरोधात्मक बल उपरोक्त प्रकार से लगाती अवश्य है परंतु वह हमारी आध्यात्मिक अग्रगति में सहायता करने के लिये ही यह करती है। जैसे, धरती पर चलते समय घर्षण बल हमारी गति का विरोध करता है परंतु जब हम फिर भी आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं तो यही सहायक बन जाता है, यदि यह विरोध न हो तो हम आगे चल ही नहीं सकते। चिकने तल पर आप नहीं चल पाते क्यों?

तो क्या इससे हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि विद्यामाया का ही सहारा लेना चाहिये और अविद्यामाया से दूर रहना चाहिये?

नहीं, केवल एक किसी के सहारे हमें अपने संघर्ष में सफलता नहीं मिल सकती । हमें सम्यक रूपसे अविद्यामाया की मदद लेते हुए विद्यामाया का साथ देना चाहिये। यदि आप केवल विद्या की उपासना करेंगे तो जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें भोजन वस्त्र आवास आदि कौन जुटायेगा? इन्हें आवश्यकतानुसार प्राप्त करने के लिये ही अविद्या का सहारा लेना पड़ता है । यदि केवल अविद्या की उपासना करेंगे तो यहीं फंसे रहेंगे । श्रुतियों में कहा गया है ‘‘ अंधं तमः प्रविश्यन्ति ये अविद्यामुपासते, ततो भूय ऐव ते तमो य उ विद्यायांरताः ।‘‘ अर्थात् जो केवल अविद्या की उपासना करते हैं वे अंधे कुए में ही अपने को फेकते हैं और जो केवल विद्या की उपासना करते हैं वे उससे भी अधिक गहरे अंधे कुए में अपने को फेक देते हैं। अतः स्पष्ट है कि सम्यक अविद्या का उपयोग कर विद्या की उपासना करने से ही हम अपनी आध्यात्मिक प्रगति कर सकते हैं। इसलिये यह जगत मिथ्या नहीं सापेक्षिक सत्य है।

Thursday, 22 June 2023

412 स्वर्ग और नर्क का मनोवैज्ञानिक, योगवैज्ञानिक और आधुनिक वैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण

कुछ विद्वानों ने  स्वर्ग और नर्क के भी अनेक स्तरों का वर्णन किया है और कहा है कि जघन्य पाप करने वाले ‘रसातल‘ को जाते हैं और अच्छे कर्म करने वाले स्वर्ग को। परन्तु इनके भौतिक अस्तित्व को मनोविज्ञान, योग और आधुनिक विज्ञान के आधार पर समझाया जा सकता हो तभी मान्य किया जाना चाहिए।

वास्तव में, मन की अपरिपक्व अवस्था ही नर्क का आधार होती है और इसी अपरिपक्वता के स्तर को उसकी गहनता के आधार पर सात स्तरों में समझाया गया है जिन्हें तल, अतल, वितल, तलातल, पाताल, अतिपाताल, और रसातल नाम दिये गये हैं। अविद्या की उपासना करने वाले या घोर पाप कर्म से जुड़े व्यक्ति से कहा जाता है कि रसातल के अंधकार में  जाओगे, इसका मतलब यही है मन का स्तर इतना निम्न हो जायेगा  कि वह ज्ञान का प्रकाश  नहीं पा सकेगा अतः अंधकार में रहेगा, मन की निम्नतम (crudest state of mind)  अवस्था में पड़ा रहेगा । इसी तरह उन्नत मन की उच्चतर अवस्थाओं को महः ,जनः ,तपः और सत्यम कहा गया है। सत्यम और हिरण्यमय कोश एक ही हैं । हिरण्यमय का अर्थ है स्वर्णमय , सोने जैसा । योग और विद्यातन्त्र में यह स्वीकार किया गया है कि परमपुरुष हिरण्यमय कोश  के पर्दे के पीछे रहते हैं। यथार्थता यह है कि जब साधना के द्वारा मन को इतना पवित्र और स्वच्छ कर लिया जाता है कि उसमें किसी भी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं हो सकता हो तो वह स्वर्ण की भॉंति कॉंतिमान लगता है और परमसत्ता का पूर्णतः  परावर्तन उसमें होने लगता है और फिर इकाई मन और भूमा मन अर्थात् परमपुरुष के मन में कोई अन्तर नहीं रहता यह अवस्था आत्मसाक्षात्कार कहलाती है।  इसलिये कर्मों के अनुसार ही मन की विभिन्न अवस्थायें होती रहतीं हैं इसलिये कोई भी व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्थाओं के अनुसार एक ही दिन में अनेक बार स्वर्ग और नर्क की यात्रा करता रह सकता है। इसलिये विद्यातंत्र वह विधि समझाता है जिससे हमेशा  ब्रह्मभाव में मन को बनाये रखने पर वह स्वर्ग और नर्क दोनों से ऊपर रहने लगता और क्रमशः  परमपुरुष के निकट होता जाता है।

 आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मनोमय कोश  को अवचेतन मन (subconscious mind) कहते हैं। यह विज्ञान कहता है कि अवचेतन मन में हमारे भूतकाल के अनेक जन्मों और वर्तमान की सभी स्मृतियों का संग्रह होता है। बिना अवचेतन मन के हम कुछ भी अच्छा नहीं कर सकते क्योंकि सभी ज्ञान और स्मृति इसी में केन्द्रित रहते हैं। मनोविज्ञान में मन के केवल तीन स्तर माने गये हैं चेतन (conscious) अवचेतन (subconscious) और अचेतन (unconscious) जबकि योग विज्ञान में अचेतन को भी तीन और स्तरों में बॉंटा गया है अतिमानस, विज्ञानमय और हिरण्यमय, जो मन की क्रमानुसार अत्यन्त कम आवृत्तियों की सूचक हैं। अतिमानस पराज्ञान, विज्ञानमय पराशक्तियों  और हिरण्यमय परम उपलब्धियों  का क्षेत्र है। 

आधुनिक विज्ञान के अनुसार प्रत्येक अस्तित्व की मूल आवृत्ति (fundamental frequency) होती है और यह जड़ता (crudity)  की ओर अधिक और सूक्ष्मता (subtlety) की ओर कम होती जाती है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि मन की आवृत्ति का अत्यधिक बढ़ जाना जड़ता अर्थात् पर्वत या पत्थर हो जाना या नर्क की ओर जाना, और आवृत्ति का लगभग शून्य  हो जाना अर्थात् स्वयं को जान लेना या परमात्मा अर्थात् स्वर्ग को पा लेना ही है। परमात्मा की तरंगदैर्घ्य  (wave length) अनन्त कही गई है अर्थात् आवृत्ति शून्य  अर्थात् हिरण्यमय कोश । योग का व्यावहारिक ज्ञान और विद्यातंत्र की व्यावहारिक विधियॉं अतिमानस, विज्ञानमय और हिरण्यमय क्षेत्रों की यात्रा कराते हुए अन्त में परमात्मा से एकाकार करा देती हैं जो मानव मात्र के जीवन का लक्ष्य है।


Thursday, 15 June 2023

411स्वर्ग और नर्क क्या हैं?

 

अनेक धर्मों में यह कहा गया है कि मरने के बाद कर्मानुसार स्वर्ग या नर्क में रहना पड़ता है अर्थात् ये स्थान पृथ्वी से भिन्न कहीं अन्यत्र माने गये हैं। परंतु ‘आनन्दसूत्रम् में कहा गया है कि ‘‘न स्वर्गो न रसातलः’’।

अतः यदि इसे इस प्रकार कहें कि सब कुछ तो परमपुरुष की ही रचना है तो स्वर्ग और नर्क दोनों के स्वामी वही हुए।  उपनिषदों में भी कहा गया है - ‘‘उतामृतस्येशानो  = उत + अमृत+  ईशान‘‘। उतः का अर्थ है नर्क , अमृतस्य का अर्थ है स्वर्ग,  ईशानः का अर्थ है स्वामी या नियंत्रण करने वाला । अतः यदि उन परमपुरुष का ही आश्रय लिये रहें तो स्वर्ग हो या नर्क वह भी साथ साथ ही रहेंगे कि नहीं? 

परंतु क्रूर सच्चाई यह है कि स्वर्ग और नर्क कोई ऐसी जगहें नहीं हैं जो कि पृथ्वी के ऊपर या नीचे हों । ये, इकाई मन अर्थात् मानव मन की विभिन्न पॉंच पर्तें हैं दार्शनिक  इन्हें कोश  या लोक कहते हैं। इनके नाम हैं , अन्नमय या काममय, मनोमय, अतिमानस, विज्ञानमय और हिरण्यमय। ये पॉंचों भूलोक और सत्यलोक के बीच मानी गईं हैं, भूलोक अर्थात् पृथ्वी पर मनुष्य और सत्यलोक पर परमपुरुष का आधिपत्य माना गया है परंतु ये सभी एक ही परमपुरुष के मन (cosmic mind)    के भीतर ही हैं क्योंकि उपनिषदों में कहा गया है कि ‘‘ सर्वं खल्विदम् ब्रह्म‘‘ अर्थात् यह सबकुछ उन परमब्रह्म की ही विचार तरंगें हैं। निर्पेक्ष रूप से इन्हें क्रमशः  भूः, भुवः, स्वः महः जनः तपः और सत्यम कहा जाता है। पुनः स्पष्ट किया जाता है कि यह सब पृथक पृथक स्थान नहीं हैं वरन् वैज्ञानिक आधार पर परमपुरुष की सगुणावस्था में भूमा मन (cosmic mind )  की विभिन्न विचार तरंगों के समूह (wave pattern) माने जाते हैं। भूलोक में भौतिक जगत और उसमें होने वाली सभी गतिविधियॉं आती हैं, मनुष्य, पशु , वनस्पति , ठोस, द्रव आदि इसी लोक की वस्तुएं हैं। भुवः लोक में वे सभी निर्माणाधीन अस्तित्व आते हैं जिन्होंने कोई आकार या रूप अब तक धारण नहीं किया है अर्थात् पदार्थ की चतुर्थ अवस्था जिसे ‘प्लाज्मा स्टेट‘ कहते हैं, को इसके अन्तर्गत माना जाता है। स्वःलोक, सूक्ष्म मन या मानसिक संसार या मनोमय कोश  कहलाता है, यहीं पर सुख या दुख की अनुभूति होती है इसीलिये मनुष्य इसे स्वर्ग लोक कहने लगे  (स्वः + ग = स्वर्ग )। जब किसी मनुष्य को अपने शुभ किये गये कार्य से संतुष्ठि होती है तो उसे जो आनन्दानुभूति होती है वही स्वर्ग है और अनुचित कार्य करने वाले का असंतुष्ठ मन हमेशा  दुख का अनुभव करता है यह उसके लिये नर्क हो जाता है। इसलिये स्वर्ग और नर्क केवल मन की अवस्थायें हैं और वे इसी भौतिक जगत में ही हैं कहीं अन्य स्थान पर नहीं। यह मनोमय कोश  ही है जो आपके साथ ही रहता है अतः स्वर्ग लोक हमेशा  आपके साथ ही है और आप यदि कल्याणकारक कार्य से जुड़े हैं तो आप साधारण व्यक्ति से असाधारण व्यक्ति के रूप में स्वर्ग में ही हैं अन्यथा की स्थिति में नर्क में। इसलिये वे लोग भले ही पंडित कहलाते हों या नहीं, यदि स्वर्ग और नर्क की कहानियॉं सुनाकर उनके  अलग स्थान पर होने की शिक्षा देते हैं तो वे भ्रामकता की ओर ले जाते हैं।


410 पृथकता विरुद्ध एकता।


वह परमसत्ता केवल एक ही है। दार्शनिकों ने उसे अपने अपने ढंग से समझाने के लिए अनेक दार्शनिक नाम दिये हैं जैसे, परमब्रह्म, परमपुरुष आदि। स्वयंभू का अर्थ है केवल ‘‘स्वयं होना’’ अर्थात् स्वयं अस्तित्व में आना। इसलिए सभी कुछ जो हम देख पाते हैं और नहीं देख पाते, उनके मन में ही हैं अतः वे निर्पेक्ष हैं और पूरा ब्रह्मांण्ड सापेक्ष।

जैसे, हमारा शरीर हमारे मन का ही विस्तार है उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत, गेलेक्सीज, ब्लेकहोल सहित पूरा ब्रह्माण्ड और स्पेस, टाइम आदि सब उनके मन का ही विस्तार है। हमें यह जानकर अजीब लगता है क्योंकि हम सभी उन्हें अपने से पृथक मानते हैं जबकि हम सब उन्हीं के मन में हैं। इसीलिए  उपनिषदें बार बार उनसे अपनी पृथकता को भूलकर अपने ही हृदय में अनुभव करने की विधियों का पालन करने का मार्गदर्शन करती है।

जब तक हम अपने को उनसे पृथक मानते रहेंगे हम उस अमरत्व को अनुभव नहीं कर सकते। समुद्र के किनारे पर बैठकर समुद्र की गहराई का अनुभव नहीं किया जा सकता उसमें डूबना ही पड़ता है। इस तरह जब हम समुद्र के साथ अपनी एकता स्थापित कर लेते हैं तब हमें समुद्र क्या है यह अनुभूति हो जाती है। वास्तव में लोगों को पौराणिक कहानियों ने भ्रमित कर रखा है। हमें अपने तर्क, विज्ञान और विवेक का उपयोग करना चाहिए।



Thursday, 8 June 2023

409 जिसे केवल बिग बेंग कहा जाता है उसे उपनिषदों इस प्रकार समझाया गया है-

 

जो व्यष्टि भाव में जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएं कहलाती हैं वही समष्टि भाव में क्रमशः क्षीरसागर, गर्भोदक और कारणार्णव कहलाती हैं।

इन तीनों अवस्थाओं के व्यष्टिभाव में जो बीज होता है वह क्रमशः विश्व, तैजस और प्राज्ञ कहलाता है यही समष्टिभाव में क्रमशः विराट, हिरण्यगर्भ और सूत्रेश्वर कहलाता है।

कहा गया है कि तुरीयावस्था में जहॉं सूत्रेश्वर भी लुप्त रहता है, वह परमसत्ता निस्प्रह, और निष्काम सुसुप्तावस्था में होता है। परन्तु प्रकृति के आलोडन से जब उनमें अस्मिता का बोध होता है तो एक से अनेक होने की भावना से कारणार्णव यानी सुसुप्तावस्था से गर्भोदक अर्थात् स्वप्नावस्था में आकर हिरण्यगर्भ का बीजारोपण होता है और जाग्रद अवस्था में यही क्षीरसागर में ( स्थूलावस्था में)  विश्व रूप में अस्तित्व पाता है। इसे पुराणों में विष्णु का स्वप्न कहा गया है।

आधुनिक वैज्ञानिक केवल बिग बेंग का नाम लेकर इस विश्व को अचानक ही अस्तित्व में आ जाना कहते हैं। वे टाइम और स्पेस के निर्माण अथवा वायु,ऊष्मा, थल और जल के निर्माण बारे में स्पष्टतः कुछ नहीं कहते परन्तु उपनिषद स्पष्टतः  कहते हैं कि -

कारणार्णव से गर्भोदक की अवधि में वह परमसत्ता अपनी शिवानी शक्ति के उपयोग से, बिना किसी वक्रता के अनन्त तरंग लंबाई की ऊर्जा को प्रसारित करते हैं जो आधार का कार्य करता है (जिसे हम आज स्पेस कहते हैं।) इस शिवानी का संवेग जब कुछ धीमा होने लगता है तो भैरवी शक्ति से पूर्वोक्त तरंगों में वक्रता उत्पन्न होने लगती है जो कला कहलाती है और यहीं से ‘काल अर्थात् टाइम’ अस्तित्व में आता है। वक्रता के क्रमशः बढ़ने पर स्पेस और टाइम आपस में और अधिक द्रढ़ता लाकर नए स्तर को बनाते हैं जहॉं भैरवी, भवानी शक्ति में परिवर्तित होकर इस दृश्य प्रपंच भौतिक जगत का निर्माण क्रमशः करती रहती है । कारणार्णव से क्षीरसागर तक की यात्रा का क्रम ‘संचर धारा’ और फिर क्षीरसागर से पुनः कारणार्णव तक वापस जाने की प्रक्रिया को ‘प्रतिसंचर’ कहा गया है।

स्पष्ट है कि हमारे पास यह ज्ञान हजारों वर्ष से सो रहा है और हम केवल दंभ भरते रहे हैं कि हमारे ऋषियों ने यह खोजा वह खोजा ।

यदि तथाकथित पंडितों ने यथासमय इसे ढंग से समझा और समझाया होता तो आज हमारा ज्ञान विज्ञान कितने उच्च स्तर पर होता यह कहने की आवश्यकता नहीं है। मेरा निवेदन है कि केवल यह कहकर कि ‘‘हमारी उपनिषदों में तो यह बहुत पहले से लिखा है जो वैज्ञानिक आज खोज रहे हैं’’ काम नहीं चलेगा, आवश्यकता है इस पर तर्क, विज्ञान और विवेक पूर्ण चिंतन करते हुए उसे नए आयाम देना। इसके लिए सभी प्रबुद्धों को एकसाथ आकर शोध करना होगा, समय की यही मांग है।