Sunday, 31 May 2015

8.10: मन्तव्य

8.10: मन्तव्य
चाहे वैज्ञानिक आधार हो या दार्शनिक आधार,  इस ब्रह्माॅंड के निर्माता को या ब्रह्माॅंड और इस मनुष्य जीवन को खंडों में नहीं समझा जा सकता। इसे सही ढंग से समझने के लिये समग्रता को एक साथ लेकर परखना होगा अर्थात् इस जीवन को केवल 100 या 120 वर्षों तक सीमित कर हम इसका रहस्य और उद्देश्य  नहीं समझ सकते और इसी प्रकार ब्रह्माॅंड को केवल पृथ्वी तक सीमित करने से पूरे ब्रह्माॅंड को नहीं जान सकते। यह ब्रह्माॅंड , उसका निर्माता,  हमारा जीवन और सभी प्राणियों और वनस्पतियों का जीवन परस्पर एक दूसरे से क्रमबद्ध रूपसे जुड़ा है और जहाॅं से प्रारंभ हुआ है वहीं पर समाप्त भी होता है।‘‘ मय्येव सकलं जातं, मयि सर्वं प्रतिष्ठितम, मयि सर्वं लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्मयहम्‘‘। इसलिये इस चक्रात्मक यात्रा का जो मूल बिंदु है वही अंतिम बिंदु भी है उसी को पहचानने का कार्य करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य  है। यह मूल विंदु हम सबके भीतर ही केन्द्रित है और हमसब उसके भीतर, अतः इसे कहीं बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है। भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक प्रवाह में अनन्त काल से आगे बढ़ते हुए हम मनुष्य के स्तर पर उस परम मूल बिंदु के पास ही पहुंच गये हैं परंतु भौतिक जगत का गुरुत्वाकर्षण हमें बार बार नीचे की ओर खींच लेता है क्योंकि हमारे संस्कार इतने भारी हैं कि वे इसकी सीमा को पार नहीं करने देते। इसलिये वे, जो अपने मूल बिंदु, जिसे दार्शनिक, ‘‘परमपुरुष‘‘ कहते हैं, को पाना चाहते हैं तो उन्हें पहले तो अपनी इस समग्र यात्रा में संचित पूर्व के सभी संस्कारों को शून्य करना  होगा और नये संस्कारों को बनने से रोकना होगा। इसके लिये महाकौल गुरु से अपना इष्टमंत्र और गुरुमंत्र प्राप्त करना होता है। इष्टमंत्र जाप के उचित अभ्यास से पूर्व के सभी जन्मों के संस्कार धीरे धीरे समाप्त होने लगते हैं और गुरु मंत्र के उचित प्रयोग से इस जन्म में नये संस्कार  बनना बंद हो जाते हैं। इन दोनों मंत्रों की सम्पूर्ण शक्ति का उपयोग करने के लिये शरीर के प्रत्येक ऊर्जा केन्द्र का यथा स्थान होना और उनका शुद्ध होना आवश्यक है अतः महाकौल गुरु इन की विधियाॅं को भी साथ में या कुछ दिन पूर्वोक्त बीज मंत्रों के अभ्यास करने के बाद सिखाते हैं। शरीर में प्राणों की पूरी शक्ति से क्रियशीलता बनी रहे और मन पर नियंत्रण रहे इसके लिये वे इष्ट मंत्र का प्रयोग करते हुए प्रणायाम किस प्रकार करना है इसकी विधि भी सिखाते हैं। इन सभी क्रियाओं में लगातार अभ्यास करने के बाद ध्यान की विधि सिखाई जाती है जिसके जान लेने और लगातार अभ्यास करने से ‘अपने आप‘ सहित सब कुछ जाना जा सकता है यही जीवन का लक्ष्य भी है। इसके पीछे आध्यात्म विज्ञान का सिद्धान्त, आधुनिक विज्ञान के सिद्धान्त से मेल खाता है। बीजमंत्र (fundamental frequency) यथार्थतः प्रत्येक सबंधित व्यक्ति का अपना अपना होता है जिसका अभ्यास श्वाश प्रश्वाश  के साथ करते करते मूलाधार में प्रसुप्त देवत्व जिसे तान्त्रिक भाषा में कुंडलनी (fundamental negativity) कहा गया है, पर आघात होता है जिससे वह क्रियाशील होकर ऊर्ध्व  गामी हो जाती है और विभिन्न ऊर्जा केन्द्रों जिन्हें तंत्र में चक्र (plexus) कहा गया है , को पार करते हुए सर्वोच्च स्तर सहस्त्रार (pineal gland or fundamental positivity) पर जा पहुंचती है और वहाॅं पर परमसत्ता की आवृत्ति (cosmic frequency) से मिलकर अनुनादीय स्वर(resonance) उत्पन्न करती है, (जीवविज्ञानी इस घटना को विशेष प्रकार के हारमोन्स( melatonin- a srotonin derived  hormone)  का स्राव मानते हैं, जो प्रकाश  से प्रभावित होता है और नींद के समय और मौसमी प्रभावों से अपने जीववैज्ञानिक लय में सामंजस्य बनाये रखता है।) जिससे आत्मदर्शन  होते हैं और जो भी अज्ञात होता है सब कुछ बिना पुस्तक पढ़े ज्ञात हो जाता है यही आत्म साक्षात्कार (self realization) कहलाता है यही परमानन्द (supreme bliss) कहलाता है। आधुनिक भौतिक विज्ञान की शब्दावली में इसे व्यक्तिगत आस्तित्विक आवृत्ति(existential frequency)  का,  इष्टमंत्रजाप आवृत्ति (incantative frequency)  के साथ अनुनाद(resonance)  होना और इस अनुनाद का परम सत्ता(cosmic frequency)  के साथ अनुनाद होना कहते हैं। वास्तव में यह, पूर्ण एकाग्रता की स्थिति में बनने बाली मानसिक तरंगों के शक्तिशाली हो जाने पर उन्हें उचित दिशा  में संचालित करते रहने पर ही घटित हो पाता है। ब्रह्माॅंड की उत्पत्ति(big bang)  के समय जो ध्वनि उत्पन्न हुई उसे ओंकार ध्वनि (cosmic frequency)  कहते हैं और यह ब्रह्माॅंड की मूल आवृति मानी जाती है और समस्त ब्रह्माॅंड में आज भी व्याप्त है। इसे सगुण और निर्गुण का सम्मिलित रूप माना जाता है, अ, उ और म क्रमशः  उत्पत्ति, पालन और संहार के, चंद्रकार रेखा निर्गुण को सगुण में परिवर्तन करने के, और विंदु, निराकार ब्रह्म के द्योतक हैं। हमें इस ध्वनि को सुनते हुए, इससे निकली तरंगों के साथ मन को ले जाते हुए, गुरु द्वारा बताये गये उर्जा केन्द्र पर स्थिर कर, इष्टमंत्र के जाप से उत्पन्न मानसिक तरंगों को इसी केन्द्र पर एकत्रित कर निर्गुणस्वरूप ‘ विंदु ' को देखने का अभ्यास करना होता है इसे ही साधना कहते हैं जिसे अष्टाॅंग योग में विभिन्न पदों में उपरोक्तानुसार सिखाया जाता है। ( यहाॅं याद रहे कि ओंकार ध्वनि को सुनना और उसमें अपने आप का एकीकरण करना ही लक्ष्य होता है न कि ओम ओम चिल्लाना, इससे कुछ भी प्राप्त नहीं होता है क्योंकि पचास वृत्तियों (propensities) के संयुक्त स्वर ‘ओम‘ को गले से उच्चारित ही नहीं किया जा सकता।) यही एकमात्र विधि सम्पूर्ण है अन्य सभी मतों में इसके ही अनेक खंड कर, अंशों  को ही पूरा मानकर सुविधानुसार अपनी अपनी पद्धतियों को बनाया गया है और पृथक धर्म या मत या संप्रदाय के रूप में प्रचलन में लाया गया है। अतः स्पष्ट है कि जब तक पूर्णता प्राप्त नहीं होगी इन आॅंशिक विधियों से किसी को क्या लाभ हो सकता है यह सहज ही समझा जा सकता है। continued to next post--

Monday, 25 May 2015

8 . 9 जन्म मृत्यु और संस्कार ,( पिछली पोस्ट से आगे )

8 . 9 जन्म मृत्यु और संस्कार ,( पिछली पोस्ट से आगे )
यह तो हुआ भौतिक मृत्यु का वर्णन अब देखते हैं मनुष्य का जन्म किस प्रकार होता है।
जो हम भोजन करते हैं उसका सार तत्व रस में, रस खून में, खून माॅंस में, मास का सार तत्व मेद में, मेद अर्थात् वसा इसी क्रम में तब तक रूपान्तरित होता है तब तक हड्डी में और अंततः शुक्र में न बदल जाये। भौतिक शरीर इन सात पदार्थों से बनता है, शुक्र  जिनका अंतिम सारतत्व है। इस जीवन्त तरल(vital fluid)  के तीन स्तर होते हैं, लिंफ या प्राणरस या लसिका, स्पर्मेटोजोआ और सेमिनल फ्लुड। लिंफ, आर्टरीज के साथ रहने वाली लिंर्फेिटक वेसिल्स के द्वारा दाब डलता है । शरीर में लिंफ का काम शरीर को सुंदरता देना और खून को साफ करना और ग्रंथियों में प्रवेश  कर हारमोन्स का उचित स्राव करने में मदद करना होता है। लिंफ, ऊपर मस्तिष्क में जाकर उसे प्रबल बनाता है अतः बौद्धिक काम करने वालों के लिये पर्याप्त मात्रा में लिंफ प्राप्त करना आवश्यक  है। इसकी कमी से अनेक जटिलतायें जन्म ले लेती हैं। गर्म देशों  में 12 से 14 वर्ष में और ठंडे देषों में 13 से 16 वर्ष में कुछ नाड़ी ग्रंथियां सक्रिय हो जाती हैं जो मस्तिष्क की आवश्यकता  से अतिरिक्त लिंफ को, पुरुषों में टेस्टीज को और महिलाओं में ओवरीज को भेज देती हैं। पुरुषों में यह अतिरिक्त लिंफ स्पर्मेटोजोआ में और महिलाओं में ओवा में बदल जाता है। पुरुष के स्पर्म और महिला के ओवा मिलने पर नया शरीर निर्मित करते हैं। गर्भ में, इस प्राथमिक रचना में स्पर्म के संवेग के कारण ऊर्जा होती है और उससे  तरंगे उत्सर्जित होती रहती हैं। पूर्व में कहे गये विच्छेदित मन जिसमें अपने संचित संस्कार होते हैं और वे अपनी तरंगे उत्सर्जित कर अनुकूल तरंगों वाली रचना को पाकर संतुलन स्थापित हो जाने पर उसमें प्रवेश  कर जाते हैं जहाॅं वे अपने को प्रदर्शित  कर पाते हैं। इस प्रकार कास्मिक रजोगुण की सहायता से वह विच्छेदित मन, माॅं के गर्भ में नया शरीर पा जाता है इस प्रकार भौतिक जीवन अस्तित्व में आता हैं।
इस विवरण से स्पष्ट है कि यह ब्रह्माॅंड सगुण ब्रह्म की मानसिक तरंगों का प्रवाह है जो संचर और प्रतिसंचर गतियों में लगातार गतिशील रह कर ब्रह्मचक्र कहलाता है। हमारा जीवन केवल इसी जन्म और मृत्यु तक सीमित नहीं है वरन् वह ब्रह्मचक्र  के सभी स्तरों की पूर्वोक्त तरंगों अर्थात् स्पेस टाइम में बंधकर गेेलेक्सियों तारों और पंचभूतों के साथ पौधों और प्राणियों में से होता हुआ अभी इस स्तर पर आ पाया है और उसे अपने मूल उद्गम (origin) तक पहुॅंचना है तभी उसकी यह यात्रा पूरी होगी। मनुष्य के स्तर पर आकर यह स्वतंत्रता है कि या तो बचा हुआ रास्ता आगे बढ़कर पूरा करे या पीछे लौट कर इन्हीं जीवजंतुओं और पेड़पौधों में से होकर फिर से लाखों वर्षों तक ठोस द्रव गैस और प्लाज्मा अवस्थाओं में भटकता रहे। चूंकि यह जन्म पिछले लाखों जन्मों का परिणाम है अतः स्वाभाविक रूप से उन सबके अभुक्त संस्कारों का बोझ हमें ढोते जाना होगा जब तक कि वे समग्रतः समाप्त नहीं हो जाते। यह संस्कार हमारे सोच विचार और कर्मों के अनुसार लगातार प्रत्येक क्षण बनते और क्षय होते रहते हैं। इन संस्कारों से मुक्त होना तभी संभव हो सकता है जब नये संस्कार बन ही न पायें और पुराने जल्दी से जल्दी समाप्त हो जायें। मृत्यु के समय जिस प्रकार के संस्कारों का समूह भोगने के लिये बचा रहेगा उसी के अनुसार अनुकूल अवसर आने पर ही प्रकृति हमें उस प्रकार का शरीर उपलब्ध करायेगी और तब तक हमें अपने संस्कारों का बोझ लादकर मानसिक शरीर या सूक्ष्म शरीर (luminous body)  में रहते हुए ही आकाश  (space)  में भटकते रहना होगा। साधना ही वह प्रक्रिया है जिसका अनुसरण कर हम नये संस्कारों को जन्म लेने से रोक सकते हैं और पुराने संस्कारों को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त कर सकते हैं, संस्कारों के शून्य हो जाने पर हम वापस अपने असली घर में पहुंच जाते हैं जो देश , काल (space-time) से मुक्त परमानन्द अवस्था है। साधना क्या है और कैसे की जाती है यह कौल गुरु ही सिखा सकते हैं वे बताते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति विशेष के द्वारा, ब्राह्मिक भाव लेकर कार्य करने से नये संस्कार जन्म नहीं  ले पाते , किस प्रकार के इष्ट मंत्र से पिछले सभी संस्कारों को अभ्यास द्वारा क्षय किया जाता है और हमारे इस मानव शरीर में प्रसुप्त देवत्व को जाग्रत कर हम कैसे अपने चिदानन्द स्वरूप को पा सकते हैं। साधना करने के लिये सबसे उपयुक्त षरीर मनुष्य का ही है अन्य किसी भी प्राणी का नहीं अतः इसका अधिकतम लाभ लेना चाहिये न कि साॅंसारिक आकर्षण में उलझकर स्नायविक आनन्द को ही सब कुछ मानते हुए यहीं भटकते रहना। पिछले खंडों में तथा ऊपर दिये विवरण में भी लिंफ का महत्व समझाया गया है। यह पुनरुत्पादन करने  और प्रसुप्त देवत्व को जगाने, दोनों के लिये उपयोगी है, इसलिये इसका कुशलता से उपयोग और संरक्षण करना चाहिये। चूंकि यह भोजन का सारतत्व ही होता है अतः हमें उपयुक्त सात्विक भोजन कर इसे अपने मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिये उपयोग करना चाहिये क्योंकि वास्तव में यह मस्तिष्क का ही भोजन है। मस्तिष्क के लिये आवश्यक  भोजन से अतिरिक्त लिंफ का उपयोग संतानोत्पत्ति के लिये किया जा सकता है। वैज्ञानिक अनुसंधान यह सिद्ध करते हैं कि एक माह में किये गये पोषणयुक्त सात्विक भोजन से 26 दिन के भोजन से बनने वाला लिंफ केवल मस्तिष्क के सैलों को सक्रिय बनाये रखने के लिये आवश्यक  होता है और शेष 4 दिन के भोजन से उत्पन्न लिंफ ही अतिरिक्त होता है जो आवश्यक  होने पर ही संतानोत्पत्ति के लिये प्रयुक्त किया जाना चाहिये अन्यथा उसका संरक्षण करने के लिये माह में चार दिन निर्जल उपवास करना चाहिये। संन्यासियों के    यों को निर्जल उपवास करना ही चाहिये जिससे अतिरिक्त लिंफ संरक्षित रहकर मस्तिष्क की सक्रियता में प्रयुक्त किया जा सके और मन में असात्विक विचार न आ सकें। यह स्वयंसिद्ध है कि यदि चार दिन के अतिरिक्त लिंफ से अधिक का दुरुपयोग किया जाता है तो निश्चय ही अवशेष लिंफ मस्तिष्क को आवश्यक   भोजन के लिये कम पड़ेगा जिससे अन्य मानसिक और शारीरिक विषमतायें जन्म लेकर समाज में विद्रूपता (डेफोर्मेशन ) उत्पन्न करेंगी।
यहाॅं एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में यह रखना चाहिये कि मन में चाहे सात्विक या असात्विक कैसे भी  विचार क्यों न आयें और उन्हें कार्य में परिणित किया गया हो या नहीं उनके संस्कार तो बन ही जाते हैं और वे अपना क्रम आने पर अवश्य कार्य रूप लेते हैं चाहे इसके लिये कितने ही जन्मों की प्रतीक्षा क्यों न करना पड़े। अतः मन में विचार भी बड़ी सावधानी से करना चाहिये ताकि प्रतिकूल संस्कार न बनें, साधना का करने की प्रथम आवश्यक   शर्त यही है।

Friday, 22 May 2015

8.9: जन्म मृत्यु और संस्कार

8.9: जन्म मृत्यु और संस्कार
पिछले खंडों में स्रष्टि चक्र को संचर और प्रतिसंचर दो धाराओं में सक्रिय होना बताया गया है जिसमें संचर सेन्ट्रीफ्युगल (centrifugal )  अर्थात् ब्राह्मिक मन में बाहर की ओर और प्रतिसंचर सेन्ट्रीपीटल (centripetal) अर्थात् भीतर की ओर गतिशील रहती हैं। इस ब्रह्म चक्र को सगुण ब्रह्म के द्वारा अपने विचार प्रक्षेप (Thought projection)  से नियंत्रित किया जाता है। संचर से प्रतिसंचर की ओर गति होने के साथ ही जीवों का अस्तित्व उनके इकाई मन और इकाई चेतना के साथ प्रारंभ होता है। इकाई मन अपनी पाॅंच ज्ञानेद्रियों और पाॅंच कर्मेद्रियों की सहायता से अन्य पदार्थों की जानकारी ग्रहण करता है। मन, जो कि बुद्धितत्व या महततत्व (existential feeling)   अहंतत्व (doer I feeling),   और चित्त तत्व (done I feeling) , का संयुक्त रूप होता है, इंद्रियों का ज्ञाता होता है इसी लिये उसे इंद्रियों का स्वामी कहा जाता है, पर क्या मन सचमुच इंद्रियों का ज्ञाता होता है? वास्तव में अस्तित्ववोध, कर्तावोध और कृतावोध सभी क्रियात्मक रूप हैं। इन क्रियात्मक रूपों को साक्ष्य कौन देता है? इस साक्षी सत्ता को जीवात्मा या इकाई चेतना कहा जाता है जो मन का भी ज्ञाता होता है। पाॅंच कर्मेंद्रियाॅं मन से निकलने वाले संस्कारों के अनुसार तन्मात्राओं को कार्यरूप में बदलती हैं पर वास्तव में यह कार्यरूप में तब तक नहीं बदल पातीं जब तक जीवात्मा की उपस्थिति न हो। इसलिये मन के प्रत्येक कार्य का होना जीवात्मा की उपस्थिति में ही संभव हो पाता है जबकि जीवात्मा क्रिया में भाग नहीं लेता वह केवल साक्ष्य देता है। यहाॅं यह स्पष्ट होता है कि मन तो सत , रज और तम के संयुक्त प्रभाव तथा लगातार होते रहने वाले परिवर्तन से उत्पन्न होता है जो कि समय , स्थान और पात्र से बंधा होता है अतः उसका साक्ष्य देने के लिये कोई निर्पेक्ष सत्ता जो देश  काल और पात्र से ऊपर हो , होना चाहिये, इसी सत्ता को जीवात्मा कहते हैं। इस प्रकार आत्मा ब्रह्मचक्र के सभी स्तरों पर विद्यमान रहता है।
ब्राह्मिक मन की साक्षी सत्ता को पुरुषोत्तम कहते हैं। संचर क्रिया में यही पुरुषोत्तम ओत योग से सभी इकाई मनों से जुड़े रहकर अपने आप को परावर्तित करते हैं और यही परावर्तन जीवधारियों में जीवात्मा कहलाता हैं । चूंकि मन एक लगातार परिवर्तनशील क्रियात्मक अवयव है इसलिये उसमें इसके पूर्व की स्थितियों के सभी परिवर्तनों के परिणाम संचित रहते हैं क्योंकि प्रत्येक स्थिति अपने पूर्व की स्थितियों का परिणाम होती है। इन्हें ही संस्कार कहते हैं जो इकाई मन को संवेग प्रदान कर आगे सक्रिय रखते हैं। चूॅंकि सभी प्रकार के पूर्व परिणामों, अर्थात् संचर और प्रतिसंचर , के लिये ब्राह्मिक मन ही कारण होता है अतः इकाई मन को उसी का आकर्षण और अधिक त्वरित करता जाता है। चूंकि प्रकृति के सक्रिय होने के प्रथम विंदु से संचर क्रिया के अंतिम अर्थात् जड़ पदार्थों के निर्माण होने तक यह संवेग ब्रह्म मन के द्वारा ही दिया गया है। जिस प्रथम अवस्था में इकाई मन में  अहम तत्व और महत्तत्व नहीं था अतः कोई संस्कार भी नहीं था और वह ब्रह्म चक्र के केन्द्र की ओर बढ़ता जा रहा था। पर  आगे की स्थितियों में जीव इकाई मन, पौधों और प्राणियों के रूपमें अपने इकाई मन में क्रमशः  अहं को विकसित करता गया जो उसकी मानसिक क्रियाओं को नियंत्रित करता रहा और इस प्रकार उसके संस्कार बनने लगे। इसी के उन्नत क्रम में मनुष्य आया जो प्रतिसंचर में बढ़ते हुए अपने दिव्य लक्ष्य परमपुरुष की ओर जाने के साथ साथ वापस विपरीत प्रतिसंचर और संचर मार्ग को भी अपना सकता है और मनुष्य से नीचे के प्राणी या निर्जीव के संस्कारों को भी अपने मन में ग्रहण कर संचित रख सकता है। इस प्रकार सामान्य जीव जहाॅं प्रकृति के सहारे प्रतिसंचर में आगे ही बढ़ता है क्योंकि उसका अहं बहुत कम होता है, पर मनुष्य का अहं अधिक होने के कारण वह आगे पीछे कहीं भी जा सकता है। प्रतिसंचर गति में इकाई संरचना को किसी वस्तु के साथ अपना साम्य स्थापित करने के लिये मानसिक और भौतिक तरंगों में संतुलन के साथ साथ प्राणों में संतुलन स्थापित होना अनिवार्य होता है इस संतुलन के अभाव में इनमें इकाई संरचना का स्थायित्व नहीं रह सकेगा। अतः इन मानसिक और भौतिक तरंगों के साम्य अथवा असाम्य होने पर संचर क्रिया में आगे उन्नति या पीछे की ओर अवनति होती है। जैसे किसी कुत्ते का मनुष्यों का सामीप्य पाने पर उसकी मानसिक तरंग दैर्घ्य  में बृद्धि होते  जाने पर एक स्तर पर वह अपने कुत्ते वाले शरीर के साथ संतुलन नहीं बिठा पायेगा और उसे उस शरीर को छोड़कर अन्य उपयुक्त और उन्नत तरंगदैर्घ्य  वाले शरीर को पाने की तलाश  करना होगी। इस प्रकार कुत्ता को उसके मन में उन्नत तरंग के स्थायी हो जाने पर मरना पड़ेगा। इसी प्रकार यदि किसी मनुष्य की मानसिक तरंगे उसकी भौतिक देह के साथ संतुलन नहीं बना पाती तो उसका मानसिक शरीर भौतिक शरीर को त्याग कर उस शरीर को खोजने लगेगा जिसके साथ उसकी मानसिक तरंगों का संतुलन हो सके अतः वह अपनी मानसिक तरंगों के अनुसार आगे उन्नत मानव या नीचे अवनत पशु  या पेड़ के शरीर को पा सकता है। अहिल्या की साॅंकेतिक कहानी यही प्रकट करती है। कहने का अर्थ यह है कि उन्नत तरंग दैर्घ्य  का अनुसरण, निम्न स्तर के जीव को उच्च स्तर पर और निम्न तरंगदैर्घ्य  के अनुसरण से उच्च स्तर का मनुष्य निम्न स्तर के प्राणी की देह में चला जाता है। इस तरह एक डाक्टर यदि इस विज्ञान को जान कर किसी व्यक्ति को दवाओें के आधार पर उसकी भौतिक तरंगदैर्घ्यों  को संतुलन में लाकर बढ़ा दे तो उसका जीवन काल बढ़ा सकता है पर यदि उसने व्यक्ति की मानसिक शरीर की तरंगदैर्घ्य   में बृद्धि कर दी तो फिर वह उस मनुष्य को किसी और मनुष्य में बदल डालेगा। मिस्टर एक्स मिस्टर वाय हो जावेंगे। इसलिये शरीर के उचित संचालन के लिये मानसिक शरीर , भौतिक शरीर और प्राण इन तीनों में सुसंतुलन होना अनिवार्य है।

 प्राण पाॅंच आन्तरिक और पाॅंच वाह्य वायुओं का संयुक्त नाम है। आन्तरिक वायु हैं प्राण , अपान, उदान, व्यान और समान, तथा वाह्य वायु हैं नाग, कूर्म, क्रिकर, देवदत्त और धनन्जय। प्राण वायु, नाभि से कंठ तक श्वाश लेने  और छोड़ने का कार्य करती है। अपान वायु , गुदा से नाभि तक कार्य करती है और मल मूत्र के सिर्जन में सहायता करती है। समान वायु , नाभि के चारों ओर रहती है और प्राण और अपान के बीच संतुलन बनाये रखती है। उदान वायु , गले में रहकर बोलने में सहायता करती है। व्यान वायु , खून को शुद्ध  करने और अफेरेन्ट और इफेरेन्ट नर्व्ज को नियंत्रण करती हैं। नाग वायु , उछलने कूदने और किसी वस्तु को फेकने में , कूर्मवायु , शरीर को संकोचन करने में, क्रिकर वायु , जंभांई लेने में, देवदत्त वायु ,  भूख और प्यास में तथा धनंजय वायु , निद्रा और तंद्रा के लिये सहायक होती हैं। शरीर के किसी भाग में दोष उत्पन्न होने से यदि प्राण और अपान में संतुलन बिगड़ता है तो उससे समान में भी असंतुलन पैदा होेता है , इस के बाद यह तीनों उदान में भी असंतुलन पैदा कर व्यान पर आघात करती है और फिर पाॅंचों मिलकर शरीर के हर कमजोर भाग पर अपना संयुक्त दाब डालकर वाहर निकल जाती है। इस प्रकार धनंजय को छोड़कर सभी वायुएं भौतिक शरीर से बाहर निकल जाती हैं। धनंजय तब तक शरीर में रहती है जब तक उसे जला नहीं दिया जाता । स्पष्ट है कि मानसिक और भौतिक तरंगों में संतुलन का समाप्त होना मृत्यु कहलाता है। भौतिक शरीर से नौ वायुओं के निकल जाने पर मानसिक शरीर भी अब भौतिक शरीर से सामंजस्य नहीं रख पाता अतः अपने संस्कारों के साथ प्रकृति के नियमानुसार अन्य भौतिक शरीर तलाशने में जुट जाता है जहाॅं वह अपने संचित संस्कार भोग सके। कास्मिक रजोगुण का यह दायित्व होता है कि वह इस मानसिक शरीर को एंसी  सूक्ष्म संरचना उप्लब्ध कराये जहाॅं वह अपने संचित संस्कारों को भोग सके।  इस प्रकार विच्छेदित मानसिक शरीर में जीवात्मा साक्षी स्वरूप होता है जो अब कर्माशय या कर्म प्रतिक्रिया के रूपमें सुप्तावस्था में रहता है।


Wednesday, 20 May 2015

8.8: परमपुरुष, तारक ब्रह्म के रूपमें कब आते हैं? क्यों आते हैं?

8.8: परमपुरुष, तारक ब्रह्म के रूपमें कब आते हैं? क्यों आते हैं?
           इसके दो कारण हैं पहला यह कि मानव बुद्धि भावसत्ता से संतुष्ठ हो सकती है पर मानव हृदय नहीं। मानव हृदय और अधिक निकटता, और अधिक आनन्द, और अधिक संवेदन चाहता है। यही कारण है कि वह परम सत्ता अपने वंशजों को अधिक आनन्द देने , अधिक संतुष्ठ करने के लिये इन सापेक्षिक घटकों में  सीमित होकर तारकब्रह्म के रूपमें आ जाते है। दूसरा कारण यह है कि इस संसार में प्रत्येक उन्नति लंबे संघर्ष के द्वारा ही हो सकती है और मानव के पास इस संघर्ष को झेलने के लिये पर्याप्त बौद्धिक क्षमता होना चाहिये पर जब उसकी बुद्धि समाज को आगे बढ़ाने हेतु कुछ नया करने  में असफल हो जाती है तो परमपुरुष के पास स्वयं अपने आप को देश  काल और पात्र की सीमा में बाॅंधकर मानवता का उद्धार करने के लिये आने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। वही आकर सिखाते हैं कि किस प्रकार ध्यान करने से उस अरूप से अपना संबंध जोड़ा जा सकता है और मन को कैसे उन्हीं में लगाया जा सकता है, इतना ही नहीं कैसे उनकी समीपता का हमेशा  अनुभव किया जा सकता है।
            प्रकृति के प्रभाव से सगुण ब्रह्म का मन अथवा सूक्ष्म संसार निर्मित होता है तथा पुरुष अथवा चेतना क्रमशः  बुद्धितत्व, अहमतत्व और चित्त में रूपान्तरित होती जाती है। मानव का धर्म है साधना करके मुक्त पुरुष हो जाना और सगुण ब्रह्म का धर्म है कि अपनी प्रत्येक इकाई  को इस कार्य हेतु अनुकूल अवसर जुटाना। वास्तव में सगुण ब्रह्म के द्वारा इस ब्रह्माॅंड को निर्मित करने और उसमें इन मानवों को निर्मित करने के सभी प्रयास और तत्संबंधी कष्ट अपने प्रत्येक इकाई अंश  को मुक्त करने की ओर ही होते हैं। जड़त्व से सूक्ष्म की ओर गति में अर्थात् प्रतिसंचर में चेतना का स्पष्टतः प्रतिकर्षण होने लगता है और पुरुष , क्रमषः प्रकृति के बंधनों से मुक्त होने लगता है इस प्रकार प्रकृति अपने बंधनकारी गुणों को उचित रूपसे प्रभावी नहीं रख पाती और जीव मुक्त होने की दिशा  में आगे बढ़ने लगता है।
            यह स्मरण रहना चाहिये कि सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार से मानव इच्छायें अनन्त होती हैं जो सीमित सामर्थ्य  के प्रयासों से संतुष्ठ नहीं की जा सकती। इस परिस्थिति में मनुष्य भौतिक जगत की एक वस्तु से दूसरी पर संतुष्ठी की चाह में तब तक उछल कूद करता रहता है जब तक कि वह पतित होकर मानव के रूपमें परजीवी न हो जाये।
             सभी जीवधारी सापेक्षिक घटकों में बंधे होने के कारण नियंत्रण क्षमता में न्यून होते हैं जबकि परमपुरुष स्वर्ग और नर्क दोनों के नियंत्रक हैं। यहाॅं ध्यान यह रखना चाहिये कि मानव मन की प्रवृत्ति यदि प्रतिसंचर धारा के विपरीत हो जाती है तो वही नर्क और संचर धारा के अनुकूल निराकार ब्रह्म की ओर रहने पर स्वर्ग कहलाते हैं। स्वर्ग और नर्क का कोई अलग से अस्तित्व नहीं है। इकाई मन जो सोना या चाॅंदी प्राप्त करने को अपना ध्येय बना लेता है वह पहले मानसिक तरंगों के रूप में सोने, चाॅंदी में बदल जाता है फिर जड़ समाधि के कारण जड़ सोने या चाॅंदी में। जो बाद में किसी सोने चाॅंदी के व्यापारी के घर तिजोरी में कैद रहता इसे ही नरकवास कहते हैं।

Monday, 18 May 2015

8.7 मतवाद और मत

8.7: मतवाद और मत
8.7 मतवाद और मत 
पातंजल और साॅंख्य दोनों ही अनेक ‘‘पुरुषों‘‘में विश्वाश  रखते हैं और मानते हैं कि ब्रह्माॅंड प्रकृति के द्वारा निर्मित किया गया है, पर यह सही नहीं है क्योंकि मन के बिना भोग नहीं हो सकता और उनके अनुसार पुरुषों के पास मन नहीं होता अतः प्रकृति के द्वारा ब्रह्माॅंड के निर्माण करने से वे संतुष्ठ नहीं हो सकते। वे यह भी मानते हैं कि प्रकृति, पुरुष से अलग है यह भी सत्य नहीं है क्यों कि वह पुरुष की ऊर्जा है ठीक उसी प्रकार जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति है जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। साॅंख्य में  ईश्वर  नहीं है अतः निरीश्वरवाद कहलाता है पर पातंजल ईश्वर  मे विश्वाश  करता हैं पर ब्र्रह्म में नहीं अतः वह सैश्वरवाद  कहलाता है। भयबोध विश्वाशों   (sematic faith ) जैसे, मुस्लिम , क्रिश्चियन और ज्यू आदि में क्रिश्चियन की सामाजिक संरचना थोड़ी सी इन दोनों से भिन्न है पर इन का धार्मिक साहित्य पुरानी अरबी में है और हिब्रू उनकी समानान्तर भाषा है। इन में अन्य किसी धर्म या विश्वास के प्रति कोई आदर नहीं है। इनका कोई दर्शन  नहीं है केवल कट्टर धार्मिक सोच है, वे मानते हैं कि यह सब ईश्वर  के वाक्य हैं जिन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती। इनमें ‘‘शैतान‘‘ का भय दिखाया गया है और स्वर्ग नर्क की अवधारणा को माना गया है। प्रोटेस्टेंटों, जिनका विचार कुछ भिन्न है , को छोड़कर  अन्य कोई भी आत्मा का परागमन स्वीकार नहीं करता। उनका विश्वास  है कि पैगम्बर या अवतारों द्वारा पाप को क्षमा किया जा सकता है। नर्क का भय दिखा कर तीनों में शोषण को ही प्रमुखता दी गयी है।
अब, यदि उनका धार्मिक साहित्य ईश्वर  के द्वारा सीधे ही कहा गया है और वे मानते हैं कि ईश्वर  का कोई आकार नहीं है तो यह कैसे संभव है, क्यों कि शब्दों को कहने के लिये गला और मुंह चाहिये जो आकार के बिना संभव नहीं है अतः या तो उनका ईश्वर  निराकार नहीं है या फिर उनका साहित्य ईष्वर के शब्द नहीं है। इन तीनों में ब्रह्माॅंड के उत्पन्न करने का कारण स्पष्ट नहीं किया गया है। वे केवल मानते हैं कि संसार ईश्वर  की पूजा के लिये बनाया गया है पर यह भी कहते हैं कि ईश्वर  दयालु है। जब ईश्वर  दयालु है तो उसकी कृपा पाने के लिये वह अपनी पूजा क्योें कराना चाहते है? यह तो उसकी साधारण मनुष्य जैसी प्रकृति ही मानी जायेगी जो कि वाॅंछनीय नहीं है।  क्रिश्चियन कहते हैं कि जीसस ईश्वर  के पुत्र हैं, परतु जब उनका ईश्वर  निराकार है तो उनका पुत्र कैसे हो सकता है, इस तर्क का वे कोई उत्तर नहीं दे पाते। तीनों धर्म यह मानते हैं कि शैतान वह सब करता है जो ईश्वर  के कार्य के विपरीत होता है जिसका सीधा अर्थ है कि शैतान भी उतना ही शक्तिशाली है जितना ईश्वर । इस प्रकार दो पृथक शक्तियों का अस्तित्व पाया जाना स्वीकृत हुआ अतः इस प्रकार के ईश्वर को   सर्वशक्तिमान नहीं कहा जा सकता। इसलिये शैतान का पृथक अस्तित्व माना जाना अतार्किक है।
यह भी माना गया है कि शैतान का अस्तित्व संसार के निर्माण के पहले से ही है अर्थात शैतान का निर्माण ईश्वर  के द्वारा नहीं हुआ है वह नकारात्मक शक्ति है अतः दो प्रकार के  ईश्वर प्राप्त होते हैं एक अच्छा और दूसरा बुरा। अब प्रश्न  उठता है कि क्या  ईश्वर वहाॅं पाया जा सकता है जहाॅं शैतान उपस्थित हो? इस प्रकार दोनों प्रकार के कथन एक दूसरे के विपरीत हो जाते हैं। इन मतों के अनुसार जो ईश्वर की पूजा नहीं करता उसे नर्क में फेक दिया जाता है जहाॅं से कभी वापस नहीं आ सकते, यह भी अतार्किक है क्योंकि किसी को भी हमेशा  के लिये बंधन में नहीं रखा जा सकता। वे कहते हैं कि संसार को ईश्वर ने बनाया पर यह नहीं बताते कि किस पदार्थ से बनाया, इस प्रकार  ईश्वरऔर संसार दो अलग अलग अस्तित्व हुए। अब यदि संसार  ईश्वरका हिस्सा नहीं है तो वह  शैतान का हिस्सा हुआ, पर शैतान  को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर स्रष्टि का केन्द्र नहीं माना गया है अतः संसार उसका हिस्सा नहीं हो सकता। इस प्रकार तीन  ईश्वर हुए , एक तो असली दूसरा शैतान और तीसरा वह पदार्थ जिससे संसार का निर्माण हुआ। इन धर्मों का एक समान उद्गम भयपूर्ण नर्क से हुआ है जो इनके अस्तित्व को बनाये रखने का कारण है।
इस विवरण से स्पष्ट होता है कि ये सब ‘मत‘ या विचारधारायें ही है इन्हें दर्शन  की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

Saturday, 16 May 2015

--8-6 भूत प्रेत और विभ्रम (पिछली पोस्ट का शेष -----)


8-6  भूत प्रेत और विभ्रम  (पिछली  पोस्ट का शेष -----)

भौतिक शरीर का संचालन नाड़ीतंतुओं द्वारा करता है। गंध, रूप, स्पर्श , स्वाद आदि के रूप में प्राप्त कम्पन इन नाड़ी तंतुओं द्वारा प्राप्त किये या बाहर प्रक्षिप्त किये जाते हैं। परंतु सूक्ष्म शरीरों की नाडि़यां होती नहीं हैं अतः वे भौतिक संचालन कैसे करेंगी? केवल एक प्रकार बचता है अपने आप में स्वप्रेरित सूचना उत्पन्न कर किसी कंपन को अनुभूत करना। ये सूक्ष्म शरीर भूत नहीं हैं और न ही स्वप्रेरित या वाह्य प्रेरित तरंगों के वशीभूत होते हैं। यदि किन्हीं परिस्थितियों में किसी को ये सूक्ष्म शरीर दिखते हैं तो वह सोच सकता है कि वह भूत है परंतु , वह सूक्ष्म शरीर है । यह दिन में दिखाई नहीं देता पूर्ण अंधकार में यह संभव है परंतु हर जगह नहीं । सूक्ष्म शरीर सात प्रकार के होते हैं, यक्ष, सिद्ध, गंधर्व, किन्नर, विद्याधर, प्रकृतिलीन और विदेहलीन। यक्षः- मानलो कोई उच्च स्तरीय साधक परम पुरुष की साधना करते हुए बहुत आगे बढ़ गया परंतु उसे द्रव्य का लोभ रह गया और उसने भले ही ईश्वर  से कुछ नहीं मांगा परंतु यह धारणा रखी कि जब इतना भजन पूजन किया है तो ईश्वर  उसे इतना धन तो अवश्य  दे देंगे कि धनाड्य हो जाउंगा और यह सोचते सोचते शरीर को छोड़ देता है तो यक्ष नामक सूक्ष्म शरीर प्राप्त करता है। सिद्धः- वे साधक जिन्हें परमपुरुष से वेहद प्यार है परंतु विभिन्न सिद्धियों की चाह मन में छिपी हुई है तो मरने के बाद ये सिद्ध नामक सूक्ष्म शरीर पाते हैं। इनकी स्थिति सभी सूक्ष्म शरीरों में श्रेष्ठ होती है और वे साधकों को साधना के मार्ग में मदद करते हैं। विद्याधरः- प्रभु भक्ति करते करते जिनकी इच्छा ज्ञान की प्रकांडता प्राप्त करने की होती है और इसी बीच वे शरीर छोड़ देते है तो उन्हे विद्याधर नामक सूक्ष्मशरीर प्राप्त होता है। गंधर्वः-संगीत विज्ञान में उत्कृष्ट निपुणता के लिये जो साधक साधना करते करते देह त्याग करते हैं वे गंधर्व नामक सूक्ष्मशरीर प्राप्त करते हैं। किन्नरः- भौतिक सुन्दरता की चाह में जो साधक साघना करते हैं वे देह त्याग के बाद किन्नर नामक सूक्ष्मशरीर प्राप्त करते हैं। इन पांचों सूक्ष्मशरीरों को संयुक्त रूपसे देवयोनि कहा जाता है। इसके अलावा विदेहलीन और प्रकृतिलीन नामक सूक्ष्मशरीर भी होते हैं। जिन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान को तत्काल पहुंचने की दिव्यशक्ति प्राप्त करने की इच्छा से साधना करते हैं वे विदेहलीन और जो परमपुरुष को पहाड़ों, पत्थरों या अन्य स्थानों में या रूपों में स्थापित मानकर पूजा करते हैं वे प्रकृतिलीन नामक सूक्ष्मशरीर पाते हैं। ये सभी सूक्ष्मशरीर होते हैं भूत नहीं और न ही विभ्रम।
           अतः जब भूत पिशाच न तो धनात्मक न ऋणात्मक विभ्रम हैं और, न देवयोनि, तो क्या हैं? वास्तव में जब किसी की अतृप्त इच्छाओं के संचित संस्कार, मृत्यु के समय, जबकि  मन शरीर से प्रथक हो रहा होता है तो उसके साथ जुड़ जाते हैं। अतः यद्यपि भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है और मन क्रियाशील नहीं हो पाता है परंतु उसकी शक्तियां पोटेंशियल रूप (potential form) में रहती हैं अतः यदि अनुकूल परिस्थतियों में किसी जीते जागते व्यक्ति का एक्टोप्लाज्म अर्थात् मनोभौतिक तंतु शरीरहीन मन के पोटेशियल फार्म से जुड़ जाता है तो शरीरहीन मन बहुत थोड़े समय के लिये अस्थायी मानसिक शरीर धारण कर लेता है और जीते जागते व्यक्ति के भौतिक शरीर के स्नायु तंतुओं द्वारा अपना फंक्शन  करने लगता है। इसे प्रशीत  मनस् कहा जाता है और जनसामान्य कहते हैं कि अमुक को प्रेत ने ग्रस्त कर लिया है। ये न तो धनात्मक और न ही ऋणात्मक विभ्रम है  और न ही देवयोनि। वास्तव में जीवित व्यक्ति के एक्टोप्लाज्मिक सैल किसी मृत व्यक्ति का मानसिक शरीर बन जाते हैं। दो चार मिनटों में यह शरीर भी मर जाता है, यह रिक्रियेटेड माइंड कहलाता है। कुछ व्यक्ति प्रशीत मनस् द्वारा अच्छे काम कराते हैं परंतु इन्हें नाड़ी तंतुओं पर पूरा कंट्रोल होना चाहिये। बुरे लोग प्रशीत् मनस् का दुरुपयोग करते हैं, लोगों के घरों में नुकसान करते हैं, फरनीचर तोड़वा देते हैं हड्डियां फिकवाते हैं आदि आदि, परंतु यह दो चार मिनट से ज्यादा नहीं होता । इसतरह हम देखते हैं कि तथाकथित भूतप्रेत न तो विभ्रम और न ही सिद्ध या प्रशीत मनस होते हैं यथार्थतः हम इनमें से किसी का अस्तित्व सिद्ध नहीं कर सकते। जहां तक धनात्मक विभ्रम का प्रश्न  है उसका वास्तविक अस्तित्व है ही नहीं यदि किसी को धनात्मक विभ्रम है तो वह मानसिक रोग है। यदि कभी इस प्रकार के प्रशीत मनस् आपको दिखाई दें तो इसका एकमात्र उपाय प्रभुकीर्तन ही है। एक मिनट तक अपना बीजमंत्र मन ही मन उच्चारित करने या कीर्तन करने से भूत पिशाच तत्क्षण वायु में विलीन हो जावेगा। अतः किसी भी परिस्थति में हमें इनसे डरना नहीं चाहिये।
            इससे स्पष्ट है कि तथाकथित भूत कमजोर और असुरक्षा अनुभव करने वाले मन की कल्पना है जो भय के समय पुरानी कल्पनाओं के अनुसार आकार ले लेती हैं। जब भय, सम्मोहन या जड़ता के कारण मन का काममय कोष अस्थायी रूपसे निलंबित हो जाता है तो मनोमय कोष में होने वाले कम्पन सत्य प्रतीत होने लगते हैं। जैसे, स्वप्न देखते समय भी यही घटना होती है। मनोविज्ञान के अनुसार भूत, देवी, देवता आदि का दिखाई देना उपरोक्त कारण से ही होता है इन में से किसी का भी अस्तित्व नहीं है। प्रबल इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति द्वारा कमजोर मन वाले व्यक्ति को धनात्मक या ऋणात्मक विभ्रम देकर हिपनोटाइज किया जाने पर कमजोर मन वह देखने लगता है जो बाहर से प्रबल मन का व्यक्ति प्रेरित करता है। इस प्रकार का प्रबल मन वाला व्यक्ति अपने एक्टोप्लाज्म की सहायता से शरीरहीन अर्थात् मृत व्यक्ति की आत्मा में अपनी इच्छानुसार आकार बनाने या काम करने का आदेश  देकर कमजोर मन को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि कमजोर मन इन आकारों को स्पष्टतः देख सकता है। जब यह घटना स्वयं को हिपनोटाइज करने पर घटित होती है तो कोई अपने संस्कारों के अनुरूप देवी या देवता के अपने ऊपर आने की अनुभूति करता है और प्रश्नो   के उत्तर या रोगों को ठीक करने की दवा बतलाता है वह अपने सबकान्शस  अर्थात् अवचेतन मन की सहायता से करता है क्योंकि हिपनोटाईज्ड मन अधिक शक्तिशाली हो जाता है। स्पष्ट है कि यह सब मन की ही अवस्थायें हैं। जब किसी को भूतप्रेत लग जाते है तो उसका काममयकोष अक्रिय/निलंवित हो जाता है और मनोमय कोष आत्मनिर्भता से सोच नहीं पाता है, इसी लिये ओझालोग उसके नर्वस सिस्टम को सक्रिय करने के उपाय करते हैं, जैसे अंगुलियों पर जोर का दवाव देना, मिर्च या तीखे धुएं की वौछार नाक पर डालना, या अन्य उपाय करना जिससे वह चैतन्य अवस्था में आ जावे । वे जानते हैं कि एक वार चैतन्य अवस्था आ गई तो देवी देवता और भूत प्रेत सब भाग जावेंगे। अतः इस मनोवैज्ञानिकता को याद रखना चाहिये और कभी भी अपनी मानसिक तरंगों को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिये, प्रबल इच्छाशक्ति हर स्तर पर सहायता करती है।

Friday, 15 May 2015

8.6 भूत प्रेत और विभ्रम

8.6  भूत प्रेत और विभ्रम
        आश्चर्य, चमत्कार और रहस्य ऐंसे शब्द हैं, जो प्रत्येक का मन आकर्षित करते हैं। भूत प्रेतों की कहानियाॅं तो प्रत्येक ने सुनी और सुनाई होती हैं। इन कहानियों को सुनकर मैं बाल्यावस्था से ही इनके पीछे क्या रहस्य है यह जानने की चेष्टा करता रहा हूं परंतु न तो मुझे कभी प्रेतों के दर्शन  हुए और न ही अन्य वैज्ञानिक समाधान। विभ्रम या हेलुसिनेशन में प्रकाशकीय नाडि़यों में कोई दोष नहीं होता केवल आंख के द्रश्य  में दोष होता है जो विभिन्न विचारों के द्वारा प्रभावित होता रहता है। विभ्रम दो प्रकार के होते हैं धनात्मक और ऋणात्मक। धनात्मक विभ्रम में भौतिक द्रश्यों  में गड़बड़ी नहीं होती वरन् देखने वाले की द्रष्टि विचार तरंगों द्वारा इतनी प्रभावित कर ली जाती है कि वह यथार्थ वस्तु से भिन्न स्वरूप देखना चाहती है। ऋणात्मक विभ्रम में भी द्रष्टि में दोष नहीं होता परंतु विचार तरंगों के तीव्र दबाव से, जिसे आटो सजेशन कहते हैं, वह वास्तविकता से भिन्न देखना चाहती है। बहुत विद्वानों ने  तथाकथित भूतों को धनात्मक विभ्रम और बहुतेरों ने ऋणात्मक विभ्रम भी कहा है। ये लोग कहते हैं कि भूतों को देखते समय आप्टीकल नर्व द्रष्टा को  धोखा देती है परंतु ऐंसा नहीं हैं यहां प्रधान भूमिका विचार तरंगों द्वारा ही प्रस्तुत की जाती है न कि भौतिक शरीर या मानसिक तंतुओं या एक्टोप्लाज्मिक सैलों द्वारा।
         कहा जाता है कि ‘‘ अभिभावनात् प्रेत दर्शनम्‘‘ । अभिभावना अर्थात्, तंतुओं द्वारा दी गई सूचना जिसमें मन और तंतु दोनों प्रभावित होते हैं, अतः दोषपूर्ण प्रतिक्रिया के कारण जो नहीं होता उससे भिन्न दिखाई देने लगता है। तंत्रिकाओं द्वारा दी गई सूचना स्वप्रेरित या वाह्य प्रेरित किसी भी प्रकार से हो सकती है। स्वप्रेरित सूचना का क्षेत्र सोचने वाले के मन के दायरे में ही होता है जबकि वाह्य प्रेरित सूचना में किसी अन्य शक्तिशाली मन द्वारा कमजोर मन को प्रभावित कर लिया जाता है। जब कमजोर मन को शक्तिशाली मन द्वारा अत्यधिक प्रभावित कर लिया जाता है तब या तो जो है वह नहीं दिखता अन्य कुछ दिखता है, या कुछ भी नहीं दिखता। दार्शनिक रूप में हम कह सकते हैं कि परमसत्ता द्वारा निर्मित यह संसार, नक्षत्र और सारा ब्रह्मांड भी धनात्मक विभ्रम है क्यों कि वह जो सोचता है वह व्यक्ति विशेष द्वारा देखा जाता है। व्यावहारिक जगत और भूतों में अंतर  यह है कि भूतों के केस में सूचना व्यक्तिगत होती है जबकि जगत के केस में सूचना बाहर से अर्थात् परमात्मा से आती है । परंतु जब व्यक्ति तथाकथित भूत देखते हैं  तो क्या वे धनात्मक विभ्रम हैं? नहीं वे नहीं हैं। संसार में जो कुछ हम देखते हैं वह ठोस, द्रव, वायु, अग्नि और आकाश  से इस प्रकार बना होता है कि वह अपने  आप संचालित होता है । यह आन्तरिक क्रिया परमपुरुष के द्वारा प्रेरित होती है, यह हो सकता है कि कुछ अस्तित्वों में भोजन पानी की आवश्यकता  न हो  परंतु जो ठोस और द्रव पदार्थों से मिलकर बना है अवश्य  ही भोजन पानी पर निर्भर करेगा क्यों कि भोजन मूलतः ठोस पदार्थ और पेय मूलतः तरल पदार्थों से निर्मित होता है। परंतु कोई चीज यदि ऊष्मा ,वायु और ईथर से बनी हो तो उसे भोजन की आवश्यकता नहीं होगी इसे ल्यूमनस बॅाडी या सूक्ष्म शरीर कह सकते हैं।