Wednesday, 12 November 2014

3.3 अवधारणायें

3.3  अवधारणायें

1. जब किसी अपूर्ण या छुद्र वस्तु के लिये आकर्षण होता है तो उसे "काम'' कहते हैं। और जब यही आकर्षण केवल पूर्ण अस्तित्व के लिये अर्थात् परमपुरुष के लिये हो तो उसे "प्रेम" कहते हैं। जैसे धन, परिवार, भूमि आदि का आकर्षण "काम" कहलायेगा। "काम" के समय मानसिक प्रवृत्ति अर्थात् आकर्षण के समय मानसिक प्रवृत्ति को संस्कृत में 'आसक्ति' और परमपुरुष के प्रति आकर्षण को संस्कृत में 'भक्ति' कहते हैं। " काम " के बीच पारस्परिक संबंध (अर्थात् अपूर्ण वस्तुओं के बीच आकर्षण के समय) 'व्यवसाय' कहलाता है। जैसे पाॅंच रुपया दो और नमक ले लो। और, प्रेम अर्थात् ईश्वरीय  आकर्षण में इस भाव को ‘सेवा' कहते हैं। सेवा में भावना यह होती है कि सब कुछ ले लो पर बदले में कुछ नहीं चाहिये। यह भय युक्त प्रेम से प्रारंभ होती है और भय रहित प्रेम में समाप्त होती है और भययुक्त प्रेम को भयरहित प्रेम में रूपान्तरण करने की प्रक्रिया 'साधना' कहलाती है।

2. आनन्द मार्ग (path of bliss) में ईश्वर प्रणिधान को जप क्रिया नहीं माना गया है। इसे प्रणिधान कहते हैं जो कि ध्यान की परिधि में आता है न कि जप। पहला है प्रणिधान और दूसरा है अनुध्यान। ध्यान के वृहद चक्र में दो क्रियाएं होती हैं, धारणा और ध्यान। जब आप किसी वाह्य वस्तु को मानसिक संसार में पकड़ कर रखना चाहते हैं तो उसे धारणा कहते हैं। इसलिये धारणा में स्थिर बल होता है, उसका उद्गम स्थाई होता है। और जब कोई वस्तु चल रही हो और उसकी गति में आपने उसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया है तो उसे ध्यान कहेंगे। इसलिये ध्यान में गतिशील बल होता है। ध्यान क्रिया शीरे के धागे के समान होती है। जब शीरा को उड़ेला जाता है तो धागा निर्मित होता है, वहां बल है, गति है, परंतु धागा कुछ स्थिर सा दिखाई देता है। तो यही है ध्यान क्रिया ।

अनुध्यान और प्रणिधान दोनों ध्यान की परिधि में आते हैं। अभिध्यान का अर्थ है कि आपने उस "परम मैं " अर्थात्  ¼supreme self½   को अपना ध्येय मान लिया है; परंतु मानलो प्रभु तुम्हें नहीं चाहते कि उन्हें पाओ तो वह तुम से दूर जाना चाहेंगे, परंतु तुम्हें मानसिक रूप से उनके पीछे पीछे दौड़ना होगा। यह पीछे पीछे दौड़ना ही अनुध्यान कहलाता है। तुम्हें कहना चाहिये , प्रभो! मैं पापी हो सकता हूँ  पर मैं आपका पीछा नहीं छोड़ूॅंगा। मैं तुम्हें पकड़कर ही चैन लूॅंगा। जब यह मानसिकता कार्य करती है तब अनुध्यान होता है और बिना अनुध्यान के कोई भी उन्हे नहीं पा सकता।

3. योजनात् तत्वभावात्। तत् माने "वह" और त्व प्रत्यय जोड़ने पर वह भाववाचक होकर अर्थ देता है "वहपन" ¼ thatness ½। अर्थात् कुछ उसके संबंध में। यहाॅं वह का अर्थ है ब्रह्म। परमपुरुष अर्थात् संज्ञानात्मक सत्ता पुल्लिंग और परमाप्रकृति अर्थात् क्रियात्मक सत्ता स्त्रीलिंग तथा ब्रह्म उभयलिंग हैं। "वहपन" का अर्थ हुआ ब्रह्मतत्वभावात् से संबंधित। अर्थात् किसी भौतिक कार्य को करते समय तुम्हें उसमें ब्रह्मपन करने का भाव अपने मन में लाना होगा। या कुछ भी सोचने के समय अपने मानसिक विषय में ब्रह्मपन आरोपित करना होगा। इसी को तत्वभावात् कहते हैं। योजनात् तत्वभावात् का अर्थ हुआ अनुध्यान। योजनात् का फल क्या होगा आप उनसे जुड़ जावेंगे। उनके साथ एक हो जावेंगे। तस्यभिध्यानात् योजनात् तत्वभावात्, भूयास्चान्ते विष्णुमाया निवृत्तिः। अर्थात् आप विष्णुमाया से मुक्त हो जावेंगे।
आप देखते हैं कि इस प्रकार माया किसी एक प्रकार की कला में विष्णुमाया, अन्य किसी में योगमाया, महामाया और अनुमाया कहलाती है। इन सभी का संयुक्त नाम विष्णुमाया है। यही कारण है कि प्रत्येक कार्य और विचार में ध्यान, अनुध्यान और प्रणिधान के द्वारा ब्रह्मपन जोड़ने से आप माया से मुक्त हो जावेंगे। इसलिये साधक की साधना करने का अर्थ है तत्वभाव, प्रणिधान, अनुध्यान और अंत में योजनात् करना। इस प्रकार से मुक्ति पायी जा सकती है और वह आत्मिक स्तर पर ही संभव है भौतिक और ज्ञान के स्तर पर नहीं।

4. मानव मन की अनेक प्रवृत्तियाॅं होती हैं उनमें मुख्य पचास हैं। उनके बीच बहुतायत उपप्रवृत्तियाॅं हैं। भौतिक जगत की ओर ले जाने वाली उपप्रवृत्तियाॅं और परमात्मा की ओर ले जाने वाली मुख्य प्रवृत्तियाॅं कहलाती है। परमात्मा की ओर ले जाने वाली प्रवृत्तियाॅं संवित शक्ति के द्वारा जाग्रत होती हैं। जैसे कोई नाम पद प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहा है, अचानक उसकी चेतना में विचार आता है कि मैं क्या कर रहा हूँ , कहाॅं भाग रहा हूॅं , और अपनी दयनीय दशा  पर सोचने लगता है। इसे संवित शक्ति कहते हैं। मुख्य प्रवृत्तियों को संवित शक्ति  जाग्रत करती है, और व्यक्ति आध्यात्म के मार्ग पर चल पड़ता है।
प्रवृत्तियों का चार भागों में विभाजन किया गया है, क्लिष्ट, अक्लिष्ट, क्लिष्टाक्लिष्ट, और अक्लिष्टाक्लिष्ट। जिन प्रवृत्तियों से प्रारंभ और अंत दोनों में कष्ट हो वे क्लिष्ट। जैसे कोई ट्रेन में बिना टिकिट यात्रा करे ट्रेन में खूब भीड़ हो और बाद में टीटीई की चेकिंग में पकड़ा जावे तो प्रारंभ में और अंत दोनों में कष्ट हुआ। जिस प्रवृत्ति में पहले तो सुख हो पर बाद में कष्ट हो उसे अक्ल्ष्टिाक्लिष्ट कहते हैं। मानलो कोई सेकेंड क्लास का टिकिट लेकर स्लीपर में यात्रा करे तो यात्रा सुखदायक हो रही है पर चेकिंग स्टाफ के आ जाने पर कष्टदायी स्थिति आ गई इसे कहेंगे अक्लिष्टाक्लिष्ट। जब पहले  कष्ट हो और बाद में सुख हो तो इसे कहते हैं क्लिष्टाक्लिष्ट जैसे, पढ़ने वाला विद्यार्थी सुखों और खेलकूद को त्यागकर अपना अध्ययन करके कष्ट पाता है परंतु रिजल्ट आने पर जब वह मेरिट में आता है तो आनन्दित होता है, इसे कहेंगे क्लिष्टाक्लिष्ट। जब न तो प्रारंभ में कष्ट हो और न अंत में तब उसे अक्लिष्ट प्रवृत्ति कहते हैं यह भक्ति की ओर ले जाती है। अक्लिष्टा ही मुख्यप्रवृत्ति कहलाती है अन्य सभी सहायक प्रवृत्तियाॅ। भक्ति, साधना नहीं है वरन् साधना की उपलब्धि है।

5. मन की पचास वृत्तियाॅ (fifty Occupations Of The Mind)

 धर्म dharma (psycho-spiritual longing) अर्थ artha (psychic longing )काम kam (physical longing), मोक्ष mokśa (spiritual longing),अवज्ञा avajiá (belittlement of others),मूर्छा múrcchá (psychic stupor, lack of common sense), प्रश्रय prashraya (indulgence),अविश्वाश  avishvása (lack of confidence), सर्वनाश sarvanásha (thought of sure annihilation), क्रूरता  kruratá (cruelty),पिशूनता lajjá (shyness, shame), ईर्ष्या   pishunatá (sadistic tendency),सुसुप्तिsuśupti (staticity, sleepiness), विषाद viśáda (melancholia)  कषाय kaśáya(peevishness),  तृष्णा trśńá (yearning for acquisition), मोह moha (infatuation), घृणा ghrna (hatred,revulsion), भय bhaya (fear), आशा  asha (hope), चिन्ता cinta (worry), चेष्टा cesta (effort), ममता mamata (mineness)दम्भ dambha (vanity),विवेक viveka (conscience), विकलता vikalata (mental numbness due to fear),अहंकार ahamkara (ego),लोलुपता   lolupta (avarice),कपटता kapatata (hypocrisy),
 वितर्क vitarka (argumentativeness to the point of wild exaggeration) अनुताप anutapa (repentance),
 षड़ज śad́aja (sound of peacock), ऋषभ rśabha (sound of bull), गाॅंधार gándhára (sound of goat), मध्यमा madhyama (sound of deer),पॅंचम paiṋcama (sound of cuckoo), धैवत्य dhaevata (sound of donkey), निषाद niśáda (sound of elephant),ओंम oṋm (acoustic root of creation), हुम्   hum (sound of arousing kulakuńd́alinii), फट्  phat́ (putting theory into practice),   वोषट् vaośat́ (expression of mundane knowledge)
 वषट् vaśat́ (welfare in subtler sphere),स्वाहा svaha (performing noble actions), विष vis'a (repulsive expression),
 अमृत amrta (sweetness in expression), अपरा  apara (mundane knowledge)...और पचासवीं वृत्ति जो कि एक आध्यात्मिक साधक को हमेशा  जानना चाहिये वह है  परा   para (spiritual knowledge)

6. प्रेम क्या है। वह, जो मन को कोमल, द्रढ़ और सहलशील बनाता है, कितनी ही कष्टदायी स्थिति हो मन संतुलित रहकर भीतर ही भीतर स्थिर आनन्द का अनुभव कराता रहे प्रेम कहलाता है। भक्ति और प्रेम बिलकुल एक समान हैं, वे अपरिवर्तनीय रूप से जुड़े हुये है। जिस क्षण भक्ति उदित होती है ईश्वर  से प्रेम हो जाता है।

7. भक्ति आनन्द का अवतार है, और आनन्द क्या है? जहाॅं दुख और सुख एकसमान प्रभाव डालते हैं वह अवस्था आनन्द की अवस्था कहलाती है। चाहे मूल प्रवृत्तियाॅं हों या सहायक वे संबंधित व्यक्ति के जीवन का अंग होती हैं। जो धन के पुजारी हैं यदि अचानक पूरा धन समाप्त हो जावे तो क्या वे जीवित रह पायेंगे? वे धन का नुकसान होने से मर जावेंगे। इसी प्रकार नाम यश  और प्रतिष्ठा के पुजारी इन पर आघात पहुंचते ही आत्महत्या करने को
तैयार हो जावेंगे। इसी प्रकार भक्त का जीवन भक्ति है। भक्ति की समाप्ति उसके जीवन की समाप्ति है। इसलिये भक्त हमेशा  परमपुरुष से और कुछ नहीं परमाभक्ति माॅंगता है। वे साधक जो आनन्द प्राप्ति के लिये ईश्वर  को
चाहते हैं बलवान हो सकते हैं पर महान नहीं। वही भक्त महान कोटि में रखे जाते हैं तो स्वयं भी आनन्दित हों और परमात्मा को भी अपनी सेवा से आनन्द पहुॅंचायें। भक्त समाज सेवा करते हैं क्योंकि वे अपने आंतरिक हृदय में जानते हैं कि यह संसार परमात्मा का ही विस्तार है और प्रत्येक सृष्ट  प्राणी उसका वंशज है। यदि कोई मानव सेवा करता है तो वह परमात्मा को प्रसन्न करने के वराबर है। साधक साधना इसलिये करता है क्योंकि परमात्मा ऐसा चाहते हैं। परमात्मा को प्रसन्न करने के लिये जिनका प्रत्येक कार्य होता है वे गोप कहलाते हैं। गोपायते यः सः गोपाः। परमात्मा को प्रसन्न करने के लिये किया गया कार्य भक्ति कहलाता है। जो संसार की सेवा इस धारणा से करता है कि वह यह सब अपने सामथ्र्य से कर रहा है तो संस्कारों के कारण पहले उसे अहंकार हो जाता है पर ज्योंही संस्कार क्षय हो जाते हैं वह पूछता है कि इस कार्य के लिये उसे किसने शक्ति दी? क्या ये उसकी अपनी ताकत है? अच्छे से अच्छा पहलवान भी कुछ दिन भूखा रहने से कमजोर पड़ जाता है , बोल भी नहीं पाता। एक सप्ताह तक भूखा रखने पर ज्ञानी का ज्ञान धरा रह जाता है। निष्कर्ष यह कि ज्ञान, बल, बुद्धि, क्षमता सबकुछ उसी पर निर्भर होते हैं मनुष्य के पास इन पर घमंड करने के लिये कुछ नहीं है। जिस क्षण उसे यह आभास हो जाता है वह भक्ति मार्ग पर चलकर अनुभव करता है कि सबकुछ परमात्मा की इच्छा से उसके माध्यम से हो रहा है, सच्चे भक्त की यही पहचान है।

8. क्रीडा और लीला में सूक्ष्म अंतर है। जब किसी घटना के कारण की पहचान सरलता से हो जावे तो वह क्रीडा कहलाती है और जब किसी घटना का होना तो दिखाई दे पर कारण समझ के बाहर हो तो उसे लीला कहते हैं। यह सृष्टि  परमपुरुष की लीला है क्योंकि मनुष्य नहीं जान पाता कि इसको क्यों बनाया गया है। अपनी बुद्धि से वे इसके कारण को जानने का प्रयास करते हें पर क्या वे जान पाते हैं? इसलिये इसे परम पुरुष की क्रीडा नहीं लीला कहा जाता है। मनुष्य के पास थोड़ी सी बुद्धि है अतः वह इस सृष्टि  का कारण नहीं जान पाता इसलिये उसे यह लीला कहना होगा पर परमपुरुष इसके कारण को जानते हैं अतः उनके लिये यह क्रीडा ही है।

9. दीक्षा क्या है? दीपज्ञानम यतो दद्यात् कुर्यात् पापक्षयम, तस्मात्दीक्षेति सा प्रोक्ता सर्वतंत्रस्य सम्मता। अर्थात् अनेक जन्मों के संस्कारों को क्षय कर जो विधि ईश्वरत्व  की ओर बढ़ने की व्यावहारिक क्रिया सिखाती है उसे दीक्षा कहते हैं। सामान्यतः दो प्रकार की दीक्षायें प्रचलित हैं वैदिक और तान्त्रिक। वैदिक विधि की दीक्षा साधक को सही धर्म को चुनने और परमब्रह्म की ओर जाने का रास्ता बताती है, इसमें अनेक वैदिक श्लोक  प्रयुक्त होते हैं। तान्त्रिकी विधि में सही रास्ते पर चलने की व्यावहारिक विधि योग्यताधारक गुरु सिखाता है जो जड़ता से मुक्त कर इष्ट से मिलने का रास्ता स्वयं समझाता है। वैदिक दीक्षा को शुद्धीकरण की विधि कह सकते हैं दीक्षा नहीं, सही अर्थों में तांत्रिक दीक्षा ही सही होती है क्योंकि उसमें आवश्यक  दीक्षा के घटकों जैसे दीपनी, मंत्र,
मंत्रचैतन्य और अभिषेक आदि का समावेश  होता है। इस प्रकार यदि सही गुरु से दीक्षा लेकर साधक ईमानदारी, नियमितता और समर्पण से साधना करता है तो वह माया के विरुद्ध अपने संग्राम में सफल हो जाता है और आत्मसाक्षात्कार करता है।

10.  यज्ञ क्या है? इसका अर्थ है कृतज्ञता पूर्वक किया गया कर्म। यह चार प्रकार से किया जाता है, भूतयज्ञ, नृ यज्ञ, पितृयज्ञ और आध्यात्म यज्ञ। भूत का अर्थ है इस संसार में जो भी जिस भी रूप में आया है वह अर्थात्( all created beings) अतः उन सबके लिये निर्पेक्ष भाव से की गयी सेवायें भूतयज्ञ के अंतर्गत आती हैं, जैसे पौधों को पानी देना, पशुओं का पालन करना, वैज्ञानिक शोध कार्य करना और समाज कल्याण के लिये, सबकी भलाई के लिये उनका उपयोग करना। नृयज्ञ वह कार्य है जो मनुष्यों की भलाई के लिये किया जाता हैं यर्थातः यह भूतयज्ञ का ही भाग है क्योंकि मनुष्य भी created being ही हैं। पितृयज्ञ का अर्थ है अपने पूर्वजों और ऋषियों को याद करना और कृतज्ञता ज्ञापित करना। जब तक कोई व्यक्ति भौतिक शरीर में रहता है वह अपने पूर्वजों का ऋणी रहता है। ऋषि वे हैं जो समाज की भलाई के लिये नये अनुसंधान कर अनेेक प्रकार से मदद कर रहे हैं या की है तथा वे जो संयमपूर्वक प्राप्त ज्ञान से अपनी मुक्ति स्वयं करने का कार्य कर रहे हैं और समाज को भी लाभान्वित कर रहे हैं ऐंसे ऋषियों का ऋण भी समाज के ऊपर रहता है। परंतु जिन्होंने विध्वंसात्मक शस्त्रों का अनुसंधान किया है उससे समाज को किसी प्रकार का कल्याण नहीं होता अतः वे ऋषि नहीं कहला सकते। इसीलिये पितृयज्ञ करते समय श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित यह भावना रखना चाहिये कि
" पितृ पुरुषेभ्योनमः , ऋषिदेवेभ्योनमः,
ब्रह्मार्पणमं ब्रह्म हर्विब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ,
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं , ब्रह्मकर्मसमाधिना"।

अर्थात् जिन्होंने अपना प्रत्येक कार्य ब्राह्मिक भाव से करते हुए अपने को ब्रह्म स्वरूप ही बना लिया और अंततः ब्रह्म में ही समाधिस्थ हो गये उन पितृपुरुष ऋषिगणों को प्रणाम।

आध्यात्म यज्ञ का सूत्रपात आत्मा से होता है और कर्म होता है मन के द्वारा। मन साधना करता है और कर्म भी, जो कि आत्मा के क्षेत्र में समाप्त हो जाते हैं। आध्यात्म यज्ञ निवृत्ति दिलाता है जबकि भूत ,नृ और पितृ यज्ञ निवृत्ति और प्रवृत्ति दोनों में उलझाते हैं। नृ यज्ञ चार प्रकार का होता है, शूद्रोचित, वैश्योचित , क्षत्रियोचित और
विप्रोचित। शूद्रोचित सेवा में अपने सुखों का त्याग कर दूसरों को प्रसन्न करना या उनके कष्टों को दूर कर देना
जैसे मरीजों की सेवा आदि, आते हैं। वैश्योचित  सेवा में किसी को रुपया पैसा देकर सेवा करना, और अपने
जीवन को खतरे में डालकर दूसरों का रक्षण करना क्षत्रियोचित सेवा कहलाता है। विप्रोचित सेवा में अपने द्वारा प्राप्त किये गये आध्यात्म के  ज्ञान को दूसरों को सिखाना और सद्गुणों को सिखा कर सच्चाई के मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित  करना आदि आते हैं। शूद्रोचित सेवा समाज की रीढ़ की हड्डी है इसे किसी प्रकार हेय नहीं
समझना चाहिये। जो शूद्रोचित सेवा नहीं कर सकता वह वैश्योचित  , क्षत्रियोेचित और विप्रोचित सेवा भी नहीं
कर सकता। इसलिये जिनमें यह चारों प्रकार के गुण हैं वही विप्र कहला सकते हैं। हमें अहंकार रहित सेवा करना चाहिये यह मान कर कि हम नारायण की सेवा कर रहे हैं। भूत, नृ और पितृ यज्ञ करते समय नारायण की सेवा करने का भाव रखने पर मैंपन की भावना को जागने का अवसर नहीं मिल पायेगा और कर्मबंधन से भी दूरी बनी रहेगी। कर्मबंधन से मुक्त होने और अहंकार को नष्ट करने के लिये ही यज्ञ किया जाता है , इसलिये उपरोक्त चारों यज्ञ कोई भी सम्पन्न कर सकता है। इससे यह स्पष्ट है कि अग्नि में घी, यव, तिल या अन्य वस्तुओं को जलाना यज्ञ नहीं है और न ही इस प्रकार खाद्यान्न को जलाने से समाज का कोई लाभ होता है।  जो , यह कहते हैं कि इससे वातावरण शुद्ध होता है और वर्षा होती है वह किसी भी प्रकार वैज्ञानिक सत्य नहीं है। पृथ्वी पर जो भी जीव जगत है वह कर्बन का ही बहुरूप है इनमें से किसी के भी जलाने पर कार्बनडाई आक्साइड उत्पन्न होती है और कार्बन ही बचता है। स्वस्थ जीवन के लिये हमे आक्सीजन की आवश्यकता  होती है और पौधों को कार्बनडाई आक्साइड, जो हम स्वाभाविक रूप से एक दूसरे को आदान प्रदान करते रहते हैं अतः पृथक से कार्बनडाई आक्साइड उत्पन्न करने का कोई औचित्य नहीं वह भी धार्मिक भावनाओं की कीमत पर। श्रीमद्भगवद्गीता के जिस श्लोक  का उदाहरण देकर यह यज्ञकार्य किया जाता है वह भी उसका मनमाना अर्थ किये जाने के कारण है।
वह श्लोक  कहता है कि
अन्नाद भवति भूतानि, पर्जन्यादन्न संभवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञःकर्मसमुद्भवः।

जिसका सीधा अर्थ यह है कि अन्न से सभी जीवधारी उत्पन्न होते और जीवित रहते हैं, वर्षा से अन्न होता है, यज्ञ करने से वर्षा होती है और यज्ञ, कर्म करने से संभव होता है। अतः ऊपर वर्णित चारों प्रकार के यज्ञकर्म सबको नारायण समझकर करने पर ही प्रकृति संतुलन में रहेगी अर्थात् वर्षा होगी, अन्न उत्पन्न होगा और जीवन बना रहेगा तभी सब लोग अपने अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।

Monday, 10 November 2014

3.2 : तथ्य

3.2 : तथ्य

प्रणिधान-  ध्वन्यात्मक लय के साथ मन की तरंगों की समानांतरता अर्थात्
                  [Parallelism between    mental and acaustic rhythm]

ईश्वर  प्रणिधान- ईश्वर  की मूल तरंगों के साथ मन की तरंगों की समानान्तरता अर्थात्
             [Parallelism between   mental and fundamental devine rhythm]

देवता - जब किसी का व्यक्तित्व और दर्शन  पूर्णतः एक समान हो जाते हैं तो वह देवता हो जाता है। ‘‘द्योतते क्रीडते यस्मात् उदयते द्योतते दिवि, तस्मात् देव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्व देवतैः।‘‘ अर्थात् ब्रह्मांड के नाभिक से उत्सर्जित होने वाले जीवन के अनंत आकार ,जो समग्र ब्रह्मांड में गतिशील  हैं और प्रत्येक अस्तित्व के भीतर रहकर सबको प्रभावित करते हैं देवता कहलाते हैं चूंकि शिव का आदर्श  उनके जीवन से बिलकुल एकीकृत है अतः इस परिभाषाके अनुसार उन्हें देवता कहा जाता है। परन्तु  शिव  के व्यक्तित्व के अनुसार वह तो समग्र देवताओं के समाहार हैं अतः देवता शब्द तो उनके लिये बहुत छोटा लगता हैं, वे तो देवताओं के भी देवता हैं अर्थात् महादेव हैं।

देवी शक्ति  - जब ब्रह्मांड के नाभिक से कोई रचनात्मक तरंग उत्सर्जित  होती है तो वह अपने संकोच विकासी स्वरूप के साथ विकसित होने के लिये प्रमुख रूप से दो प्रकार के बलों का सहारा लेती है।
1. चितिशक्ति    2. कालिकाशक्ति।
       वास्तव में पहला बल उसे आधार जिसे हम ‘‘स्पेस‘‘ कहते हैं, देता है और दूसरा बल ‘‘टाइम‘‘ अर्थात् कालचक्र में बांधता है, इसके बाद ही उस तरंग का स्वरूप, आकार पाता है।

ध्यान रहे इस कालिकाशक्ति का तथाकथित कालीदेवी से कोई संबंध नहीं है, काल अर्थात्(eternal time factor) के माध्यम से अपनी क्रियाशीलता बनाये रखने के कारण ही इसे कालिकाशक्ति नाम दिया गया है।

 परम सत्ता और प्रकृति (cosmic entity and nature)
वह परम सत्य अपने क्रियात्मक घटक जिसे प्रकृति कहते हैं, के माध्यम से संपूर्ण सृजन करता है। प्रकृति सात्विक बल को आधार बनाकर रजोगुण और तमोगुण की मदद से प्रपंच रचती हैं। यथार्थतः आधार अदृश्य   सा ही रहता है केवल रजो गुण और तमोगुण की ही अनुभूति सबको होती रहती है इन्हीं से द्वन्द्वों का आभास होता है जबकि इन द्वन्द्वों का अस्तित्व उस सात्विक आधार पर ही टिका रहता है। इन बलों में असंतुलन होने का अर्थ है अस्तित्वहीनता।
प्रत्येक जड़वस्तु चाहे वह सूर्य जैसे तारे हों या आकाशगंगायें  या इलेक्ट्रान जैसा छुद्र कण, वे सब नहीं जानते कि उनका अस्तित्व है जबकि मनुष्य, चीटी, केंचुआ ये सब जानते हैं कि उनका अस्तित्व है। यह आस्तित्विक अनुभूति का आधार ही वह सत्ता है जिस पर जीव व जगत टिका हुआ है इसलिये ‘‘मै हूृॅं‘‘ इसी बोध में वह परम सत्ता अदृश्य   रूप में रहती है। बलों के त्रिभुज के नियमानुसार वस्तु संतुलित रहती है, जैसे, दीवार पर टंगी तस्वीर जिसके दो छोर रस्सी से बंधे दिखाई देते हैं, पर तीसरा, जो तस्वीर में से गुजरकर संतुलन बनाता है, रहते हुए भी दिखाई नहीं देता जबकि तस्वीर दिखाई देती है। यही अदृश्य  बल अर्थात् सात्विक बल वह आधार है जो तस्वीर को टांगे रहता है।

पॅंचाग्नि
मनुष्य के शरीर में अनेक प्रकार की ग्रंथियाॅं पाई जाती हैं जो जीवन के संचालन के लिये आवश्यक  ग्रंथि रसों का स्राव करती रहती हैं। ये ग्रंथियाॅं एक नियत ताप पर ही अपनी पूरी क्षमता से कार्य कर शरीर को अधिकतम लाभ पहुंचाती हैं। प्रधानतः पाॅंच प्रकार की ग्रंथियाॅं शरीर के संतुलन को बनाये रखती हैं ये क्रमशः  सिर, दाढ़ी, मूछों, कंधों के नीचे संधियों पर, और जननेद्रिय तथा पैरों के संधिस्थल पर रहती हैं । प्रकृति ने ही इस तापक्रम को उचित बनाये रखने के लिये इन स्थानों पर बालों का समूह स्थापित किया है अतः वाह्य वातावरण में तापीय परिवर्तनों को ये बाल ऊष्मा के संग्राहक और विकिरक दोनों प्रकार से कार्य करते हैं और शरीर  के ताप को नियत बनाये रखते हैं। इन स्थानों के इन बालों का संरक्षण करना ही पंचाग्नि का तापना कहलाता है। आध्यात्मिक राह पर चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इनका संरक्षण करना चाहिये। यदि इनका संरक्षण नहीं किया जाता और काट दिया जाता है तो ग्रंथियों की क्रियाशीलता प्रभावित होती है और शरीर  तथा मन पर नियंत्रण कर पाना संभव नहीं होता ।

षोडष कला
मनुष्य का अस्तित्व षोडष अर्थात सोलह  कला युक्त है, जब तक मनुष्य की वृत्ति वर्हिमुखी रहती है तब तक वे भौतिक जगत से सुख की सामग्री खोजते रहते हैं और तब तक उन्हें इन सोलह कलाओं से  बाहर जाने का उपाय नहीं है। इनके अंतर्गत, पाॅंच ज्ञानेन्द्रियाॅं (चक्षु, कर्ण, नासिका, जिव्हा और त्वक्,) पाॅंच कर्मेंद्रियाॅं (वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ,) पॅंच प्राण, (प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान,) (पंच वर्हिवायु नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनन्जय, कला में सम्मिलित नहीं हैं, क्योंकि वे अंतर्वायु समूह के परिणाम हैं)  और अहंतत्व। ये ही षोडष कलायें हैं। तद्गत भाव से साधक की पंचदश  कलाओं का भाव उन सबके मूल कारण में मिल जाता है। देवता अर्थात् इंद्रियां अपने अपने प्रतिदेवता अर्थात् नियंत्रक शक्ति में, अंत में, लीन हो जाती हैं।

तैतीस करोड़ देवता
अनेक विद्वानों के विभिन्न मतों में अधिकाॅंशतः यह माना जाता है कि मनुष्य के शरीर में तेतीस करोड़ नाडि़याॅं होती हैं अतः देवता भी तेतीस करोड़ हैं, वस्तुतः मनुष्यों के शरीर नियंत्रक स्नायु तथा नाड़ी पुॅंज ही अविद्या और अंधविश्वास  के कारण तेतीस करोड़ देवताओं में परिणित हो गये हैं।

देवता के संबंध में शंकराचार्य  का कहना है, सर्वद्योत्नात्मक अखंडचिदैकरस।
और याज्ञवल्क्य का कहना है, द्योतते क्रीडते यस्मादुद्यते द्योतते दिवि, तस्माद्देव इतिप्रोक्तः स्तूयते सर्व देवतैः।

निष्कर्ष यह कि देवता दो प्रकार के हैं 1. आत्मा का प्रकाश  इंद्रियों द्वारा होता है अतः इंद्रिय समूह को दैहिक देवता कहा जाता है, 2. विश्व ब्रह्माॅंड का प्रकाश   और नियंत्रण जिस देवता समूह के द्वारा होता है उन्हें ब्राह्मी देवता कहा जाता है। दोनों की सॅंख्या तेतीस है क्योंकि ब्राह्मी देवतागण प्रत्येक देहिक देवता गण के प्रतिदेवता हैं। दैहिक देवतागण प्रतिदेवता में लय होते हैं और प्रतिदेवता ब्रह्म में मिल जाते हैं, इसलिये मोक्ष प्राप्त साधक ब्रह्म ही हो जाता है।

मनुष्य के शरीर की असंख्य नाडि़यों में से तेतीस ही प्रधान हैं इन्हीं की नियंत्रक सत्ता को तेतीस देवता कहा जाता है। ये हैं, एकादश  रुद्र, द्वादश  आदित्य, अष्टवसु, इंद्र, और प्रजापति। ब्रह्मशक्ति के प्रधान विकास को इंद्र कहा जाता है, यही देवता मनुष्य शरीर का पूर्णरूप से नियंत्रण करता है।

एकादश  रुद्रः दस इंद्रियां और मन। रुद्र का अर्थ है जो रुलाता है। मृत्यु के समय जब प्रत्येक इंद्रिय अपने प्रतिदेवता में मिल जाती है, मन निष्क्रिय हो जाता है, शरीर अचल और अस्पंद हो जाता है तब उसके आत्मीय गण कातर भाव से रोने लगते हैं। चूँकि ये ग्यारह देवता मनुष्य को रुलाते हैं अतः ये रुद्र कहलाते हैं।

अष्टवसुः वसु का अर्थ है जीवों का वास स्थान अर्थात् जो इंद्रियों के वास स्थान, आश्रय स्थल या विषय हैं वही वसु हैं। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, अन्तरिक्ष, व्योम, वायु ,तेज, और धरती ये आठ वसु हैं।

द्वादश  आदित्यः आदित्य का अर्थ है लेने वाला। यहां पर अर्थ है जो कर्मफल और आयु को ले लेता है। प्रत्येक क्षण आयु क्षीण होती रहती है, और कर्मफल भोग के लिये मनुष्य को एक शरीर छोड़कर दूसरा लेना पड़ता है, यह सब काल प्रवाह के कारण ही होता है अतः समय ही आदित्य है इसलिये बारह मास ही द्वादश  आदित्य हैं।

इंद्रः     इंद्र शब्द का  अर्थ विद्युत , वज्र या कर्मशक्ति है।

प्रजापतिः इस शब्द का अर्थ है यज्ञ या कर्म।

हरि:     हरति पापान् इत्यर्थे हरिः। अर्थात् जो दूसरों के पापों को हर लेता है वह हरि।
हर:      हरति बंधानम् इत्यर्थे हरः। अर्थात् जो बंधनों को काट देता है वह हर।
ईश्वर :   क्लेश कर्मविपाकाषयैर्परामिष्ट सः पुरुषविशेष ईश्वर: । अर्थात्, वह पुरुष, जो क्लेशों  से प्रभावित
          नहीं होता, कर्मबंधन में नहीं बंधता, प्रतिक्रियाओं में नहीं उलझता, और संस्कारों से मुक्त रहता
          है वह ईश्वर  कहलाता है।
भाव:    शुद्धसत्वविशेषाद्वा प्रेमसूर्यांशुसम्यभाक् रुचिभिश्चित्तमाश्रन्य क्रदासौ भाव उच्यते।
          अर्थात्, वह जो परम शुद्ध और सात्विक बनाता है, जो प्रेम के सूर्य को चमकाता है, जो मन को
          भक्ति की किरणों से चमकदार और चिकना बनाता है उसे भाव कहते हैं। भावार्थ यह कि मन
          की वह एकान्तिक सूक्ष्मतम अवस्था जो विचारों को व्यावहारिक उत्प्रेरण देकर व्यक्तित्व का
          विकास करती है भाव कहलाती है।

 भक्ति, साधना नहीं है
भक्ति, साधना नहीं है।  भक्ति का स्तर ज्ञान और कर्म की साधना करने के बाद ही प्राप्त होता है। भक्ति के द्वारा उत्पन्न आनन्द का अनुभव अखंड अवस्था में ले जाता है। प्रसन्नता का समाचार किसी व्यक्ति के मन की आनन्दायी भावनाओं को उत्प्रेरित कर उसे हॅंसने नाचने गाने की ओर उन्मुख करदेता है और जिस क्षण वह इस पुल को पार कर लेता है वह अखंड सत्ता में मिल जाता है। इसलिये ज्ञानपूर्वक कर्म करने से भक्ति उत्पन्न होती है और भक्ति को प्राप्त करने के लिये ज्ञान और कर्म दोनों की आवश्यकता होती है। ध्यान रहे ज्ञान और कर्म की साधना करना है परंतु कर्म की साधना ज्ञान से अधिक होना चाहिये क्योंकि ज्ञान की साधना कर्म से अधिक होने पर अहंकार के उत्पन्न होने की संभावना होती है जो पतन का कारण बनती है।

भगवान और उनके नाम
    अपने अपने संज्ञानात्मक प्रक्षेप के अनुसार लोग एक ही परमसत्ता को विभिन्न नाम दे देते हैं। आध्यात्मिक साधक को इन नामों और उनसे जुड़ी महामनस्कता के झगड़े में नहीं पड़ना चाहिये क्योंकि इन सबके भीतर एक समान आत्मा रहती है।

 अब हम क्रमशः  इन नामों को लेते हैं। सबसे अधिक प्रचारित है ‘‘नारायण‘‘। यह ‘नार‘ और ‘अयन‘ इन दो
शब्दों से मिलकर बना है, और उसका आन्तरिक अर्थ है परमपुरुष। नार शब्द  के संस्कृत में तीन अर्थ हैं, पहला है भक्ति, जैसे नारद माने भक्ति देने वाला। दूसरा अर्थ है पानी, और तीसरा अर्थ है प्रकृति अर्थात् परम क्रियात्मक शक्ति। और अयण माने आश्रय, इसलिये नारायण माने प्रकृति का आश्रय। परम क्रियात्मक शक्ति का आश्रय अर्थात् परमपुरुष।

अगला प्रसिद्ध नाम है शिव । शिव  और शक्ति एक ही वास्तविकता के दो पक्ष हैं। शक्ति कोई पृथक सत्ता नहीं वह सार्वभौमिक तथ्य है और शिव  अखंडसत्ता। शक्ति का अर्थ है क्रियात्मक सत्ता। किसी भी क्रिया में दो सिद्धान्त होते हैं एक ज्ञानात्मक और दूसरा क्रियात्मक। मानलो आप कोई मशीन चला रहे हैं, इसमें दो सिद्धान्त हैं एक मशीन को मस्तिष्क की सहायता से दिशा निर्देश  अर्थात् संज्ञानात्मक और दूसरा मासपेशियां जो संज्ञान के दिशा निर्देश  पर मशीन संचालित करतीं हैं, क्रियात्मकता। ब्रह्माॅंड भी संज्ञानात्मक सिद्धान्त और क्रियात्मक सिद्धान्त दोनों से मिलकर बना है। संज्ञानात्मक सिद्धान्त हैं परमपुरुष और क्रियात्मक सिद्धान्त है परमाप्रकृति। सिद्धान्ततः यह दो पृथक  सत्ताओं के होने का आभास कराता है पर आन्तरिक रूप से वे एक ही हैं। शिव  और शक्ति  का सम्मिलित नाम है ब्रह्म। इसलिये शिव  हुए परम चेतना, नारायण भी परमचेतना हैं अतः शिव  और नारायण में कोई अंतर नहीं है।

अब हम अन्य नाम ‘माधव‘ लेते हैं। संस्कृत में ‘मा‘ के तीन अर्थ हैं, पहला है ‘‘नहीं‘‘ जैसे मा गच्छ, अर्थात् मत जाओ। अन्य अर्थ है इंद्रियाॅं। इसलिये जीभ को भी ‘मा‘ कहते हैं, और तीसरा है परम क्रियात्मक सत्ता, परमा प्रकृति, लक्ष्मी। ‘धव‘ माने नियंत्रक या पति, इसी कारण जिस महिला का पति नहीं होता उसे विधवा कहते हैं। ‘धव‘ का अन्य अर्थ सफेद भी है। इसलिये माधव का मतलब हुआ जो परमा प्रकृति को नियंत्रित करता है अर्थात् परमपुरुष। ‘कृष्ण‘ का अर्थ है आकर्षण करने वाला, अतः वह जो विश्व  ब्रह्माॅंड के संपूर्ण अस्तित्व को अपनी ओर खींच रहे हैं वह कृष्ण हैं। सभी जाने अंजाने उन्हीं के आकर्षण में बंधे हुए हैं इसलिये कृष्ण परमपुरुष हैं। इसप्रकार कृष्ण/माधव भी शिव  और नारायण की तरह एक ही सत्ता को प्रदर्शित   करते हैं।

अब अगला नाम लेते हैं ‘राम‘। रमन्ति योगिनः यस्मिन् इति रामः। धातु ‘रम‘ और प्रत्यय ‘घईं ‘ को मिलाकर राम बनता है जिसका अर्थ है परम सुन्दरता का आश्रय अर्थत् परमपुरुष। इसलिये किसी को भी भगवान के नामों की महानता को लेकर झगड़ना नहीं चाहिये। राम का अन्य अर्थ है, राति महीधरा राम अर्थात् अत्यंत चैंधियाने वाला, चमकदार अस्तित्व। परमपुरुष को सभी अत्यंत चमकदार अर्थात् प्रकाशवान मानते हैं।

 अन्य अर्थ है, रावणस्य मरणम् इति रामः। रावण क्या है? आप जानते हैं कि मानव मन की सूक्ष्म और स्थूल दोनों प्रकार की  प्रवृत्तियां होती हैं, केवल स्थूल प्रवृत्तियाॅं दस दिशाओं पूर्व, पश्चिम , उत्तर, दक्षिण, ईशान, वायव्य, नैरित्य, आग्नेय, ऊर्ध्व और  अधः में अपना काम करती रहती हैं। इन दसों दिशाओं में भौतिक जगत की वस्तुओं की ओर मन के भटकने के कारण मन के भृष्ट होने की संभावना अधिक होती है अतः जीव मन की इस प्रकार की प्रवृत्तियों के साथ संयुक्त रहने को रावण कहते हैं। रावण को दस सिरों वाला इसी लिये माना गया है। अतः आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले साधक को क्या करना चाहिये? साधक को इन भृष्ट करने वाली, आत्मिक उन्नति के मार्ग में अंधेरा उत्पन्न करने वाली, प्रवृत्तियों से संघर्ष करना होगा अर्थात् रावण का वध करना होगा। रावणस्य मरणम् इति रामः, अतः साधक रावण को मारकर सार्वभौमिक सत्ता के सतत प्रवाह में आकर राम राज्य पाता है। इसलिये राम माने पुरुषोत्तम। रावण का प्रथम अक्षर ‘रा‘ मरणम का प्रथम अक्षर ‘म‘ इसलिये रावणस्य मरणम माने राम क्योंकि जब आध्यात्मिक साधक राम का चिंतन करता है रावण मर जाता है। इस प्रकार नारायण, शिव , माधव और राम एक ही हैं।

इष्टमंत्र
      परंतु साधक के लिये सबसे महत्वपूर्ण उसका इष्ट मंत्र ही है, उसी के चिंतन मनन और निदिध्यासन से वह परम प्रकाश  पायेगा। इष्टमंत्र प्रत्येक व्यक्ति का अलग अलग होता है जो उसके संस्कारों के अनुसार चयन किया जाकर गुरुकृपा से प्राप्त होता है। यह कार्य कौलगुरु ही करते हैं क्योंकि वे ही पुरश्चरण  की क्रिया में प्रवीण होते हैं।  पुरश्चरणका अर्थ है शब्दों को शक्ति सम्पन्न करने की क्षमता होना। अपने अपने इष्टमंत्र का श्वाश  प्रश्वाश  की सहायता से नियमित रूपसे जाप कारते रहने का इतना अभ्यास करना होता है कि यह जाप नींद में भी चलता रहे , इसे ही साधना कहते हैं। इस स्थिति को प्राप्त होने पर ओंकार (cosmic rhythm) के साथ अनुनाद स्थापित करने में कठिनाई नहीं होती। अनुनाद की यही स्थिति जब स्थिर या स्थायी हो जाती है तो इसे ही समाधि कहते हैं। शक्तिमान शब्द ही मंत्र कहलाते हैं जो कौलगुरु साधक को उसके संस्कारों के अनुसार इष्टमंत्र के रूप में कृपापूर्वक देते हैं और मंत्रचैतन्य हो जाने पर अर्थात् उपरोक्तानुसार ओंकार के साथ अनुनाद स्थापित हो जाने पर, उन्हीं की कृपा से परमपुरुष से साक्षात्कार होता है। जिसे सक्षम गुरु से इष्टमंत्र मिल गया वही धन्य है उसी का जीवन सफल है। अन्य सब तो प्रदर्शन  मात्र है।

Saturday, 8 November 2014

3.0: तथ्य और अवधारणायें

 मध्य (भाग दो)  विशुद्ध  ज्ञान

3.0: तथ्य और अवधारणायें

पिछले खंड में आपने देखा कि ब्रह्माण्ड के बारे में वैज्ञानिक शोधकार्य से प्राप्त आँकडे़ और तथ्य अपने आप में कितने जटिल और
आश्चर्यजनक हैं और इनका मेल आध्यात्मिक क्षेत्र से कितना और किस प्रकार हो सकता है यह भारतीय दर्शन  के साथ अन्य
दार्शनिकों की विचारधाराओं को एकत्रित करने के उपरान्त ही पता लगाया जा सकेगा।  इसके लिये दार्शनिक शब्दावली की परिभाषायें समझना होंगी अन्यथा कुछ भी नहीं समझा जा सकेगा। अब आइये दार्शनिकों के मत में कुछ महत्वपूर्ण शब्दों की परिभाषाओं को जान कर उन पर विचार करें,  इन तथ्यों/शब्दों को दार्शनिकों ने अपनी अपनी व्याख्याओं में किसी न किसी प्रकार प्रयुक्त किया है।
3.1: परिभाषायें
प्रकृति- उस एकमात्र परम सत्ता का क्रियात्मक पक्ष (operative principle) जो अपने तीन प्रकार के गुणों सत, रज और तम की सहायता से समग्र ब्रह्माण्ड  में संतुलन बनाये रखती है। इसे  वह्वंकुरा   या नित्यनिवृत्ता भी कहते हैं जिसका अर्थ है अनेक रूपों में परिवर्तित होने की क्षमता होना और लगातार परिवर्तित होते जाना। 
पुरुष- उस एकमात्र परमसत्ता का संज्ञानात्मक पक्ष (cognitive principle) है  जो प्रकृति के प्रत्येक कार्य पर अपना साक्ष्य देता है।

विद्यामाया- प्रकृति का वह रूप जिसमें वह जीव को भौतिक और मानसिक जगत के संघर्ष से आत्मिक जगत में ले जाने की ओर प्रेरित करती है।

 सम्वितशक्ति  -  विद्यामाया, इसकी सहायता से अज्ञान में फंसे जीव को अचानक वैचारिक आघात देकर अनुभव कराती है कि अब तक गलत दिशा  में जा रहा था अब इसी क्षण से सही रास्ते पर चलूँगा , अर्थात् होश  में ले आती है। 
ह्लादिनीशक्ति-  विद्यामाया, इसकी सहायता से सच्चाई के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य को आत्मिक क्षेत्र में और आगे जाने का मार्गदर्शन करती है और रागानुगा तथा रागात्मिका भक्ति प्रदान करतीहै।

अविद्यामाया-  प्रकृति का वह रूप जिसमें वह जीव को भौतिक और मानसिक जगत के संघर्ष में ही उलझाये रखती है और उसे ही सब कुछ मानने के विचार देती है।

विक्षेपशक्ति-  अविद्यामाया का वह रूप जो मनुष्य के मन को प्रकृति के विविध रूपों की ओर विक्षेपित करता रहता है और इस प्रकार के विचार देता है कि यही सब कुछ है यह सब कुछ उसके लिये ही है आदि।

आवरणीशक्ति-  अविद्यामाया का वह रूप जो मनुष्य के मन को आत्मिक क्षेत्र में जाने पर सामने से अपारदर्शी  आवरण डाल कर अवरोध पैदा करता है। ( इसे  विद्या के विवेकपूर्ण तरीके से दूर कर आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति की जा सकती है।)

रागानुगाभक्ति-  विद्यामाया की ह्लादिनी शक्ति के प्रभाव से जब मनुष्य का मन परमपुरुष के चिंतन में  लीन होता है तो वह अनुभव करता है कि उसके इस कार्य से उसके आराध्य प्रसन्न हो रहे  हैं जिससे उसे भी आनन्द की अनुभूति हो रही है।
रागात्मिकाभक्ति-  विद्यामाया की ह्लादिनी शक्ति के प्रभाव से जब मनुष्य का मन परम पुरुष के चिंतन में इतना लीन हो जाता है कि वह अनुभव करता है कि उसके इस कार्य से उसके आराध्य हमेशा  ही प्रसन्न होते रहें भले ही उसे कष्ट मिले या सुख । इसे ही भक्ति की पराकाष्ठा  कहा गया है।

काल अर्थात् टाइम- क्रिया की गतिशीलता का मानसिक माप है। 
पात्र अर्थात् पर्सन, मन की सहायता से इस गतिशीलता को ग्रहण करने वाला है।
देश  अर्थात् स्पेस, पात्र तथा काल में संबंध स्थापित करने वाली सत्ता है।

मन- प्रकृति के तीनों आभ्यांतरिक गुणों में (अर्थात सात्विक, राजसिक और तामसिक) लगातार होने वाले संघर्ष के परिणाम स्वरूप होने वाले रूपान्तरण से बनता है और महत्तत्व , अहंतत्व और चित्ततत्व इन तीन प्रकारों में क्रियारत रहता है जो क्रमशः  साक्षी, कर्ता और कृता कहलाते हैं।
Mind:   Never ending clash in the three principles i.e. sentient, mutative  &  static.This  means  Mind originates as a result of ever changing functional  metamorphosis in  three  principles. 

आत्मा- मन को, काल अर्थात् टाइम के सभी पक्षों में,  देश  अर्थात् स्पेस की सभी विमाओं में, और पात्र अर्थात् पर्सन के भौतिक तथा मानसिक सभी रूपों में साक्ष्यीभूत करने वाली निर्पेक्ष सत्ता है। इसे इकाई संरचना में नाभिकीय चेतना या कूटस्थ चैतन्य कहते हैं और इसका  नियंत्रण बिन्दु दोनों भोंहों के बीच का स्थान है जहां पर पिट्यूटरी ग्लेंड क्रियाशील रहती है।
Atma   Absolute entity to witness the mind in all the aspects of Time, all the dimensions of  Space and Person in all forms (physical and psychic). The nucleus consciousness or the  Atma in the unit structure is called “Kutasth Chaitanya” and its controlling state is  middle point between the eye –brows, the place  where the functioning point of the  pituitary gland is located.

विचार- मनोआत्मिक समानान्तरता की अवस्था है ।
(Idea: is a state of  psycho-spiritual  parallelism)
आदर्श-  मानसिक स्तर पर विचार की संकल्पना है ।
(Ideology:  is a conception of idea on the psychic level)

अर्थ- मनोभौतिक समानान्तरता की अवस्था है। 
 (Meaning:  is a state of  psycho-physical parallelism) 

साधना- यह प्रतिसंचर की गति को त्वरित करने का प्रयास है जिससे उस ‘दिव्य‘ से पृथकत्व के कष्टदायी घंटों को जल्दी ही समाप्त किया जा सके। आध्यात्मिक साधना की परख तभी होती है जब लगता है कि मैं उस ‘दिव्य‘ की ओर बढ़ रहा हूँ । देर करने का प्रत्येक क्षण कष्टों का क्षण है। जो उस दिव्य से साक्षात्कार कराये केवल वही आध्यात्मिक साधना है अन्य सब कर्मकांडीय प्रदर्शन मात्र है।        (Spiritual Sadhana: It is the attempt to accelerate the motion of Pratisanchar and thereby covers up painful hours of divine separation as early as possible.The touch stone of spiritual Sadhana is therefore, the feeling that I am tending  towards Him. Every delayed moment of life is only a moment of pain. That alone which brings His realization is His spiritual practice, all other actions being ritualistic ostentation.)

दशा-  जब साधना के समय साधक आनन्द से गिर पड़ता है।
भाव- जब साधना के समय साधक ईश्वर  की निकटता का अनुभव करने से गिर पड़ता है।
महाभाव-  साधना के समय साधक परमपुरुष का स्पर्शजन्य आनन्द पाकर गिर पड़ता है और उसका रोम रोम ईश्वरीय आनंद से भर जाता है।

दीपनी-  प्रकाश अर्थात  टार्च।
मंत्रदीपनी- भौतिक वस्तुओं से मन को खींचना।
मंत्राघात- मंत्र को बार बार दुहराना।
मंत्रचैतन्य- मंत्र के अर्थ पर चिंतन करना।

भूतशुद्धि- भौतिक पदार्थों से मन को खींच लेना।
आसनशुद्धि-  खींचे गये मन को उचित शुद्ध आसन पर बैठाना।

महत्तत्व- शुद्ध मैं आर्थात् [Pure I, Knower I] 
अहमतत्व- कर्ता मैं अर्थात्   [Doer I]
चित्तत्व- कृता मैं अर्थात् [Done I]

प्रमा- भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों क्षेत्रों में सुसंतुलन होने की स्थिति "प्रमा" कहलाती है। भौतिक क्षेत्र में की गई प्रगति प्रमा-संवृद्धि, मानसिक क्षेत्र में  प्रगति प्रमा-रिद्धि और आध्यात्मिक क्षेत्र में हुई प्रगति को प्रमा-सिद्धि कहलाती है।

पूजा अथवा पूजन- जब कोई व्यक्ति स्वार्थवश  या बिना स्वार्थ के अविभक्त मन से अपने आराध्य के प्रति अपना अत्यंन्त आदर प्रकट करता है जिसमें बाहरी तौर पर फूल, बेलपत्र, चंदन, गंगाजल तुलसी, केला, चावल आदि अर्पण करता है या इन वस्तुओं का नहीं भी अर्पण करता है तो उसे पूजा या पूजन कहते हैं।
अर्चा या अर्चना- जब कोई व्यक्ति स्वार्थवश  अपने आराध्य के प्रति अपना अत्यंन्त आदर प्रकट कर बाहरी तौर पर फूल, बेलपत्र, चंदन, गंगाजल, तुलसी, केला, चावल आदि अर्पण करता है तो इसे अर्चा या अर्चना कहते हैं।
प्रार्थना- जब कोई व्यक्ति स्वार्थवश  या बिना स्वार्थ के अविभक्त मन से अपने आराध्य के प्रति गहरे मन से बिना किसी बाहरी सामग्री के साथ अत्यंन्त आदर प्रकट करता है तो उसे प्रार्थना कहते हैं।
ब्रह्मसद्भाव- वह विशेष प्रकार की पूजा जो निस्वार्थ भाव से बिना किसी वाह्य सामग्री के साथ अपने आराध्य के ध्यान में की जाती है उसे ब्रह्म चिंतन या ब्रह्मसद्भाव कहते हैं। (इसे ही सर्वोत्तम कहा गया है।)
विधिपूजन- ऊपर वर्णित पूजा की विधियाँ , धार्मिक कर्मकांडियों द्वारा अनेक भागों में कराई जाती हैं जैसे, अंगन्यास, करन्यास, आचमन, शिखाबंधन, आवाहन, माल्यदान, तिलकधारण, और विसर्जन। इस प्रक्रिया सहित पूजन करने को विधिपूजन कहते हैं।

धुवास्मृति - परमात्मा समग्र ब्रह्माण्ड  का कर्ता और समग्र ब्रह्माण्ड  उसका कर्म है। इसलिये उन्हें अपना कर्म नहीं बनाया जा सकता। तब क्या किया जाय? इसके लिये यह विचार सदा करना होगा कि वह हमें लगातार देख रहे हैं। बुद्धिमान लोग परमात्मा को अपना विषय नहीं बनाते बल्कि अपने को उनका विषय मानते हैं और उन्हें हमेशा  साक्ष्य देने वाला मानकर सोचते हैं कि ‘‘परमात्मा मेरे विषय नहीं हैं मैं उनका विषय हूँ ।‘‘ जब यह भावना किसी के मन में हमेशा  के लिये दृढ़  स्थान ले लेती है कि वे हमेशा  उन्हें देख रहे हैं तो इसे धुवास्मृति कहते हैं। इसी का नाम आध्यात्मिक ज्ञान है इस अवस्था में ही कोई व्यक्ति सच्चा ज्ञान पा सकता है। आध्यात्मिक ज्ञान को मानसिक और भौतिक क्षेत्र में बदला जा सकता है। यदि कोई इस प्रकार करना चाहता है तो वह संसार का बहुत भला करेगा। इसी से प्रगति होती है। सबसे विद्वान व्यक्ति वह है जो समझता है कि वह कुछ नहीं जानता।
पराभक्ति- आध्यात्मिक ज्ञान के अभिलाषी को यह याद रखना चाहिये कि मनोभौतिक ज्ञान की आवश्यकता केवल भौतिक जगत में ही होती है, पर जब व्यक्तिगत जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान आ जाता है तो मनोभौतिक ज्ञान की जरूरत नहीं रह जाती । लगातार प्रयत्न करने पर आध्यात्मिक ज्ञान भक्ति में बदल जाता है क्योंकि जब ज्ञान से यह पता लग जाता है कि यह किसी काम का नहीं है तो परमपुरुष के समक्ष समर्पण करने के अलावा कुछ भी नहीं रह जाता और यही असली ज्ञान है। इसलिये याद रखना है कि एक बार भक्ति का उद्गम हो गया समझ लो सबकुछ मिल गया, परमात्मा ने यदि कभी कुछ माँगने का अवसर दिया तो उनसे पराभक्ति ही माँगना चाहिए।

जीवन की गति-  मानसिक सामग्री को ज्ञान में परिवर्तित करना चाहिये इसे धर्म कहते हैं। यह धर्म प्राथमिक और द्वितीयक इन दो भागों में बाँटा  गया है। प्राथमिक धर्म के प्रकाशित होने का अवसर मनुष्यों में ही पाया जाता है इसलिये शुद्ध ज्ञान अथवा भागवत धर्म का स्थायीकरण मनुष्य के लिये ही संभव है। द्वितीयक धर्म अन्य प्राणियों के लिये है। जीवन की गति जब मूल अवस्था में अर्थात् चेतना की ओर हो जाती है तो वहाँ  गति तो बनी रहती है पर प्रसार नहीं होता। यर्थाथतः इस अवस्था में व्यक्ति का स्वभाव उसके स्वरूप में बदल जाता है, इस अवस्था की यह विशेषता है। यह दिव्य और निर्पेक्ष अवस्था है इसे किसी प्रकार का प्रतीक नहीं दिया जा सकता। इसलिये जीवन की गति भौतिक से मानसिक, मानसिक से मनोआत्मिक ओर मनोआत्मिक से आध्यात्मिक दिशा  में होना चाहिये। जो इस प्रकार गति नहीं कर रहे हैं वे बड़े ही संकट में जा रहे हैं अपने को लोहा और लकड़ी में रूपान्तरित करने जा रहे हैं।

परा वृत्ति -    भ्रष्ट करने वाली प्रवृत्तियों को दबाने से वे समाप्त नहीं होती ,वे अवसर पाकर फिर दबोच लेती हैं अतः उनसे बचने का एक ही उपाय है कि उन्हें मन की सहायता से आध्यात्मिक तरंगों में बदल कर परमात्मा की ओर प्रेषित करते जाना चाहिए। कुल मिला कर 49 वृत्तियाँ  होती हैं इसलिये इन्हें एक़ित्रत कर  50 वीं वृत्ति को जाग्रत करो जिसे ‘परा‘ वृत्ति कहते हैं। ज्योंही यह जाग गई आप विशुद्ध ज्ञान के क्षेत्र, जिसे ब्रह्मधाम कहते हैं, में प्रवेश  कर जावेंगे।

ईश्वर- मन को धर्म साधना में लगाये रहो, धर्म की आत्मा तुम्हारे ही "मैंपन" के पीछे छिपी है कहीं अन्य़त्र ढूडने  नहीं जाना है, इसे कैसे प्राप्त करना है इसकी विधि उन व्यावहारिक महापुरुषों से सीख लो जिन्होंने साधना कर अपने आपको देख लिया है अनुभव कर लिया है। तुम्हारा भूखा भगवान भीतर वैठा है और तुम उसे खोजने के लिये बाहरी संसार को भोज दे रहे हो। वह तुम्हारे भीतर कैसे छिपा है? जैसे तिल के भीतर तेल और दधि के भीतर मख्खन। अतः जैसे तिल को पीसकर तेल पाया जाता है, साधना करके मन को चेतना से पृथक कर लेने पर देखोगे कि तुम्हारा पूरा अस्तित्व चेतना से जगमग हो रहा है। ईश्वर तुम्हारे भीतर ही भीतर प्रवाहित हो रहा है मन की रेत को हटाओ स्वच्छ ठंडा जल पाओगे।

भगवान- भगवान का क्या अर्थ है? आध्यात्मिक रूप से इसके दो अर्थ है, पहला है आध्यत्मिक प्रकाश  और दूसरा है छह गुणों का समाहार। भग के पहले अक्षर ‘भ‘ का अर्थ है, 'भेति भास्यते लोकान', अर्थात् जिसके ज्ञान, जीवन्तता और महानता के प्रकाश  से सभी लोक प्रकाशित होते हैं। अत्यधिक उच्च स्तरीय मानवीय सद्गुणों का ध्वन्यात्मिक उद्गम है ‘भ‘। और ‘ग‘ का अर्थ है , 'इत्यागच्छत्यजस्रम् गच्छति यस्मिन आगच्छति यस्मात्'। अर्थात् वह सत्ता जहाँ  सभी जीव  वापस लौट जाते हैं, जिससे सभी का उद्गम भी होता है। दूसरे प्रकार से भग का अर्थ है छः गुणों का समाहार, ‘‘एश्वर्यम् च समग्रं च वीर्यं च यशासः  श्रियः, ज्ञानवैराग्ययोश्च  च षन्नाम भग इति उक्तम्।‘‘ एश्वर्य का अर्थ है अणिमा, गरिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व ,वशित्व और अंतर्यामित्व ये आठों सिद्धियाँ , वीर्य का अर्थ है जिसकी उपस्थिति से शत्रु कांपने लगें, जो सब पर प्रशासन कर सके। यशासः  काअर्थ है यश  और अपयश   दोनों। श्री का अर्थ है सभी भौतिक उपलब्धियों के साथ शक्ति का प्रचुर सामंजस्य। ज्ञान का अर्थ है आघ्यात्मिक ज्ञान, परा और अपरा ज्ञान। वैराग्य का अर्थ है राग रहित होना, किसी भी भौतिक आकर्षण में लिप्त न होना। इस प्रकार जिस किसी में भी यह छः गुण हैं वह भगवान कहला सकता है।

एकाग्रता- एकाग्र हुए बिना परमचेतना से नहीं मिल सकते हो, मनोआध्यात्मिक प्रगति के लिये एककेन्द्रित मन आवश्यक है। ‘परा‘ केवल एक विचार पसंद करती है किसी प्रकार का संदेह नहीं। एक लक्ष्य, एक रास्ता, एक मार्गदर्शक होने से संदेह रहित होकर आगे बढ़ते जाओगे इन में से कोई भी दो हुए तो भटक जाओगे।

शैव, शाक्त और वैष्णव-  शिवत्व  की साधना में प्रकृति को नहीं भूल सकते क्योंकि जो शैव  है वे शाक्त  भी हैं। साधना के पथ में शक्ति की आवश्यकता होती है। चूकि विष्णु भौतिक जगत की सभी वस्तुओं में हैं अतः भक्त को वैष्णव भी होना होगा, इसलिये शैव व, शाक्त  और वैष्णवों को आपस में झगड़ने से कुछ नहीं मिलेगा। ध्येय शक्ति नहीं है, वह तो शिव का विचार मन में लाने से ही आ जाती है, परंतु शक्ति का विचार करने पर शिव नहीं आते। शक्ति सा शिवस्य शक्ति। वेदों के अनुसार शक्ति नित्यनिवृत्ता है और वह लगातार शिव में रूपान्तरित होती जा रही है जब पूरी शक्ति शिव में रूपान्तरित हो चुकेगी ब्रह्माण्ड  का अन्त हो जावेगा। शिव  और शक्ति  में केवल दार्शनिक भिन्नता ही है इसलिए  किसी को यह नहीं कहना चाहिये कि वह शक्ति प्राप्त करने के लिये शिव  की उपासना कर रहा है।

चार धाम- धाम का अर्थ है घर। चार घाम यह हैं, 1. चेतन मन 2. अवचेतन मन 3. अचेतन मन 4. धामहीन अवस्था, निरालंब अवस्था या तुरीयावस्था। प्रारंभिक तीनों अवस्थाओं में सोचने का विषय मौलिक नहीं होता न ही यह होना संभव है। नींद में या स्वप्न देखने में भी चेतन मन के द्वारा देखी गई विषयवस्तु ही पुनः निर्मित हो जाती है मौलिक नहीं। चेतन मन द्वारा अनुभव की गई विषयवस्तुओं को अचेतनमन पूर्णतः आभाषित कर लेता है और स्वभावतः कल्पित भूत प्रेतों के आकार वहां वास्तविक लगने लगते हैं, परंतु तुरीयावस्था में मौलिक चिंतन/रचना संभव है। मनुष्य मन से ही विषयों का भोग करता है। प्रारंभिक तीनों अवस्थाओं में तुम्हारी जीवात्मा का एक भाग भोक्ता और दूसरा भोग्य बन जाता है। भोक्ता को 'सगुण परा' और भोग्य को 'सगुण अपरा' कहते हैं। निर्पेक्ष भाग निर्गुण कहलाता है। तुम्हारी इकाई चेतना, महत् , अहं भोक्ता , और चित्त भोग्य।

चार युग-  कलिः शयानो भवति सञ्जिहानोस्तु द्वापरः ।
              उत्तिष्ठंत्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरण ।
जबतक सो रहे हो कलयुग में हो, जाग गये हो तो द्वापर में हो, उठ कर वैठ गये हो तो त्रेता में हो और चलने के लिये कदम बढ़ा दिया है तो सतयुग में हो।

मन की संकीर्णता- परमसत्ता की ओर बढ़ने के लिये सबसे पहले मन की तुच्छता और बंधनकारी घटकों को काटना होगा इसलिये इनके विरुद्ध संघर्ष करना अनिवार्य है। मन, जब संकीर्णता से ग्रस्त रहता है तो पाप और प्रदूषण फैलाता है, परंतु जब वह विस्तारित कर दिया जाता है तो सद्गुणों की चमक से वह मानवता को देवत्व की ऊंचाई तक ले जाता है।

रासलीला- रस साधना की मूल भावना यह है कि व्यक्तिगत इच्छायें और वांछायें सभीकुछ परमपुरुष की ओर संप्रेषित करना। इस प्रकार साधना में पूर्णता अर्थात् रिद्धि और सफलता अर्थात् सिद्धि प्राप्त होती है। शास्त्रों में इसे रासलीला कहा गया है। जिस किसी की रचना हुई है वह सब परम पुरुष की इच्छा से ही चक्कर लगा रहा है, किसी का अध्ययन, बुद्धि और व्यक्तिगत स्तर, सब कुछ व्यर्थ हो जाते हैं जब तक उन्हें परमपुरुष की ओर संप्रेषित नहीं किया जाता । इस परमसत्य को जानने के बाद चतुर व्यक्ति यह कहते हुए आगे बढ़ता जाता है कि है, ‘‘परमपुरुष मुझे कुछ नहीं चाहिए आपकी इच्छा पूरी हो।‘‘

आन्तरिक और वाह्य सेवा- जपक्रिया और ध्यान, परमपुरुष की निर्पेक्ष सेवा कर रहा हूँ  इस भावना से करना चाहिए, इसे आन्तरिक सेवा कहते हैं। इसप्रकार से कोई भी अपने मन को तीव्र गति से केद्रित कर सकता है। जप क्रिया के बीच यदि यह भावना पूर्णरूप से जाग्रत रहे तो साधक सबकुछ प्राप्त कर सकता है। आन्तरिक और वाह्य दोनो प्रकार की सेवाओं का बराबर महत्व है। वाह्य सेवा से मन शुद्ध होता है जिससे वह अपने इष्ट की और अच्छी तरह सेवा कर सकता है। सभी साधकों को दोनों प्रकार की सेवायें करना चाहिए। साधना, और कुछ नहीं अपने और परम पुरुष के बीच की दूरी कम करना है।

स्वरस- पूर्व काल में ब्रह्म का स्वरस अर्थात् दिव्य प्रवाह चैतन्य महाप्रभु के द्वारा प्रदर्शित किया गया, इससे लोग उनके पीछे पागलों की तरह भागते, रोते, नाचते, गाते और दिव्यानन्द में हॅंसते थे। ब्रह्म का स्वरस कृष्ण ने अपनी बाँसुरी  के द्वारा प्रदर्शित किया था जिसे सुनकर लोग पागलों की तरह अपने परिवार, संस्कृति, प्रतिष्ठा, सामाजिक स्तर आदि छोड़कर उनकी ओर भागते थे। इतना ही नहीं बृंदावन की गोपियां अपने घर की गोपनीयता छोड़कर बाँसुरी  के स्वर में नाचतीं गाती  और अट्टहास करतीं थी। आनन्दमार्ग (path of bliss) में ब्रह्म का स्वरस, साधना के विभिन्न पाठों में भर दिया गया है अतः जो इसे करते हैं या भविष्य में करेंगे अवश्य  ही ब्रह्मानन्द में डूब कर नाचेंगे, गायेंगे , रोयेंगे और स्थायी रूप से परम पुरुष को पाने की दिशा  में बढ़ेंगे।

अग्रयाबुद्धि-  आत्मा को न तो मन और न ही इंद्रियां समझ सकती हैं क्योंकि आत्मा इन सबसे सूक्ष्म है। आत्मा को समझने के लिये अग्रयाबुद्धि ही उपयोगी है जिसका अर्थ है एकाग्र बुद्धि। इसके सहारे ही मन आत्मा में मिल सकता है। मन अपना प्रसार इंद्रियों की सहायता से विभिन्न दिशाओं में बनाये रखता है यदि इस प्रसार को केवल एक बिन्दु  की ओर केन्द्रित कर दिया जावे तो इसे अग्रयाबुद्धि कहते हैं।

धीरपुरुष- जो अपनी वाह्य गतियों को आन्तरिक गतियों में बदल लेते हैं 'धीर' कहलाते हैं। धीर 'प्रत्यगात्मा' को जानने का प्रयास करते हैं। प्रत्यगात्मा का अर्थ है सबकुछ जानने की क्षमता जिसमें है वह अर्थात, आत्मा। ‘‘प्रतीपम विपरीतमॅंचति विज्ञानाति इति प्रत्यक‘‘ अर्थात् वह जो जीवात्मा के विपरीत मुद्रा लेकर जीवात्मा का साक्ष्य देती है वह 'प्रत्यक' है और प्रत्यक +  आत्मा =  प्रत्यगात्मा।  सबकुछ अदृश्य   वास्तविकता से आता है और अदृश्य  में ही विलीन हो जाता है। इन दो अदृश्य  स्थितियों के बीच दृश्य  स्थिति होती है।
इस क्षणिक दृश्यता  में जिसके पास जो होता है उसे हम अपना और पराया ये नाम देते हैं। यह उसी प्रकार का है जैसे कोई दो आमने सामने चल रही ट्रेनें थोड़ी देर के लिये समानान्तर हो जावें। भौतिक जगत की सभी विषय वस्तुऐं अपनी अपनी चाल से घूम रहीं हैं इसलिये तुम्हारी अपनी चाल है और अन्यों की दूसरी, अतः स्वभावतः सबका संपर्क क्षणिक है। इसीलिये 'धीर' इसकी चिंता नहीं करते कि कौन उनके संपर्क में आ रहा है और कौन छूट रहा है।

जीवान्तिका-  इसमें 'मन' परावर्तित होकर दृश्य  क्षेत्र में आकर अपना आकार लेता है। 'जीव' का अर्थ है कोई व्यक्ति या जीवधारी, और अन्तिका का अर्थ है निकटतम बिन्दु । संस्कृत में निकट और अन्तिका में कोई अंतर नहीं है, निकट माने पास और अन्तिका माने सबसे अधिक पास। तुम्हारा निकटतम बिन्दु  क्या है यह कहना संभव नहीं है, तुम्हें अपना बिन्दु  स्वयं ही जानना होगा। 'जीवान्तिका' तुम्हारा निकटतम बिन्दु  है।

भक्ति-  भक्ति का मतलब है मनोभावों के सभी झरनों को एकीकृत कर देना, साधना का अर्थ है भक्ति को जाग्रत करना। हमेशा  ध्यान रखना है कि हमारा हर प्रयास भक्ति को जाग्रत करने में ही हो, एक बार भक्ति जाग्रत हो गई फिर कुछ नहीं करना पड़ेगा।

क्रिया-  प्राकृतशक्ति, कुछ करने की प्रेरणा 'सात्विक घटक' से, कार्य करना 'राजसिक घटक' से और कार्य को अस्तित्व देना 'स्थैतिक घटक' से करती है, अर्थात् किसी भी कार्य का होना इन तीनों घटकों का संयुक्त परिणाम होता है। प्राकृतशक्ति जब परिणामविहीन कार्य करती है तो वह अव्यक्त और जब कार्य का परिणाम प्राप्त होता है तो वह व्यक्त कहलाती है। व्यक्त अवस्था में वह 'पुरुष भाव 'अर्थात् 'चेतना' को कर्मान्वित करती है। जब प्राकृतशक्ति   कार्य करती है पर परिणाम नहीं मिलता अर्थात् चेतना कर्मान्वित नहीं होती तो इस अवस्था में पुरुषभाव, ' चितिशक्ति ' कहलाता है। 'शम्भू' से यह जगत 'भैरव ' और फिर 'भव' अवस्था में आता है। ये सभी कम्पन उत्पन्न करते हैं और प्रकृति कम्पित होती है।
जो अनेक प्रकार के 'लक्ष्य ' रखते हैं वे उन सबके पीछे पीछे दौड़ते रहते हैं और अंत में कुछ भी नहीं पाते और जिन्होंने अपना एक ही लक्ष्य रखा है वे उसे सरलता से पा जाते हैं। इसीलिये कहा गया है कि ‘‘अनन्यममता विष्णोर्ममता ब्रह्मसंगता‘‘ अर्थात् अनेक विषयों की ओर न दौड़ कर केवल विष्णु की ओर दौड़ने से वे सरलता से प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि अनेक ओर दौड़ने से मन की शक्ति विभिन्न भागों में बॅट जाती है अतः कुछ भी नहीं मिल पाता।

श्री-   ऊर्जा का बीजमंत्र है ‘‘रम्‘‘। सभी लोग भौतिक जगत की उपलब्धियों के साथ ऊर्जा को भी सक्रिय रखना चाहते हैं अतः नाम और यश  के प्रेरक ‘‘श‘‘के साथ ऊर्जा की क्रियाशीलता के प्रेरक ‘‘र‘‘ को जोड़ने पर श + र = श्र, और स्त्रीलिग में यह हुआ श्री, इसे आधार मानकर ही भारत में नाम के आगे "श्री" लगाने का प्रचलन हुआ। आजकल इस अर्थ में 'श्री' किसी के पास नहीं है फिर भी सभी के नाम में श्री लगाते हैं।
श्रद्धा- विश्वाश  और समर्पण के संयुक्त भाव को 'श्रद्धा' कहते हैं, अंग्रेजी में इसका कोई शब्द  नहीं है। जीवन का जो कुछ भी मूलाधार है वह 'सत' कहलाता है और जब सभी ज्ञान और भावनायें इसी को प्राप्त करने के लिये चेष्टा करने लगती हैं तो यह ‘श्रत‘ कहलाता है, और इससे जुड़ी भावना को 'श्रद्धा' कहते हैं।

ज्ञानी- ज्ञानी होने से कुछ नहीं मिलता, ज्ञान का उपयोग तभी तक है जब तक 'भक्ति' उत्पन्न नहीं हो जाती। जब  किसी स्वादिष्ट भोजन को खाते हैं तो कागज की प्लेट जिसमें खाद्य पदार्थ रखा होता है वह ज्ञान है, भोजन करना कर्म है, और भोजन से मिलने वाला स्वाद भक्ति है। भोजन को स्वाद लेकर समाप्त कर देने के बाद कागज की प्लेट (अर्थात् ज्ञान), डस्टबिन में फेकने के अलावा और किस काम की  बचती  है। स्पष्ट है कि ज्ञान पूर्वक कर्म करने से ही भक्ति उत्पन्न होती है।

पंडित-      संस्कृत में एक क्रिया है ‘‘पंडा‘‘ जिसका अर्थ है ‘ जिसने यह समझ लिया है कि मैं ब्रह्म हूँ  और वैसा ही वह अनुभव करने लगा है‘ तो वह भावना ‘पंडा‘ कहलाती है ‘‘ अहं ब्रह्मास्मीति तामितः प्राप्तः बुद्धिः स पंडा‘‘। और इस प्रकार जिसकी यह पंडा नामक भावना दृढ  हो चुकी है वह कहलायेगा पंडित।

पंचभूत, देश(space) , काल(time), पात्र(person) और ध्यान

परमसत्ता, प्रकृति के सत, रज और तमो गुण के प्रभाव में आकर जब पंचभूतों का निर्माण करती है तभी स्पेस अर्थात् आकाश  का उद्गम होता है। वह अवस्था, जिसमें परमपुरुष पंचभूतों में रूपान्तरित नहीं होते हैं, स्पेस की सीमा से बाहर होती है।
समय अर्थात् टाइम, क्रिया की गतिशीलता का मानसिक मापन है। सामान्यतः सूर्य के उदय, मध्यान्ह और अस्त होने की क्रियाओं को मन के द्वारा मापन किया जाकर समय नामक तथ्य का अनुभव कराया जाता है परंतु यदि पृथ्वी का घूर्णन अथवा मन इन दो में से किसी एक को समाप्त कर दिया जावे तो समय भी समाप्त हो जाता है। इसलिये समय तभी समाप्त होगा जब परमपुरुष अपने ब्रह्मचक्र के प्रवाह में अपना रूपान्तरण पंचभूतों में करना बंद कर देंगे।
तीसरा सापेक्षिक घटक है पात्र अर्थात व्यक्ति। वास्तव में तो केवल परमपुरुष का ही अस्तित्व है पर जब वे खेल खेल में अपने को एक से अनेक में रूपान्तरित करते हैं तो व्यक्ति नामक घटक उत्पन्न होता है। इस संरचना के पूर्व कोई व्यक्तिगत घटक नहीं था और इसके समाप्त हो जाने पर भी नहीं रहेगा। परम पुरुष जब अपनी मूल अवस्था में होते हैं तो वह अवस्था मानव मन की परम मनोआत्मिक चिंतन की अवस्था होती है। परंतु समस्या यह है कि इस भाववाचक अस्तित्व का  ध्यान किया ही नहीं जा सकता है। केवल उस स्थिति में मनुष्य उन्हें ध्यान में ला सकता है और अपने जीवन का परम लक्ष्य मान सकता है जब वे अपनी मूलअवस्था अर्थात् नित्यानन्द अवस्था से लीलानन्द अवस्था में अपना रूपान्तरण करते हैं। जब वह परम अस्तित्व अपने को लीलानन्द मुद्रा में रूपान्तरित करता है तभी पंचभूत बनते हैं अन्यथा वह किसके साथ लीला करेंगे। जिस प्रकार किसी ने भी विद्युत को नहीं देखा पर उसके प्रभावों को सभी ने अनुभव किया है उसी प्रकार जब परमपुरुष अपने व्यक्त और अव्यक्त रूपों के साथ लीलानन्द अवस्था में होते हैं तभी उनका सरलता से ध्यान किया जा सकता है। इसलिये ध्यान का बिंदु इस संरचना का मूल कारक बिंदु होना चाहिये न कि विभिन्न वस्तुएं। इसलिये परमपुरुष ही ध्यान करने योग्य हैं अन्य कुछ नहीं।
  
क्रमिक अभ्यास-  आनन्दस्वरूप ब्रह्म को ही जानने का अभ्यास करना चाहिये क्योंकि सभी की संरचना आनन्द से ही हुई है  आनन्द में ही प्रतिष्ठित है और अंत में आनन्द में ही मिल जाती है। प्रारंभिक अवस्था में व्यक्ति एक समय में किसी एक इंद्रिय से परम सत्ता को प्राप्त करने का प्रयास करता है, पर अंत में अपने पूरे अस्तित्व अर्थात् विचारों, प्रवृत्तियों, अनुरोधों के द्वारा। जैसे पहली अवस्था में वह आंखों को बंद कर कहता है, .हे परमपुरुष अपना व्यक्तिकरण मुझ में करो, हे परमात्मा मुझे अंधकार से प्रकाश  की ओर ले चलो, मेरे मन के अंधेरे कक्ष में अचानक प्रकट होकर मुझे मेरे मानसिक नेत्रों से आपके दर्शन करने दो। इस प्रकार मानसिक आंख से देखना एकेन्द्रिय कहलाता है। धीरे धीरे अभ्यास हो जाने पर वह कहता है, प्रभो और निकट आओ में आपकी सेवा करना चाहता हूँ , अर्थात् स्पर्श  करना चाहता है, फिर मधुर बाँसुरी  को सुनकर आनन्द में डूबना  चाहता है अर्थात् श्रवणेद्रिय सक्रिय करता है। इसी क्रम से वह साधना करते आगे बढ़ता जाता है।

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा- जैसे हर जीवित प्राणी का विषय उसका गर्वीला मन होता है उसी प्रकार मन का विषय पुरुष होता है। विशेष परिस्थितियों में इस पुरुष को जीवात्मा कहते हैं। केवल ब्रह्म की ओर बढ़ने और उनके मूल स्वरूप को पाने पर ही मनुष्य इस संसार के मोहभ्रम से छूट सकता है। अपने मूल स्वरूप को पाने का अर्थ है सार्वभौमिक पुरुष को प्राप्त करना। विषय रहित जीवात्मा और विषयमुक्त सार्वभौमिक आत्मा एक ही हैं। यह ज्ञान परम ज्ञान है जो अनेक जन्मों के पुण्यों के प्रभाव से प्राप्त मानव देहधारी को ही प्राप्त करना संभव होता है। यह ज्ञान पुस्तकें पढ़ने से प्राप्त नहीं होता इसे प्राप्त करने के लिये तीव्र लगन से आध्यात्मिक साधना करना होती है। ब्रह्म को लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना होता है, जब सभी वृत्तियों को परम ब्रह्म की ओर प्रेषित करना प्रारंभ हो जाता है तो वे सूक्ष्म से सूक्ष्म होते हुए ब्रह्म में मिल जाती हैं। ज्योंही वृत्तियां समाप्त हो जावेंगी मन भी समाप्त हो जावेगा और आप मन की सीमा से बाहर जा पहुंचेंगे। सुख दुख की अनुभूति से ऊपर अपने आप में। इसलिये मन को अति सतर्कता से अधिकतम प्रयास कर पापों से दूर रखो और मन की शुद्धता को किसी भी प्रकार से खंडित नहीं होने दो। कुछ समय तक अभ्यास करते रहने पर पाओगे कि जो मन इन दुष्ट प्रवृत्तियों को पाले हुए था अब आपका सबसे अच्छा मित्र बन गया है और आपको सच्चे मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित कर रहा है। इस प्रकार मन आत्मप्रकाश  से आभावान होकर अपने आप उस निर्पेक्ष सत्य का साक्षात्कार करावेगा।

मधुविद्या- यदि आप मधुविद्या का उचित प्रकार से पालन करते हैं तो कर्म करते हुए भी आप कर्म बंधन में नहीं फॅंसेंगे और कर्मबंधन  से मुक्त हो जावेंगे। मधुविद्या आपके भीतर और बाहर, ब्रह्मानन्द के उल्लास से भर देगी और कष्टों से सदा के लिये मुक्त कर देगी। अविद्यामाया के जबड़े फिर आपके पास आकर निगल नहीं सकेंगे। आपके चारों और केवल एकमात्र भद्र सत्ता की कीर्ति चमकने लगेगी।

शम्भूलिंग- ब्रह्मांड के निर्माण के पीछे अलौकिक रूप से परमसत्ता की इच्छा ही कार्य कर रही है, दर्शन शास्त्र  में इस इच्छा को ही शम्भूलिंग कहा जाता है।

कौषिकी या शिवानी , भैरवी और भवानी- परम सत्ता की ब्रह्मांड के निर्माण करने की इच्छा उत्पन्न होने के साथ ही उन्हें अस्तित्व वोध कराने की शक्ति को 'शिवानी' और उसके आधार को 'शिव' कहते हैं। ब्रह्मांड के निर्माण के समय जब शिवानी शिव लिंग से निकलकर सरलरेखिक गति में होती है तो आकाश  का निर्माण होने लगता है और इसमें तेज गति होने पर सरल रेखा में वकृता आने लगती है जिससे समय का निर्माण होता है समय के निर्माण का कार्य करने वाली शक्ति 'भैरवी' कहलाती है और इसका आधार 'भैरव'।   समय का निर्माण होने के साथ ही रजोगुण और तमोगुण अधिक सक्रिय हो जाते हैं जिससे सूक्ष्म सत्ता को विविध ठोस रूप और दृश्य  आकार देने के लिये क्रियाशील शक्ति को 'भवानी' कहते हें और इस का आधार 'भव' कहलाता है। इसीलिये यह संसार भवसागर भी कहलाता है।

सीखने का उचित तरीका
ज्ञान पिपासुओं को सीखने का उचित तरीका यह है कि वे हमेशा  यह मानते रहें कि वे कुछ नहीं जानते।

कर्मसंन्नयास- साधारण प्रकार के कार्यों को कोई भी अपने छोटे से मस्तिष्क से कर सकता है परंतु बडे़ और पवित्र कार्य करने के लिये उसे परमपुरुष के मस्तिष्क से अपने मन को जोड़ना पड़ेगा और उसके परम ज्ञान के द्वारा काम करना होगा। इसे ही कर्मसंन्नयास की भावना कहते हैं। इकाई मन को भूमा मन के साथ जोड़ने की विधि क्या है? चूंकि विकास की प्रक्रिया का आधार स्थूल से सूक्ष्म की ओर है इसलिये बुद्धि को सूक्ष्म बनाने के लिये सूक्ष्म सत्ता का ही विचार मन में लाना होगा। उस परम सूक्ष्म सत्ता का लगातार चिंतन करते रहने से धीरे धीरे मन सूक्ष्म होते हुए उसी में परिवर्तित हो जावेगा। इस प्रकार इकाई मन में परमसत्ता से पृथक होने  का भाव समाप्त हो जाता है और वह स्वयं भूमा मन बन जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। बुद्धि की इस परमोत्कृष्ट अवस्था को कर्म संन्नयास कहा गया है इसलिये बुद्धिमान  लोग कर्म संन्नयास के प्रति सचेत रहें।
कर्मसंन्नयास और परा भक्ति में क्या संबंध है? जब परमचेतना अपनी मूल अवस्था में रहती है तो वह परब्रह्म कहलाती है, परंतु जब वह भिन्न भिन्न विचारों या वस्तुओं में रूपान्तरित हो जाती है तब उसे अपरब्रह्म कहते हैं। अतः अपरब्रह्म से लगाव या आसक्ति रहना अपराभक्ति और परमपुरुष से अत्यधिक प्रेम करना पराभक्ति कहलाता है। देश , काल और पात्र की सीमाओं से बाहर निकलने का नाम कर्म संन्नयास है।

वैराग्य- 'ज्ञानस्यैव पराकाष्ठा वैराज्ञम्'। वैराग्य अर्थात् राग रहित होना ज्ञान की ही पराकाष्ठा है। ज्ञान प्राप्ति की भिन्न भिन्न स्थितियों में मन की तरंग लंबाइयां अर्थात् वकृता भिन्न भिन्न होती है और अपेक्षतया छोटी होती हैं परंतु, परमज्ञान या ज्ञान की पराकाष्ठा पर पहुंचने पर मन की तरंग लंबाई सरलरेखा जैसी हो जाती है और वह परमब्रह्म की तरंग लंबाई के साथ अनुनाद स्थापित करने में समर्थ हो जाता है।
आत्मसाक्षात्कार ही असली ज्ञान है, इसमें किसी भी प्रकार का व्यक्तिकरण करना संभव नहीं होता क्योंकि इस अवस्था में वाह्य वस्तु,, मन, और आत्मा सब कुछ एक ही हो जाते हैं। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय परम एकीकरण में मिल जाते हैं। आत्मसाक्षात्कारी को बिना  पढ़े ही आत्मा में परावर्तित होने वाली विषयवस्तु का पूरा पूरा सही ज्ञान हो जाता है। इसी तरह वह क्या, क्यों, कब और कैसे अदि प्रश्नो  के उत्तर भी पा जाता है। सच्चा ज्ञान यही है बाकी तो ज्ञान की प्रच्छाया ही है।
संसार के सभी विषयों को छोड़कर जब मन केवल परम सत्ता की ओर दौड़ने लगता है तो इसे भक्ति कहते हैं। भक्त यह नहीं जान पाता कि उसका मन कब और कैसे परिवर्तित हो गया और वह अनुभव करने लगता है कि अब वह इकाई मन नहीं है। जब किसी के मन से व्यक्तिगत  भावनाएं पूरी तरह हट जाती हैं तो जिस क्षण वह आगे बढ़ता है वह परम लक्ष्य को पा जाता है। परमपुरुष जिस प्रकार अपनी सृष्टि को प्यार करते हैं उसी प्रकार भक्त को परम पुरुष से प्यार करना चाहिए इस प्रकार उनकी इच्छा से कार्य करते करते मन उन्हीं में मिल जावेगा।
कुछलोग कहते हैं कि परमात्मा से एकाकार होना उचित नहीं है वरन् उनके साथ रहकर उनकी सेवा करना उचित है। अन्य कहते है, परमात्मा के साथ एक हो जाने वालों की इच्छायें परमात्मा की इच्छायें हो जाती हैं और वे सब कार्य आत्मा द्वारा करते है। कुछ और भी कहते हैं कि, जो परमात्मा को प्यार करते हैं वे उनकी सन्तान को भी प्यार करेंगे और उनकी सेवा करेंगे तो किसी को यह क्यों सोचना चाहिए कि उसे परमात्मा में मिलकर एक हो जाना चाहिए?
इसका उत्तर यह है कि यह विषय परमात्मा पर ही छोड़ देना चाहिए क्योंकि, वे, जो सही भक्त हैं, जानते हैं कि परमात्मा उनकी तुलना में अधिक बुद्धिमान हैं। इसे प्रणिपात कहते हैं और यह पराभक्ति से प्राप्त होता है। हमेशा  याद रखना है कि यहां हम धर्म का पालन करने और मानवता के साथ मित्रता, प्यार और भाईचारा निर्मित करने के लिये आये हैं। जो  धर्म से जुड़े रहेंगे वे अलौकिक सफलता अंकित करेंगे।

गुरु की कसौटी:- आध्यात्मिक क्षेत्र में आदर्श  गुरु वह है जो साधना के सभी आवश्यक और अनावश्यक सूक्ष्मतम तथ्यों से परिचित हो। गुरु को केवल इन तथ्यों की जानकारी ही नहीं दूसरों को इनके सिखाने की भी योग्यता होना चाहिए, अन्यथा उसे गुरु नहीं माना जा सकता। यह योग्यता केवल महाकौल के पास ही होती है अन्य किसी के पास नहीं। कौल वह हैं जिन्होंने अपनी साधना के बल पर अपनी छुद्र अवस्थिति को सफलतापूर्वक परम अवस्थिति में स्थापित कर उन्नयन कर लिया है। परंतु महाकौल  वह है जो कौल तो है ही परंतु अन्यों को भी इस परम उन्नत अवस्था अर्थात् कौल को प्राप्त करा देने की योग्यता रखते हैं। अभी तक भगवान शिव और कृष्ण ही महाकौल हुये हैं। गुरु होने के लिये महाकौल होना अनिवार्य है। सैद्धान्तिक और प्रायोगिक साधना का ज्ञान, शास्त्रों का ज्ञान और सभी महत्वपूर्ण भाषाओं का ज्ञान होना गुरु के लिये अनिवार्य है। आध्यात्मिक गुरु के पास स्नेह करने और दंड देने की क्षमता होना चाहिये परंतु दंड का स्तर स्नेह करने के स्तर से अधिक नहीं होना चाहिये। गुरु को सभी विषयों के आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक पक्ष का पूरा ज्ञान होना चाहिये, किताबों में जो लिखा है उससे भी अधिक, तभी वह शिष्यों को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाकर पूरा ज्ञान दे सकेगा। मानव मन में अपेक्षाओं का तंतु रहता है , जो इसे दूर कर संतोष दे सकता है वही गुरु है। मन की क्रियायें और उसे नियंत्रित करने का साधन बताना भी गुरु का कर्तव्य है। मनुष्य, गुरु, और शिष्य सभी हाड़ मास के पुतले हैं, सबके दुख और सुख है भौतिक आवश्यकताएं  हैं, आंसु हैं सुख के और दुख के भी, पर असली गुरु को भौतिक क्षेत्र में लोगों के भोजन ,वस्त्र , आवास ,चिकित्सा और शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के समाधानकारक उपाय सुझाने में कुशल होना चाहिये। इसलिये पृथवी पर गुरु होने के लिये उसमें आध्यात्मिक जगत की सर्वोच्च योग्यता के साथ साथ भौतिक जगत में पहाड़ों जैसी समस्याओं को हल करने की क्षमता भी होना चाहिये।
गुरु में शिष्य के मन के भीतर का अंधकार हटाने की क्षमता होना चाहिये। इसी लिये कहा गया है कि ‘‘ब्रह्मैव गुरुरेकः नापरः‘‘ अर्थात् ब्रह्म ही गुरु हैं अन्य दूसरा कोई नहीं। अतः स्पष्ट है कि गुरु की जिम्मेदारी निभाना बच्चों का खेल नहीं है। वह जो रूपहीन, आदिअन्त  रहित अनन्त चेतना हैं वही प्राप्त करना जीवमात्र का लक्ष्य होना चाहिये, वही एकमात्र जगतगुरु हैं और ब्रह्म विद्या को उन्हीं के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। लोगों को उनकी महानता को स्वीकारना चाहिये।
आजकल किसी कार्य विशेष के जानकार को गुरु कहने की पृथा चली है जैसे कंप्युटरगुरु, मेकेनिक गुरु, राजनीतिगुरु, खेल गुरु आदि आदि पर यह गुरु शब्द की महत्ता को कम करना ही है।
शास्त्र कहते हैं कि ‘‘ गुरवः वहवः सन्ति, वित्तहर्ता न तु चित्तहर्ता।‘‘  अर्थात् वित्तहर्ता गुरु तो बहुत हैं, पर चित्तहर्ता गुरु बहुत कठिनाई से मिलते हैं।

गुरुपूजा:-    साधक और गुरु के बीच यह एक व्यक्तिगत मामला होता है जहां वह अपने को गुरु के अत्यन्त निकट होने का अनुभव करता है। इस अवस्था में वह गुरु के प्रति अपना सर्वस्व अर्पण कर देता है। गुरुपूजा की सफलता शिष्य की सही भक्ति भावना के साथ एकाग्रचित्त होने पर निर्भर करती है। शिष्य को उन परिस्थितियों का ज्ञान होना आवश्यक होता है जिनमें आंखें बंद करके या खुली रखकर गुरुपूजा करने का विधान है क्योंकि साधक की आत्मिक उन्नति पर इसका भी बहुत प्रभाव पड़ता है। इसलिये गुरु के प्रति भक्ति भाव से पूर्ण समर्पण कर देने में ही भलाई है।

परम पुरुष से बात करना:-  मनुष्य को परमपुरुष ने बोलने की शक्ति दी है, इसलिये यदि वह उनसे कुछ कहता है तो उसे सुनना पड़ेगा। यदि वह नहीं सुनेगा तो कौन सुनेगा। इसलिये मनुष्य अपने सभी दुखों और समस्याओं को अपने निकटतम और सबसे प्रिय को ही तो कह सकेगा। परमपुरुष को उन्हें सुनना पड़ेगा। इसका अर्थ है कि हमें अपने सभी सुखों ओर दुखों के बारे में अपनी ध्यान साधना के दौरान परम पुरुष से बात करना चाहिये जिससे कि मन और हृदय में गहरे छिपे भावों को उन तक  पहुँचाया  जा सके। भक्त के जीवन में परमपुरुष के निकट आने और उनसे सीधे जुड़ने  का यह तरीका  सरल समीकरण है। 

Thursday, 6 November 2014

2.3 हमारी आकाश गंगा और अन्य आकाश गंगायें

2.3  हमारी आकाश गंगा और अन्य आकाश  गंगायें

अब देखिये, हमारा सौर परिवार और इस तरह के लाखों अन्य सौर परिवार जिसमें आश्रय लिये हुये हैं वह है हमारी  गैलेक्सी आकाशगंगा।  कासमस अर्थात् ब्रह्मांड में इस प्रकार की अनगिनत गेलेक्सियां हैं। कुछ का ज्ञात विवरण संक्षेप में नीचे दिया जा रहा है।

Milky way 
 Milky way अर्थात् अपनी आकाश गंगा में अपना सौर परिवार स्थित हैं। इसकी आयु 13.2 बिलियन ईयर है तथा 300 बिलियन तारों को समेटे इसका द्रव्यमान सूर्य की तुलना में 1250 बिलियन गुना है।

Andromeda galaxy

पृथ्वी से 2,5 मिलियन लाइटईयर दूर यह कुंडलाकार एन्ड्रोमेडा गैलेक्सी है। यह एनजीसी 224 या मेसीयर 31 भी कहलाती है। इसकी आयु 9 बिलियन साल है और इसमें 1 ट्रिलियन तारे हैं। अपने सूर्य से इसका द्रव्यमान 1230 बिलियन गुना है।

Whirlpool Galaxy

केन्स वेनाटिकी तारामंडल में स्थित यह व्हर्लपूल कुंडलाकार गेलेक्सी है जो अपनी अंतरक्रिया से भव्य आकार निर्मित करती, पृथ्वी से 23,160,000 लाइट ईयर दूरी पर दिखाई दे रही है। इसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से लगभग 160 बिलियन गुना है।

Pinwheel Galaxy

पिनव्हील गेलेक्सी, नासा के चार स्पेस टेलिस्कोपों से देखे जाने पर इसमें इन्फ्रारेड, विजिविल, अल्ट्रावायलेट और एक्स रेज के डाटा पाये गये हैं। इसे एम 101 के नाम से भी जाना जाता है। इसका मल्टी स्पेक्ट्रल दृश्य  प्रकट करता है कि इसकी सघन बनावट वाली कुंडलाकार भुजाओं में नये और पुराने दोनों प्रकार के तारे समान रूप से वितरित हैं। यह अर्सा मेजर तारा मंडल में स्थित है।

Sombrero Galaxy

सोम्ब्रेरो गेलेक्सी, यह अबाधित कुंडलाकार गेलेक्सी है। वर्गो तारा मंडल में स्थित यह हमारी पृथ्वी से 29 मिलियन लाइट ईयर दूर है। इसका चमकदार केन्द्र और असामान्य केन्द्रीय उभार है। इसकी झुकावदार डिस्क पर धूल की प्रमुख रेखा है। इसका द्रव्यमान अपने सूर्य से 1 बिलियन गुना है।


The majestic spiral galaxy NGC 4414

     हबल के वाइड फील्ड प्लेनेटरी केमेरा 2 से 1995 में तेजस्वी कुंडलाकार गेलेक्सी  एनजीसी 4414 का चित्र लिया गया  है जो पृथ्वी से लगभग 60 मिलियन लाइट ईयर दूर है। इसके केन्द्रीय भाग में बहुत पुराने पीले और लाल तारों  की कुंडलियां हैं और बाहरी कुंडलाकार भुजाओं में नीले तारों का निर्माण होता दिखाई दे रहा है। इन भुजाओं में इन्टरस्टैलर डस्ट के घने बादल छाये हुये हैं।


2.4  ब्रह्माॅंडीय माडल

ब्रह्माॅंड का आद्यान्तिका में  दिया गया माडल स्पेसटाइम और जो कुछ उसमें है, के उद्गम और विस्तार को प्रकट करता है। इस चित्र में टाइम को बाये से दांये बढ़ते हुए दर्शाया  गया है तथा स्पेस की एक विमा को दबा दिया गया है अतः किसी भी समय यूनीवर्स को चकती के आकार की पट्टी के रूप में देखा जा सकता है।

इसके बाद  ब्रह्माॅंड को फैलते हुए गोले के रूप में दिखाया गया है । वे गेलेक्सिियाॅं जो सबसे दूर हैं सबसे तेज भागती जा रही हैं अतः केन्द्र में खड़े अवलोकन कर्ता को छोटे आकार की दिखाई देती है।

2.5  काॅसमस अर्थात् ब्रह्मांड का आकार और आयु

पूर्वोक्त सभी प्रकार की ज्ञात और अज्ञात गेलेक्सियां जिसके अंदर आश्रित हैं उसे काॅसमस या ब्रह्मांड कहते हैं। वर्तमान वैज्ञानिक सिद्वान्तों के अनुसार काॅसमस की उत्पत्ति 13.7 बिलियन साल पहले बिग बेंग में हुई। दृश्य  कासमस का व्यास लगभग 93 बिलियन लाईट ईयर माना जाता है। संपूर्ण काॅसमस का व्यास अज्ञात है फिर भी एलान गुथ की इन्फ्लेशन थ्योरी के अनुसार काॅसमस का वास्तविक आकार दृश्य  काॅसमस से परिमाण के क्रम में  कम से कम 15 गुना अधिक  होना चाहिये।  अर्थात् यदि इन्फ्लेमेशन थ्योरी सही है तो वर्तमान में दृश्य  काॅसमस का 93 विलियन लाइट ईयर व्यास संपूर्ण काॅसमस की तुलना में वैसा ही होगा जैसे सूर्य के व्यास की तुलना में हीलियम एटम का व्यास। इसतरह संपूर्ण काॅसमस का व्यास 1026  (10के ऊपर 26 की घात) ,लाइट ईयर प्राप्त होता है। इतने बड़े आकार की कल्पना कीजिए?

काॅसमस की प्रकृति
   स्पेस: काॅसमस का ऐंसा रेशा (fibre) जो मोड़ा और ऐंठा जा सकता है और समय के साथ चार विमीय रेशा   निर्मित कर लेता है। समय और स्पेस अपने आप में एडजस्ट होते रहते हैं जिससे प्रकाश  की चाल एकसमान बनी रहती है चाहे वह कुछ भी क्यों न हो। ध्यान रहे स्पेस वह लचीला रेशा  है जिसमें गेलेक्सियां, तारे और अन्य भारी ग्रह भरे हुये हैं। इनका भार स्पेस टाइम रेशे  को मोड़ देता है जिससे कम द्रव्यमान के तारे या ग्रह भारी द्रव्यमान के तारे के चारों ओर घूमने लगते हैं जैसे पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के चक्कर लगाता है। इस घटना को गुरुत्व बल कहा जाता है जो  स्पेस के चार प्रमुख बलों में से एक है।

टाइम: चूंकि स्पेस और टाइम एकीकृत होते हैं इसलिये स्पेस के भीतर गति, समय को प्रभावित करती है। टाइम गतिशील व्यक्ति के लिये धीमा हो जाता है जबकि स्थिर व्यक्ति के लिये तेजी से गति करता है, इसका अर्थ यह हुआ कि टाइम की गतिशीलता जो हम अनुभव करते हैं वह एक भ्रम है। इस स्थिति में प्रारंभ से लेकर भविष्य में बहुत दूर तक, समय का प्रत्येक क्षण, साथ साथ रहता है परंतु वह काॅसमस के विभिन्न क्षेत्रों में होता है। इससे समय के गतिशील होने की संकल्पना इस प्रकार बनती है कि ‘टाइम और स्पेस के एकीकृत भौतिक अस्तित्व होने के कारण यह संभव है कि स्पेस टाइम रेशों  में कुछ लघु रास्ते हों जो हमें वर्तमान समय से भिन्न किसी अन्य समयान्तराल में ले जा सकें‘। समय की गतिशीलता होने के वावजूद इसके कोई प्रमाण नहीं हैं जिनके आधार पर हम भूतकाल अथवा भविष्य को परिवर्तित कर सकें। इसका कारण यह है कि समय के विभिन्न अन्तराल स्थायी अवस्था में रहते हुए सहअस्तित्व में होते हैं। फिर भी टाइम की सही सही प्रकृति अभी भी पूरी तरह ज्ञात नहीं है।

काॅसमस के विभिन्न बल:
 गुरुत्वीय बल- आइ्रस्टीन की जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटि के अनुसार स्पेस टाइम में वकृता उत्पन्न करने वाला बल गुरुत्वीय बल कहलाता है।
विद्युतचुंबकीय  बल- आवेशित कणों पर लगने वाला एक प्राकृतिक बल विद्युत चुंबकीय बल कहलाता है।
प्रबल नाभिकीय बल- प्रकृति का वह बल जो न्युट्रानों बौर प्रोट्रानों के भीतर क्वार्क्स को बांधे रहता है और उन्हें प्रभावित करता है।
दुर्बल नाभिकीय बल- प्रकृति का वह बल जो परमाणुओं के खंडीय स्तरों पर सक्रिय रहता है और रेडियो एक्टिविटी जैसी घटनाओं के लिये उत्तरदायी होता है।

चूँकि  गुरुत्वीय बल खगोलीय स्तर पर और अन्य तीनों बल परमाण्वीय स्तर पर सक्रिय होते हैं अतः समस्या यह बनती है कि सामान्य सापेक्षता सिद्वान्त परमाण्वीय स्तर पर लागू नहीं हो पाते क्यों कि क्वान्टम स्तर पर परमाणुओं का व्यवहार व्यवस्थित नहीं रह पाता। गुरुत्वीय बलों के साथ कॉसमॉस  का व्यवहार विश्वसनीय  और व्यवस्थित होता है जबकि क्वान्टम स्तर पर कणों की ऊर्जा और स्थिति का पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं होता। परमाण्विक स्तर पर होने वाली अव्यवस्था पर नियंत्रण कर पाना भौतिक वेत्ताओं की सबसे बड़ी कठिनाई है। क्वान्टम स्तर पर ग्रेविटान नामक कण को गुरुत्वीय बल का जनक माना जाता है परंतु अभी तक प्रायोगिक रूप से यह सिद्ध नहीं हो पाया है। ऊपरी स्तर पर स्पेस लचीला और व्यवस्थित है परंतु परमाण्विक स्तर पर वह सक्रिय, बहुविमीय और पूर्वानुमान रहित होता है।

सभी बलों के एकीकरण का प्रयास: स्पेस को खगोलीयस्तर से लेकर परमाण्विक/क्वान्टम स्तर तक समझने के लिये सभी बलों का एकीकृत होना आवश्यक  है, इसलिये वर्तमान में स्ट्रिंग थ्योरी को लाया गया है जो स्पेस की मूल प्रकृति को समझाने में सहायक मानी जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसार मूल घटकों को  धागे की एकविमीय खुली या बंद लूप में कम्पित हो रही ऊर्जा के रूप में माना गया है जो क्वान्टम मेकेनिक्स और सामान्य रिलेटिविटी को एकीकृत करता है। चूंकि कण तरंग की भांति व्यवहार करता है अतः उन्हें मूल स्तर पर बटे हुए धागे के  आकार में निर्मित माना जा सकता है। ऊर्जा के ऐंठन के आकार को देखकर  यह अंदाज लगाया जाता है कि कौन प्रोटान है और कौन न्यूट्रान, अर्थात् कणों की पहचान इसी आधार पर की जाती है परंतु अभी तक यह सिद्धान्त ही है, कोई प्रायोगिक रूप से इसे  प्रमाणित /अप्रमाणित नहीं कर पाया है।

अतः, काॅसमस को इस प्रकार पारिभाषित किया जाता है ‘‘ बाहरी स्पेस से परमाण्विक स्तर तक जो कुछ भी अस्तित्व में है उसका व्यवस्थित उपक्रम ‘कासमस‘ है,‘‘ अर्थात् Ordered system of all that exist from outer space down to the atomic scale.

हबल का नियम
गेलेक्सियों के बीच पारस्परिक स्पेस में दिखाई देने वाले सभी पिंडों में, पृथ्वी के सापेक्षिक वेग के साथ और पारस्परिक ‘‘ डापलर शिफ्ट ‘‘ पाई जाती है। और, पृथ्वी से दूर जाने वाली विभिन्न गैलेक्सियों का डापलर शिफ्ट  के आधार पर नापा गया यह वेग पृथ्वी  और अन्य सभी पिन्डों से उनकी दूरी के समानुपाती होता है। इसका अर्थ यह है कि अवलोकित ब्रह्मांड का स्पेस-टाइम आयतन फैलता जा रहा है जिसका सीधा प्रमाण हबल का नियम है। स्पेस टाइम आयतन के फैलने की दर को हबल कास्टेंट का नाम दिया गया है।

3 अक्टूबर 2012 को नासा के द्वारा हबल नियताॅंक का मान गणना कर  74.3 ± 2.1 (km/s)/Mpc
 बताया गया है।

आद्यान्तिका में  93 बिलियन प्रकाश वर्ष के आकार का त्रिविमीय अवलोकनीय ब्रह्माॅंड की कल्पना की गई है। इसका स्केल इसप्रकार लिया गया है कि दिखाई देने वाले छोटे छोटे से कण वास्तव में बड़े बड़े सुपरक्लस्टरों के समूह को प्रदर्शित  करते हैं। वर्गो सुपरक्लस्टर जो कि अपनी आकाशगंगा का घर कहलाता है उसे केन्द्र में दिखाया गया है पर वह बहुत छोटा होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा है।

ब्रह्माॅंड की अंततः आयु और भविष्य

ब्रह्माॅंड की अंततः आयु और भविष्य की गणना हबल कांस्टेंट को आज की स्थिति में ज्ञात कर, उसे अवलोकित अवमंदन (या अवत्वरण) की परिमिति के मान के साथ एक्स्ट्रापोलेट करने पर की जा सकती है। अद्वितीय रूपसे प्राप्त किये गये घनत्वीय परिमिति के पदार्थीय मान  Ωऔर डार्क ऊर्जा के मान ΩΛ , यदि बंद ब्रह्मांड के लिये क्रमशः    ΩM > 1  vkSj  ΩΛ = 0    लिये जावें तो  उसका अन्त बहुत बड़ी कमी के साथ होगा जो हबल की आयु से कम होगा, परंतु यदि खुले ब्रह्मांड के लिये यही मान क्रमशः ΩM ≤ 1   vkSj  ΩΛ = 0    लिये जावें तो यह लगातार फैलता जावेगा और उसकी आयु हबल आयु के बराबर होगी। हबल पैरामीटर के मान का घटना बढ़ना तथाकथित अवत्वरण पैरामीटर(q) के मान पर निर्भर करता है। इसे इस प्रकार परिभाषित किया जाता है,

                    q        =   - ( 1+ H/H2 
      किसी ब्रह्मांड के लिये यदि अवत्वरण का मान शून्य  हो तो, ] H = 1/t, जहाँ  t बिग बंग की घटना 
       होनेका समय है।(q) का समय पर निर्भरशील  अशून्य  मान, प्राप्त करने के लिये फ्राइडमन समीकरणों
      को वर्तमान समय से पीछे चलते हुए सहगामी क्षितिज के शून्य  आकार होने तक के बीच के समय में
      इन्टीग्रेट  करना होगा। लंबे समय तक  (q) के मान को धनात्मक माना जाता रहा जिससे यह
      धारणा बनी थी कि गुरुत्वाकर्षण के कारण ब्रह्माॅड का फैलाव घटता जायेगा और ब्रह्माॅड की आयु
     1/H से कम होगी जो गणना करने पर 14  मिलियन वर्ष होती है।  परन्तु  1998 में हुई खोज से ज्ञात
      हुआ है कि अवत्वरण पेरामीटर का मान ऋणात्मक होता है जिसका अर्थ है कि ब्रह्माॅंड की आयु
      1/H   से अधिक होनाचाहिए पर यह लगभग इसके बराबर ही प्राप्त होती है।

ब्रह्मांड, गेलेक्सियों को समेटे ऐंसा गोला है जो लगातार फैलता जा रहा है। सबसे दूरस्थ गेलेक्सी सबसे तेज चलती है अतः उसकी लंबाई की दिशा में संकुचन हो जाने के कारण केन्द्र में खडे़ अवलोकनकर्ता के लिये वह छोटी दिखाई देती है।

2.6  बहुब्रह्माॅड और ब्लेक होल

  बहुब्रह्माॅंड:
अपने यूनीवर्स की तरह स्पेस में अन्य यूनीवर्स हो सकते हैं और उन्हें नीचे दिये गये माडल के अनुसार प्रकट किया जा सकता है और मल्टीवर्स सिद्धान्त के समर्थन और विपरीत दोनों प्रकार के वैज्ञानिक वहस कर रहे हैं। यह माना जा रहा है कि बुलबुले के आकार के सात यूनीवर्स हो सकते हैं जिनके स्पेसटाइम अलग होंगे और उनके भौतिक नियम और स्थिरांक तथा विमायें या टोपोलाजी भी भिन्न होंगी। परंतु प्रायोगिक प्रमाणों के अभाव में ये विचार अभी एक मत से स्वीकार नहीं किये जा पा रहे हैं पर भविष्य में इस रहस्य से अवश्य  पर्दा उठ सकता है।

ब्लेक होलः
ब्लेक होल  स्पेस टाइम का वह क्षेत्र है  जिसका गुरुत्व, प्रकाश  सहित सब कुछ को अपने में से बाहर निकलने से रोक लेता है। द्रव्यमान के अनुसार ये अपने सूर्य की तुलना में 10 से 15 गुने द्रव्यमान के तारों की मृत्यु होने के समय उस समय उत्पन्न होते हैं जब मरने वाले तारे एक बिंदु  पर शून्य  आयतन और अनन्त घनत्व के साथ टकराते हैं और सिंगुलारटी को निर्मित करते हैं ।  सापेक्षिकता का सामान्य सिद्धान्त कहता है कि द्रव्यमान के पर्याप्त सघन हो जाने पर स्पेसटाइम में विरूपण आ जाता है जिससे ब्लेक होल बनते हैं। सिंगुलारटी के चारों ओर गुरुत्वीय बल इतना अधिक होता है कि प्रकाश  भी नहीं भाग पाता, यह ब्लेक होल के चारों ओर गणितीय रूपसे पारिभाषित तल होता है जो ‘‘ईवेंट होरीजन‘‘ कहलाता है और वहाॅं पहुंचने पर कोई भी वापस नहीं लौट सकता। इसे ब्लेक होल इसलिये कहते हैं क्योंकि उससे टकराने वाला प्रकाश  पूर्णतः कृष्ण पिंड की तरह अवशोषित हो जाता है। ईवेंट होरीजन से नियत ताप का विकिरण निकलता है जो ब्लेक होल के द्रव्यमान का व्युत्क्रमानुपाती होता है अतः बहुत अधिक द्रव्यमान के ब्लेक होलों का विकिरण नापना बहुत ही कठिन होता है। अधिकाॅंश  गेलेक्सियों के केन्द्र में अत्यधिक द्रव्यमान के ब्लेक होल पाये जाते हैं जो भारी तारों के समाप्त होने पर परस्पर टकराने से बनते हैं। एक बार ब्लेक होल बन जाने के बाद वह अपने आसपास के द्रव्यमान को अवशोषित करते हुए अत्यधिक द्रव्यमान का हो जाता है।  ब्लेक होल के निर्मित होकर स्थायी आकार ले लेने पर उसमें द्रव्यमान ,आवेश  और कोणीय संवेग ये तीन स्वतंत्र गुण पाये जाते है।


ईवेंट होरीजनःः ब्लेक होल के होने का प्रमाण ईवेंट होरीजन से ही मिल पाता है , यह स्पेस्टाइम के भीतर वह सीमा होती है जिसके भीतर पदार्थ और प्रकाश , ब्लेक होल के भीतर केवल प्रवेश  कर सकते हैं, पर बाहर नहीं निकल सकते। ईवेंट नाम इस लिये दिया गया है क्योंकि उस क्षेत्र में होने वाली किसी भी घटना अर्थात् ईवेंट की जानकारी अवलोकनकर्ता को प्राप्त नहीं हो सकती। स्थिर ब्लेक होलों में इसका आकार हमेशा  लगभग गोलीय होता है, पर घूमने बाले ब्लेक होलों में ईवेंट होरीजन का आकार कुछ कुछ चपटा होता है।

प्रचंडरूप से भारी ब्लेकहोल ही वे अवशेष होंगे जब गेलेक्सियों के सभी प्रोटान क्षय हो चुकेंगे, फिरभी ये ब्लेक होल भी अमर नहीं हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि 1040 (10 के ऊपर 40  की घात) , वर्ष बाद पूरे ब्रह्मांड में केवल ब्लेक होल ही होंगे। वे हाकिंग रेडिएश न के अनुसार धीरे धीरे वाष्पीकृत हो जावेंगे। अपने सूर्य के बराबर द्रव्यमान वाला एक ब्लेक होल नष्ट होने में 2x1066   ( 2x 10के ऊपर 66 की घात), साल लेता है, परंतु इनमें से अधिकांश  अपनी गेलेक्सी के केेन्द्र में स्थित अपनी तुलना में अत्यधिक द्रव्यमान के ब्लेक होल में सम्मिलित हो जाते हैं। चूंकि ब्लेक होल का जीवनकाल अपने द्रव्यमान पर तीन की घात के समानुपाती होता है इसलिये अधिक द्रव्यमान का ब्लेक होल नष्ट होने में बहुत समय लेता है। 100 बिलियन सोलर द्रव्यमान का ब्लेक होल नष्ट होने में 2x1099  (2x 10 के ऊपर 99 की घात), साल लेगा ।
इस प्रकार ब्रह्मांड में पाये जाने वाले आकाशीय पिंडों अर्थात् ग्रहों, सूर्यों, गेलेक्सियों, ब्लेक होलों या ऊर्जा अर्थात् प्रकाश , विद्युत, रेडियो, और ब्लेकएनर्जी और पृथ्वी जैसे ग्रहों के जीवधारी आदि सभी स्पेस और समय के अत्यंत विस्तारित क्षेत्रों में अपना साम्राज्य जमाये हुए हैं परंतु फिर भी वे अनन्त नहीं हैं अमर नहीं हैं।


2.7   आधुनिकतम महाप्रयोग

वर्तमान वैज्ञानिकों का प्रयोग;LHC

अब प्रश्न  यह है कि इन सबके नष्ट हो जाने पर वह क्या है जो बचेगा? वह क्या है जिसमें अथवा जिसके द्वारा इन्हें अस्तित्व मिला? और वह है कैसा? इन प्रश्नों  के उत्तर वैज्ञानिकों के पास नहीं हैं, न ही वे सही सही यह बताने में सक्षम हैं कि स्पेस और समय की असली परिभाषा  क्या है। वैज्ञानिकों ने इन रहस्यों को समझने के लिये हाल ही में ‘‘लार्ज हैड्रान कोलायडर‘‘ (LHC) नामक प्रयोग किया है जिसमें वे उन परिस्थितियों को निर्मित कर रहे हैं जो बिग बेंग के समय रही होंगीं। इस प्रयोग के परिणामों का विश्लेषण  करने पर यह पता लगाया जा सकेगा कि पदार्थ का द्रव्यमान निर्धारित करने के लिये कौन से घटक उत्तरदायी हैं और गुरुत्व कैसे उत्पन्न होता है।


इस प्रकार हम वैज्ञानिक आधार पर विश्व ब्रह्माण्ड  की उत्पत्ति और उसके रहस्यों की खोज में लगे हुए हैं परंतु अभी तक कोई सारगर्भित  तथ्य प्राप्त नहीं हुए हैं जो पूर्वोक्त प्रश्नों  के उत्तर दे सकें। इससे यह भी स्पष्ट है कि इतने अपरिमित क्षेत्र और परिमाण के ब्रह्मांड को समझने के लिये भी अपरिमित आकार  के मस्तिष्क की आवश्यकता  होगी। पूरे ब्रह्माॅंड में पदार्थ का परिमाण 3 ls 100x1022 (3 से 100x10 के ऊपर 22 की घात) , तारों की संख्या बराबर है जो 80 बिलियन गेलेक्सियों में वितरित है। ब्रह्माॅंड की स्थानिक वक्रता शून्य के निकट है। हमारे मस्तिष्क में पाये जाने वाले न्यूरानों की संख्या ब्रह्मांड के सभी तारों की संख्या से अधिक है। जीवन की उत्पत्ति के संबंध में वैज्ञानिक मानते हैं कि जल के भीतर जीव उत्पन्न हुए पहले एक कोषीय और क्रमागत रूपसे बहुकोषीय जीव के रूप में , डारविन के सिद्धान्त के अनुसार अति उन्नत जीव मनुष्य हुए हैं। पृथ्वी के अलावा अन्य गेलेक्सियों के किन्हीं सौर मंडल के ग्रहों में जीवन की संभावनायें भी बताई गयीं हैं। ये जीव मनुष्य की तरह या मनुष्य से अधिक उन्नत  या अन्य प्रकार के भी हो सकते हैं, यह भी कहा गया है। तारे और गेलेक्सियाॅं मरते हुए ब्लेक होल में लय हो जाते हैं और अंततः ब्लेक होल भी समाप्त हो जाता है , इसी प्रकार जीव भी मनुष्य होकर अंततः मर जाता है, इसके आगे क्या होता है विज्ञान को इसकी कोई जानकारी नहीं है।