Monday, 19 October 2015

27 बाबा की क्लास ( नवदुर्गा 2)


रवि- लेकिन बाबा! यह विभिन्न आकार प्रकार की देवियों की नौ दिन तक पूजा करने का समारोह तो पूरे देश  में हर वर्ष सभी लोग धूम धाम से मनाते हैं?
बाबा- हाॅं तुम ठीक कहते हो, इस प्रकार के समारोहों में भक्तिभाव तो कुछ ही लोगों में देखा जाता है आडम्बर और हो हल्ला ही मुख्यतः दिखाई देता है ।
नन्दू- तो क्या ‘‘देवी शक्ति ‘‘ की अवधारणा असत्य है ?
बाबा- देवीशक्ति की अवधारणा की यथार्थता पौराणिक काल से काल्पनिक कथाओं , आकारों , आडम्बर और बाहरी प्रदर्शनों  में विलुप्त ही हो गई है बहुत कम लोग ही यह सच्चाई  जानते हैं।
चन्दू- तो इस अवधारणा की सच्चाई क्या है आप हमें बताइये जिससे हम अन्य लोगों को उसका ज्ञान करा सके? इन देवियों के माता पिता कौन हैं ? ये सब कहाॅं से आई और अब कहाॅं हैं?
बाबा- अच्छा! तुम लोग विज्ञान में शक्ति अथवा ऊर्जा के बारे में क्या पढ़ते हो? क्या तुम उसे उत्पन्न कर सकते हो, क्या उसे नष्ट कर सकते हो? अथवा क्या तुम उसे देख सकते हो?
रवि,नन्दू और चन्दू - नहीं बाबा! ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट । हाॅं, उसका रूपान्तरण, अपने कार्य में लेने के अनुसार अवश्य  किया जा सकता है जैसे चुम्बक , विद्युत, ऊष्मा, प्रकाश , ध्वनि आदि आदि।
बाबा- तुम लोग सही कह रहे हो, पर यह बताओ कि शक्ति क्या है? क्या इसके अनेक हाथ पैर , मुंह या कोई अन्य आकार होता है?
रवि- बाबा! हम लोग तो यह जानते हैं कि भौतिक कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा अर्थात् एनर्जी औरसमय के सापेक्ष  कार्य करने की दर को शक्ति अर्थात् पावर कहते हैं । इसके हाथ पैर मुंह होने का तो प्रश्न  ही नहीं है।
बाबा- तो अब तुम्हीं लोग बताओ कि यह जो आडम्बर और प्रदर्शन  देवी पूजा के नाम पर होता है उसकी सार्थकता क्या है?
नन्दू- बाबा! यह बात तो समझ में आ गई कि भौतिक कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं पर उसकी पूजा करने का अर्थ क्याहै?
बाबा- तुम लोग विज्ञान में यह भी पढ़ते हो कि पदार्थ क्या है? 
चन्दू- हाॅं बाबा! ऊर्जा और पदार्थ एक दूसरे में रूपान्तरित होते रहते हैं आइंस्टीन के ‘‘ मास एनर्जी इक्वेलेंस ‘‘ के अनुसार। इसका अर्थ है पदार्थ और कुछ नहीं ऊर्जा का घनीभूत रूप ही है । और इस ‘कासमस‘ अर्थात् ब्रह्माॅंड में पदार्थ , ऊर्जा और रिक्त स्थान अर्थात् ‘स्पेस‘ के अलावा कुछ नहीं है ।
बाबा- तो अब तुम्हीं लोग बताओ कि जब पदार्थ और ऊर्जा के अलावा कुछ है नहीं तो हमें इनका अधिकतम सदुपयोग करना चाहिये कि नहीं ? उनके रूपान्तरण करने और नियंत्रण करने की नयी नयी विधियाॅं खोजना और जनहित में उनका सदुपयोग करना सीखना ही हमारी पूजा हुयी या उसके अनेक भयावह आकार देकर डरना डराना और पानी फूल पत्ते भेंट देकर सारे संसार पर राज्य करने का वरदान पाने की इच्छा रखना?

Tuesday, 13 October 2015

26 बाबा की क्लास ( नवदुर्गा 1)



रवि- बाबा!आजकल सबेरे से ही अनेक लोग अपने बगीचे के फूल तोड़ने आ जाते हैं, बिना पूछे ही डंडे से या हाथ से खींच खीच कर जासोन की तो कलियाॅं और डालियाॅं तक तोड़ जाते हैं। कल मैं ने कुछ लोगों को टोका तो कहने लगे नवदुर्गा के लिये चाहिये हैं उन्हें जासोन का फूल प्रिय है। बाबा! यह नवदुर्गा क्या हैं ?

बाबा- प्रागैतिहासिक युग के लोग फार्मेकोलाजी से अपरिचित थे अतः वे पेड़ पौधों को सीधे ही रोगों को दूर करने में प्रयुक्त करते थे। उन दिनों विशेषतः भारत में लोग नौ प्रकार के पेड़ पौधों के संपर्क में आये जो दवाओं या भोजन के रूप में अत्यंन्त लाभदायी थे। वे उन्हें जीवनदायी मानकर उन्हें अत्यधिक आदर के साथ पालते और रक्षा करते।  बाद में उन्हें नष्ट होने से बचाने के उद्देश्य  से उनमें देवी देवताओं का स्वरूप दे दिया गया जिसका परिणाम अन्धानुकरण और आडम्बर के रूप में आज तक दिखाई दे रहा है। ये नौ पौधे जिनमें भारत के लोगों ने विशेष औषधीय गुण पाये, वे हैं, कदली (Plantain) कचु या अरबी (arum) हरिद्रा(Turmeric) जयंती, अशोक, विल्व, दाडि़म्ब अर्थात् अनार , मान अर्थात् कन्द और धान्य (Unhusked rice)।

नंदु- बाबा! ये नौ पौधे किस प्रकार जीवनदायी हैं?

बाबा-  कदली एक अच्छा न्युट्रिशियस भोजन है और एक दिन के अंतर से आने वाले ज्वर के लिये बढि़या औषधि है, इसके अलावा वह पेंक्रियाज और किडनी के लिये अच्छी तरह क्रियाशील बनाये रखने में भी सहायक है। वह डिसेंट्री के लिये औषधि है ही। उन माताओं के लिये यह अच्छा भेाजन है जिनके बच्चे छोटी अवस्था में मर जाते हैं। उन बच्चों के लिये जिनकी माॅं की मृत्यु हो जाने के कारण दूध के न मिल पाने से रिकेट्स की बीमारी हो जाती है, उन्हें यह काले चिट्टे वाले अधिक पके केले के रूप में खिलाये जाने पर रामवाण औषधि है। इतना ही नहीं यह, वे बछड़े जिनकी माॅं मर गयी हो उनको अधिक पके  केले और सत्तू के एक अनुपात दो के अनुपात में पेस्ट के रूप में खिलाने पर स्वस्थ हो जाते हैं। स्पष्ट है कि कदली में अनेक जीवनदायी गुणों के कारण लोगों ने उसे देवता की तरह आदर देना प्रारंभ किया।
दूसरा है कचु या अरबी अर्थात् अरुम, इसकी भोजन के रूप में कम उपयोगिता है परंतु किडनी के लिये यह बहुत ही उपयोगी है।
तीसरा है हरिद्रा अर्थात् टर्मेरिक, यह एन्टीसेप्टिक होती है और अच्छा मसाला भी है। भोजन में प्रयुक्त होने वाली हल्दी धूप में सुखाई गई होती है, सीधे खेत से लाई गई हरी हल्दी विषैली होती है अधिक उपयोग करने पर मृत्यु भी हो सकती है, परंतु ऐंटीसेप्टिक है वह खून को साफ करती है तथा त्वचा के रोगों को दूर करती है। जब किसी के घर कोई्र बड़ा समारोह आयोजित होता है तो आज भी एकत्रित होने वाली महिलाओं में हल्दी का उबटन लगाने की प्रथा है खास तौर पर विवाह के अवसरों पर, क्यांेकि अनेक स्थानों के व्यक्ति एकत्रित होने से इन्फेक्शस डिजीज होने की संभावना रहती है।
चौथा है जयन्ती, इसकी जड़ों में औषधीय गुण अधिक होते हैं, यह श्वेत कुष्ठ के लिये सही दवा है। यथार्थतः यह सात प्रकार के त्वचीय रोगों में से चार प्रकार के लिये अधिक उपयोगी है।
पाॅंचवाॅं है अशोक, अर्थात् सीता अशोक, केवल अशोक कहने  का अर्थ है देवदारु। सीता अशोक में ही औषधीय गुण पाये जाते हैं। यह सभी प्रकार के स्त्री रोगों की आदर्श  औषधि है।
छठवाॅं है विल्व, अर्थात् बेल का फल। बिना पका बेल हर प्रकार के पेट रोग की दवा है। कच्चे बेल फल को भूंन कर खाना चाहिये। बिल का अर्थ है सूक्ष्म छिद्र अतः विल्व का अर्थ है ‘वह जो छोटे से छोटे छिद्र में प्रवेश   कर पेट को अधिकतम लाभ पहुंचाता है‘। इसके असाधारण गुणों के कारण इसे  श्रीफल भी कहते है जिसका मतलब है उत्तम गुणों वाला फल।
सातवाॅं है दाडि़म्ब, इसकी छाल, जड़ें और फल सभी महिलाओं की सभी प्रकार की बीमारियों की अच्छी दवा है। चीन और भारत की आयुर्वेदिक पद्धतियों में दाडि़म्ब के ये गुण मान्यता प्राप्त हैं।
आठवाॅं है मान अर्थात् कंन्द, जो मनुष्य के शरीर में मास बढ़ाने बाले सभी प्रकार के स्टार्ची खाद्य पदार्थों में अतुलनीय है। यह आलु अथवा कटहल के बीजों की तुलना में अधिक अच्छा है। कटहल के बीज आलु से ढाई गुने अच्छे हैं। भारत में आलु के आने के पहले यहाॅं इन्हीं बीजों का उपयोग किया जाता था, मान इन बीजों से भी अधिक मूल्य रखता है। इसके अलावा मान के द्वारा मानव शरीर पर ठंडा प्रभाव डाला जाता है। गर्मी के समय यह अच्छी दवा है, जब शरीर गर्मी से प्रभावित होकर नाक से खून बहाने लगता है तो यह औषधि और भोजन दोनों की तरह काम में लाया जाता है। 
नौवाॅं है धान्य अर्थात् पैडी जिसके अनेक उपयोग हैं, सबसे सरल तो यह है कि इससे अल्कोहल बनाया जाता है जो अनेक प्रकार की दवायें बनानें के काम आता है।

चंदु- परंतु बाबा! मंदिरों में तो इनके अनेक आकार, प्रकार, के मुंह हाथ आदि होते हैं?

बाबा- यह सभी काल्पनिक हैं, किसी रचनाकार की कल्पना को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इन नौ प्रकार के पौधों के विशेष गुणों के कारण ही उनमें लोगों ने अपना पूज्य भाव स्थापित किया और बहुत समय  बाद  पौराणिक काल में उनमें नौ प्रकार की चंडिका शक्ति के वास स्थान होने की कल्पना की गई,  जैसे,  कदली में ब्राह्मणी, अरुम में कालिका, हरिद्रा में दुर्गा, जयंति में कार्तिकी, अशोक में शोकरहिता, विल्व में शिव, दाडिंब में रक्तदन्तिका, मान में चामुंडा, और धान्य में लक्ष्मी। 
राजू - अच्छा ! इसीलिए आज भी यदि किसी के पैर भूल से चावल के दानों से छू जावें तो वह फौरन ‘‘ओ माता लक्ष्मी‘‘ कह कर क्षमा मागते हुए प्रणाम करने लगता है। 

बाबा- इस प्रकार का सोच उस समय लोगों का था। अभी भी देवी शक्तियों को लोग संयुक्त रूप से उसी प्रकार इन पौधों में होने की मान्यता देते हैं और नवदुर्गा का नाम देकर पूजते हैं ;अर्थात् अगरबत्ती लगाकर घी के दीपक जलाकर आरती उतारते हैं और चंदन का तिलक लगाते हैं तथा जैसा कि तुमलोगों ने भी देखा चोरी के जासोन के फूल चढ़ाकर भौतिक वैभव और स्वर्ग की कामना करते हैं, और उन पौधों को संयुक्त रूप में नव पत्रिका का नाम देते हैं। अब तुम लोग ही सोचो  कि पौधों की पूजा करने का अर्थ  उन्हें पालने, पानी, खाद और अन्य पोषक तत्वों से उनका संवर्धन और रक्षण करने में होता है या केवल आरती और चंदन या अगरबत्ती से?  बस, यहीं से अन्धानुकरण और आडंबर ने जन्म लिया है और बढ़ता ही जा रहा है। 
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Monday, 5 October 2015

25 बाबा की क्लास (तीर्थ , भगदड़ और मृत्यु )

 

राजू- बाबा! पिछले 24 सितम्बर 2015 को सऊदी अरब के हाजी में भगदड़ होने पर मरने वालों की संख्या अलग अलग रिपोर्टो में 769 से 1184 के बीच बताई गयी है । इसी स्थान पर , 1990 में , हज यात्रा के पहले ही दिन 1426 यात्री भगदड़ में मारे गये थे। इतनी भीड़ इन स्थानों पर क्यों होती है?

रवि- हाॅं बाबा! भारत में भी अक्टूबर 2013 में रतनगढ़ (मप्र) की सिंध नदी के पुल पर यात्रियों की भगदड़ में 115 लोग मर गये थे और 100 से अधिक घायल हुए थे, और इससे पहले भी अप्रेल 2008 में हिमाचल प्रदेश  के  एक पर्वत पर बने मंदिर कों जाते समय मची भगदड़ में 145 लोगों ने अपने प्राणों से हाथ धोये थे।

चंदू- ये तो अपेक्षतया हाल के ही उदाहरण हैं बाबा! भूतकाल के अनेक हृदय विदारक द्रश्य  भी सभी को ज्ञात हैं जो समय समय पर तीर्थों धार्मिक मेलों और उत्सवों में एकत्रित भीड़ में लोगों के प्राणहर्ता बने हैं?

बाबा- तुम लोग तो आज आॅंकड़ों सहित आये हो, चलो आज ‘तीर्थ‘ पर ही चर्चा करते हैं। प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन मे तीन प्रकार की भूख क्रमशः  लगती है, एक तो शारीरिक जो समय समय पर भोजन करने से, दूसरी मानसिक जो भौतिक सुख सुविधायें जुटाने से और तीसरी आध्यात्मिक जो सच्चे ज्ञान की प्राप्ति से शाँत होती है। जब प्रथम दो प्रकार की भूखों को तृप्त करने पर भी मन शान्त  नहीं होता तो वह उस रास्ते या व्यक्ति को ढूंडने लगता है जो भौतिक और मानसिक जगत से ऊपर हो और मन को शांत  कर सके, इसे आध्यात्मिक जगत कहते हैं। इसे खोजने के कार्य को हमारे पूर्व मनीषियों ने ‘‘पर्यटन‘‘ कहा है जिसका अर्थ है ज्ञान प्राप्ति के लिये अध्ययन करते हुए घूमना। इस प्रकार अलग अलग विचार धाराओं के लोग अपने अपने ढंग से इस प्रकार ज्ञान प्राप्त करने के लिये अध्ययन हेतु स्थान स्थान पर जाते थे। बाद में कुछ स्वार्थी लोगों ने इन्हें आय के साधनों की तरह उपयोग में लेना प्रारंभ कर दिया। इसलिये यह अब विकराल अंधानुकरण में बदल गया है।

राजू- बाबा! इन्हीं स्थानों को  क्या तीर्थ कहा गया है ? या कोई अन्य? तीर्थ वास्तव में है क्या?

बाबा- मनुष्यों का यह स्वभाव है कि वे भौतिक जगत में हो या आध्यात्मिक जगत में, बिना कुछ पराक्रम किये सब कुछ पाना चाहते हैं । यही कारण है कि वे अपने सौभाग्य को पाने या पापों को धोने के लिये तथाकथित तीर्थों की यात्रा करते हैं। इन तथाकथित तीर्थों में गाय की पूछ पकड़ कर वैतरणी पार कराकर स्वर्ग में ले जाने का ठेका चलाने वाले तथाकथित ज्ञानी लोग इन भोले भाले लोगों को ही नहीं डिग्री धारी पढ़े लिखे लोगों को भी ठगते देखे जाते हैं क्योंकि वे उनकी इस मानसिक कमजोरी को पहचानते हैं। यात्री, अपने ज्ञान और इच्छा से कोई पूजा पाठ नहीं कर पाते और इन धूर्तों के बहकावे में आकर एक स्थान से दूसरे स्थान को तीर्थ यात्रा के नाम पर भटकते रहते हैं और अपना बहुमूल्य समय, धन और पराक्रम व्यर्थ ही व्यय करते रहते है। अनेक स्थलों पर चाहे प्राकृतिक घटना कहें या मानव निर्मित त्रासदी, हजारों लोग इस अवसर पर जीवन भी समाप्त कर बैठते हैं, इसके अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। कुछ तो तुम लोग बता ही चुके हो। पवित्र स्थलों या तीर्थों का ‘डोग्मा‘ लोगों के मन में इतना गहरा गया है कि वे  भौतिक सम्पदा जैसे धन, पति, पत्नि, विवाह, पदोन्नति, स्वर्ग और अनेक सुखोपभोग की वस्तुओं को विना पराक्रम किये इन स्थानों पर जाकर पाने की इच्छा करते हैें और फिर भगदड़ जैसी कृत्रिम घटनाओं में अपने प्राण तक खो बैठते हैं।

रवि- तो क्या जिन स्थानों को तीर्थ स्थान कहा जाता है वे व्यर्थ हैं? यदि हाॅं तो वास्तविक तीर्थ क्या हैं?

बाबा- तीर्थ का अर्थ है ‘‘तीरे स्थितः यः सः तीर्थः।‘‘ जैसे नदी के किनारे पहुंचने पर यदि एक ही कदम आगे बढ़ाते हैं तो नदी के पानी में जा पहुंचते हैं और नदी किनारे से  एक ही कदम पीछे रहते हैं तो स्थल पर ही बने रहते हैं, है कि नहीं?

सभी बच्चे- हाॅं बाबा! इसीलिये नदी के किनारे को तीर कहते हैं ।

बाबा-  बिलकुल सही। इसी प्रकार भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत की मिलन रेखा पर  (अर्थात् तीर पर ) जो स्थित हो गया उसे कहेंगे ‘तीरस्थ‘ और वह मिलन स्थल तीर्थ । कितना आश्चर्य  है कि अन्तरिक्ष में अपना अपना राज्य फैलाने को उत्सुक संसार के देश  अपने नागरिकों को इतना शिक्षित नहीं कर पाये कि वास्तविकता क्या है , धर्म अधर्म और आस्था अनास्था क्या है।
धर्मप्राण भारत के ही पुरोधा कह गये हैं कि ‘‘ इदं तीर्थं इदं तीर्थं भ्रामयन् तमसा जनाः, आत्मतीर्थं न जानन्ति कथम् मोक्ष वरानने?‘‘ अर्थात् अज्ञान के प्रभाव से लोग इस तीर्थ से उस तीर्थ में भटकते फिरते हैं, परंतु जब तक आत्मतीर्थ को नहीं जाना है मोक्ष कैसे मिल सकता है?
 ----- अब तुम्हीं लोग बताओ क्या हमें अब भी जनसामान्य में व्याप्त इस अज्ञान को हटाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये?

Sunday, 27 September 2015

24 बाबा की क्लास (श्राद्ध)



राजू- ‘‘बाबा! अभी कुछ दिनों तक हमारे विषय शिक्षक यहाॅं नहीं  आ पायेंगे , वे कहते हैं कि श्राद्ध दिवस चल रहे हैं ‘‘। 

चंदू- ‘‘ ये श्राद्ध दिवस क्या हैं, बाबा!‘‘

बाबा- चलो , आज हम लोग इसी पर चर्चा करें।
     तुम लोगों को याद है, एक बार हमने श्रद्धा के बारे में क्या समझाया था ? नहीं ? अच्छा फिर से सुनो अब नहीं भूलना। ‘‘विश्वास  और समर्पण के संयुक्त भाव को श्रद्धा कहते हैं, अंग्रेजी में इसका कोई शब्द नहीं है। जीवन का जो कुछ भी मूलाधार है वह ‘सत‘ कहलाता है और जब सभी ज्ञान और भावनायें इसी को प्राप्त करने के लिये चेष्टा करने लगती हैं तो यह ‘श्रत‘ कहलाता है, और इससे जुड़ी भावना को ही श्रद्धा कहते हैं। ‘श्रत् सत्यम तस्मिन धीयते या सा श्रद्धा‘।‘‘
स्पष्ट  है कि वे दिन जिनमें हम जीवन के मूलाधार ‘सत‘ को जानने के लिये विश्वास  और समर्पण के साथ जुट जाते हैं उन्हें श्राद्ध दिवस कहते हैं। इसके लिये कोई अलग से निर्धारित समय या दिन नहीं हैं फिर भी कर्मकाॅंड में इन्हें आश्विन  मास के कृष्ण पक्ष को निर्धारित किया गया है।

नन्दू - बाबा! कुछ लोग कहते हैं कि वे अपने पूर्वजों को स्मरण करते हुए इन दिनों में ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और दान भी देते हैं, जिससे उनकी आत्मा को शान्ति  मिलती है और वे तृप्त होकर मुक्त हो जाते हैं।

बाबा- तुम लोग इस बात को ध्यान से समझ लो कि पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना अलग बात है और उनका मुक्त और तृप्त होना बिलकुल अलग।

राजू- कैसे?

बाबा- हमें यह मानव शरीर अपने अपने माता पिता से प्राप्त हुआ है इसमें रह कर ही हम सत्य को जानने और अनुभव करने का कार्य कर सकते हैं अतः हमें कृतज्ञता से प्रति दिन ही उनका स्मरण करना चाहिये केवल आश्विन  मास के कृष्ण पक्ष में ही नहीं। इसे स्मरण करने की क्रिया को मंत्र और मुद्रा के साथ तुमलोगों को सिखाया गया है जिसे पित्रयज्ञ कहते हैं। तुम लोग रोज करते हो कि नहीं?

राजू- हाॅं बाबा! स्नान मंत्र के साथ ही न ?

बाबा- हाॅं ठीक है।

चंदू- परंतु बाबा! कुछ लोग कहते हैं कि यह तो केवल दिवंगत हो चुके पितरों के लिये ही किया जाता है, जिनके माता पिता जीवित हो तो उन्हें यह आवश्यक नहीं है ? 

बाबा-  नहीं चंदू, यह गलत है। सभी को अपने माता पिता सहित पित्रपुरुषों को भी प्रति दिन कृतज्ञता ज्ञापित करना ही चाहिये। यह नहीं कि जीवित रहते समय बृद्धावस्था में तो पानी के लिये भी नहीं पूछा और मरने के बाद पानी दे रहे हैं।

नन्दू- तो क्या पितरों के याद कर लेने से ही कृतज्ञता प्रकट हो जाती है?

बाबा- नहीं याद करने का तात्पर्य यह है कि उनके द्वारा किये गये सत्कार्यों को अपने जीवन में उतारना तथा असत्कार्यों और की गई त्रुटियों को त्यागना।

राजू- लेकिन, तृप्ति और मुक्ति की बात क्या है, बाबा!?

बाबा- किसी को भोजन कराने पर भोजन करने वाले भले ही तृप्त हो जायें परंतु शरीरहीन दिवंगत किस प्रकार तृप्त हो सकते हैं?  जिसे अनेक दिनों से भरपेट भोजन न मिला हो और उसे नारायण समझकर आत्मीयता से पेट भर भोजन करा दिया जाय तो यह उनको खिलाने की तुलना में अधिक अच्छा होता है जो रोज ही अनेक बार खाते हैं।

नन्दू- और मुक्ति? 

बाबा- मुक्ति और मोक्ष प्राप्त होना अपने अपने कर्मों पर आधारित होता है किसी के कर्मों के फल को किसी अन्य के पुण्यों से बदला नहीं जा सकता, कर्मफल उसी को भोगना पड़ता है जिसने कर्म किया होता है। इसी लिये मैं बार बार कहता हॅूं कि इस अमूल्य मनुष्य देह में आकर इसका अधिकतम सदुपयोग करते हुए सत्य को जानने का अभ्यास करने में ही समय लगाना चाहिये।


Monday, 14 September 2015

23 बँधु बांधव


कौटिल्य  अर्थात  चाणक्य से मिलने आये एक विद्वान ने उनसे पूछा -
"आपके कितने बँधु  बांधव हैं और वे कहाँ रहते  हैं?"
चाणक्य बोले "छह बंधु बांधव हैं और वे मेरे साथ ही रहते हैं।" विद्वान ने फिर कहा - "यहाँ तो  छह हाथ लम्बी और छह हाथ चौड़ी झोपड़ी ही दिखाई दे रही है वे सब कहाँ हैपरिचय  तो कराओ ?"
चाणक्य बोले -
"सत्यम  माता पिता ज्ञानं बुद्धिर्भ्राता  दया सखा 
शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रो षष्ठेते मम बान्धवा। " 

अर्थात सत्य मेरी माता हैं पिता ज्ञान हैं बुद्धि भाई और दया सखा हैं , शांति पत्नी और क्षमा पुत्र है,  यही मेरे छह बँधु बांधव हैं।  

विद्वान महोदय ,  साधोसाधोसाधोकहते अश्रुपात करते रहे।  

22 चलते हैं...


- जा...  रहे हो??.. यह भी कोई बात हुई?
- क्यों ? मैं तो जाने के लिये ही आया था।
- इतनी जल्दी क्या है?
- जल्दी ? पेंतालीस वर्ष हो चुके हैं साथ साथ चलते ?
- तुम भी ! क्या व्यर्थ की बातें करते हो?
- तुमने सत्य कहा, हमें प्रकृति के द्वारा मुफ्त में मिली चीजें महत्वहीन लगती हैं और जिन्हें हम अपने पराक्रम से  अर्जित करते हें वे मूल्यवान।
- तुम्हारी यह फिलासफी समझ से परे है?
- अरे! समय और स्थान से बंधे हम इनकी गतिशीलता पर कभी ध्यान ही नहीं देते, सोचते हैं वे तो स्थिर हैं हमारे साथ हमेशा  हैं जबकि प्रत्येक 'क्षण' हमारे हाथ से फिसलता जा रहा है, वैसे ही,  देखो ! जैसे ट्रेन आगे बढ़ती जा रही है स्थान पीछे हटते जा रहे हैं । नया स्टेशन आने वाला है, वहॉं से अब इस बर्थ पर किसी और की पात्रता है।
- लेकिन मैं अकेली...?
- परमपिता की अंतरंगता का अनुभव करो, कोई भी, कभी भी, अकेला नहीं है।
   देखो ! स्टेशन आ गया, 
अच्छा.... तो..... हम.... च...ल...ते... हैं... ... ..! ! !

21 बाबा की क्लास (अमृतत्व) 
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- "बाबा! हम लोगों ने अनेक स्थानों पर पढ़ा है और रसायन में भी पढ़ाते हैं कि अनेक पदार्थ हैं जो विषैले होते हैं जिनके खाने पर मृत्यु हो जाती है, और इनके विपरीत स्वभाव के पदार्थ भी होते हैं जिनका उपयोग करने या खाने से व्यक्ति पर इनका असर घट जाता है?"
- "सभी पदार्थों का अपना अपना अपना गुणधर्म होता है , एक पदार्थ किसी के लिये विष तो दूसरे के लिये अमृत होता है।"
- "बस बाबा! हम लोग आज यही समझने आये हैं कि हमने ‘अमृत‘ नामक वस्तु की अनेक चर्चायें सुनी हैं परंतु , क्या सचमुच उसका भौतिक अस्तित्व होता है जैसा कि विष का?"
- "ठीक कहा, पर अमृत तुम्हारे भीतर ही है बाहर नहीं, उसे समझने के लिये चिंतन करना होगा। इसलिये मैं तुम लोगों को अपने समय के मूर्धन्य, कुशाग्रबुद्धि आचार्य और शास्त्रार्थ में अपराजेय शीर्ष कोटि के विद्वान ऋषि याज्ञवल्क्य जी का द्रष्टान्त सुनाकर इसे स्पष्ट करना चाहता हॅूं सुनो - "

याज्ञवल्क्य जी, ग्रहस्थ आश्रम त्याग कर सन्यास लेने लगे तब उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों, कात्यायिनी और मैत्रेयी से अनुमति लेते हुए कहा -
 ‘‘तुम दोनों मेरे पश्चात्  सम्पत्ति पर विवाद न करो इसलिये मुझे बताओ किसे क्या चाहिये है, मैं अपने सामने ही वंटवारा कर दूॅं।‘‘  कात्यायिनी ने अपनी लम्बी सूची बनाकर दे दी परंतु मैंत्रेयी ने कहा, ‘‘ भगवन्! धन दौलत से भरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी मुझे मिल जाये, तो क्या मैं अमर हो सकती हॅूं?‘‘
याज्ञवल्क्य बोले, ‘‘ नहीं, जैसे धन सम्पन्न लोगों का जीवन होता है वैसे ही तुम्हारा जीवन हो जायेगा, धन से अमर होने की आशा  करना व्यर्थ है।‘‘
मैत्रेयी बोली, ‘‘ जिसे पाकर मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर क्या करूंगी ? आप तो मुझे अमृतत्व का जो भी साधन जानते हों वही बताते जाइये।"
वह बोले - मैत्रेयी! मेरी इन बातों पर चिंतन करना, यही अमृतत्व का रास्ता बतायेंगी। 
‘‘पति के प्रयोजन के लिये पति प्रिय नहीं होता अपने ही प्रयोजन के लिये पति प्रिय होता है। स्त्री के प्रयोजन के लिये स्त्री प्रिया नहीं होती अपने ही प्रयोजन के लिये स्त्री प्रिया होती है। पुत्र के प्रयोजन के लिये पुत्र प्रिय नहीं होता अपने ही प्रयोजन के लिये पुत्र प्रिय होता है। धन के प्रयोजन के लिये धन प्रिय नहीं होता अपने ही प्रयोजन के लिये धन प्रिय होता है। पशुओं के प्रयोजन के लिये पशु  प्रिय नहीं होते अपने ही प्रयोजन के लिये पशु  प्रिय होते हैं। सब के प्रयोजन के लिये सब प्रिय नहीं होते अपने प्रयोजन के लिये ही सब प्रिय होते हैं। अतः अपना आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान करने योग्य है। आत्मा का दर्शन  हो जाने पर अप्राप्त, प्राप्त हो जाता है, और अज्ञात, ज्ञात हो जाता है।‘‘
इस प्रकार के अनेक उदाहरण देने के बाद भी जब मैत्रेयी ने कहा कि मुझे विशेष कुछ समझ में नहीं आया, तब वे बोले-
‘‘ मैत्रेयी! मन में भेद रहने पर ही अन्य , अन्य को देखता, सूंघता ,रसास्वादन करता, सुनता, मनन करता, और स्पर्श  करता है परंतु जिसे सब कुछ आत्ममय ही हो गया वह किसके द्वारा किसे देखे , सुने , सूंघे, अभिवादन करे, मनन करे? जिसके द्वारा मनुष्य इस सब को जान पाता है उसे किसके द्वारा जाने, किस साधन से जाने? वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, उसका नाश  नहीं होता, वह व्यथित और क्षीण नहीं होता। मैत्रेयी! विज्ञाति के विज्ञाता को किसके द्वारा जाने? बस इतना चिंतन करना, यही अमृतत्व है।‘‘ 
यह कहते हुए उन्होंने सन्यास ले लिया।