Wednesday, 11 May 2022

378 अपूर्णीय क्षति

  

आजकल प्रायः अनेक विद्वान चर्चा करते हैं कि हमारे पूर्वज ऋषियों के पास बहुत पहले से चिकित्सा, इंजीनियरिंग, एअरोनाटिक्स आदि का ज्ञान था। यह सत्य भी है परन्तु प्रश्न यह है कि वह ज्ञान कहॉं चला गया, हम उसे संरक्षित क्यों नहीं रख पाए? आइए इसका कारण खोजें।

जब मूल सिद्धान्तों को भूलकर अपने वर्चस्व के लिए मनमाने सिद्धान्तों को प्रधानता दी जाने लगती है तो स्वाभाविक रूप से आडम्बर जन्म लेता है और मूल सिद्धान्तों के पालनकर्ताओं को हेय समझा जाने लगता है। भारतीय दर्शन के अनुसार प्रकृति अपने तीन गुणों सत्व, रज और तम में पारस्परिक संतुलन के आधार पर अपनी गतिविधियां जारी रखती है जिससे कहीं पर सत्व की अधिकता हो तो अन्य दोनों रज और तम की आनुपातिक रूप से कमी होती है और इस प्रकार के जीव सात्विक कहलाते हैं जबकि अन्य गुणों की प्रधानता जिनमें होती है वे क्रमशः राजसिक और तामसिक कहलाते हैं। सपष्ट है कि एक ही परिवार में कोई राजसिक कोई तामसिक और कोई सात्विक हो सकता है परन्तु उनमें आपस में घृणा नहीं होती। पूर्वकाल में कुछ अहंकार ग्रस्त लोगों ने तामसिक गुणों के लोगों को घृणित मानकर उन्हें सामाजिक महत्व से वंचित कर दिया और ‘राक्षस’ कहकर पुकारने लगे। अब यदि राक्षस कुल के किसी व्यक्ति ने कोई अच्छा कार्य किया तब भी वह समाज के तथाकथित सात्विकों द्वारा ग्राह्य नहीं माना जाता था अतः हमारे देश में इन तथाकथित राक्षस प्रवृत्ति के लोगों के द्वारा प्राप्त विद्याओं और किये गए अनुसंधानों को भुलाया जाता रहा है।

हमारा पुराना साहित्य इस प्रकार के दृष्टान्तों से भरा पड़ा है। यह उदाहरण देखिए, पूर्वकाल में बंगाल और झारखंड के एक भूभाग के राजा अनुभवसेन की पत्नी कर्कटी तमोगुणी अर्थात् तथाकथित राक्षसी थी परन्तु वह चिकित्सा के क्षेत्र में लगातार अनुसंधान करती रहती थी। उनका पुत्र सुतनुक आदर्श चरित्र का जनहितकारी वैद्य था। इस प्रकार राजा और उनका पुत्र सात्विक परन्तु पत्नी राक्षसी प्रवृत्तियों की मानी गई। कर्कटी ने अपनी प्रयोगशाला में कर्कट रोग जिसे आज केंसर कहा जाता है की खोज कर ली थी परन्तु तत्कालीन संकीर्ण सोच के सात्विकों ने उसे मान्यता नहीं दी इतना ही नहीं जब वह अपनी प्रयोगशाला में शवों का परीक्षण कर रही थी तो इस समूह के लोगों ने उसे यह कहकर वहीं जला दिया कि वह नरमांस भक्षण के लिये शवों को एकत्रित करती रहती है। अर्थात् उसे राक्षसी कहकर मार डाला गया। कहा जाता है कि कर्कटी की प्रयोगशाला में रखे शवों और अन्य रसायनों के साथ उसके जलने से जो भी गैसें उत्पन्न हुई उनसे ‘कॉलेरा’ अर्थात् हैजा (संस्कृत में विसूचिका) और ‘डायबिटीज’ अर्थात् मधुमेह रोग फैला। इसके साथ ही कॉलेरा और केंसर की औषधि भी विलुप्त हो गई। आयुर्वेद, चिकित्सा और सर्जरी के क्षेत्र में पुराने भारत का ज्ञान इसी निरर्थक सोच के कारण नष्ट होता गया ।

यह सर्वविदित है कि लिपि का ज्ञान न होने के कारण उस समय वेदों के ज्ञान को सुन सुन कर एक दूसरे को दिया जाता था इसीलिये उन्हें श्रुति भी कहा जाता है। परन्तु जब लिपि का ज्ञान हो चुका तब भी परम्परावादी तत्कालीन विद्वानों ने लिखने नहीं दिया क्योंकि वेदों को सुनकर ही एक दूसरे को सिखाने की परम्परा को वे बदलना नहीं चाहते थे। परिणाम यह हुआ कि बहुत सा ज्ञान याद ही नहीं रखा जा सका और जानकार पृथ्वी छोड़कर चले गए। ऋषि अथर्वा ने बड़ी कठिनाई से  इन लोगों से छिप छिप कर अपने साथियों और शिष्यों अंगिरा, अंगिरस, वैदर्भि आदि के साथ वेदों को लिखा जिसे बाद में वेदव्यास ने कालक्रम के अनुसार चार भागों में विभाजित किया।

इसी प्रकार की दकियानूसी विचारधारा का वर्तमान समय का ही उदाहरण है, वह घटना जब अंग्रेजों के शासन में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव बढ़ा तब उसी अवधि में अड़ियल मुल्लाओं के एक समूह ने अंग्रेजी भाषा के खिलाफ एक फतवा जारी किया कि ‘‘यह एक अपवित्र भाषा है क्योंकि यह बाएं से दाएं लिखी जाती है। अगर मुसलमानों ने इसे सीख लिया तो वे अपनी धार्मिक पहचान खो देंगे और ईसाई बन जाएंगे।’’ मुस्लिम विद्वानों के इस रवैये का भारतीय मुसलमानों पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ा। बाद में उन्हें क्षति पूर्ति करने के लिए ही अलीगढ़ में मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना करनी पड़ी।

स्पष्ट है कि जब तक हम तर्क और विज्ञान पर आधारित विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता का समुचित उपयोग कर ऊंचनीच की भावना को दूर करना नहीं सीख लेते हमारे इस प्रकार के दम्भ का कोई मूल्य नहीं कि हम पूर्वकाल में कितने ज्ञान सम्पन्न थे।


Friday, 6 May 2022

377 धर्म


आजकल कुछ विद्वानों को इस बात पर बहस करते देखा जाता है कि कृष्ण के समय अर्थात् पांच हजार साल पहले जब अनेक धर्म थे ही नहीं तो उनका अर्जुन से यह कहना निरर्थक है कि ‘‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शरणम् ब्रज’’ अर्थात् सभी धर्मो को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। कुछ विद्वानों तर्क है कि उनका यह कथन उस बनिये की तरह है जो कहता है कि मेरी दूकान में ही सबसे अच्छा माल मिलता है इसलिए अन्य दूकानों पर न जाकर केवल मेरे पास ही आओ।
वास्तव में यह बहस तब उत्पन्न होती है जब हम ‘‘धर्म’’ का अर्थ अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ शब्द के समानार्थी की तरह स्वीकार करते हैं जबकि रिलीजन का अर्थ है ‘मतवाद’ से न कि धर्म से। अंग्रेजी में धर्म के समतुल्य यदि कोई शब्द है तो वह है ड्युटी अर्थात् कर्तव्य। सोचने वाली बात यह है कि कृष्ण और अर्जुन का संवाद हो रहा है युद्ध स्थल पर। युद्ध भी तत्काल के निर्णय पर नहीं वरन् अनेक प्रकार से शान्ति के प्रयास असफल हो जाने के बाद हुआ। अब यदि कोई योद्धा कहे कि मैं इन्हें क्यों मारूं ये तो मेरे सगे संबंधी हैं, यदि ये मर गए तो इनके आश्रित संबंधियों का क्या होगा, यह पाप क्यों करना आदि, तो क्या उचित होगा? नहीं।
इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं कि ‘‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शरणम् ब्रज’’ अर्थात्, पृथकता, चिन्ता, भय और रोना (द्वितीयक धर्म यानी सभी उपधर्म) छोड़कर, केवल मेरी ओर अर्थात् परमसत्ता की ओर (प्राथमिक धर्म यानी प्रधान धर्म की ओर ) आनन्दपूर्वक चले आओ । यदि चलते हुए गिरने से चोट लग जाए तो तुम्हारा पिता गुणकारी मरहम लगा कर ठीक कर देगा, धूल को पोंछ कर स्वच्छ कर देगा, चिन्ता की कोई बात नहीं । यही समझाने के लिए उन्होंने अनेक शब्दों में से ‘‘ब्रज’’, ब्रजति अर्थात् ‘‘आनन्द पूर्वक चलना’’ को ही अपने कथन में प्रयुक्त किया है। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा है कि ‘ चिंता न करो, मैं तुम्हें तुम्हारे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा’ जो इससे पहले न किसी ने कहा है और न भविष्य में कहेगा। यह केवल कृष्ण का ही सामर्थ्य है किसी बनिये का नहीं। संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद की गई पुस्तकों में प्रायः इस प्रकार के निराधार अर्थ किये गए हैं और अर्थ का अनर्थ किया गया है। पाठकों को मूल संस्कृत का निरुक्त के आधार पर स्वविवेक से अर्थ ग्राह्य करना चाहिए। कृष्ण लगातार बुला रहे हैं और हम डरकर उनसे दूर भागते जा रहे हैं प्रकृति के हर क्षण बदलते मायावी स्वरूपों से आकर्षित होकर । इस विचित्र दुनिया के सतत रूपान्तरित होते वर्णक्रम को हमने सबकुछ मान लिया है!

Sunday, 10 April 2022

376 अनर्थ


योग में यम और नियम साधना करने का विशेष महत्व है। नियम साधना का एक खंड है‘‘स्वाध्याय’’। इसका अर्थ है किसी जटिल आध्यात्मिक तत्व के गूढ़ार्थ को समझकर अध्ययन करना और तदनुसार आचरण करना। इसलिये यह आवश्यक हो जाता है कि शास्त्रों में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ को जिस संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है उन्हें उसी के आधार पर उनकी व्युत्पत्ति के साथ समझना। यदि ऐसा न किया जाय तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है और समाज को अपूर्णीय क्षति का सामना करना पड़ता है। वर्तमान में शास्त्रज्ञों और व्याख्याकारों की भरमार देखी जाती है जो शास्त्रों को अत्मसात किये बिना ही धनोपार्जन के लिये मनमानी व्याख्या में लगे हुए हैं। शास्त्र निहित भाषा की दूरूहता को समझे बिना किस्से कहानियों की तरह सुनाकर दूर हो जाने से समाज विभ्रान्त होकर धर्मच्युत हो जाता है। इन तथाकथित विद्वानों की व्याख्याओं के कुछ उदाहरण देखिए जिनसे समाज पर कुप्रभाव पड़ा है-

1. ‘शाक्त’ संप्रदाय के उपासकों में ‘पंच मकार’ साधना में ‘मकार’ को सिद्ध करने के लिये शक्ति  रूपी ‘मॉं’ को संतुष्ट करने के नाम पर बलि देने का प्रावधान किया गया और प्रसाद के रूप में  ‘मांस’ भक्षण  प्रारंभ कर दिया गया। जबकि शब्दिक व्युत्पत्ति के आधार पर ‘मा’ का अर्थ होता है ‘जिव्हा’ अर्थात् जीभ, और मांस का अर्थ हुआ ‘जिव्हा का कार्य’ अर्थात् ‘वचन’। इसका गूढ़ार्थ हुआ ‘‘जो साधक वचन का रोज भक्षण करता है’’ अर्थात् ‘वाक् संयम’ का नियमित अभ्यास करता है वह है ‘मांस साधक’। परन्तु दुख है कि सतही ज्ञान के पोषक तथाकथित व्याख्याकारों ने अनर्थ कर निरीह प्राणियों की हत्या कराना प्रारंभ कर दिया।

2. शब्दों के प्रयोग करने के स्थान आदि के अनुसार शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं परन्तु सतही ज्ञान वाले पंडित स्वाध्याय के अभाव में इसका महत्व नहीं जानते और समाज को गलत दिशा देते पाए जाते हैं। जैसे, ‘‘शोण्डिकः सुरालयं गच्छति’’ में ‘सुरालय’ का स्वाभाविक अर्थ होगा सुरा की दूकान यानि ‘मदिरालय’ (अर्थात् शोण्डिक मदिरालय जाता है) परन्तु ‘नारदः सुरालयं गच्छति’ में यदि इस प्रकार का अर्थ लिया जाएगा तो अनर्थ होगा। यहॉं ‘सुरालय’ का अर्थ होगा ‘सुरों का आलय’ अर्थात् ‘सुर’ माने ‘देव’ इसलिये सुरों का आलय मतलब देवालय, (अर्थात् नारद देवालय जाते हैं) न कि मदिरालय यानि ‘सुरा का आलय’।

3. वैदिक काल में जब लिपि नहीं थी तब सभी तथ्य और मंत्र मौखिक ही गुणीजन अन्यों को समझाया करते थे। उस समय व्यवस्था बनायी गई थी कि पति के मरने पर पत्नी शवयात्रा में कुछ दूर तक आगे आगे जायेगी (विधवा अग्रे गमिष्यति) परन्तु लिपि के आने के बाद इसे लिखा गया (विधवा अग्ने गमिष्यति) और अमानवीय ‘सतीप्रथा’ का दंश यह मानव समाज झेलता रहा।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि शास्त्रों के नाम पर धर्मव्यवसायी तथा स्वार्थी तत्वों द्वारा युक्तहीन, तर्कहीन, अवैज्ञानिक  और अव्यावहारिक धारणाओं का प्रचार किया जा रहा है जिनका यथार्थ ज्ञानवेत्ताओं को खंडन करना चाहिए और ‘स्वाध्याय’ को सही अर्थ मैं आत्मसात करने का प्रोत्साहन करना चाहिए।


Monday, 21 March 2022

375 वर्णार्घ्य


रंग सभी को आकर्षित करते हैं। यह विश्व रंगीन है, सभी इन रंगों को पाने की इच्छा से उसी ओर दौड़ते जा रहे हैं। बसंत ऋतु में प्रकृति अपने रंगों को अद्वितीय रूप से विकीर्णित करती है। इसके उल्लास में लोग बसंतोत्सव मनाते हैं। रंगों की ओर पागलों की तरह दौड़ने वाले यह लोग वैसा ही कार्य कर रहे होते हैं जैसे कोई धुएं या ध्वनि को पकड़ने के लिए उनके पीछे भागे। विवेक पूर्वक सोचने पर पता चलता है कि यदि धुएं या ध्वनि के श्रोत को ही पकड़ लिया जाए तो इन्हें नियंत्रित कर पाना कठिन नहीं है। पर यह कोई नहीं करता, उन रंगीन वस्तुओं को पाने के लिए उनके पीछे दौड़ लगाते हैं जो उनका है ही नहीं। विज्ञान के अनुसार सभी रंग तो प्रकाश के ही हैं वस्तुएं तो केवल उसे परावर्तित ही करती हैं। लोगों के मन में यह विचार कभी नहीं आता कि जिसने इतने आकर्षित करने वाले रंगों की दुनिया बनाई है वह निश्चय ही इससे अधिक अकर्षक होना चाहिए पर उसे पाने की इच्छा ही नहीं जागती।

संस्कृत में रंग को ‘‘वर्ण’’ कहा जाता है और विज्ञान में ‘‘तरंगदैर्घ्य’’। जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति के संबंध में व्याख्या करते हैं तो इसीलिए उसे कहा जाता है ‘वर्णन’। विद्यातंत्र में सभी प्रकार के अच्छे बुरे संस्कारों को मन के ऊपर तरंगों अर्थात् वर्णों के रूप में चिपका हुआ माना जाता है। इसका साक्षीस्वरूप जीवात्मा भी इसी कारण इन रंगों के प्रभाव में आकर वर्ण बिखेरने लगता है। मूलतः वर्णहीन, यह अलग अलग प्रकार से वर्णित किया जाने लगता है और संसार इसी में भ्रमित बना रहता है। विद्यातंत्र में इन सभी वर्णों से मुक्त होकर अपने ‘अवर्ण स्वरूप’ को जाने की विधियां समझाई गई है। प्रतिदिन इन्हें प्रयुक्त करते हुए अपने अवर्ण स्वरूप से साक्षात्कार किया जा सकता है। इन्हें ‘‘वर्णार्घ्य दान ’’ कहा जाता है। जिसका अर्थ है रंगों के रूप में चिपके हुए सभी संस्कारों को उनके निर्माता को ही दान करते जाना। वैष्णवतंत्र में इस सिद्धान्त को ‘‘हरि’’ शब्द से व्यक्त किया जाता है जिसका अर्थ है ‘‘हरति पापान् इत्यर्थे हरिः’’ अर्थात् जो पापों को हर लेता है वह हरि है। 


Tuesday, 15 March 2022

374 निरुक्तकार ‘‘यास्क’’

  

‘‘वाक्यं रसात्मकं काव्यं’’ यह वेद का कथन नहीं है परन्तु 6 वेदांगों में से एक जिसे ‘निरुक्त’ कहा जाता है, की व्याख्या है। निरुक्त में, वेदों में प्रयुक्त हुए शब्दों की शाब्दिक व्युत्पत्ति के आधार पर व्याख्या की गई है। निरुक्त का जनक ‘‘यास्क’’ को माना जाता है। यास्क ने सरल सूत्रों के अनुसार वैदिक संस्कृत के शब्दों की व्याख्या की है अतः वेदों का सही सही अर्थ जानने के लिये निरुक्त का अध्ययन करना परम आवश्यक है। इसका महत्व ‘पाणिनी’ जैसे व्याकरणाचार्य ने समझाते हुए कहा है कि निरुक्त श्रुति (वेद) के श्रोतृ (कान) हैं। निरुक्त में तीन कांड क्रमशः नैघंटुक, नैगम और दैवत हैं इन्हें 12 अध्यायों में विस्तारित किया गया है।

निरुक्त के अध्याय 2 के 12 वें श्लोक में यास्क का कथन मनन करने योग्य है ‘‘मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन् को न ऋषिर्भवतीति। तेभ्य एतं तर्कऋषिं प्रायच्छन्....’’ अर्थात् वेदार्थ को भली भांति समझने के लिए ‘‘तर्क ऋषि’’ की मदद ली जाना चाहिए क्योंकि अब ऋषियों का उत्क्रमण हो चुका है। अतः तर्क से गवेषणापूर्वक निश्चित किया हुआ  अर्थ ऋषियों के अनुकूल ही होगा। इसी आधार पर स्मृतियों में भी कहा गया है कि ‘‘यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेद नापरः’‘ अर्थात् जो तर्क से  वेदार्थ का अनुसंधान करता है वही धर्म को जानता है दूसरा नहीं।

हमारे देश में बाहर से आकर अपनी जड़ें फैलाते जा रहे कुछ तथाकथित धर्मों का कहना है कि उनके ज्ञाता जो कह रहे हैं वही सत्य है उसे आंख मूंद कर स्वीकार करना चाहिए, उसमें तर्कवितर्क करने की गुंजाइश ही नही है। वे अपने धर्मग्रंथों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि ‘मजहब में अकल का दखल नहीं ’। इससे प्रभावित होकर देश के कुछ लोगों ने यह भी कहना प्रारंभ कर दिया है कि ‘‘ विश्वासे ही फल मिले तर्के बहुदुर ।’’ स्पष्ट है कि ये मतावलंबी, अंधानुकरण करने की प्रेरणा ही देते हैं जिससे उनकी स्वार्थ सिद्धि होती रहे। इसलिए सत्य के अनुसंधान कर्ताओं को ‘‘निरुक्त’’ में की गई व्याख्या के आधार पर प्रत्येक शब्द का अर्थ अपने तर्क, विज्ञान और विवेक के अनुसार ही निर्धारित करना चाहिए। 


Sunday, 13 March 2022

373 अंतर्ज्ञान कालातीत होता है।

 अंतर्ज्ञान कालातीत होता है। 

बुढ़ापे की प्रक्रिया न केवल हाथों  और पैरों को प्रभावित करती है, बल्कि मस्तिष्क सहित पूरे शरीर को भी अपने प्रभाव में ले लेती है। मस्तिष्क  हमारा  मानसिक केंद्र है । यही कारण है कि 50 या 60 साल की आयु पार करने के बाद, आम लोगों की बुद्धि कमजोर पड़ती है। उनकी तंत्रिका कोशिकायें अधिक से अधिक  कमजोर हो जाती हैं। लोग, अपनी स्मृति और मनोवैज्ञानिक संकाय धीरे धीरे एक दिन कम होते जाते हैं और एक दिन  उनके दिमाग भी काम करना बंद कर देते हैं।  यह असाधकों के साथ होता है जब वे बहुत बूढ़े हो जाते हैं। हालांकि, योग साधना करने वालों के मामले में, यह नहीं होता है। परन्तु आपको केवल बुद्धि पर ही निर्भर नहीं होना चाहिए क्योंकि बुद्धि में इतनी  दृढ़ता नहीं होती है। अगर आपके पास भक्ति है, तो अंतर्ज्ञान विकसित होगा और इसके साथ, आप समाज को बेहतर और बेहतर सेवा करने में सक्षम होंगे। 

इसलिए मानसिक क्षेत्र में, भक्त अंतर्ज्ञान पर अधिक निर्भर करते हैं जो  कभी भी क्षय नहीं होता क्योंकि अंतर्ज्ञान ब्रह्मांडीय विचारों पर आधारित होता है। जब मन को सुदृढ़ किया जाता है या उसे सूक्ष्म दृष्टिकोण की ओर निर्देशित किया जाता  है, तो वह  “पुराना हो रहा है“ इसका प्रश्न ही नहीं उठता । मन अपना विस्तार करना जारी रखता है जिससे वह  अधिक तेज और अधिक एकाग्र  होता जाता है परन्तु जो लोग केवल बुद्धि पर निर्भर होते हैं वे बहुत कष्ट पाते हैं। इसका कारण यह है कि बुढ़ापे की शुरुआत से ही  उनका  मानसिक संकाय अधिक से अधिक कमजोर  होता  जाता है जब तक कि उनकी बुद्धि पूरी तरह से नष्ट होने  की संभावना न हो जाय । जो लोग अपने अन्तर्मन से भक्ति कर रहे हैं वे आसानी से परमपुरुष  द्वारा अंतर्ज्ञान पाने का  आशीर्वाद प्राप्त कर लेते  हैं।

अगर किसी ने अपनी युवा अवस्था  से ही उचित साधना की है  और मन को आध्यात्मिक  अभ्यास  में प्रशिक्षण दिया  है तो उसकी  प्राकृतिक प्रवृत्ति परमार्थ  की ओर बढ़ने की हो जाती है।  इस प्रकार  साधना करते हुए  उसे अंतिम सांस तक कोई समस्या आने का कोई प्रश्न नहीं उठता । उनका मन  आसानी से ब्रह्मांडीय लय और  ताल में बह जाएगा और साधना क्रिया स्वाभाविक रूप से सरल होगी । इसके विपरीत यदि कोई कहे कि साधना करना तो बुढ़ापे का कार्य है तो उसे बहुत कठिनाई होगी।


Monday, 14 February 2022

372 अर्जुन का अहंकार


यह तो सभी जानते हैं कि अर्जुन महाभारत का वह पात्र है जिसे महावीर योद्धा और धनुर्विद्या में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यद्यपि उसी के समकालीन कर्ण और एकलव्य धनुर्विद्या में तथा घटोत्कच और बर्वरीक राक्षसी युद्ध विद्या में उससे श्रेष्ठ थे परन्तु तात्कालिक सामाजिक मान्यताओं के कारण अर्जुन को एकपक्षीय लाभ प्राप्त होता रहा। यह ठीक वैसा ही कहा जा सकता है जैसे आज के युग में उत्तम योग्यता धारक किसी सवर्ण का चयन रोककर आरक्षित श्रेणी के अपेक्षतया कम योग्यता धारक युवक का चयन किया जाता है। कर्ण को सूत पुत्र कहकर, एकलव्य को शूद्र कुल का कहकर तथा घटोत्कच और बर्वरीक को राक्षस कुल का कहकर अर्जुन के रास्ते से अलग कर दिया गया। यहांॅ यह स्मरणीय है कि महाभारत युद्ध में अर्जुन पर कर्ण द्वारा चलाए गए अमोघ ब्रह्मास्त्र को घटोत्कच ने अपने ऊपर लेकर अर्जुन के प्राण बचाये और अपना उत्सर्ग किया, बर्वरीक को युद्ध में लड़ने से कृष्ण ने अपनी नीति से न रोका होता तो निश्चय ही वह कौरवों की ओर से लड़ा होता और उसके अकेले लड़ने से ही पांडवों की हार निश्चय थी। जो भी हो, सब कुछ काल के आधीन होता है और तदनुसार ही  प्रकृति परिस्थितियॉं निर्मित करती जाती है।

इससे कुछ लोग पूछ सकते हैं कि ‘फिर अर्जुन के पास वह क्या था जो उपरोक्त महावीरों से पृथक करता है और उसे कृष्ण का प्रिय बनाता है?’ इसमें कोई शक नहीं  कि अर्जुन महावीर महारथी था। कृष्ण ने भी उसका साथ दिया क्योंकि वह धर्मपरायण और निष्पाप था। उपनिषदों में परमपुरुष को अनुभव करने के लिये जिन छः स्थितियों का विवरण मिलता है वे हैं, सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य, सायुज्य, सार्ष्ठी और कैवल्य। कहा जाता है कि इनमें से अर्जुन को ‘सालोक्य’ स्थिति की उत्तम अनुभूति थी जबकि दुर्योधन को बिलकुल नहीं। इसका उदाहरण है, जब कृष्ण को युद्ध का आमंत्रण देने दुर्योधन और अर्जुन दोनों उनके घर पहुंचे तब भले ही कृष्ण ने सोते रहने का बहाना बनाया हो और दुर्योधन पहले आया हो, लेकिन वह उनके सिरहाने बैठा जबकि अर्जुन उसके बाद में आया और कृष्ण के पैरों की ओर बैठा। इस प्रकार जब कृष्ण ने अपनी झूठी निद्रा तोड़ी तो सबसे पहले अर्जुन को और बाद में दुर्योधन को देखा। विद्वान इसे सालोक्य अनुभूति का प्रभाव कहते हैं जो अर्जुन को प्राप्त थी दुर्योधन को नहीं। एक अन्य बात यह भी कि जहॉं अर्जुन को सहजनैतिकता के साथ परमपुरुष की भक्ति का उच्च स्तर प्राप्त था वहीं कर्ण, घटोत्कच या बर्वरीक में सहजनैतिकता होने के बाबजूद भक्ति का स्तर अपेक्षतया कम था।

आध्यात्म के मर्मज्ञ विद्वान कहते हैं कि जब भक्त अपने इष्ट की अनुभूति करने करने लगता है तो वह दूसरे भक्तों से अपने को अधिक श्रेष्ठ मानने की सात्विक भूल कर बैठता है। वह सोचता है कि मेरे  कार्य से भगवान प्रसन्न होते हैं अतः मुझे अपार प्रसन्नता का अनुभव होता है। दार्शनिक इसे ‘रागानुगा भक्ति ’ कहते हैं। जबकि इससे भी श्रेष्ठ मानी गई है ‘रागात्मिका भक्ति’ जिसमें भक्त की यह भावना होती है कि भले ही मुझे कितना ही कष्ट हो, मेरे हर कार्य से मेरे प्रभु प्रसन्न ही हों, उन्हें कोई कष्ट न हो। युद्ध के समाप्त होने और युधिष्ठर के राजकाज सम्हालने के बाद कुछ समय पश्चात् अर्जुन रागानुगा भक्ति के प्रभाव में अहंकारी हो चले तब कृष्ण ने इस दोष को दूर करने के लिए उपाय सोचा। इसका दृष्टान्त यह है कि एक दिन कृष्ण, अर्जुन को छद्मवेश में नगर से दूर घुमाने पैदल ही ले गए। दूर जाते हुए खेत में एक कृषकाय बृद्ध केवल लंगोट पहने परन्तु कमर में तलवार लटकाए, हाथ में टोकनी लिए खेत की कटाई हो चुकने के बाद वहॉं गिरे हुए बीजों को ढूंड़ रहा था। अर्जुन का ध्यान उस पर गया तो उसने कृष्ण से कहा ‘देखो तो, यह जीर्ण देहधारी जो अन्न वस्त्र से बंचित है फिर भी कमर में तलवार लटकाए फिरता है! कृष्ण बोले, चलो उसी से इसका कारण पूछते हैं। अर्जुन ने उस बृद्ध से पूछा, ‘महोदय! आप शरीर से बहुत कमजोर दिखाई देते हैं फिर भी इस तलवार का बोझ क्यों लादे हैं?’ उसने कहा, भैया! अभी मुझे तीन लोगों से बदला लेना है जिसमें यह तलवार ही काम आएगी।’ वे कौन लोग हैं, अर्जुन ने उत्सुकता से पूछा। बृद्ध ने कहा, ‘सबसे पहले अर्जुन जहॉं भी मिलेगा उसे मारना है, फिर द्रोपदी को और फिर सुदामा को’। ‘लेकिन इन बेचारों ने आपका क्या बिगाड़ा है,  अर्जुन ने पूछा। बृद्ध बोला, क्या नहीं बिगाड़ा? अर्जुन ने मेरे प्रभु को सारथी बना कर उनसे घोड़ों की लगाम खिचवाई, उनकी हथेलयों में छाले पड़ गए, मैं यह कैसे सहन कर सकता हॅूं। अच्छा, लेकिन बेचारी द्रोपदी ने तो कुछ नहीं किया, अर्जुन ने फिर पूछा। वह बोला, अरे! उसने तो मेरे प्रभु को उस समय पुकारा जब वह भोजन करने के लिए पहला कौर भी मुंह में नहीं रख पाए, वे भूखे ही उसे मदद करने दौड़ पड़े, क्या उनका कष्ट तुम समझ सकते हो? ठीक है, पर सुदामा तो गरीब ब्राहम्ण भक्त है उसकी क्या गलती है? अर्जुन ने फिर पूछा। बृद्ध बोला, अरे वह मिल जाय तो एक ही बार में उसे दो टुकड़े करना चाहता हॅूं, उसने मेरे प्रभु से अपने पैर धुलवाए, उन्हें नंगे पांव दौड़ते हुए महल के बाहर तक दौड़ाया, उनके पैरों में पड़े छालों का दर्द तुम क्या जानो राहगीर! जाओ मुझे अपना काम करने दो। अर्जुन को उसकी पराभक्ति का आभास हो गया और उच्च स्तर के भक्त होने का दम्भ चूर चूर हो गया। मन ही मन वे कृष्ण को साष्टांग प्रणाम करने लगे।

निष्कर्ष यह कि ज्ञान, विद्या, कौशल और भक्ति यह सभी लगन और अभ्यास पर निर्भर होते हैं जिन पर किसी वर्ग विशेष का विशेषाधिकार नहीं है परन्तु पूर्व काल से ही समाज के एक वर्ग ने दूसरे को यह अवसर नहीं दिया जिससे वे अपना मानसिक और आध्यात्मिक विकास करने से वंचित रह गये।