Monday, 10 May 2021

350 भ्रष्टाचार का विरोध क्यों नहीं?

 

 सभी प्रकार के चिंतक अनैकिता, अवैज्ञानिकता, अतार्किकता और भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिये प्रोत्साहित करते हैं परन्तु किसमें यह साहस है कि सामाज में व्याप्त इस केंसर को दूर करने का बीड़ा उठाये?  उत्तर है, वे इस कार्य के लिये सक्षम हैं जो सही अर्थ में नैतिक हैं, सद्विप्र हैं, तेजस्वी हैं। यहाॅ भर्तृहरि की यह उक्ति प्रासंगिक है कि, 

यदचेनोपिपादैः स्पृष्टः प्रज्ज्वलति सवितुरिकान्तः, तत्तेजस्वी पुरुषःपरकृतनिकृतिं कथं सहते।

अर्थात् जब एक निर्जीव पत्थर का टुकड़ा सूर्य की किरणों से आहत होता है तब स्वयं गर्म होकर चारों ओर अपना विरोध प्रकट कर सकता है तो फिर सद्गुणी तेजस्वी पुरुष इन भ्रष्टाचारियों का विरोध क्यों नहीं कर सकते? उनकी क्रूरता को सहते ही क्यों हैं? 

पॅूंजीवादियों द्वारा आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शोषण किया जाना हमारे देश का ही नहीं, पूरे संसार का रोग है। क्या यह सद्गुणी लोगों का कर्तव्य नहीं है कि वे इन सरल और सताए हुए लोगों को इस प्रकार के शोषण से बचाने का उपाय करें? ये निरपराधी लोग बली का बकरा बनने के लिए क्यों विवश हों? यह असहनीय है। इसलिये यदि आप सच्चे अर्थ में मानव हैं तो एक ओर तो अथक आध्यात्मिक साधना कर आत्मसाक्षात्कार की ओर बढ़ते जाएं और उतनी ही तेज गति से बाहरी संसार में फैलाए जा रहे अविवेकपूर्ण, अवांछनीय और क्षतिकारक सिद्धान्तों रोकने के लिये कटिबद्ध हों। हमारा मनुष्य होना तभी सार्थक कहलाएगा जब संसार का प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाएगा। 


कुछ लोगों का मानना है कि अविकसित देशों में अशिक्षा के कारण लोग अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानते इसलिए वे बुराई को सहते रहते हैं और भ्रष्टाचार की समस्या बढ़ती जाती है। पर क्या यह सही है? इन अविकसित देशों के पढ़े लिखे लोग भी विभिन्न राजनैतिक पार्टियों को विश्वसनीयता से समर्थन देते पाए जाते हैं जबकि वे जनसामान्य को अपना नेतृत्व देकर अनीति के विरुद्ध एकत्रित कर सकते हैं। भले ही वे पूरे समाज को प्रेरित न कर पाएं परन्तु कुछ समस्याओं का तो अवश्य ही समाधान कर सकते हैं। वे यह क्यों नहीं करते ? कारण सरल है। समाज के उन्नत स्तर का एक बड़ा घटक भ्रष्टाचार में लिप्त रहता है इसलिए वे उनके सामने यह साहस ही नहीं जुटा पाते कि उनके विरुद्ध आवाज उठाएं, अनैतिकता को रोकें और समाज के हर स्तर पर सक्रिय भ्रष्टाचारियों में सुधार लाने का प्रयास करें। देखा गया है कि लिपिक, शिक्षक, इंजीनियर, सरकारी अधिकारी और व्यवसायी जो कि समाज में तथाकथित पढ़े लिखे माने जाते हैं, अधिकांश अनैतिक कामों और अपने अपने कर्तव्यक्षेत्रों में भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं। उनका कमजोर मन परोक्षतः अन्याय की आलोचना करता है परन्तु आमना सामना करने से डरता है। चोर लोग अपने चोरों के समूह में चोरों की आलोचना कर सकते हैं परन्तु वे ईमानदार लोगों के समूह में अपना कोई सुझाव नहीं दे सकते क्यों कि ऐसा करने में उनके ओठ थरथराएंगे, उनका हृदय धड़कने लगेगा।  विकसित देशों के उच्च स्तरीय समाज में भी पढ़े लिखे भ्रष्टाचारियों की दशा भी ऐसी ही है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से तो स्थिति और भी जटिल हो गई है। भारतीय दर्शन की गाइड लाइन्स के आधार पर इस प्रकार के लोगों के आचरण में परिवर्तन लाकर ईमानदार बनाना होगा अन्यथा समाज की कोई भी बुराई दूर नहीं होगी और न ही कोई समस्या हल होगी। कोरोना के इस संकट ने बाजारी संस्कृति की पोल खोल दी है और बता दिया है कि व्यापारी किस प्रकार धन के पीछे भागकर मानवता से खिलवाड़ करने भी नहीं चूकते। इस समय कोरोना से शिक्षा लेने की आवश्यकता है  जिसने स्वच्छता से रहने ,अनावश्यक भीड़ न बढ़ाने और सात्विक जीवन जीने को विवश कर दिया है। हमें हर हाल में राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण कर ऐसा आर्थिक दर्शन स्थापित करने के लिये आगे आना होगा जो विश्वव्यापी भ्रष्टाचार को मिटा सके। यह आशा करना कि केवल सरकर ही इन बुराइयों को दूर करने का कोई जादू कर सकती है, पागलपन ही कहा जाएगा । “भारतीय दर्शन’ सभी को महान लक्ष्य की ओर प्रेरित  करते  हुए सेवाभाव सिखाता है और अपना सब कुछ अपने ’’इष्ट’’ के ही इस सगुण रूप ‘विश्व’ के प्रति के देने का आव्हान करता है न कि धन संग्रह कर अपना घर भरते जाने का। इसलिए नैतिक और सच्चरित्र लोगों को ही आगे आकर अपनी दक्षता को आजमाना होगा, दूसरा कोई उपाय नहीं है।

हम महर्षि पतंजलि से भी प्रेरणा ले सकते हैं, जिन्होंने 2500 वर्ष पहले कहा था, ‘‘जब आप किसी महान उद्देश्य से प्रेरित होते हैं, कुछ असाधारण करने की इच्छा से प्रेरित होते हैं, तो आपके विचार अपने सारे बंधनों को तोड़ देते हैं। आपका मन सीमाओं के परे चला जाता है। आपकी चेतना हर दिशा में फैल जाती है और आप खुद को एक नई, महान और शानदार दुनिया में पाते हैं। आपके अंदर सुसुप्त ताकतें और हुनर जाग जाते हैं और आप पाते हैं कि आप इतने महान व्यक्ति बन चुके हैं, जिसकी कल्पना आपने सपनों में भी नहीं की थी।’’


Sunday, 2 May 2021

349 स्वधर्म और परधर्म


‘‘धर्म’’ की विभिन्न विद्वानों ने अनेक प्रकार से व्यरख्या की है। धर्म को ‘रिलीजन’ का अनुवाद मानकर उन्होंने समाज को अनेक प्रकार से बाॅंट दिया है, जिनमें अपने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिये झगड़े होना आम बात हो गई है। जबकि सत्य यह है कि धर्म तो सभी को जोड़ता है विभाजन करना उसका स्वभाव ही नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि रिलीजन धर्म का पर्याय नहीं बन सकता हाॅं उसे मतवाद अवश्य कहा जा सकता है क्योंकि मतवादों में ही वाद विवाद बने रहने की संभावना रहती है। इस संदर्भ में कुछ विद्वानों को श्रीमद्भग्वदगीता का यह श्लोक उद्धृत करते भी देखा जाता है-

‘‘श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनिष्ठतात्, स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मो भयावहः। 3/35’’

अर्थात् अपना धर्म चाहे दूसरे की तुलना में निम्न स्तर का अर्थात् हीन ही क्यों न हो, स्वयं के लिए उसे ही निष्ठापूर्वक अन्त तक पालन करना चाहिए क्योंकि स्वधर्म का पालन करते हुए मरना भी श्रेष्ठ होता है जबकि दूसरे का धर्म भयकारक होता है।

धर्म को रिलीजन का पर्याय मानने वालों ने इस श्लोक का मनमाना अर्थ निकालकर समाज में परस्पर वैमनस्य भर दिया है और रोज नए नए तथाकथित धर्म उत्पन्न होते जा रहे हैं और वर्ग संघर्ष बढ़ता जा रहा है। मनुष्य अपने निर्धारित लक्ष्य को पाने के लिये पराक्रम न कर उसके स्थान पर समाज के अन्य वर्गों से व्यर्थ का संघर्ष करने में जीवन नष्ट कर रहे है। 

यदि ध्यानपूर्वक इस श्लोक पर चिंतन किया जाय तो यहाॅं धर्म का अर्थ ‘‘कर्तव्य’’ अर्थात् ड्युटी की सूचना देता है न कि रिलीजन की। उसका कारण यह है कि श्लोक का अर्थ करने के पहले यह देखना चाहिए कि वह किस स्थल पर किसके संदर्भ में कहा गया है अन्यथा सब कुछ गड़बड़ होने की अधिक संभावना हो जाती है। इस श्लोक को श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को यह समझाने के लिए कहा गया है कि उसका युद्ध करना क्यों उचित है और युद्ध न करने का निर्णय करना अनुचित क्यों है। स्थिति यह है कि सभी प्रकार से युद्ध रोकने के प्रयास जब असफल हो चुके तब युद्ध करना ही अन्तिम उपाय सामने आया और सभी योद्धा युद्ध स्थल में पहुंच भी चुके हैं; यहाॅं एक योद्धा का धर्म अर्थात् ड्युटी स्वाभाविक रूप से क्या होगी? स्पष्टतः पूरे कौशल के साथ शत्रु से युद्ध करना फिर परिणाम चाहे जो कुछ भी हो। अर्जुन का यहाॅं युद्ध न करने का निर्णय, यह कारण बताते हुए कि मैं अपने सगे संबंधियों और गुरुओं की हिंसा करने का पाप नहीं करना चाहता, क्या उचित है? निश्चय ही इसे अपने मूल कर्तव्य अर्थात् ‘‘ क्षत्रिय धर्म’’ का पालन न करते हुए  ‘ब्राह्मण धर्म अहिंसा’ की ओर पलायन करना ही कहा जाएगा। इसीलिए श्रीकृष्ण का यह कहना कि,‘‘ हिंसा की तुलना में अहिंसा भले ही श्रेष्ठ कर्तव्य लगता हो पर वह युद्धस्थल में खड़े एक योद्धा का कर्तव्य नहीं है वह तुम्हारे लिए भयकारक है’’ सर्वथा उचित है। अतः यह बिलकुल स्पष्ट है कि यहाॅं धर्म का अर्थ कर्तव्य ही माना गया है। इसी के पक्ष में अन्य प्रमाण भी श्रीमद्भगवद्गीता में ही दिया गया है जो अर्जुन को लगातार समझाने के बाद अंतिम रूप से कहते हुए श्रीकृष्ण द्वारा इसी श्लोक में थोड़ा सा परिवर्तन कर इस प्रकार कहा गया है-

‘‘श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनिष्ठतात्, स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्। 18/47’’

श्रीकृष्ण ने, हिंसा के फलस्वरूप होने वाले पाप से भयभीत अर्जुन को आश्वस्त करने के लिए पूर्वोक्त श्लोक में केवल यह जोड़ा है कि ‘‘स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्’’ अर्थात् स्वाभाविक रूप से जिसे जो कर्तव्य निर्धारित किया गया है उसे निष्ठापूर्वक करते हुए कर्ता को किसी प्रकार का पाप नहीं लगता।

अतः धर्म के नाम पर जनसामान्य को गुमराह करना, धर्म के नाम पर श्रेष्ठता और हीनता की भावना से झगड़े करना और समाज को विभाजित कर प्रगति में बाधा पैदा करना, केवल तुच्छ मानसिकता का प्रदर्शन और धर्म की सही सही समझ न होना ही प्रकट करता है।

अब, स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि ‘धर्म’ किसे कहा जाय? इसका उत्तर है किसी व्यक्ति या पदार्थ के आभ्यान्तरिक लक्षण जिन्हें वे धारण करते हैं वही उनका धर्म कहलाता है। जैसे आग की लाक्षणिकता है उसकी दाहिका शक्ति, अतः यह उसका धर्म हुआ। पशुओं का लक्षण है खाना, सोना और मौज मस्ती करना यह पशुओं का धर्म हुआ। मनुष्य पशुओं से उन्नत प्राणी है अतः स्वभावतः पशुओं के गुण उनमें भी हैं परन्तु उसके पास बुद्धि और विवेक भी है जो उन्हें पशुओं से पृथक करता है। वह अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग कर अपनी आगे की प्रगति के आयाम खोज सकता है, यह हुआ मानव धर्म । पशुओं और मनुष्यों में (1)विस्तार- अर्थात् अपने को एक से दो, दो से चार करते हुए विस्तारित करते जाना (2)रस-अर्थात् ऐंद्रिय सुख में लीन रहना (3)सेवा- अर्थात् अपने निकट संबंधियों के प्रति लगाव रखते हुए उनकी सहायता करना; ये तीनों लक्षण आन्तरिक रूप से पाए जाते हैं पर मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग कर एक नए गुण का विकास कर लेता है वह है (4) तद्स्थिति अर्थात् परमसत्ता से अपने आप को जोड़ने का प्रयत्न करते रहना। इन चारों लक्षणों के विवेकपूर्ण समाहार को कहा जाता है ‘भागवत धर्म’। इसलिए ब्रह्मचक्र की विकास धारा में सभी प्राणियों का लक्ष्य है भागवत धर्म में प्रतिष्ठित होना। यही है हम सबका धर्म; अन्य सब तो आडम्बर के पोषक मतवाद मात्र हैं। 


Thursday, 22 April 2021

348 कर्म

 348 कर्म

‘‘अच्छा, तो आप कर्म किसे कहते हैं?’’

‘‘कर्म वह है जो बंधन में न बाॅंधे।’’

‘‘तो वे कर्म जो बंधन में बाॅंधते होे, उन्हें क्या कहेंगे?

‘‘अन्य सभी कर्म आयास मात्र हैं।’’

‘‘आपके अनुसार विद्या किसे कहा जाय?’’

‘‘विद्या वह है जो कर्म बंधन से मुक्त कर दे।’’

‘‘तो अन्य विद्याएं क्या है?’’

‘‘ वे सब केवल कौशल हैं।’’


Friday, 16 October 2020

347 शास्त्र

 

यह सार्वभौमिक रूप से सभी युगों में, सभी स्तरों पर स्वीकार किया जाता रहा है कि धर्म ही मनुष्य जीवन की मुख्य धारा है। जीवधारियों की वही जीवनी शक्ति है, यही नहीं वह उनकी जीवन यात्रा का मार्गदर्शक और धन का स्रोत है। शब्द के व्यापक अर्थ में सभी सजीव या निर्जीव पदार्थों, सबका  अपना अपना धर्म होता है अर्थात् धर्म उस पदार्थ के अस्तित्व को प्रकट करता है। उसके संकीर्ण अर्थ में निर्जीव पदार्थों में धर्म का प्राकट्य कम और सजीवों में अधिक होता है। मनुष्यों में मानवेतर प्राणियों के धर्म का जन्मजात समावेश रहता है परंतु मानवों का धर्म इससे बहुत अधिक होता है वह जीवन के प्रत्येक पहलु में प्रविष्ठ रहता है। इसलिये धर्म वास्तव में नियंत्रक और सच्चा मार्गदर्शक होता है, प्रेरक बल और मनुष्यों का रक्षक होता है, वह एक उत्तम और व्यापक आदर्श होता है जो मानव जीवन के हर पहलु का निश्चित, साहसी और स्पष्ट दिशा निर्देश देता हैं, न केवल व्यक्तिगत दिनचर्या का वरन् उसकी समग्र क्रियाओं और प्रेरकों के संबंध में आध्यात्मिक प्रेरणा भी देता है जो उसे ईश्वर के निकटतर लाने में सहायक होता है। सच्चे धर्म शास्त्र वही हैं जिनमें इन सभी शर्तों का समावेश होता है और ‘‘शासनात् तारयेत यस्तु सः शास्त्रः परिकीर्तितः’’ की परिभाषा से पारिभाषित होते है। अन्य धर्मग्रंथ जो इन शर्तों के अनुरूप नहीं हों  और इस परिभाषा का पालन नहीं करते उन्हें सत्य का पथप्रदर्शक नहीं माना जा सकता। यहाॅं यह भी ध्यान में रखने योग्य है कि सच्चे धर्मशास्त्रों में स्पष्ट दिशानिर्देश होना चाहिये जिनका पालन सभी लोग अपने जीवन में तो करें ही दूसरों को भी मार्गदर्शन कर सकें।

हम सभी रस के अनन्त महासागर में रहते हैं, इसमें कभी समाप्त न होने वाले सृजन का विकिरण, अर्थात् सभी छोटी और बड़ी अवर्णनीय अभिव्यक्तियों का स्पंदन, उच्चारित और अनुच्चारित अलौकिक विचार तरंगों के रूप में, भीतर और बाहर सभी दसों दिशाओं में, हिलोरें ले रहा है। इसलिये परम सत्ता की प्रत्येक संरचना के साथ उचित और विवेकपूर्ण व्यवहार करते हुए उसका ध्यान रखना चाहिये जो कि इन विभिन्न रचनाओं का सारतत्व है। अपने आपको कुमुदिनी के आदर्श पर ढालने का प्रयत्न करना चाहिये जो कीचड़ में खिलती है और अपने अस्तित्व के रक्षण में दिन रात कीचड़ भरे पानी, झंझटों तथा भाग्य के थेपेड़ों और तूफानों के आघात सहती है फिर भी अपने ऊपर दिखने वाले चंद्रमा को नहीं भूलती वह अपना प्रेम उसके साथ स्थायी रूप से जीवित रखती है । वह एक साधारण फूल ही है उसमें असाधारण कुछ नहीं है फिर भी वह अपनी सभी इच्छायें चंद्रमा पर केन्द्रित रखकर अपना रोमान्स महान चंद्रमा के साथ बाॅंधे रहती है। हो सकता है हम बहुत ही साधारण व्यक्ति हों और साॅंसारिक जीवन में अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये  उतार चढ़ाव से अपने दिन काट रहे हों  परंतु हमें उस परम सत्ता को नहीं भूलना चाहिये, हमारी सभी इच्छायें उसी की ओर झुकी रहना चाहिये, सदा ही उसी के विचारों में डूबे रहना चाहिये, उसके अनन्त प्रेम में डूब जाने पर साॅंसारिक गतिविधियाॅं प्रभावित नहीं होंगी। परिस्थतियां चाहे जैसी भी क्यों न रहें परम सत्ता से अपनी निगाहें नहीं हटना चाहिये। जिन्हांेने अपने जीवन का आदर्श और लक्ष्य उस परम सत्ता को बना लिया है उसका पतन नहीं हो सकता। चित्त में जड़ और तुच्छ विचारों के आ जाने पर उन्हीं के अनुसार निम्न स्तरों पर ही अगला जन्म पाना होगा यह प्रकृति का नियम है। जैसे भरत मुनि, उत्कृष्ट साधक होते हुए भी अंत में हिरण पर चिंतन करने के कारण अगले जन्म में हिरण के जीवन को पाकर उन्हें वह संस्कार भोगना पड़ा। इसलिये सतर्क रहकर परमपुरुष पर ही अपना समग्र चिंतन जमाये रखना ही सभी मनुष्यों का कर्तव्य है, ताकि वे सभी आनन्द के पथ पर चलते हुए अपने लक्ष्य को पा सकें। धर्मशास्त्र और सद साहित्य इस कार्य में संजीवनी का काम करते है।


Monday, 12 October 2020

346 सप्तलोक क्या है ?

ये सभी एक साथ ही है,इनकी कोई अलग-अलग दुनिया नहीं है। सप्त लोकों में निम्नतर लोक है " भूर्लोक"(physical world)। ऊर्ध्वतम लोक है "सत्य लोक" जो परमपुरुष में स्थित है। और, इन दोनों के बीच जो पञ्च लोक हैं, वही है पञ्चकोष । मानव मन के पाँच कोष, पाँच स्तर । भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः । भुवः है स्थूल मन, जो प्रत्यक्षरूपेण शारीरिक कर्म के साथ सम्पर्कित रहता है। स्वः लोक है सूक्ष्म मन । मनोमय कोष, मानसिक जगत् । मुख्यतः सुख-दुःख की अनुभूति होती है कहाँ ? स्वर्लोक में, मनोमय कोष में । तो, यह जो स्वर्लोक है, इसी को लोग स्वर्ग कहते हैं , स्वः युक्त “ग”। सुख-दुःख की अनुभूति यहीं होती है । मनुष्य को अच्छा कर्म करने के बाद मन में जो तृप्ति होती है, वह मन के स्वर्लोक में अर्थात् मनोमय कोष में होती है । इसलिए ये स्वर्लोक हमेशा तुम्हारे साथ है । तुम सत्कर्म करते हो, तुम मानव से अतिमानव बनते हो तो, स्वर्लोक खुशी से भर जाता है और जब तुम मनुष्य के तन में, मनुष्य की शक्ल में अधम कर्म करते हो, तो स्वर्लोक दुःख में भर जाता है, मन में ग्लानि होती है,आत्मग्लानि होती है ।

  स्वर्ग-नरक अलग नहीं, इसी दुनिया में हैं और तुम्हारे मन के अन्दर ही स्वर्ग छिपा हुआ है। इसलिए जो पण्डित हो चाहे अपण्डित हो, स्वर्ग-नरक की कहानी, किस्सा-कहानी सुनाते हैं, वे सही काम नहीं करते हैं। वे मनुष्य को misguide करते हैं , विपद में परिचालित करते हैं, उनसे दूर रहना चाहिए वे dogma के प्रचारक हैं ।

Monday, 5 October 2020

345 अन्धविश्वासों की प्रवृत्ति और उनका संरक्षण

भारत के सभी कोनों में व्याप्त ‘अन्धविश्वास‘ एक ऐसी विचित्र विधा है जो काल्पनिक देवी देवताओं की रचना करने में लगाई जाती है। जब जन सामान्य अच्छी तरह शिक्षित नहीं होता है तो वह अन्धविश्वास की ओर प्रवृत्त हो जाता है। जब अन्धविश्वास उगता है तब काल्पनिक देवी देवताओं की रचना कर ली जाती है और उन्हें उन लोगों की समस्याओं के समाधान करने के लिये प्रयुक्त किया जाता है। यही श्रेष्ठ सूत्र है। दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश, काली, सूर्य, जगन्नाथ और न जाने कितने देवता इसी प्रकार बनाए गए हैं।

अनेक प्रकरणों में लोगों को उपदेवताओं के प्रति भय के कारण भक्ति करने या कभी कभी कुछ पाने के लिए पूजा करते देखा गया है। जंगल में जाने से शेर का डर लगता है इसलिए ‘‘वनदेवी’’ की कल्पना शेर के भय से मुक्त करने के लिये की गई। हैजा से बचने के लिये ‘‘ओलाइ चंडी’’ बड़ी माता से बचने के लिए ‘‘शीतला देवी’’ साॅंपों सें बचने के लिए ‘‘मनसा देवी’’ की कल्पना की गई। इन्हें उपदेवता भी कहा जाने लगा। घर में पूरे वर्ष सुख समृद्धि बनी रहे इसलिए गृहणियाॅं ‘लक्ष्मी’ देवी की पूजा करती है। शाॅंति अनुष्ठान के सम्पन्न होने के लिए ‘सेतेरा और सुवाचनी देवी’ की पूजा की जाती है। बच्चों की भलाई के लिए ‘सष्ठी और नील देवी’ की तथा बीमारी से बचने के लिए ‘श्मशानकाली और रक्षकाली’ की पूजा की जाती है। संस्कृत में इन्हें उपदेवता कहा गया है क्योंकि वे परमपुरुष नहीं हैं। अर्थात् आध्यात्मिक संसार में उन्हें ध्यान करने के लिए लक्ष्य नहीं माना गया है। इसी प्रकार मंगला चंडी, आशानबीबी, सत्यपीर आदि भी हैं। उपदेवताओं को लौकिक देवी देवता भी कहा जाता है जिनमें से किन्हीं किन्हीं का लौकिक भाषा में ही ध्यानमन्त्र भी बना लिया गया है। अनेक मामलों में जैनोत्तर और बुद्धोत्तर काल में इन धर्मों के देवी देवताओं ने भी उपदेवताओं का स्थान पा लिया।

कुछ लोग भूतों को भी भय के कारण उपदेवता कहते पाए जाते हैं अर्थात् वे उन्हें छोटे देवी या देवता की तरह पूजने लगते हैं अन्यथा वे नाराज हो कर अहित कर देंगे। परन्तु संस्कृत में उपदेवता का अर्थ भूत नहीं है, भूत के लिए अपदेवता शब्द उच्चारित किया गया है। ‘उप’ का अर्थ होता है ‘निकट’ जबकि ‘अप’ का अर्थ होता है ‘बिलकुल उल्टा’ । इसलिए अपदेवता का अर्थ हुआ ‘जिसकी प्रकृति देवता के बिलकुल विपरीत है।’

वे आध्यात्मिक साधक जो ज्ञान, कर्म और भक्ति का रास्ता पकड़ कर आगे बढ़ते हैं वे किसी भी काल्पनिक देवता या उपदेवता की शरण में नहीं जाते वे तो केवल एकमेव परमपुरुष की ही साधना और उपासना करते हैं।


344 संस्कार का सिद्धान्त

 कर्म अच्छा हो या बुरा उसके कारण मन पर विरूपण उत्पन्न होता है और जब वह अपनी मूल अवस्था में लौटता है तो प्रतिक्रिया के फलस्वरूप अच्छे कामों का अच्छा और बुरे कामों का बुरा परिणाम भोगता है। मुत्यु के बाद मन इकाई चेतना का आश्रय लेता है जहाॅं पर प्रतिक्रियात्मक यह विरूपण अपने पोटेंशियल रूप में अर्थात् सुप्तावस्था में रहता है, इन्हें ही संस्कार कहते हैं। इकाई चेतना को इन संस्कारों को प्रकट करने अर्थात् भोग करने के लिए ही दूसरा शरीर ग्रहण करना होता है। मानलो मिस्टर ‘ए’ के मरने के बाद उनकी इकाई चेतना में कर्मफल के रूपमें सुप्त संस्कार के अनुसार आठ साल की आयु में हाथ टूूटने के  बराबर कष्ट भोगना है और दस वर्ष की आयु में भाग्योदय का सुख भोगना है और ग्यारह वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु का कष्ट भोगना है तो उन्हें यह सब अपने मन के विरूपण को समाप्त करते करते मूल अवस्था में लाते हुए अनुभव करना होगा।

 यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी कष्ट के वास्तविक रूप को पहले से नहीं बताया जा सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसी विशेष क्रिया की वास्तव में क्या प्रतिक्रिया होगी। जैसे , यह पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता कि किसी ने चोरी की है तो प्रतिक्रिया के कारण उतने ही मूल्य की उसकी चोरी होगी। वास्तव में प्रतिक्रिया में होने वाला कष्ट मानसिक कष्ट के अनुसार घटित होता है, जैसे किसी की चोरी करने से उसको जितना मानसिक कष्ट हुआ है उतना ही मानसिक कष्ट चोरी करने वाले को प्रतिक्रिया में भोगना पड़ता है। इसलिए कर्मफल को ‘‘मानसिक कष्ट या सुख’’ के अनुसार भोगना पड़ता है और अनुभव का वास्तविक स्वरूप अपेक्षतया महत्वहीन होता है।  

इसलिये मिस्टर ‘ए‘ को प्रतिक्रिया के फलस्वरूप मानसिक कष्ट या सुख अनुभव कराने के लिए उनकी इकाई चेतना उन परिस्थितियों को खोजकर वहाॅं ही उन्हें नया जन्म देकर नया शरीर दिलाएगी जहाॅं पर पिता के संस्कारों के अनुसार उसके पुत्र की ग्यारह वर्ष आयु होने पर मृत्यु हो जाएगी, आठ साल की आयु में पुत्र का हाथ टूटेगा आदि,  और उन्हें इसका मानसिक कष्ट भोगना पड़ेगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो वे अपना कर्मफल नहीं भोग पाऐंगे। अतः स्पष्ट है कि इकाई चेतना और कर्मफल बिना सोचेसमझे किसी भी शरीर में पुनर्जन्म नहीं ले लेते। उसे संस्कार भोगने के लिए पुनर्जन्म, उचित शरीर और कर्मफल भोगने के लिये उचित क्षेत्र तलाशना होता है।